पेहला पड़ाव

रास्ता सफर और ज़िन्दगी.लेह लददाख के उस सफर में ना तो रास्ता आसान न तो वाहा तक पोहोचने का सफर और ज़िन्दगी की तो अपनी एक अलग ही लड़ाई चली आ रही है बरसो से. पर सब अगर आसान होता तो रोमांच कहा रह जाता और मुश्किलें चाहे जितनी भी आये जब आप कुछ करने की ठान ही लेते है तो रास्ता तो कुदरत खुद ही बना देती है. मई 2016 जब अपने एक दोस्त के फ़ोन कॉल पर मैंने तय कर लिया था की मैं लददाख जा रही हु,बस ज़िद्द इतनी थी की जाउंगी तो अपने वेगो पर ही. मेरी मोपेड वेगो को वादा था मेरा उसे खारदुंगला टॉप जो की दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता माना जाता है, 18380 feet वाहा ले जाना. दोस्त ने काफी समझाने की कोशिश की “वेगो नहीं चल पायेगी वाहा” पर वादा किया था तो निभाना भी था और पता भी करना था आखिर क्या है ये लददाख का पागलपन और क्यों वेगो नहीं चल सकती. अभी तक कश्मीर, उसकी वादियाँ, वहा का डर,लेह तक जाने वाला मुश्किल रास्ता और आने वाली मुश्किलों के बारे में बस सुन रखा था पर अब खुद जाने का तय किया था,डर लग रहा था. कई सवाल थे मन में क्या मैं सही में तैयार हु ये करने के लिए? क्या मैंने अपने दोस्तों की बात मान लेनी चाइये वेगो से ना जाने की ? क्या मैं ये कर पाऊँगी?. अपने डर और सवाल के जवाबो के लिए व्हाट्सप्प किया मेरे मार्गदर्शक डॉ अमित निकम ये खुद 3 बार लेह जा चुके है और 8 साल से राइडिंग कर रहे है. मुझे पता था इनसे बेहतर मुझे और कोई सही तरीके से नहीं समझा पायेगा. मेरी पेहले की राइड्स में भी इनका काफी सपोर्ट रहा था. उठाया फ़ोन किया मैसेज “खारदुंगला जाना है वेगो से” जवाब था जाओ. आत्मविश्वास जैसे सातवे आसमान पर था, अमित ने कह दिया मतलब तो पक्का वेगो जाएगी खारदुंगला. उसके बाद काफी सारी बाते, क्या तैयारी लगेगी, कैसे है वाहा के रास्ते,काहा काहा ज्यादा दिक्कते आ सकती है,साथ में क्या क्या रखना होगा, मुश्किल आयी तो किस से मदद ले सकती हु, गाडी में क्या क्या ध्यान देना होगा और उन सबके पहले क्युकी गाडी अभी तक किसी ऊंचाई पर नहीं चढ़ी थी तो मुझे सुझाव दिया गया- गाडी का टेस्ट पचमारी के धूपगढ़ पर चढ़ाकर. धूपगढ़ मध्य भारत की सबसे ऊँची जगह है. मई महीने के अंत तक ये सुझाव का पालन भी कर लिया था मैंने और गाडी में क्या क्या ठीक करना होगा ये भी समझ आ गया था.

 

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Wego at Dhupgarh

गाडी की तैयारी तो समझ आ गयी थी अब बारी थी खुदके तैयारी की. लददाख का मौसम,ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी इन बातो के लिए भी खुदको तैयार करना था. तो तय हुआ की शारीरिक रूप से तैयार होने के लिए ज़ुम्बा लगाया जाये. मई के आखरी हफ्ते में शुरू हुई जुम्बा क्लासेज.मेरा ऑफिस नागपुर से कुछ 85 km की दुरी पर है,10.30 बजे ऑफिस का समय होता है तो 8 बजे घर से निकल जाना होता था,आधे दिन मैं ऑफिस इसलिए नहीं जाती थी क्युकी सुबह 7 बजे उठने से ज्यादा मुश्किल काम मुझे कोई और लगता नहीं था. जहा मुझे 7 बजे उठना जान पे आता था वही जुम्बा की क्लास ही 7 बजे शुरू होती थी मतलब सुबह 6-6.30 की बिच उठना होता था. ऑफिस के लिए घरवाले 7 बजे से 10 बार आवाज़े देकर हार जाते थे तब कही मैं 7.30 तक उठती थी. पर यकीन मानिये उस एक महीने बिना किसीके आवाज़ लगाए मैं खुद अपनी मर्ज़ी से 6 बजे उठकर 15 min पहले क्लास पोहोचति थी ताकि डंबल्स, थोड़ा वार्म उप करने का टाइम मिल जाये. 7 से 7.45 तक ज़ुम्बा फिर भागे भागे घर आती थी 15 min में तैयारी कर निकल जाती थी अपने ऑफिस की बस पकड़ने. फिट बनने की लिए डाइट भी जरुरी थी तो भागादौड़ी में दूध पीकर निकल जाती थी और नाश्ते से लेकर खाने का डब्बा साथ ले जाती थी. जिस लड़की को फल किसी जहर से कम नहीं लगता था उसने दिन में 3 बार फल खाना शुरू किया, खाने का महत्त्व भी कम ही था जिंदगी में इसलिए 40 kg के ऊपर बढ़ना मुश्किल हो रखा था पर बस उस खारदुंगला राइड के लिए हर 2 घंटे में खाना शुरू रहता था और वह भी बिलकुल समय पे. सुबह 8.30 बजे बस में अंडा, फल, ऑफिस पोहोचकर 10-10.15 के बिच नाश्ता,12.30 बजे फिर फल,2.30 बजे खाना , शाम 5 बजे केला और रात 9 बजे तक खाना. सारी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी कई सपने रचे जा रहे थे.और असर ये था की एक दिन ऑफिस जाते जाते बस में सोच रही थी खारदुंगला पोहोचने के बाद की ख़ुशी के बारे में और बस आँखों का पानी रोके नहीं रुक रहा था,टप टप पानी बहे जा रहा है,आँखों में एक चमक है और होटो पे मुस्कान, आसुओ को रोकना ही था वरना बस के लोग पागल समझ लेते. डूब चुकी थी मैं पूरी तरीके से उस सपने में,जीने लगी थी सपने का हर लम्हा अपनी तैयारी के साथ. तैयारी का असर भी अच्छा ही आया था, एक महीने में 40 kg से में 42 पर पोहोच गयी थी.

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Koshish mat kijiye isme weight nahi samjhega 😛

गाडी और खुदकी तैयारी तो जोरो पर चालू थी और उतने ही जोरो पर चालू थी मेरे घरवालों की हर वह कोशिश जिस से की मैं खारदुंगला ना पोहोच पाउ.

11 जून 2016 मम्मी पापा की शादी की सालगिरह का दिन, जिसे मना ने के लिए मौजूद थी 3 फॅमिली कुल 3 आंटी मम्मी पापा सोनल दादा और मैं. जश्न उसे कहना बिलकुल ही गलत है क्युकी उस दिन तो जंग लड़ी गयी थी बस तलवारे नहीं थी. जंग में मेरी तरफ थी मैं और दादा और दूसरी तरफ परिवार. मुश्किल था उनसे लड़ना उन्हें समझाना, TVS Scooty Pep की Ad में खारदुंगला और वाहा के रास्ते देखकर उन्होंने मुझे पूछा था ” जिन्दा आएगी तू”, जायज़ थी उनकी हर चिंता, चिंता ख़राब सड़क की, चिंता सड़क पर मिलने वाले लोगो की, की रेप हो जाएगा, वही भारत परोसा जाता है रोज़ टीवी और अखबारों में वही उनके लिए पूरा सच भी था, चिंता थी उन्हें की क्यों इतने फिजूलखर्ची करनी है,चिंता थी उन्हें क्या हासिल कर लेगी वाहा जाकर, क्यों ये ज़िद्द और क्यों ये सपना, वेगो ही क्यों, चिंता की क्या ये सही में वापस फिर हमे मिलेगी. मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं, मैंने थोड़ी फाइट मारी और फिर सोनल दादा का सपोर्ट उनके समझाने का तरीका उसके आगे मान ही गए. 5 घंटे में शांति प्रिय तरीके से जंग ख़तम हो ही गयी कुछ गीले शिकवे बाकी थे वो भी दूर होने ही थे.

गाडी की तैयारी खुद की तैयारी और घरवालों की तैयारी इन सब तैयारियों के बिच आखिर वह दिन आ ही गया 23 जून 2016 जब सुबह सुबह मैं पोहोची रेलवे स्टेशन अपनी गाडी दिल्ली पार्सल करवाने. गाडी पार्सल करने वालो को तो इतनी मिन्नतें “भैया ध्यान से पैक कीजिये, गाडी का ध्यान रखिये, अपना सबकुछ दे रही हु मैं आपको, गाडी को कुछ होना नहीं चाइये,बोहोत लम्बा सफर ये तय कर चुकी है और बोहोत लम्बा सफर तय करना है इसे”. गाडी हुई पार्सल, एक और काम ख़तम. फिर हुई 24 जून 2016 की सुबह, सुबह 7 बजे रोज़ के ही जैसे जुम्बा क्लास पोहोची,7.45 को क्लास से निकलने से पेहले अपनी दोस्त को मिलने गयी, की निकल रही हु मैं आज शाम को दिल्ली,कुछ अलग फीलिंग थी तब कुछ छूट रहा हो जैसे, कुछ डर भी, कुछ अलग बस पर जाना तो था ही. शाम को बैठी मैं दिल्ली की गाडी में और आख़िरकार शुरू हुआ मेरे सपनो का सफर…..

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Wego at Delhi Railway Station

उत्सुकता बनाये रखिये सफर थोड़ा लम्बा है, धीरे धीरे तय करेंगे. आगे का सफर अगली पोस्ट मे…..

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