पड़ाव दूसरा


साथ चलता है मेरे दुवाओ का काफिला, और ऐसी ही एक दुआ ने असर दिखाया 25 जून 2016 को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर. 25 को शुरू होने वाला था मेरा दिल्ली से लद्दाख तक का सफर. 25 को दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे नागपुर से पार्सल की हुई मेरी वेगो लेनी थी. 25 को सुबह अपना बड़ा सा रकसैक, एक बैग,हेलमेट और जैकेट लेकर मैं ट्रैन से उतरी. मैं एक अकेली और सामान इतना सारा, सामान लेकर पोहोची मैं प्लेटफार्म के पार्सल ऑफिस में. ऑफिस में 2 लोग मौजूद थे,उनमे से एक का नाम था मनोज . मुझे देखकर पहले तो शॉक ही लगा उन्हें,पतली दुबली सी लड़की इतने सारे सामान से लदी हुई और जून की गर्मी से पूरा पसीना पसीना. मैडम सामान रख दीजिये निचे और पहले आराम से बैठकर पानी पीजिये. सामान निचे रखकर कुछ देर मैं बैठी फिर उन्हें रिसिप्ट दिखाई. रिसिप्ट देखकर उन्होंने मुझे प्लेटफार्म के दूसरे पार्सल ऑफिस जाने के लिए कहा. मुझे दोनों ने सामान वही रखने के लिए कहा पर मैंने सोचा की जब गाडी वही से उठानी है तो फिर यहाँ वापस आकर फायदा नहीं इसलिए सामान लेकर ही मैं चल पड़ी प्लेटफार्म की दूसरी और. गलती बस इतनी कर दी की और आधे रस्ते पोहोचकर मैंने किसी और से पार्सल ऑफिस पूछ लिया और उन्होंने मुझे दूसरा रास्ता बता दिया ,उनका कहा हुआ मानकर मैं पोहोच गयी प्लेटफार्म 1 मेन पार्सल ऑफिस, वाहा अपनी गाडी के बारे में पूछा जवाब मिला यहाँ कोई गाडी नहीं है. पहले ही गर्मी इतनी ज्यादा और जवाब ये मिला तो मौसम के पारे से ज्यादा चढ़ गया मेरे दिमाग का पारा. गुस्से गुस्से में निकली मैं फिर से वापस दोनों से मिलने, ऑफिस के बहार पोहोच ही रही थी की दोनों ताला लगते हुए बहार मिल गए “अरे मैडम हमने तो आपको इसी प्लेटफार्म के आखिर में जो ऑफिस है वाहा जाने के लिए कहा था आप कहा चली गयी थी”. अब गुस्सा खुद पे आ रहा था, एक ही जगह के इतने सारे सामान के साथ 3 चक्कर. चलिए मैडम हम आपको ले चलते है, दोनों मेरे साथ ही ऑफिस तक चले मेरी रिसिप्ट की जाँच करवाई और गाडी लेने को कहा. दूसरी मुसीबत ऐसी की गाडी पूरी पैक और पेट्रोल 0. मैडम आप ले जाएँगी अकेली गाडी,सामान काहा रखेंगी,कोई साथ में हो तो बुला लो किसीको. साथ में तो कोई था नहीं,ये उन्हें भी बताया. अच्छा तो हम आपको प्लेटफार्म के दूसरे कोने तक छोड़ देते है वाहा से आप चला लीजियेगा गाडी और उस रस्ते निकल जाइएगा. अब हम पोहोचे दूसरे कोने तो फिर मनोज जी कहते है पर अब आप वाहा तक भी कैसे जाएँगी,रुकिए मैं पेट्रोल यही मंगवा देता हु. घुमाया उन्होंने एक फ़ोन और पेट्रोल लेकर आने के लिए कह दिया. पेट्रोल लाने के लिए आधे घंटे का समय लगने वाला था तो दोनों मेरे साथ ही पूरा समय धुप में खड़े रहे कहते हुए”जब आप धुप में खड़ी रह सकती है फिर हम तो राजस्थान से आये है”. आधे पौन घंटे बाद पेट्रोल आया अब समस्या थी गाडी पैक है, उसके लिए भी उन्होंने इंतज़ाम करवाया गाडी में पेट्रोल डाला मुझसे बिना पैसे लिए हुए और उस पर आगे भी जरुरत पड़े दिल्ली से गाडी नागपुर भेजनी हो तो बताइयेगा हम करवा देंगे,हमारा नंबर रख लीजिये. लद्दाख सफर का पहला पड़ाव था दिल्ली और उसकी इतनी अच्छी शुरुआत होगी ये मैंने सोचा नहीं था. दिल्ली शहर में बिना मतलब मदद मिल जाना ही अपने आप में अजूबा सा लगता है कुछ लोगो को क्युकी सुनाया ही कुछ ऐसा जाता है दिल्ली के बारे में,पर दिल्ली के मामले में भी मेरी किस्मत बुलंद ही रही है,इनसे मेरी पेहचान बस 5 min की ही थी और ये मदद के लिए आगे आ गए और आज भी बैंक के काम को लेकर कभी कोई दिक्कत हो तो कॉल कर लेते है. इसलिए मैं हमेशा कहती हु “हा दुनिया थोड़ी बुरी तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” .

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रेलवे कर्मचारी मदद करते हुए
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वेगो पार्सल

वेगो हाथ में आयी और साथ ही आयी उसके मेरी हिम्मत. गाडी लेने के बाद अब बारी थी रितेश सर से मिलने की जिन्होंने जाने कितने ही लोगो की किस्मत बदली है प्रेरणा देकर. यकीं नहीं हो रहा था की अपनी राजधानी में मैं मेरी वेगो चला रही हु. रितेश सर से मिलना तो तय था उसके साथ मुझे सरप्राइज मिला नवीन मामाजी का,3 साल बाद मिल रही थी दोनों से और उसपर घर के कड़ी पकोड़े,वो खाने के बाद तो लग रहा था ज़िन्दगी में और चाहिए क्या अब इसके आगे. चाहिए और बोहोत कुछ था इसलिए चंद घंटो की बोहोत ही जबरदस्त प्रेरणादायी मुलाकात के बाद निकली मेरी अगली टोली से मिलने. श्रीदीप और रंगा इन दोनों से ही मेरी मुलाकात हुई थी किसी सफर में और बस दोस्ती हो गयी. इन सभी ने मेरा मनोबल बोहोत बढ़ाया और अलविदा किया शुभकामनाओ के साथ.

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रितेश सर के आफिस के बाहर

 

26 जून 2016 निकली मेरी वेगो अपना अगला पड़ाव पूरा करने होशियारपुर की तरफ. थोड़ी हैरान परेशान,जो राइड सुबह 6 बजे शुरू होनी थी वो हुई 9 बजे शुरू ऊपर से दिल्ली इतना बड़ा की गाडी चले जा रही है और दिल्ली ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा. थोड़ी राहत मिली जब गाडी दिल्ली से बहार निकली. दिल्ली से बहार निकलने की ख़ुशी मनाना चालू ही था की एक और खुश खबर मिली मेरी राइड की खबर राजस्थान पत्रिका में छपने की. सोने पे सुहागा वाली बात थी ये फिर तो सफर और सुहाना हो गया इस जश्न के साथ. ख़ुशी और जश्न में कब होशियारपुर पोहोच गयी पता ही नहीं चला. होशियारपुर में रात बितानी थी और फिर सुबह तैयारी करनी थी आगे चलने की पर उसके पहले रात में इंतज़ाम करना था रकसैक को कवर करने के लिए कवर का,मेरे ड्यूल फ़ोन के सिम ट्रे का ताकि जम्मू कश्मीर पोहोचते ही मैं अपना बीएसएनएल चालू कर सकू पर ना सिम ट्रे का इंतज़ाम हो पाया ना कवर का. ऊपर से बीएसएनएल माइक्रो में भी कन्वर्ट नहीं हो पाया. छोड़ी वो टेंशन और रूम पर जाकर करणअर्जुन को उनके गाओं वापस आते हुए देखने में डूब गयी सोचा कवर और सिम ट्रे का जुगाड़ रास्ते में कर लेंगे.

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राजस्थान पत्रिकाओं

 

27 जून 2016 : आज सफर अपने समय सुबह 6 बजे शुरू किया. गाडी शहर के बहार भी बड़ी जल्दी निकल गयी क्युकी छोटा सा ही शहर है होशियारपुर. गाडी शहर के बहार निकली नहीं की रास्ते के दोनों तरफ दिखने लगे बड़े बड़े उचे उचे पेड़, हरियाली ही हरियाली पूरी पंजाब वाली फीलिंग. एन्जॉय करना बस चालू ही किया था की ऊपर वाले ने कुछ नया प्लान बना लिया, सोचा गर्मी से हमे थोड़ी आज़ादी दिलाये, 2 min में दिन से रात हो गयी और बादल जो बरसे की आगे का आप कुछ देख नहीं सकते, न रेनकोट तब किसी काम का रहा और बैग को कवर अपनी ही गलती से था नहीं. जब तक गाडी और खुदको बचाने का सहारा ढूंढ़ती बारिश अपना काम कर चुकी थी. फिर भी एक जगह जाकर शेड में रुकी, सामने खुली हुई दूकान दिखी किस्मत से एक,पहले तो काफी सोचा इतना भीगकर कैसे अंदर पर सफर क्युकी इतना लम्बा तय करना था तो और कोई चारा था नहीं. पूरी भीगी हुयी अंदर जाकर बैठी. उन्ही से कुछ और प्लास्टिक ली की अपना कैमरा फ़ोन जो आलरेडी मैंने एक पॉलिथीन में दाल रखा था पर एक और कवर के नाम पर ले ली. रकसैक के लिए कवर पूछा पर उनके पास था नहीं. बारिश पुरे जोरो शोरो से एक डेड घंटा बरसी उसके बाद कही कुछ कम हुयी तो सोचा चलो निकला जाए वरना कही आगे देरी न हो जाये. भीगी भागी सी निकली अपनी वेगो पे तो मजे की बात ये की 10 min बाद जिस रस्ते पर पोहोची वाहा ऐसा लग रहा था मानो मेघ देवता इनसे दोस्ती तोड़े बैठे है इसलिए रूठकर सालो से बरसे ही नहीं है. थोड़ी खुद पर हसी आ रही थी और थोड़ी कुदरत पर. थोड़ा और आगे पोहोचे तो मेहरबानी से बादल अपना काम पहले निपटा चुके थे,ठंडी हवा और गीली जमीं से उनका पैगाम मिल गया था. बारिश से लड़ते झगड़ते, पंजाब के मक्खन में डूबे परांठे खाते आखिर पोहोची मैं उन रास्तो पर जिन पर गाडी चलाने का सपना ना जाने कब से देखा था,युही बैठे बैठे दिमाग में ख्याल आ जाता था कब चलाऊंगी इन रास्तो पर गाडी,क्या फीलिंग रहेगी उन रास्तो पर गाडी चलाने की और आज बस एक गेट की दुरी थी उन रास्तो और मेरे गाडी की बिच. अगर आप सोच रहे है की मैं लद्दाख की बात कर रही हु तो ना जी ना लद्दाख पोहोचने विच तो लम्बा समय है.. किन रास्तो की बात कर रही हु मैं ये बताउंगी मैं मेरे अगले पोस्ट में तब तक आप भी मजा लीजिये पराठे और बारिश का 🙂

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बारिश का संकेत
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पंजाब का परांठा
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