Pehli Iftari aur Chasme ka Paani (पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी)

IMAG090630 जून 2016 की वो शाम, हलकी सी ठण्ड और कारगिल के एक होटल का वो बरामदा.

तोशिब : आ गए आप कारगिल देखकर,कैसा लगा आपको हमारा कारगिल, यकीन हुआ आपको की पाकिस्तान भी दिखता है यहाँ से.

मैं : मज़ा आया कुछ नए लोगो से भी मिली, नमकीन चाय भी पि. अच्छा खाना  कहा अच्छा मिल जायेगा यहाँ

तोशिब: मैडम इफ्तारी खायी है आपने कभी

मैं :नहीं आज तक तो नहीं खायी

तोशिब: अच्छा खाना पसंद करेंगी आप, घर से शाम में आने ही वाली है आपके लिए भी मंगवा देते है

मैं :हां चलेगा

तोशिब: तो आप फ्रेश हो जाइये जैसे ही इफ्तारी आती है मैं आपको बुलाने आ जाऊंगा

पेहचान  इनसे तब तक बस इतनी थी की कुछ दो घंटे पेहले इनके होटल में रूम बुक किया था. रूम बुक करने में मदद मिली थी २ राइडर्स की, जो बस राह चलते युही मिल गए थे. मुझे कुछ समझ नहीं रहा था की कारगिल में कहा ठहरा जाये तो इन दोनों राइडर्स की मदद ले ली थी. होटल के सामने ही था तोशिब का जनरल स्टोर्स. होटल और जनरल स्टोर्स दोनों ही सँभालने की जिम्मेदारी तोशिब  पर. २ घंटे की पहचान में बात हमने की थी बस १५ min, तोशिब ने मेरी मदद की थी मेरे वेगो पर बंधे सामान को निकालकर रूम तक पोहोचाने में और फिर कारगिल में क्या देखा जा सकता है ये बताने में. जब कारगिल देखकर वापस लौटी तो पता नहीं था अपनी पहली इफ्तारी खाने का मौका मिलेगा

रूम पर जैसी ही पोहोची थकान की वजह से नींद आ गयी. दो तीन बार दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़ आयी पर नींद से उठकर दरवाज़ा खोलने की इच्छा ना हुयी. और आख़िरकार उठकर जब घडी देखि तो ८ बज चुके थे. उठकर फ्रेश होती की फिर से दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़. तोशिब  खाना खाने बुलाने आया था. १० min बाद जब निचे दुकान पर पोहोची तो पता चला मेरे इंतज़ार में तोशिब ने रोज़ा नहीं तोडा है. आप मेहमान है आपके पेहले मैं कैसे खा लेता. दुकान पर तोशिब के अलावा और एक उनके पहचान वाले जिनका टूर्स एंड ट्रेवल्स का बिज़नस था वो भी मौजूद थे. हमारी बात चित शुरू हो उसके पेहले तोशिब  ने जमीन पर ही मेरे बैठने के लिए एक चटाई बिछाई, थैले में से सब्ज़ी मेरे सामने रखी और फिर वही थैला मेरे सामने रखकर उस पर रोटी रख दी.

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इफ्तारी

और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला. दुकान पर मौजूद मेहमान मुझे लेह में रुकने के लिए अलग अलग होटल बता रहे थे. तोशिब के हाव भाव से मुझे समझ आ रहा था की मैंने उनकी बातो में ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. और बिच में ही होटल के टोपीक को रोककर तोशिब ने पूछा मैडम आपने कभी चश्मे का पानी पिया है, बोहोत ही मीठा पानी होता है और मिनरल वाटर से भी अच्छा. मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की आखिर चश्मे का पानी होता क्या है. और तोशिब उसका हिंदी शब्द ढूंढ नहीं पा रहा था.  तभी हमारे 3 की मेहफिल में आये एक और शक्श रात के 8 बजे के अँधेरे और सनाटे को चीरते हुए. नाम तो उनका  याद नहीं पर ये थे तोशिब के  बचपन के दोस्त. इन्होंने अपनी SBI PO की नौकरी छोड़ स्कूल में टीचर बन ना पसंद किया. कह रहे थे नहीं होता मैडम इतना काम हमसे जाने का समय तो था आने का नहीं, लाइफ भी तो कोई चीज़ है. वो नौकरी ही किस काम की जिसके चलते सुकून से शाम को दोस्तों के साथ वक़्त ही न बिताने मिले,छोड़ दी मैंने नौकरी. काश मेरे लिए भी इतना ही आसान होता नौकरी छोड़ पाना.

और इन शख्स ने बताया मुझे चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. उस पानी से मीठा और स्वाद वाला पानी मैंने आज तक नहीं पिया है,प्राकृतिक ठंडा पानी. बातो का काफिला फिर थोड़ा और आगे बढ़ा. मैडम मेरे दोस्त का भी पास ही में होटल है, रात को वाहा कैंपिंग भी होती है. मैडम अभी धुप है तो हम सब्ज़िया सुखाकर रख देते है ताकि ठण्ड में खा सके. वरना तो बस दाल उबालकर खाओ ऐसा लगता है पेट में पूरी दाल दाल ही हो गयी है. रास्ते सभी बंद हो जाते है बर्फ की वजह से तो कुछ मिलना भी मुश्किल. बड़ी मुश्किल से निकलती है ठण्ड,कुछ काम भी नहीं मिलता.

कारगिल के उस जनरल स्टोर में जमीन पर चटाई पर बैठी हुई मैं अकेली इन दोनों लड़को की बाते सुन रही थी. रास्ते पर लड़की तो दूर की बात है पर कोई इंसान भी उस समय मौजूद नहीं था. बस कुछ कुत्तो के भौकने की आवाज़.फिर भी जितना महफूज मैं अपने घर पर बैठकर खुदको मेहसूस करती उतना ही महफूज मुझे वाहा लग रहा था. घर से दूर भी कुछ घर जैसा लग रहा था. ना तो कोई डर था ना ही कोई हिचक और ना शंका. होना भी शायद लाजमी ना था क्योंकि फॉर्मेलिटी कम और अपनापन ज्यादा था,एक रिस्पेक्ट थी. रिस्पेक्ट अपने काम के लिए,अपने मेहमान के लिए,अपनी संस्कृति के लिए. वो काफी था मुझे विश्वास दिलाने के लिए. कारगिल के उस शहर की वो दिखने में तो साधारण दावत पर मुझसे पूछा जाये तो ऐसी दावत के लिए किसी 5 सितारा होटल की दावत छोड़ने का मलाल न होगा. वाहा होता है एक दिखावा सजावट का काटे छुरी का टेबल चेयर का क्रोकेरी  का अंग्रेजी का किसको प्रभावित करने का यहाँ था बस अपनापन.ना कोई ढोंग ना कोई दिखावा बस सादगी और सरल  निश्छल  मन. अगर ये खूबसूरती साथ हो तो किसी और श्रृंगार की क्या कीमत.

बाते कुछ और भी होती पर दूसरे दिन जल्दी निकलना था इसलिए बातो का सिलिसिला वही ख़तम करना पड़ा . दूसरे दिन तोशिब ने सामान गाडी पर बाँधने में मेरी मदद की और दुआ के साथ “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगे” अलविदा किया. वो इफ्तारी और चश्मे का पानी थी मेरी ईदी जो ईद के पेहले ही नसीब हो गयी थी.लौटूंगी शायद फिर कभी कारगिल, परिंदो की तरह.

युथ सेन्टर (Youth Center)

कुछ रिश्ते बनाते बनाते जहा पूरी ज़िन्दगी निकल जाती है वही कुछ रिश्ते बस एक मुस्कुराहट से ही बन जाते है. ऐसा ही कुछ प्यारा सा रिश्ता बना मेरा झाँसी से १६ km दूर बसे ओरछा गांव के बच्चो से.यु तो ओरछा में कई आकर्षण है पर मुझे जिसने सबसे ज्यादा आकर्षित किया वह है वाहा का “युथ सेन्टर” और वाहा के बच्चे. जितने मासूम ये बच्चे है उतने ही अनुशाषित भी. इस युथ सेण्टर की शुरुआत की फ्रेंड्स ऑफ़ ओरछा की आशा डिसूज़ा ने जो अल्मोड़ा,उत्तराखंड की निवासी है. जहा युथ सेन्टर की शुरुआत इन्होंने की उसे सँभालते ओरछा के होम स्टे के होस्ट के बच्चे है. आशा डिसूज़ा महीने में एक बार आकर नए नए गेम्स लाकर देती है और बच्चो को सिखाकर भी जाती है. उसके अलावा युथ सेन्टर में योगदान रहता है होम स्टे में रुके हुए मेहमानों का जो दुनियाभर से आते है और इन्हें कुछ नया सीखा जाते है.

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Wall Painting
युथ सेंन्टर खुलने का निर्धारित समय है दोपहर के ३ से ४ जिसमे करीब २० से २५ बच्चो के नाम रजिस्टर्ड है. इसे खोलने की जिम्मेदारी किसी टीचर मेंटर या गाइड की नहीं तो युथ सेन्टर की ही एक बच्ची खुशि जो ५ वि कक्षा में पढ़ती है उसे दी गयी है. गुरुवार जो की छुट्टी का दिन निर्धारित है उस दिन छोड़कर बाकि दिन अपने समय पर ये युथ सेन्टर खोल दिया जाता है. बिना अपनी ख़ुशी दीदी से परमिशन लिए ये बच्चे अंदर नहीं आते, अंदर आते ही गुड आफ्टरनून विश करते है .ये है सारे हमउम्र ही पर उस एक घंटे के लिए ख़ुशी दीदी उनकी टीचर बन जाती है जिसे वे बिना किसी जबरदस्ती और कोई न देख रहा हो तो भी आदर देना जानते है. अंदर आकर बिना कोई शोर किये बच्चे अपने लिए गेम्स सेलेक्ट करते है. गेम्स भी ऐसे जो उन्हें कुछ सिखाये जैसे मास्टरमाइंड पजल फिर कुछ देर इंग्लिश सीखते है और थोड़े आउटडोर गेम जैसे फोर बॉक्स और हर संडे ड्राइंग.

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Spider Man Puzzle जिसमे थोड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन मेरा भी है 😉

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और काऊ की हैडलाइन पर ड्राइंग फ्लैग की

जहा उनका अनुशाषण ईमानदारी देखकर मैं अचम्भे में थी उतनी ही हैरानियत हुई उनकी बाते सुनकर.जब मैंने उनसे उनके सपनो के बारे में पूछा तो जवाब मिले पेंटर,नेवी,आर्मी,कलेक्टर और जो मेरा फेवरेट जवाब था मुझे ना पैसे कमाकर अमेरिका अफ्रीका घूमना है दुनिया देखनी है :). और फिर जब बात चली की स्कूल में पढाई के अलावा आप लोग और किन एक्टिविटीज में भाग लेते हो तो एक जवाब आया मैडम मुझे न डांस करना बोहोत पसंद  है और इस बार २६ जनवरी को पार्टिसिपेट भी करना था. पर ड्रेस लेने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे तो मैं नहीं कर पाया. इस पर मैं कुछ बोलू उसके पेह्ले ख़ुशी और बाकि बच्चो ने ही बोलना चालू कर दिया. अरे तो हर बार जरूरी थोड़ी है की नयी ड्रेस ली जाये अपने दोस्तों से भी तो ली जा सकती है. मुझे भी “बुमरो बुमरो” डांस में ड्रेस की जरुरत पड़ी थी तब मैंने अपने दीदी से ड्रेस ले लिया था. और पैसे हम भी तो बचा सकते है,अगर कोई रिश्तेदार या हमारे घर आये  मेहमान पैसे देकर जाते है तो जमा करके रखना चाहिये. फिर जब कभी जरुरत पड़े तो उसी में से निकाल सकते है. अगर कभी मम्मी पापा को पैसो को लेकर टेंशन हो तो उन्हें भी मदद कर सकते है,बिना ये सोचे की ये बस हमारे पैसे है. मैंने १३०० रूपए जमा कर लिए थे उसमे से ५०० की मैंने ड्रेस खरीद ली अपने लिए और ८०० अभी भी बाकि है,तुम भी ऐसे कर सकते हो.

इन बच्चो की समझदारी बस इतनी ही नहीं तो जहा आधी दुनिया धर्म के नाम पर लड़ती है वही ये सभी धर्म का आदर भी करना जानते है. बाहर खेलते खेलते किसीने “अल्लाह हु अकबर ” बड़ी ही मस्ती में गाना शुरू किया और उसी मस्ती में सारे बच्चे वैसे ही गाने लगे.2 ही सेकंड हुए होंगे की सब रुक गए और खुद ही सबने  सॉरी बोल दिया ये कहकर की “ये किसीके धर्म का गाना है उसका मजाक  नहीं उड़ाना चाहिए अगली बार हम ऐसा नहीं करेंगे”. खेलने के बाद इनका समय ख़तम होता है अटेंडेंस के बाद ही.

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Four Square

फक्र हो रहा था इन बच्चो से मिलकर। जहां शहर के बच्चो को देखकर हमेशा एक सोच में पढ़ जाती हु की कहा खो गया है इनका बचपन, वही उस छोटे से गाँव के कुछ बच्चो को देखकर फिर बच्चा बन जाने की इच्छा जाग उठी. ख़ुशी हो रही थी ये देखकर की आज भी ऐसा बचपन कही जिन्दा है. युथ सेन्टर पर जाकर मेरी कोशिश चालू थी की इन्हें कुछ नया सिखाकर जाऊ. पर हुआ कुछ उल्टा दो दिन के उस एक एक घंटे ने मुझे  ही बोहोत कुछ सीखा दिया. उन छोटे बच्चो को देखकर लगा था इन्हें कुछ समझदारी की बाते सिखाकर जाउंगी पर मेरी समझदारी की बाते जाहा किताबो से निकालकर आयी होती वही उनकी समझदारी जिंदगी को जीकर आ रही थी.इसलिए निदा फाजली कहेते है की

घटाओ में निकलो धुप में नहाकर देखो

ज़िन्दगी क्या है किताबो को हटाकर देखो

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बच्चो की गैंग
अगर कभी ओरछा जाये तो अपना कुछ समय इस युथ सेन्टर में जरूर बिताये.उन बच्चो के लिए नहीं तो अपने लिए,कुछ नया जरूर सीखकर आएंगे.