TO ALL THE FATHERS

कुछ दिन पेहले ट्रैन में एक बच्ची के पापा को उसको अप्पर बर्थ पे चढ़ाने की प्रैक्टिस करवाते हुए देख अपने पुराने दिन याद आ गये थे.

जब सारी लड़किया स्कूटी चलाना सिख रही थी पता नहीं काहा से मुझे बजाज स्कूटर चलाने का शौक आया, शायद घर पर तब वही गाडी मौजूद थी हो सकता है इसलिए. 9th में थी तब मैं.मुझे याद नहीं मैंने पापा से क्या काहा था की उन्होंने सिखने के लिए मना नहीं किया पर वो ग्राउंड याद है जहा स्कूटर सीखी थी. तब धमतरी (छत्तीसगढ़) में रेह्ते थे, वाहा जिस घर में किराये से रहते थे उसके पीछे ही हमारी स्कूल की प्राइमरी बिल्डिंग का ग्राउंड था. घर से वो ग्राउंड साफ़ साफ़ नज़र आता था. रविवार के दिन वही स्कूटर सिखाने ले जाते थे पापा. पेहला रविवार तो याद नहीं क्या किया था जरूर कुछ ध्यान से सीखा नहीं होगा तभी याद नहीं पर दूसरा रविवार बड़े अच्छे से याद है. पापा मुझे ग्राउंड पर स्कूटर चलाना सीखा रहे थे और मम्मी हमारी पड़ोस वाली आंटी के साथ घर की गैलरी से मुझे सीखता हुए देख रही थी . पापा मुझे गाडी का हैंडल सभालना सीखा रहे थे,पेहले उन्होंने खुद गाडी चलाकर दिखाई फिर मेरी बारी थी. स्कूटर स्टार्ट करके पापा ने मेरे हाथ में दी, अपना एक हाथ उन्होंने स्कूटर के पीछे पकड़ा दूसरा सामने हैंडल पर. धीरे धीरे मैं स्कूटर चला रही थी जब थोड़ा बैलेंस समझा पापा ने हैंडल से अपना हाथ हटाया और बस स्कूटर के पीछे से सपोर्ट दे रहे थे. ग्राउंड में गोल गोल स्कूटर घुमा रही थी, एक दो बार पीछे मुड़कर देखा तो पापा पीछे से गाडी को पकडे हुए दिखे. एक दो चक्कर घुमाने के बाद बड़ा कॉन्फिडेंस आया और मैं चिल्लाने लगी “डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो ना ” कुछ जवाब नहीं आया तो पीछे मुड़कर देखा पापा तो बड़ी दूर खड़े थे, मुड़कर देखने के बाद जवाब मिला मैं तो कबसे छोड़ चूका हु तू ही चला रही है. फिर क्या पूरा धमतरी घूमती थी अपनी स्कूटर पे, मम्मी को मार्किट ले जाना, टूशन लेकर जाना,. पेट्रोल पंप पर तो पेट्रोल डालने से पहले स्कूटर और मुझे पूरा टटोल कर देखते थे “इतनी सी लड़की इतनी बड़ी स्कूटर” फिर कही पेट्रोल डालते थे. मज़ा आता था.

स्कूटर का साथ कुछ महीनो का ही रहा. पापा की नागपुर ट्रांसफर हो गयी, स्कूटर उन्होंने धमतरी में बेच दी और नागपुर में हाथ में काइनेटिक थमा दी गयी. स्कूटर वाला मज़ा इस गाडी में नहीं था पर स्कूटर मिले ये होना नहीं था.12th में फिर शौक आया होण्डा स्प्लेंडर सिखने का भाई और सोनल दादा ने मिलकर सिखाई वो बोहोत चलाने का मौका नहीं मिला, स्कूटी दी हुयी थी मुझे अलग से और उसके बाद तो पुणे चली गयी थी हॉस्टल. आज जब अकेले अपनी वेगो लेकर भारत दर्शन करती हुयी दिखती हु तो कुछ जाने कुछ अनजाने लोग ये सवाल पूछ लेते है की तुम्हारे घर वालो को तुमने खुदपर कॉन्फिडेंस दिलाया कैसे, जवाब इसका मुझे भी नहीं पता. मैं उन्हें बताने लगती हु बचपन से ही ऐसा था, मुझे कभी मेरे पापा ने नहीं बताया की लड़किया ये नहीं कर सकती या वो नहीं कर सकती. घर में दो लड़के है, मेरे दो छोटे भाई पर उनसे ज्यादा मुझे ही सिखाया गया कराटे सीखा,कत्थक सीखा, क्रिकेट में अलग दिलचस्पी हुआ करती थी तब, तो स्टेट टीम सिलेक्शन के लिए गयी,टेबल टेनिस स्टेट लेवल पर खेला, लड़को के साथ ग्राउंड पर फुटबॉल खेला, डांस में स्कूल में नाम कमाया,पिकनिक जाने के लिए याद नहीं कभी कोई रोक टोक हुई हो,ग्रेजुएशन में जब हॉस्टल में रहती थी तब कॉलेज ट्रिप की परमिशन के लिए कॉल किया था, तो जवाब मिला था ” अब इतनी बड़ी तो हो ही गयी है की अपने डिसिशन खुद ले सके, क्या सही है क्या गलत हर बात मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है” . पर इसमें लोगो को अपने सवाल का जवाब नहीं मिल पाता ” ये सब के लिए भी कही उनका कॉन्फिडेंस जीता होगा”. अब ये तो मुझे नहीं पता कब कहा कैसे मैंने ऐसा क्या किया और उनका कॉन्फिडेंस जीता, पर ये उनके ही कॉन्फिडेंस का नतीजा है की आज मैं इस मुकाम पर हु उन्होंने मुझे कभी डरना नहीं सिखाया, उन्होंने मुझे नहीं बताया की यहाँ जाने से पुलिस पकड़ लेगी, या कोई बाबा आ जायेगा या भूत ले जायेगा. आज भले ही वो थोड़ा डर जाते है,कभी कभी मेरे लड़की होने की याद भी दिला देते है,समाज की हालत देखकर और हो रहे घटनाओ की वजह से, पर बचपन की कुछ आदते इतनी आसानी से नहीं छूट ती और उसमे से एक आदत पापा ने सिखाई थी निडरता. आज जो भी मुझमे है उनकी ही देन है।

ट्रैन में भी उस बच्ची को उसके पापा बस बर्थ पर चढ़ना नहीं तो अपने डर पर जित पाना सीखा रहे थे. काश की सभी पापा अपनी बच्चियों को भी यही सिखाये ” बेटा बिना डरे लड़ना जमके लड़ना अपने हर उस डर से लड़ना जो तुम्हे कमजोर बनाये,जो तुम्हे अपना हक़ ना लेने दे,आगे बढ़ने ना दे और जीने की आज़ादी न दे,लड़ना अपने सपनो के लिए बिना हिचकिचाए, बनाना अपनी खुद की एक अलग पहचान खुदका एक अलग नाम,ना हो कोई साथ और हो खुद पे विश्वास की गलत तुम हो नहीं,तो लड़ना अकेले अपने उस विश्वास के लिए, लड़ना तुम आज की फिर लड़ना न पढ़े आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान,अपने अधिकार, अपने नाम,अपनी हिफाजत, अपने सपनो के लिए “.

Water Army

05/06/2017

जितना खूबसूरत आज का दिन था उस से कही ज्यादा खूबसूरत थी आज की शाम. शाम को नवाज़ा गया मुझे एक बोहोत बड़े पुरुस्कार से, वो पुरुस्कार मिला इसी साल चौथी और नवी कक्षा में प्रवेश किये हुए बच्चो से. पुरुस्कार मुझे घोषित कल ही कर दिया था इन्होने,मुझे पता बस आज चला जब शाम को ७ बजे मैं विहार के एंट्रेंस पर पोहोची. गाडी बस लगा ही रही थी और आर्या की आवाज़ आयी- क्या टाइमिंग है आपकी, आर्या के साथ साथ थे मिक्की और तनिष्क. अब आप पूछेंगे ये कौन तो ये है मेरी “वाटर आर्मी” के 3 जवान. जवान और भी है आर्मी में पर आज ये 3 ही थे.

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तनिष्क पेड़ो को पानी डालते हुए

गाडी मैंने खड़ी की हेलमेट निकाला और गाडी पे रखा हुआ पौधा उठाने झुकी ही थी की पौधा मिक्की ने अपने हाथ में ले लिया और हेलमेट आर्या, ये दोनों ही 4th में. अंदर जाकर गार्डन एरिया में हमने पौधा रखा और चालू हो गयी आर्या की बड़बड़ ” अरे दीदी आपको पता है क्या कल मिक्की ने क्या किया, कल ना अकेला ही डब्बे ( 5 लीटर के 2 कैन) लेकर हैंडपंप पर गया और पेड़ो को अकेले ही इसने पानी डाला” मैं थोड़ा चौक गयी. रोज़ हम ना तो मिक्की को हैंडपंप मारने देते है ना ही डब्बे उठाने क्युकी बाकी बच्चो से वो थोड़ा नाजुक और नखरे वाला है. कल सुबह 7 बजे से जो वृक्षारोपण के लिए बहार निकली थी तो सीधा शाम को 5 बजे घर पोहोची जिसकी वजह से थकान थी थोड़ी, अब जब ये इन बच्चो को बताया तो बोलते है ” आप थकते भी हो”. पहली बार सुन रहे है हम आपसे, आप कितना कुछ करते हो राइड पे जाते हो, ऑफिस भी करते हो पेड़ भी लगाते हो, पानी भी डालते हो,क्रिकेट भी खेलते हो इनकी छोटी सी दुनिया की मैं सुपरवूमन.

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और हम मैच जीत गए

ऑफिस से आकर जैसे ही मैं इन्हे ग्राउंड पर आते हुए दिखती हु तुरंत “दीदी आयी दीदी आयी” करके दौड़कर पास आते है और साथ में विहार चलते है कैन उठाने. इनसे मिलने के बाद मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं जब मैंने हैंडपंप चलाया हो या कैन खाली हो या भरी उठायी हु. तनिष्क मुझे करने ही नहीं देता, पंप को हाथ भी लगाया तो “दीदी आप ऑफिस से आये हो,थक गए रहोगे, मैं करता हु ना, आर्या दीदी को मत करने दे उन्हें मत थका”. पानी भी वही डालते है और जब क्रिकेट खेलने का टाइम होता है तो रनर आर्या बन जाता है, पैर की चोट के बारे में उन्हें पता है तो पैर के पास बॉल आयी भी तो “दीदी लगी तो नहीं,सॉरी दीदी”. थकान की वजह से कल पानी डालने के लिए लेट पोहोची तब ये बच्चे वाहा थे नहीं और मेरी हालत जवाब दे चुकी थी इसलिए वापस चली गयी.फिर आज पता चला की पानी तो दिया गया था और वह भी अकेले बस छोटे से मिक्की ने.आज लगा की मुझे ”आउटस्टैंडिंग एचीवर अवार्ड” देना सफल हुआ.

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सकाळ ग्रुप का मुझे दिया गया अवार्ड

कल मैं विहार में नहीं थी उन्हें बताने के लिए की पेड़ में पानी डालना और ना ही मैंने कोई उनकी ड्यूटी लगा रखी है पानी डालने की ना ही कोई जबरदस्ती पर फिर भी जो काम वो मेरे होते हुए बड़े जोश के साथ करते है मेरे ना होते हुए भी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया. और बड़ी इम्मान्दारी से मुझे ये भी बताया गया की दीदी ये दो पेड़ो को पानी नहीं दे पाया. आज उनसे पूछा भी अगर मैं नहीं रही फिर भी पानी डालोगे तुम लोग तो जवाब एक साथ सबने हां में ही दिया.आज भी जब एंट्रेंस पर हम मिले तो इन बच्चो की तैयारी पानी डालने जाने के लिए ही हो रही थी. ये बच्चे जुड़े भी मेरे काम से अपने मन से ही, मुझे रोज़ पेड़ लगाते हुए देखते थे आकर एक दिन मदद कर दी और तब से हमारी रोज़ की मुलाकात. ख़ुशी से ज्यादा गर्व हो रहा है खुद पर की कुछ अच्छे बदलाव मैं इन बच्चो में ला पायी बिना जबरदस्ती के.

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आओ पेड़ लगाए

किसीने मुझे कल ही सिखाया है अपनी छोटी से छोटी ख़ुशी लोगो से शेयर करनी चाहिए इसलिए नहीं की आप खुश हो पर इसलिए भी की उन्हें अच्छा लगेगा की आपने उन्हें अपनी ख़ुशी में शामिल किया. और फिर मैं तो खुश भी हु और गर्व भी महसूस कर रही हु.

शुरुआत हुई थी हर रविवार एक पेड़ लगाने से पर पता नहीं था इतने लोग और इतने रिश्ते जुड़ते चले जायेंगे इस सफर में. वाटर आर्मी के बाकि जवानो की कहानी भी बोहोत जल्दी लिखूंगी. वैसे बता दू हमारी सबसे छोटी जवान हाल ही में पहली कक्षा में गयी है.

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सबसे छोटी  चार्मी