TO ALL THE FATHERS

कुछ दिन पेहले ट्रैन में एक बच्ची के पापा को उसको अप्पर बर्थ पे चढ़ाने की प्रैक्टिस करवाते हुए देख अपने पुराने दिन याद आ गये थे.

जब सारी लड़किया स्कूटी चलाना सिख रही थी पता नहीं काहा से मुझे बजाज स्कूटर चलाने का शौक आया, शायद घर पर तब वही गाडी मौजूद थी हो सकता है इसलिए. 9th में थी तब मैं.मुझे याद नहीं मैंने पापा से क्या काहा था की उन्होंने सिखने के लिए मना नहीं किया पर वो ग्राउंड याद है जहा स्कूटर सीखी थी. तब धमतरी (छत्तीसगढ़) में रेह्ते थे, वाहा जिस घर में किराये से रहते थे उसके पीछे ही हमारी स्कूल की प्राइमरी बिल्डिंग का ग्राउंड था. घर से वो ग्राउंड साफ़ साफ़ नज़र आता था. रविवार के दिन वही स्कूटर सिखाने ले जाते थे पापा. पेहला रविवार तो याद नहीं क्या किया था जरूर कुछ ध्यान से सीखा नहीं होगा तभी याद नहीं पर दूसरा रविवार बड़े अच्छे से याद है. पापा मुझे ग्राउंड पर स्कूटर चलाना सीखा रहे थे और मम्मी हमारी पड़ोस वाली आंटी के साथ घर की गैलरी से मुझे सीखता हुए देख रही थी . पापा मुझे गाडी का हैंडल सभालना सीखा रहे थे,पेहले उन्होंने खुद गाडी चलाकर दिखाई फिर मेरी बारी थी. स्कूटर स्टार्ट करके पापा ने मेरे हाथ में दी, अपना एक हाथ उन्होंने स्कूटर के पीछे पकड़ा दूसरा सामने हैंडल पर. धीरे धीरे मैं स्कूटर चला रही थी जब थोड़ा बैलेंस समझा पापा ने हैंडल से अपना हाथ हटाया और बस स्कूटर के पीछे से सपोर्ट दे रहे थे. ग्राउंड में गोल गोल स्कूटर घुमा रही थी, एक दो बार पीछे मुड़कर देखा तो पापा पीछे से गाडी को पकडे हुए दिखे. एक दो चक्कर घुमाने के बाद बड़ा कॉन्फिडेंस आया और मैं चिल्लाने लगी “डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो ना ” कुछ जवाब नहीं आया तो पीछे मुड़कर देखा पापा तो बड़ी दूर खड़े थे, मुड़कर देखने के बाद जवाब मिला मैं तो कबसे छोड़ चूका हु तू ही चला रही है. फिर क्या पूरा धमतरी घूमती थी अपनी स्कूटर पे, मम्मी को मार्किट ले जाना, टूशन लेकर जाना,. पेट्रोल पंप पर तो पेट्रोल डालने से पहले स्कूटर और मुझे पूरा टटोल कर देखते थे “इतनी सी लड़की इतनी बड़ी स्कूटर” फिर कही पेट्रोल डालते थे. मज़ा आता था.

स्कूटर का साथ कुछ महीनो का ही रहा. पापा की नागपुर ट्रांसफर हो गयी, स्कूटर उन्होंने धमतरी में बेच दी और नागपुर में हाथ में काइनेटिक थमा दी गयी. स्कूटर वाला मज़ा इस गाडी में नहीं था पर स्कूटर मिले ये होना नहीं था.12th में फिर शौक आया होण्डा स्प्लेंडर सिखने का भाई और सोनल दादा ने मिलकर सिखाई वो बोहोत चलाने का मौका नहीं मिला, स्कूटी दी हुयी थी मुझे अलग से और उसके बाद तो पुणे चली गयी थी हॉस्टल. आज जब अकेले अपनी वेगो लेकर भारत दर्शन करती हुयी दिखती हु तो कुछ जाने कुछ अनजाने लोग ये सवाल पूछ लेते है की तुम्हारे घर वालो को तुमने खुदपर कॉन्फिडेंस दिलाया कैसे, जवाब इसका मुझे भी नहीं पता. मैं उन्हें बताने लगती हु बचपन से ही ऐसा था, मुझे कभी मेरे पापा ने नहीं बताया की लड़किया ये नहीं कर सकती या वो नहीं कर सकती. घर में दो लड़के है, मेरे दो छोटे भाई पर उनसे ज्यादा मुझे ही सिखाया गया कराटे सीखा,कत्थक सीखा, क्रिकेट में अलग दिलचस्पी हुआ करती थी तब, तो स्टेट टीम सिलेक्शन के लिए गयी,टेबल टेनिस स्टेट लेवल पर खेला, लड़को के साथ ग्राउंड पर फुटबॉल खेला, डांस में स्कूल में नाम कमाया,पिकनिक जाने के लिए याद नहीं कभी कोई रोक टोक हुई हो,ग्रेजुएशन में जब हॉस्टल में रहती थी तब कॉलेज ट्रिप की परमिशन के लिए कॉल किया था, तो जवाब मिला था ” अब इतनी बड़ी तो हो ही गयी है की अपने डिसिशन खुद ले सके, क्या सही है क्या गलत हर बात मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है” . पर इसमें लोगो को अपने सवाल का जवाब नहीं मिल पाता ” ये सब के लिए भी कही उनका कॉन्फिडेंस जीता होगा”. अब ये तो मुझे नहीं पता कब कहा कैसे मैंने ऐसा क्या किया और उनका कॉन्फिडेंस जीता, पर ये उनके ही कॉन्फिडेंस का नतीजा है की आज मैं इस मुकाम पर हु उन्होंने मुझे कभी डरना नहीं सिखाया, उन्होंने मुझे नहीं बताया की यहाँ जाने से पुलिस पकड़ लेगी, या कोई बाबा आ जायेगा या भूत ले जायेगा. आज भले ही वो थोड़ा डर जाते है,कभी कभी मेरे लड़की होने की याद भी दिला देते है,समाज की हालत देखकर और हो रहे घटनाओ की वजह से, पर बचपन की कुछ आदते इतनी आसानी से नहीं छूट ती और उसमे से एक आदत पापा ने सिखाई थी निडरता. आज जो भी मुझमे है उनकी ही देन है।

ट्रैन में भी उस बच्ची को उसके पापा बस बर्थ पर चढ़ना नहीं तो अपने डर पर जित पाना सीखा रहे थे. काश की सभी पापा अपनी बच्चियों को भी यही सिखाये ” बेटा बिना डरे लड़ना जमके लड़ना अपने हर उस डर से लड़ना जो तुम्हे कमजोर बनाये,जो तुम्हे अपना हक़ ना लेने दे,आगे बढ़ने ना दे और जीने की आज़ादी न दे,लड़ना अपने सपनो के लिए बिना हिचकिचाए, बनाना अपनी खुद की एक अलग पहचान खुदका एक अलग नाम,ना हो कोई साथ और हो खुद पे विश्वास की गलत तुम हो नहीं,तो लड़ना अकेले अपने उस विश्वास के लिए, लड़ना तुम आज की फिर लड़ना न पढ़े आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान,अपने अधिकार, अपने नाम,अपनी हिफाजत, अपने सपनो के लिए “.

Water Army

05/06/2017

जितना खूबसूरत आज का दिन था उस से कही ज्यादा खूबसूरत थी आज की शाम. शाम को नवाज़ा गया मुझे एक बोहोत बड़े पुरुस्कार से, वो पुरुस्कार मिला इसी साल चौथी और नवी कक्षा में प्रवेश किये हुए बच्चो से. पुरुस्कार मुझे घोषित कल ही कर दिया था इन्होने,मुझे पता बस आज चला जब शाम को ७ बजे मैं विहार के एंट्रेंस पर पोहोची. गाडी बस लगा ही रही थी और आर्या की आवाज़ आयी- क्या टाइमिंग है आपकी, आर्या के साथ साथ थे मिक्की और तनिष्क. अब आप पूछेंगे ये कौन तो ये है मेरी “वाटर आर्मी” के 3 जवान. जवान और भी है आर्मी में पर आज ये 3 ही थे.

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तनिष्क पेड़ो को पानी डालते हुए

गाडी मैंने खड़ी की हेलमेट निकाला और गाडी पे रखा हुआ पौधा उठाने झुकी ही थी की पौधा मिक्की ने अपने हाथ में ले लिया और हेलमेट आर्या, ये दोनों ही 4th में. अंदर जाकर गार्डन एरिया में हमने पौधा रखा और चालू हो गयी आर्या की बड़बड़ ” अरे दीदी आपको पता है क्या कल मिक्की ने क्या किया, कल ना अकेला ही डब्बे ( 5 लीटर के 2 कैन) लेकर हैंडपंप पर गया और पेड़ो को अकेले ही इसने पानी डाला” मैं थोड़ा चौक गयी. रोज़ हम ना तो मिक्की को हैंडपंप मारने देते है ना ही डब्बे उठाने क्युकी बाकी बच्चो से वो थोड़ा नाजुक और नखरे वाला है. कल सुबह 7 बजे से जो वृक्षारोपण के लिए बहार निकली थी तो सीधा शाम को 5 बजे घर पोहोची जिसकी वजह से थकान थी थोड़ी, अब जब ये इन बच्चो को बताया तो बोलते है ” आप थकते भी हो”. पहली बार सुन रहे है हम आपसे, आप कितना कुछ करते हो राइड पे जाते हो, ऑफिस भी करते हो पेड़ भी लगाते हो, पानी भी डालते हो,क्रिकेट भी खेलते हो इनकी छोटी सी दुनिया की मैं सुपरवूमन.

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और हम मैच जीत गए

ऑफिस से आकर जैसे ही मैं इन्हे ग्राउंड पर आते हुए दिखती हु तुरंत “दीदी आयी दीदी आयी” करके दौड़कर पास आते है और साथ में विहार चलते है कैन उठाने. इनसे मिलने के बाद मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं जब मैंने हैंडपंप चलाया हो या कैन खाली हो या भरी उठायी हु. तनिष्क मुझे करने ही नहीं देता, पंप को हाथ भी लगाया तो “दीदी आप ऑफिस से आये हो,थक गए रहोगे, मैं करता हु ना, आर्या दीदी को मत करने दे उन्हें मत थका”. पानी भी वही डालते है और जब क्रिकेट खेलने का टाइम होता है तो रनर आर्या बन जाता है, पैर की चोट के बारे में उन्हें पता है तो पैर के पास बॉल आयी भी तो “दीदी लगी तो नहीं,सॉरी दीदी”. थकान की वजह से कल पानी डालने के लिए लेट पोहोची तब ये बच्चे वाहा थे नहीं और मेरी हालत जवाब दे चुकी थी इसलिए वापस चली गयी.फिर आज पता चला की पानी तो दिया गया था और वह भी अकेले बस छोटे से मिक्की ने.आज लगा की मुझे ”आउटस्टैंडिंग एचीवर अवार्ड” देना सफल हुआ.

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सकाळ ग्रुप का मुझे दिया गया अवार्ड

कल मैं विहार में नहीं थी उन्हें बताने के लिए की पेड़ में पानी डालना और ना ही मैंने कोई उनकी ड्यूटी लगा रखी है पानी डालने की ना ही कोई जबरदस्ती पर फिर भी जो काम वो मेरे होते हुए बड़े जोश के साथ करते है मेरे ना होते हुए भी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया. और बड़ी इम्मान्दारी से मुझे ये भी बताया गया की दीदी ये दो पेड़ो को पानी नहीं दे पाया. आज उनसे पूछा भी अगर मैं नहीं रही फिर भी पानी डालोगे तुम लोग तो जवाब एक साथ सबने हां में ही दिया.आज भी जब एंट्रेंस पर हम मिले तो इन बच्चो की तैयारी पानी डालने जाने के लिए ही हो रही थी. ये बच्चे जुड़े भी मेरे काम से अपने मन से ही, मुझे रोज़ पेड़ लगाते हुए देखते थे आकर एक दिन मदद कर दी और तब से हमारी रोज़ की मुलाकात. ख़ुशी से ज्यादा गर्व हो रहा है खुद पर की कुछ अच्छे बदलाव मैं इन बच्चो में ला पायी बिना जबरदस्ती के.

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आओ पेड़ लगाए

किसीने मुझे कल ही सिखाया है अपनी छोटी से छोटी ख़ुशी लोगो से शेयर करनी चाहिए इसलिए नहीं की आप खुश हो पर इसलिए भी की उन्हें अच्छा लगेगा की आपने उन्हें अपनी ख़ुशी में शामिल किया. और फिर मैं तो खुश भी हु और गर्व भी महसूस कर रही हु.

शुरुआत हुई थी हर रविवार एक पेड़ लगाने से पर पता नहीं था इतने लोग और इतने रिश्ते जुड़ते चले जायेंगे इस सफर में. वाटर आर्मी के बाकि जवानो की कहानी भी बोहोत जल्दी लिखूंगी. वैसे बता दू हमारी सबसे छोटी जवान हाल ही में पहली कक्षा में गयी है.

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सबसे छोटी  चार्मी

India-The Other Side

आज tripoto पर एक सवाल देखा  “I am not sure about travelling Solo  in India. Can anyone suggest some safe destinations” और उस पर कुछ लोगो के जवाब थे की “भारत सुरक्षित नहीं  है,मैं खुद अपने लोगो के बिच सुरक्षित मेहसूस नहीं करती “. इस सच को झुटलाया नहीं जा सकता पर ये पूरा सच भी तो नहीं है. एक भारत वो भी तो है जहा अकेली लड़की को मौका  नहीं बल्कि  जिम्मेदारी समझकर रक्षा की जाती है. अगर आप सोच रहे होंगे की ये बस कहने, सुन ने, लिखने में ही अच्छा लगता है तो आइये आपको मिलवाती हु भारत के दूसरे पहलु से. इस भारत से मेरी मुलाकात हुई जब अकेली लड़की होते हुए मैंने भारत भ्रमण करने का सोचा इस जिज्ञासा के साथ के चलो अपने लोगो का जाने पेहचाने, तो शुरू से शुरुआत करती हु-

मेरा पहला सोलो ट्रिप दिल्ली अमृतसर- सच्च बताऊ तो बोहोत डरी हुई थी पर जब दिल्ली पोहोची हुमायूँ  के मकबरे पर सुबह  टहलने आयी एक आंटी ने मुझे अकेला देखकर बड़ी उत्सुकता से सवाल पूछा अकेले आये हो और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला जिसमे था कुछ इतिहास भी. अकेला बिलकुल मुझे लगा ही नहीं. दिल्ली की यात्रा ख़तम कर मैं पोहोची अमृतसर, सुबह 4 बजे गोल्डन टेम्पल जाना था तो सुबह के 3.30 बजे मैंने रस्ते से ऑटो पकड़ा सुरक्षित गोल्डन टेम्पल पोहोची  और गोल्डन टेम्पल से वाघा बॉर्डर के लिए भी ऑटो, शर्मा जी का ऑटो था वो. खूब बाते हुयी उनसे उनके परिवार के बारे में मेरे परिवार के बारे में. वो आस्चर्यचकित हो रहे थे की मेरे घरवालों ने मुझे अकेले इतनी दूर भेज दिया.”दीदी मेरी  3 बेहने है पर ना कभी वो हिम्मत कर पायी अकेले कही जाने की ना हमारी हिम्मत हो पायी उन्हें अकेला भेजने की”. मुझे कोई मंदिर देखना होता तो खुद मुझे दरवाज़े तक छोड़कर आते “दीदी हम है आपके साथ कोई परेशानी न होने देंगे”. फिर वाघा बॉर्डर पर मुलाकात हुई  कोलकता के एक परिवार से और आज भी उनके साथ मैं संपर्क में हु.जब कोलकाता जाने का प्लान बना और दादा भाभी को खबर पोहोचाई उनकी ख़ुशी तो पूछिए मत ” आपको हमारे घर पर ही रहना है, अच्छा आप चिकन और फिश खाते है ना”.

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Humayun Tomb Delhi

मेरी वाराणसी से रीवा की राइड– रीवा जाते हुए मैंने अल्लाहाबाद का रास्ता ले
लिया, अल्लाहाबाद तक तो सब ठीक रहा पर मुश्किल शुरू हुई उसके बाद. एक तो रास्ता बड़ा ख़राब शाम के 6 बज चुके थे 130 km और जाना था और गाडी थी मोपेड. रास्ते का काम चालू था सफ़ेद मिट्टी में गाडी फसे जा रही थी मुश्किल से चल रही थी मोपेड और रास्ता सही है गलत समझ नहीं रहा, तभी सामने एक रीवा के नंबर प्लेट की गाडी दिखी,मैं समझ गयी की ये भी रीवा जा रहे है हो ली मैं उनके पीछे पीछे. कुछ दूर तक तो पीछे चली फिर अचानक से उन्होंने अपनी गाडी मोड़ ली दूसरे रस्ते पर, मैंने जब बिच में रूककर लोगो से पूछा था तब मुझे बताया गया था की आपको बिलकुल सीधा सीधा जाना है. मुझे लगा हो सकता है उन्हें कही और जाना हो और मैं चली सीधा सीधा. रात हो चुकी थी,सीधा चलते चलते मैं ऐसी जगह जा फसी जहा रास्ता ही ख़तम हो गया था. रास्ते पर कोई लाइट नहीं और किसी से पूछ सकू ऐसा कोई इंसान भी नहीं. डरकर बस रोना ही बाकि था की पीछे से आवाज़ आयी अरे आप तो गलत रास्ते आ गयी,मैंने वाहा से गाडी मोड़ ली थी क्युकी वो रास्ता अच्छा था. मुझे लगा आप पीछे आ जाएगी, आप नहीं दिखी तो मैं आ गया आपको देखने अब साथ ही चलिएगा. 100 km का सफर हम दोनों ने साथ में तय किया उनकी बाइक और मेरी मोपेड. सुनसान रस्ते कोई कुछ कर ले तो खबर भी ना मिले ऐसे,बिच में बारिश भी मिली हम ढाबे पर रुके नाश्ता किया और 10 बजे हम रीवा पोहोचे बिलकुल सही सलामत. वाहा से मैं अपने होटल और वो अपने घर. आज भी हम संपर्क में है.

मेरी कन्याकुमारी राइड– कन्याकुमारी से कुछ 117 km पेहले मेरी मोपेड ख़राब हो गयी ख़राब हुई इंडस्ट्रियल एरिया में और किस्मत से एक इंडस्ट्री के सामने. गाडी स्टार्ट तो हो रही थी पर आगे नहीं बढ़ रही थी. इंडसट्री के गार्ड को समझा की कोई परेशानी जरूर है. वो देखने आये पर दिक्कत ऐसी की ना उन्हें हिंदी समझ रही थी ना इंग्लिश. उन्होंने और दो लोगो को बुलाया की कम से कम वो गाडी की परेशानी समझे पर ना वो गाडी की परेशानी   समझ पा रहे थे और ना मेरी भाषा.ऐसा करते करते लोग जमा होते चले गए और फिर आये उनके मेंटेनेंस मैनेजर उन्हें हिंदी इंग्लिश समझ रही थी पर गाडी की परेशानी नहीं. उन्होंने पेहले मुझे TVS को कॉल करने लगाया जब TVS से मदद नहीं मिल पायी तो उन्होंने अपने पहचान वाले मैकेनिक को कॉल लगाया और आने के लिए कहा, कॉल कट हुआ ही था की उनके कंपनी का एक वर्कर आया जिसे हिंदी भी आती थी इंग्लिश समजती थी और जिन्होंने गाडी की प्रॉब्लम भी पता लगा ली. उन्होंने तुरंत मैकेनिक को कॉल करके परेशानी बताई और हो पायेगा ठीक या नहीं पूछा जवाब हां ही था. जब ये सब लोग मिलके मेरी परेशानी का हल ढूंढ रहे थे मैं बैठकर कॉफ़ी पि रही थी “मैडम आप बैठ जाइये Have कॉफ़ी”. कुछ  देर बाद मैकेनिक आया मैंटेनस मैनेजर  उनके साथ गाडी को धक्का  देकर लेकर  गए और मुझे कार से वर्कशॉप तक छोड़ा गया. जब तक गाडी ठीक नहीं हो जाती मैनेजर मेरे साथ रहे तिरुनेलवेल्ली तक गाडी उन्होंने खुद चलायी और वाहा से 90 km दूर कन्याकुमारी का सफर रात को 11.30 बजे मैंने पूरा किया.

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Kanyakumari

अनुभव ऐसे और भी है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, बिना जान पहचान किसी ने बस युही रोटी खिला दी तो किसीने चाय पीला दी, मेरा फ़ोन बंद पड़ा तो कॉल के लिए मदद कर दी. एक किताब लिख दी जाए अनुभव इतने है, लिखूंगी उनके बारे में भी पर एक एक कर कर . आज जितने अनुभव लिखे है उम्मीद है उसमे आपको भारत के दूसरे पहलु की झलकियां जरूर दिखी होगी  . आप अगर मेरी नज़र से भारत पूछेंगे तो मैं बस यही कहूँगी “हां थोड़ा बुरा तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” थोड़ा नज़र बदलकर देखिये और एक बार हिम्मत कर कर देखिये. टीवी, पेपर, सोशल मीडिया इसके परे भी एक सच्च बस्ता है जो आप खुद अपने अनुभवों से जान और समझ सकते है. हर अनुभव अच्छा होगा जरुरी नहीं पर उसके डर से घर से बहार निकलना तो छोड़ा नहीं जा सकता, लड़ना नहीं सिखेंगें तो देश बदलेंगे कैसे,जीतेंगे कैसे. आपकी कमज़ोरी ही किसी और की ताकत बनती है, आप किसे ताकतवर देखना चाहते है तय आपको करना होगा.

Kaalu

इनसे मिलिए ये है कालू. कालू से हम मिले कळसूबाई पीक  की नाईट ट्रेक पर कळसूबाई बोले तो महाराष्ट्र का एवेरेस्ट. हम हमारे गाइड के साथ निकले पीक के लिए और ये जनाब हमारे पीछे पीछे, थे ये गाइड के पेहचान वाले ही. 15 min ही हुए थे हमे शुरुवात किये हुए की गाइड को याद आया वो अपना फ़ोन शायद गाओं में ही भूल गए है. हमने कहा उनसे आप जाइये आपका फ़ोन लेकर आइये हम यही रुकते है. गाइड तो चले गए हमे लगा था कालू जनाब भी चले जायेंगे, पर नहीं ये बैठे रहे हमारे साथ हमारे बाजू में ही जब तक गाइड आये नहीं. गाइड आने के बाद शुरू की हमने फिर आगे की चढाई और कालू जी हमारे साथ साथ. हमे तो हिम्मत क्या ही देते ये खुद ही इतने डरपोक की थोड़ी भी आवाज़ हुई नहीं की हमारे पैरो के पास आ जाते. कालू ने तो कई बार हमे ही आजु बाजु छान बिन करने को मजबूर कर दिया था की कही कोई है तो नहीं. था कोई नहीं ये युही होशियार बने जा रहे थे. कुछ सुबह 3 बजे हम कळसूबाई टॉप से कुछ 10 min पेहले कुछ हॉटेल्स जाहा रात को रुका जा सकता है वहा पोहोचे. वाहा हमारे गाइड का भी एक होटल था जहा उन्होंने हमारे सोने का इंतज़ाम कर दिया. सुबह कुछ 6 बजे हम टॉप पर जाने के लिए निकले , इस बार गाइड साथ नहीं आने वाले थे क्युकी उन्हें नाश्ते चाय की तैयारी करनी थी ट्रेक के लिए आये और आने वाले बाकि लोगो के लिए भी. Saturday Sunday होने की वजह से काफी लोग ट्रेक के लिए आते है  तब  ऑफ सीजन में भी बिज़नेस इनका अच्छा  हो  जाता है. गाइड नहीं भी साथ आये तो भी कालू जनाब हमारे साथ साथ कळसूबाई टॉप चढ़े, जब तक हम वाहा रुके ये भी हमारे साथ और निचे उतरना चालू किया तो  भी हमारे पीछे पीछे ही. ट्रेक के लिए आये हुए एक ग्रुप के किसी मेमबर ने कमेंट भी किया ये आपके साथ साथ  आया है,हर किसीके साथ आते नहीं ये.

घर पर  कोई पालतू जानवर कभी रहा नहीं तो लोग जो इतना कहते है  कुत्ते आपके सबसे अच्छे दोस्त होते है, निष्ठावान होते है ये सब कभी महसूस करने मिला ही नहीं. फिर कालू से मिलकर समझा की लोग जो भी केहते है सच्च ही है. हमने तो कालू को एक बिस्किट भी नहीं खिलाया था,फिर भी वो हमारे साथ रहा. हर ट्रिप में अलग अलग लोगो से रिश्ते बनाये, वो रिश्ते बने उन लोगो से बात करके कुछ अपने बारे में बताकर कुछ उनके बारे में जानकार और फिर इस ट्रिप में बना ये एक अनोखा रिश्ता सारे रिश्तो से अलग, जहा ना कुछ बताने की जरुरत पड़ी ना कुछ जान ने की. उम्मीद है जब कभी अगली बार कळसूबाई गयी कालू इसी तरह हमारे साथ चलेगा.

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Kaalu

My India Green India

Almost everyday people discuss about environmental issues on different mediums and also really want to contribute to solve the issues but somehow fail to take out time from their hectic schedule. We understand your problem hence we will help you.

HOW : We are starting an initiative “Mera India Green India”. On any of your special occasion (Birthday’s, Anniversaries, Valentines,First Salary anything) give us a call,tell us which tree and how many trees you want to plant and we will do it for you. Buying saplings from nursery,selection of location (unless you want it in some specific place), plantation,maintenance of trees will be taken care by us. We will give your name to that tree/trees. You just need to pay for the service and sapling.So from next time instead of giving an excuse give us a call. Make your special day memorable and special for the world 😊

For Mumbai, Nikesh Jilthe : 90 96 133400
Nagpur, Snehal Wankhede : 9930322101

Last year on environment day 05.06.2016 we had taken a pledge to do plantation every Sunday and till now 47 Sunday’s are completed.

Friend’s this time only All the Best will not work,we will also need your support which starts by spreading the message. Share this with your friends family colleagues and enemies too even are part  of the Mother Earth.

#SaveEnvironment #MeraIndiaGreenIndia #TreePlantation #India #Joinhands #payback

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Pehli Iftari aur Chasme ka Paani (पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी)

IMAG090630 जून 2016 की वो शाम, हलकी सी ठण्ड और कारगिल के एक होटल का वो बरामदा.

तोशिब : आ गए आप कारगिल देखकर,कैसा लगा आपको हमारा कारगिल, यकीन हुआ आपको की पाकिस्तान भी दिखता है यहाँ से.

मैं : मज़ा आया कुछ नए लोगो से भी मिली, नमकीन चाय भी पि. अच्छा खाना  कहा अच्छा मिल जायेगा यहाँ

तोशिब: मैडम इफ्तारी खायी है आपने कभी

मैं :नहीं आज तक तो नहीं खायी

तोशिब: अच्छा खाना पसंद करेंगी आप, घर से शाम में आने ही वाली है आपके लिए भी मंगवा देते है

मैं :हां चलेगा

तोशिब: तो आप फ्रेश हो जाइये जैसे ही इफ्तारी आती है मैं आपको बुलाने आ जाऊंगा

पेहचान  इनसे तब तक बस इतनी थी की कुछ दो घंटे पेहले इनके होटल में रूम बुक किया था. रूम बुक करने में मदद मिली थी २ राइडर्स की, जो बस राह चलते युही मिल गए थे. मुझे कुछ समझ नहीं रहा था की कारगिल में कहा ठहरा जाये तो इन दोनों राइडर्स की मदद ले ली थी. होटल के सामने ही था तोशिब का जनरल स्टोर्स. होटल और जनरल स्टोर्स दोनों ही सँभालने की जिम्मेदारी तोशिब  पर. २ घंटे की पहचान में बात हमने की थी बस १५ min, तोशिब ने मेरी मदद की थी मेरे वेगो पर बंधे सामान को निकालकर रूम तक पोहोचाने में और फिर कारगिल में क्या देखा जा सकता है ये बताने में. जब कारगिल देखकर वापस लौटी तो पता नहीं था अपनी पहली इफ्तारी खाने का मौका मिलेगा

रूम पर जैसी ही पोहोची थकान की वजह से नींद आ गयी. दो तीन बार दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़ आयी पर नींद से उठकर दरवाज़ा खोलने की इच्छा ना हुयी. और आख़िरकार उठकर जब घडी देखि तो ८ बज चुके थे. उठकर फ्रेश होती की फिर से दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़. तोशिब  खाना खाने बुलाने आया था. १० min बाद जब निचे दुकान पर पोहोची तो पता चला मेरे इंतज़ार में तोशिब ने रोज़ा नहीं तोडा है. आप मेहमान है आपके पेहले मैं कैसे खा लेता. दुकान पर तोशिब के अलावा और एक उनके पहचान वाले जिनका टूर्स एंड ट्रेवल्स का बिज़नस था वो भी मौजूद थे. हमारी बात चित शुरू हो उसके पेहले तोशिब  ने जमीन पर ही मेरे बैठने के लिए एक चटाई बिछाई, थैले में से सब्ज़ी मेरे सामने रखी और फिर वही थैला मेरे सामने रखकर उस पर रोटी रख दी.

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इफ्तारी

और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला. दुकान पर मौजूद मेहमान मुझे लेह में रुकने के लिए अलग अलग होटल बता रहे थे. तोशिब के हाव भाव से मुझे समझ आ रहा था की मैंने उनकी बातो में ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. और बिच में ही होटल के टोपीक को रोककर तोशिब ने पूछा मैडम आपने कभी चश्मे का पानी पिया है, बोहोत ही मीठा पानी होता है और मिनरल वाटर से भी अच्छा. मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की आखिर चश्मे का पानी होता क्या है. और तोशिब उसका हिंदी शब्द ढूंढ नहीं पा रहा था.  तभी हमारे 3 की मेहफिल में आये एक और शक्श रात के 8 बजे के अँधेरे और सनाटे को चीरते हुए. नाम तो उनका  याद नहीं पर ये थे तोशिब के  बचपन के दोस्त. इन्होंने अपनी SBI PO की नौकरी छोड़ स्कूल में टीचर बन ना पसंद किया. कह रहे थे नहीं होता मैडम इतना काम हमसे जाने का समय तो था आने का नहीं, लाइफ भी तो कोई चीज़ है. वो नौकरी ही किस काम की जिसके चलते सुकून से शाम को दोस्तों के साथ वक़्त ही न बिताने मिले,छोड़ दी मैंने नौकरी. काश मेरे लिए भी इतना ही आसान होता नौकरी छोड़ पाना.

और इन शख्स ने बताया मुझे चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. उस पानी से मीठा और स्वाद वाला पानी मैंने आज तक नहीं पिया है,प्राकृतिक ठंडा पानी. बातो का काफिला फिर थोड़ा और आगे बढ़ा. मैडम मेरे दोस्त का भी पास ही में होटल है, रात को वाहा कैंपिंग भी होती है. मैडम अभी धुप है तो हम सब्ज़िया सुखाकर रख देते है ताकि ठण्ड में खा सके. वरना तो बस दाल उबालकर खाओ ऐसा लगता है पेट में पूरी दाल दाल ही हो गयी है. रास्ते सभी बंद हो जाते है बर्फ की वजह से तो कुछ मिलना भी मुश्किल. बड़ी मुश्किल से निकलती है ठण्ड,कुछ काम भी नहीं मिलता.

कारगिल के उस जनरल स्टोर में जमीन पर चटाई पर बैठी हुई मैं अकेली इन दोनों लड़को की बाते सुन रही थी. रास्ते पर लड़की तो दूर की बात है पर कोई इंसान भी उस समय मौजूद नहीं था. बस कुछ कुत्तो के भौकने की आवाज़.फिर भी जितना महफूज मैं अपने घर पर बैठकर खुदको मेहसूस करती उतना ही महफूज मुझे वाहा लग रहा था. घर से दूर भी कुछ घर जैसा लग रहा था. ना तो कोई डर था ना ही कोई हिचक और ना शंका. होना भी शायद लाजमी ना था क्योंकि फॉर्मेलिटी कम और अपनापन ज्यादा था,एक रिस्पेक्ट थी. रिस्पेक्ट अपने काम के लिए,अपने मेहमान के लिए,अपनी संस्कृति के लिए. वो काफी था मुझे विश्वास दिलाने के लिए. कारगिल के उस शहर की वो दिखने में तो साधारण दावत पर मुझसे पूछा जाये तो ऐसी दावत के लिए किसी 5 सितारा होटल की दावत छोड़ने का मलाल न होगा. वाहा होता है एक दिखावा सजावट का काटे छुरी का टेबल चेयर का क्रोकेरी  का अंग्रेजी का किसको प्रभावित करने का यहाँ था बस अपनापन.ना कोई ढोंग ना कोई दिखावा बस सादगी और सरल  निश्छल  मन. अगर ये खूबसूरती साथ हो तो किसी और श्रृंगार की क्या कीमत.

बाते कुछ और भी होती पर दूसरे दिन जल्दी निकलना था इसलिए बातो का सिलिसिला वही ख़तम करना पड़ा . दूसरे दिन तोशिब ने सामान गाडी पर बाँधने में मेरी मदद की और दुआ के साथ “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगे” अलविदा किया. वो इफ्तारी और चश्मे का पानी थी मेरी ईदी जो ईद के पेहले ही नसीब हो गयी थी.लौटूंगी शायद फिर कभी कारगिल, परिंदो की तरह.