जिद्द हिम्मत और दुआ

पटनीटॉप से सोनमर्ग की राइड के बाद अब समय था आराम का. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में रहने के कई विकल्प मौजूद है. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में पहुँचते ही आपके बाए और देखने मिलेंगे होटल्स, रेस्तरां और दुकाने और दाहिनी ओर GOVT रेस्ट हाउस, GOVT द्वारा संचालित कुछ दुकाने, बैंक और एटीएम.मैंने होटल्स की लाइन में से एक होटल में अपने लिए कमरा सुरक्षित किया. कमरा बहुत ही छोटा सा, डबल बेड के बाद बस चलने भर की जगह बाकी रही, पर रूम के बहार के मंज़र की बात की जाए तो कवी को कविता मिल जाये और चित्रकार को चित्र. जैसे ही कमरे की खिड़की खुली सामने थे पहाड़ जो अँधेरे से ढके जा चुके थे,हरा भरा मैदान, मैदान में कुछ तम्बू, लकड़ियों पर हलकी से जलती आग और भूरे रंग के घोड़े. थोड़ा आराम और फ्रेश होने के बाद अब समय था पेट पूजा और कुछ जरुरी सामान लेने का.

होटल से निकलते ही बिल्कुल बगल में ही दिखाई दी ऊनि कपड़ो की दूकान.पर्यटक स्थलों पर आम तौर पर ये धारणा होती है की खरीदारी थोड़ी महंगी होगी, पर सोनमर्ग में उच्च दर्जे के ऊनि कपडे मिल जाते है बिल्कुल वाजिब दाम में. दस्ताने, मोज़े, टोपी खरीदने के बाद पता करना था मुझे मैकेनिक के बारे में. मार्केट के आखरी छोर में एक दूकान पर पूछा तो पता चला अभी तो कोई नहीं मिलेगा आप सुबह पता कर लीजियेगा, अगर कोई मोपेड के जानकार हो तो. वेगो मुझे श्रीनगर में ही दिखाने की इच्छा थी पर क्युकी इतना समय मेरे पास था नहीं तो आगे निकल आयी. खाना खाने मैं पैदल ही निकली पर जब दूकान में मोपेड का जिक्र निकला तो दूकान में बैठे भैया की भी उत्सुकता बढ़ गयी. वेगो से आयी हु, अकेली आयी हु,लद्दाख जाना है सब जानकर वो थोड़ा हैरान भी हुए और खुश भी “यहाँ तो बाइकर्स आते रहते है पर मोपेड से इतनी दूर अकेले हमने नहीं देखा किसीको“. मैकेनिक तो अगली सुबह मिलना था अब बस खाना बाकि था. उनसे अच्छे होटल के बारे में पूछा तो वह अपने ही होटल ले गए जो दूकान के बिलकुल बाजू में था, रहने का इंतज़ाम भी था वहा उन्होंने उसके लिए भी पूछा पर मेरा रूम मैं पहले ही बुक कर चुकी थी. खाने में उन्होंने मुझे कश्मीरी स्पेशल वाज़वान खिलाया. खाते खाते बातचीत का सिलसिला जारी था और तभी मेरे मन में थोड़ा डर और थोड़ी उत्सुकता बनाये जो सवाल था मैंने पूछ लिया “कैसा है ज़ोजि ला,मोपेड जा पायेगी मेरी वहा. बहुत मुश्किल होगा क्या?“. ज़ोजि ला के बारे में मैंने बस सुन रखा था और कुछ अच्छा तो नहीं ही सुना था. पटनीटॉप में जब विशाल से मिली थी तब उसने भी अपनी चिंता जाहिर की थी “कैसे करेगी तू  ज़ोजि ला वेगो से, अच्छी अच्छी गाड़िया फेल होती है, इसका तो टार्क भी कम है “.ऐसा ही कुछ सभी ने कहा था इसलिए फोटो देखने की हिम्मत नहीं हुई. लग रहा था अभी पता नहीं तो ही चिंता खाये जा रही है फोटो में अगर देख लू तो कही आत्मविश्वास पे डर हावी ना हो जाए.

खतरनाक रास्तो में से एक है ज़ोजि ला और लद्दाख के लिए प्रवेश द्वार. लद्दाख की असली चढाई भी शुरू यही से होती है. होटल में सवाल पूछने का एक कारन ये भी था की जो मैं सुन ना चाहती हु वो मन को तसल्ली और हिम्मत देने वाला जवाब मिल जाये और वही हुआ भी ” मैडम आप इतनी दूर आयी है तो इंशाल्लाह आगे भी जरूर जाएँगी, आप कर लोगे ज़ोजि ला पार डरिये मत, हमारा तो रोज़ का आना जाना है यकीन मानिये कुछ नहीं होगा“. खाना ख़तम कर मैं दुआओ के साथ रूम पर लौटी. दिमाग तो अटका हुआ था ज़ोजि ला पर और किस्मत से बीएसएनएल चालू था तो अपने मेंटर को आखिर मैसेज कर ही दिया , ज़ोजि ला क्यों इतना मुश्किल माना जाता है?. जवाब में एक फोटो आयी, वो फोटो डाउनलोड करने से खुदको रोका और सोने चली गयी पर ” मनचला मन चला तेरी ओर” ओर फोटो देख ही ली, देखकर भी उस पार तो जाना ही था पर अब डर अच्छे से मन में घर कर गया था.दिमाग दिल की अपनी अलग लड़ाई शुरू हो चुकी थी ओर इस लड़ाई में नींद कब आयी समझा ही नहीं.

29th June 2016- सुबह कुछ आराम से ही हुई. उठते ही पहले खिड़की के बहार का नज़ारा देखा सुबह की हलकी धुप उजाले में साफ़ दीखते हरे भरे पहाड़, हरा भरा मैदान ओर मैदान में घोड़े.३ दिन से लगातार वेगो चलाने के बाद आज सोनमर्ग में ही रुकने का फैसला किया था .तैयार होकर पहला काम किया मैकेनिक के पास वेगो ले जाने का. मार्केट के आखरी छोर पर ही थी उनकी दुकाने. जब पहले मैकेनिक के पास गयी तो जवाब आया “बेटा मोपेड की तो जानकारी कुछ कम ही है यहाँ बस ट्रक का काम करना ही जानते है”. मुझे निराशा हो उसके पहले वहा खड़े ट्रक ड्राइवर अंकल बोल पड़े बेटा उस दूसरी दुकान में देख लो उसे थोड़ी जानकारी है इन गाड़ियों की. नाम लेकर उस दूसरे मैकेनिक को आवाज़ दी ओर मुझे वहा जाने के लिए कह दिया. मैकेनिक वहा किसी काम में व्यस्त थे पर फिर एक और ट्रक ड्राइवर अंकल ने उन्हें पहले मेरा काम करने के लिए कहा. मैकेनिक को मैंने बताया ज़ोजि ला जाना है इस गाडी से, आप देखिये कोई परेशानी तो नहीं होगी, जाएगी क्या ये ज़ोजि ला.वो वेगो स्टार्ट कर उसे थोड़ा घुमा कर वापस आये ” क्यों नहीं जाएगी बिलकुल जाएगी ये गाडी  बिल्कुल ठीक है“. आस पास काफी ट्रक ड्राइवर्स थे उनमे से भी किसीने कहा ” बेटा आराम से जा, हिम्मत ऐ मर्दा तो मदद ऐ खुदा“. दिन मतलब अच्छा गुजरना था, मैकेनिक ट्रक ड्राइवर्स इन्होने बोल दिया अब क्या डरना था. अब पेट्रोल का इंतज़ाम करना था, दूकान से कैन लेकर मैं पोहोची १३ कम दूर श्रीनगर हाईवे पर पेट्रोल पंप. वह ख़तम कर होटल रूम भी बदला शाम को मेरे दो दोस्त जो आने वाले थे. सब काम ख़तम कर अब समय था सोनमर्ग की वादियों को जीने का.

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वेगो लेकर मैं बढ़ी थाजीवास ग्लेशियर की तरफ, ३ कम की राइड फिर आपको ले चलती है खुशनुमा वादिया, खुला आसमान और आपको मोहब्बत से भर देने वाले नज़ारो में . पर बदकिस्मती देखिये की खूबसूरती के बिच भी नफरत आखिर जगह बना ही रही है.

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राइड करके मैं पहुंची जहा से शुरुआत होती है glaciers के तरफ चढाई की. वही कुछ छोटी चाय की दुकाने है पार्किंग और गाइड और घोड़े किराये पर ले सकते है. घोड़ो के लिए अलग से पगडण्डी बनी हुयी है पर अगर आप खुद चलकर जाना चाहा रहे है तो वो मैदान, वो वादी पूरी आपकी. और जब आप सफ़ेद पानी की बहती धारा में अपने पैर डालकर बैठ सकते हो ,उसकी ठंडक महसूस कर सकते हो, ठंडी बहती हवा को फुर्सत में अपने गालो को चूमने दे सकते हो,नंगे पैरो से जन्नत महसूस कर सकते हो, जब मन चाहे बर्फ से ढके पहाड़ और जब मन चाहे पलटकर दूसरी और हरी भरी घाटियों में बहता पानी, छोटे छोटे घर, दुकाने देख सकते हो तो क्यों भला घोड़ी चढ़ी जाए और बेज़ुबान जानवर को सताया जाए. मैंने फैसला किया पैदल चलने का और साथ ही हो लिया मेरे साथ एक १८ साल का बच्चा,उम्र जैसी उसने बताई थी हो सकता है कम ही हो, स्लेड्जिंग बोर्ड साथ लेकर मुझे मनाते हुए की दीदी ज्यादा पैसे नहीं लूंगा आप ही देख लो कितना दूर है. आपको स्लेड्जिंग भी करवा दूंगा मैं खुद ही . हां मैंने कहा नहीं था पर साथ साथ हम पोहोच गए स्लेड्जिंग पॉइंट.

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स्लेड्जिंग करने में तो मुझे दिलचस्पी नहीं आयी पर बर्फीले पहाड़ की चोटी तक पहुंचने की इच्छा जाग उठी. बच्चे का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने मुझे गम बूट्स दिलवाये, स्लेड्जिंग बोर्ड कही छुपा कर रख दिया और हो लिया मेरे साथ “दीदी पर मैं ज्यादा दूर तक नहीं आऊंगा बस आधे रस्ते वहा से आप चली जाना,मेरा दिन वरना पूरा आप ही के साथ चला जायेगा“. तो चल पड़े हम साथ साथ, आधे रस्ते जहा तक तय हुआ था वो मेरे साथ आया फिर रुक गया “दीदी अब आप ही जाओ आगे”.

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पहाड़ में पूरी बर्फ, कुछ छोटे छोटे पत्थर और बर्फ पिघलकर बहता हुआ पानी. कुछ कुछ जगह ऐसी की कही बर्फ पिघलकर आपका पैर अंदर ना चला जाए . अभी तक तो वो बच्चा साथ में था बहुत बार फिसलते फिसलते मुझे बचाया ,गिरी तो मुझे उठाया ,पैर कहा रखना है ये बताया पर आगे मुझे खुद ही खुदको संभालना था. थोड़ी ही दूर मैं अकेले पहुंची थी की पीछे से आवाज़ आ गयी “अरे दीदी कहा जा रहे हो,गलत जा रहे हो आप,रुको मैं आता हु, आप वाहा चले जाते तो कुत्ते खा जाते आपको,पहाड़ी कुत्ते है ये उनके आस पास भी जाने का मत सोचिये“. पहाड़ी कुत्ते जो रखे जाते है भेड़ की रखवाली के लिए और वह अपना काम पूरी निष्ठा से करते है, मजाल किसीकी की उनके रहते भेड़ को हाथ लगा ले. अरे पर तुम तो वापस जाने वाले थे, “कैसे चले जाता आपको छोड़कर, मेहमान हो आप हमारे आपको कुछ हो जाता तो क्या जवाब देते हम कश्मीर वाले”. और कुछ यु हमारी दोस्ती हुयी. फिर बाते आगे बढ़ी ,परिवार में कौन कौन है और क्या काम करते हो ” इस पर घर की सारी जिम्मेदारी थी सोनमर्ग में गाइड के अलावा अमरनाथ यात्रियों के लिए भी गाइड की सेवा देता था,बेहेन थी एक छोटी जो स्कूल में थी.

“तुम थके नहीं रोज़ा होगा ना तुम्हारा “

“नहीं मैं नहीं थका अल्लाह हिम्मत देता है”

हर कोई यहाँ रोज़ा नहीं करता क्या मार्केट में मैंने देखा कुछ लोग तो खाना खा रहे थे?

“हा तभी तो क़यामत आती है ना, देखा नहीं आपने २०१४ में जो बाढ़ आयी थी, अल्लाह सब देख रहा है”.

“अच्छा ये जो जगह है ना यही बजरंगी भाईजान के शूटिंग हुई थी जो सलमान खान को गोली लग जाती है वही वाला”.

मुझे बताओ तुम भारत में रहना पसंद करोगे या पकिस्तान?

“दीदी मुझे क्या पता पाकिस्तान, ये कुछ ३ % लोग है जो कश्मीर बेच आये है,नफरत फैला रहे है”

बातो बातो में काफी ऊपर चढ़ चुके थे हम,”दीदी आप पहले गेस्ट हो अभी तक के जो इतना ऊपर चढ़ के आये हो वरना कोई आना पसंद नहीं करता“. चोटी तक तो हम नहीं पहुंच पाए क्युकी शाम के पहले निचे भी उतरना था और उसे घर पे सामान देने भी जाना था. अपने आप में ही एक अलग दुनिया में आये जैसा लग रहा था उन पहाड़ो के बिच. निचे उतरते उतरते नदी के किनारे बानी चाय की दूकान पर कावा और मैगी का मज़ा लिया, पहली ही बार ही कावा का स्वाद चका था मैंने. मुझे वेगो के पास छोड़ वो तुरंत भागा घर की और सामान खरीदने के लिए.

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इस बार जो मैंने होटल बुक किया था वो मार्केट से काफी पहले ही था पर किसी कारन से मैं फिर मार्केट के लिए निकली. मार्केट में कल रात वाली दूकान पर जा ही थी की अचानक से आवाज़ आयी “The Wego Girl”. अनजान शहर में आपको कोई इस नाम से बुलाये तो चेहरे पर मुस्कान आना लाजमी ही था. तब तो मुस्कुराकर मैं दूकान के लिए आगे निकल गयी पर लौट ते वक़्त उनसे मिली. होटल वाली लाइन में ही एक होटल के बहार कुछ ३० ३१ उम्र के एक नौजवान और २ बुजुर्ग अंकल बैठे थे. होटल उन्ही का था. उन्होंने मुझे चाय के लिए पूछा और चाय के लिए तो मना हम करते ही नहीं. चाय और बिस्कुट मंगवाई गयी मेरे लिए.एक अंकल ने बातो का सिलसिला आगे बढ़ाया बेटा कहा से आये हो कौन है साथ में उन्हें जवाब दिए, थोड़ा वो चौके फिर बोले-

आप नागपुर से अकेले आये हो, बड़ी हिम्मत की है बेटा आपने , मेरी बेटी के उम्र के ही हो आप वो श्रीनगर में पढ़ती है, वो श्रीनगर से सोनमर्ग आने की भी हिम्मत नहीं कर पाती, कहा तक जाओगे आप “. बताया मैंने और फिर उनसे अपना सवाल पूछ ही लिया

” जोज़ि ला में चल जाएगी ये गाडी”.

बेटा आपने यहाँ तक आने की हिम्मत की है इंशाल्लाह आगे भी आप जरूर जाओगे, मैं आपके लिए दुआ करूँगा, जब आप नागपुर पहुुँच जाओ तो कॉल जरूर करना “.

इतनी शिद्दत और खूबसूरती से बोला जाता है यहाँ “इंशाल्लाह”, हाय, दुआ काबुल ही हो गयी समझो.

उनके बेटे ने भी कहा मैं आज ही आया हु जोज़ि ला पार करके चले जाओगे आप बस थोड़ा आराम से रुकते रुकते जाना और ध्यान रखना. कोई परेशानी आयी अगर तो मदद के लिए लोग भी मिल जाएंगे या मुझे कॉल कर देना. इनके जवाब ही थे जो हिम्मत दे रहे थे. उन्होंने शाम को खाने का न्योता दिया.
आजकल जहा लोगो को प्यार से नफरत और नफरत से मोहब्बत होती जा रही है ऐसे में ऐसे लोगो का मिलना , जिंदगी को उमंग और उम्मीद से भर देता है. फैलती नफरत और खौफ के बिच भी मोहब्बत अपनी जगह ढूंढ ही लेती है.

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हामी भरकर मैं होटल वापस आ गयी अपने दोस्तों के इंतज़ार में. सोनमर्ग में जहा नज़र उठा के देख लेंगे वहा आपको बस खूबसूरती ही दिखेगी और इसलिए इस होटल से भी खूबसूरत पहाड़ दिल जीत रहे थे. दोस्त आये हमने बोहोत मस्ती भी की पर जैसे जैसे रात चढ़ रही थी वैसे वैसे बैचनी बढ़ रही थी.ये बैचनी ख़तम तब ही होनी थी जब अगली सुबह उठकर जोज़ि ला नाम का पहाड़ पार लगता. उसके लिए जरुरी थी रात की अच्छी नींद. अपनी बैचैनी को साथ लेकर और अपने कुछ करीबी लोगो को मुझे आगे के सफर के लिए शुभेछा देने का मैसेज डालकर चली मैं अपनी नींद पूरी करने कल के मुश्किल सफर के लिए.

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कश्मीर के रंग

28th June 2016 : अपने सफर को आगे बढ़ाते हुए सुबह 7 बजे निकली मैं  सोनमर्ग का लक्ष्य लेकर. हल्का सा कोहरा, जून में नवंबर वाली ठण्ड और रास्ते के साथ साथ चलती झेलम नदी का मजा लेते हुए शुरू हुआ ये सफर. सोनमर्ग के लिए श्रीनगर होते हुए जाना होता है तो निकल पड़ी मैं बीआरओ द्वारा लगाए हुए रास्ता बताते हुए साइन बोर्ड के इशारो पे श्रीनगर की ओर.आज पहाड़ चढ़ने नहीं उतरने थे.सफर चालू तो कर दिया पर मुश्किल ये की इस ज़िन्दगी में  रंग भर देने वाले मौसम को छोड़कर आगे बढ़ा कैसे जाये.आगे नज़ारे और खूबसूरत ही होने वाले थे पर शर्त ये थी इन्हे छोड़ा जाए. जी कर रहा था वेगो को सड़क किनारे खड़ा करा बैठ जाऊ दिल को शांति देने वाले इन नज़ारो को देखते हुए पर एक नए लक्ष्य का मुझे भी इंतज़ार था .पटनीटॉप से बहार निकलकर जो सबसे पहला काम करना था वो था रकसैक को बारिश से बचाने के लिए ताड़पत्री लेने का.पटनीटॉप से पास ही एक शहर में मुझे काम का सामान मिल गया और फिर सफर कैसे आगे बढ़ रहा था इन मदमस्त हवाओ के साथ कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, की अचानक इस खुले मौसम में कुछ बंद बंद महसूस होने लगा और तब समझा की मेरी वेगो कुछ ही देर में पोहोचने वाली है धरती का स्वर्ग कश्मीर.

सुरक्षा इंतज़ाम एकदम कड़े जहा नज़र घुमाओ पहाड़ पेड़, खूबसूरती और उसके साथ बन्दुक ताने हमारे आर्मी जवान. दूकान के सामने, बनते हुए घर की छत पे, खेलते हुए बच्चो के पास, स्कूल के सामने, पेट्रोल पंप पर, सड़क के किनारे, जंगल के बिच, 2 sec के लिए तो लगा जैसे किसी और देश में आ गयी हु जो आज़ाद नहीं है. वादिया सुन्दर थी पर उनकी हवाओ में डर सा था. हर लोग वाहा 24 घंटे किसी की निगरानी में था. बुरा लग रहा था वो देखकर, बुरा लग रहा था उन लोगो के लिए जो इस निगरानी में जीते है, खुशकिस्मत महसूस कर रही थी खुदको की मैं ऐसे शहर ऐसे वातावरण में पली की आज़ाद भारत को आज़ाद ही देखा. बड़ा मुश्किल होता जीना अगर बंदूकों की निगरानी में जीना पड़ता. उस 10 15 min में बोहोत गुस्सा आया,डर भी लगा खुद पर शर्म भी आयी, कुछ आँखे नम हुयी ,50 सवाल मन में आये पर थी मैं लाचार।

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गलत न वाहा के लोग थे न हमारे आर्मी के जवान, हलात के आगे मजबूर थे सब बस. आगे का सफर अब ऐसे ही कटना था जवानो के समूह और निगरानी के साथ. पहली बार आर्मी को देखकर मेहफ़ूज़ नहीं डर लग रहा था. अब नज़ारे कुछ कम ही अपनी और खींच रहे थे, सफर कब ख़तम होगा इसका इंतज़ार ज्यादा था. सफर ख़तम करने के लिए आगे बढ़ना जरुरी था और बढ़ते बढ़ते वेगो पोहोची कश्मीर के प्रवेश द्वार जवाहर टनल.  1956 में बना गया 2.5 km लम्बा ये टनल जो ले चलता है आपको कश्मीर की वादियों में. किस्मत से जब मैं टनल में गयी मेरे आगे ही एक टैक्सी थी जिसकी लाइट की मदद से टनल पार कर पायी, वरना वेगो की हेड लाइट में उस अँधेरी सुरंग से निकलना मुश्किल ही ठहरता। अपने देश की एक और ऐतिहासिक जगह से होकर गुजरने की थोड़ी ख़ुशी हो रही थी. जवाहर टनल के बहार निकलते ही खड़ी थी हमारी आर्मी जवानो का समुह. इच्छा थी उस ऐतिहासिक टनल को कैमरा में कैद करने की पर  ध्यान ये भी था की सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए बिना इजाजत फोटो ना ली जाए. इजाजत मिलनी नहीं थी ये भी तय ही था और वही हुआ भी एक आर्मी अफसर से पूछने के बाद. कैमरा में ना सही दिल में वो अनुभव हमेशा कैद रहेगा.

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हरी भरी वादियों से होकर गुजरने के बाद समय था कश्मीर के शहरों से गुजरने का और ऐसे ही एक शहर क्वाजिगंड  से गुजरते हुए अचानक से मुझे रोक लिया पुलिस चौकी के बिलकुल आगे एक पुलिस सिपाही ने. मैं थी पूरी तरह से पैक हेलमेट स्क्राफ् जैकेट ग्लव्स जूते.देखते ही पहला सवाल उन्होंने पूछा “आप तो पेहले ये बताइये आपको मैं सर बोलू या मैडम”. तब मैंने अपना हेलमेट और स्क्राफ् हटाया-

” अच्छा तो आप मैडम है, मैडम ये बताइये आपने गाडी का लाइट क्यों चालू रखा है? बंद कीजिये उसे ,कहा से है आप और कहा से आ रही है आप इस स्कूटी पर? साथ में कौन है आपके? “.

उन्हें बताया मैंने टनल पार करने के बाद लाइट बंद करना भूल गयी , कोई साथ नहीं है नागपुर से आयी हु मैं ,सोनमर्ग जा रही हु. उन्हें चौकाने के लिए इतने जवाब काफी थे. “अकेले आयी है आप इतने दूर से”?. चाय पीना पसंद करेंगी.

आप सफर में हो कोई आपको चाय के लिए पूछे और आप मना कर दे इस से बड़ा और गुनाह कोई हो नही सकता, क्युकी जहा चाय को मना किया मतलब एक नए रिश्ते को भी आप मना कर गए और कुछ नया जान ने को भी.जवाब मेरा हां था सोचा चलो चौकी में बैठके चाय पि जाये कुछ यादे, कुछ रिश्ते बटोरे जाए और आराम भी चाइये ही था. पर चाय चौकी पे नहीं तो चौकी के कैंपस में बने कैंटीन में  पीनी थी. कैंटीन के बहार कुछ टेबल कुर्सियां लगी थी  पेड़ो से घिरी हुई, वही बैठने का सोचा. कैंटीन वाले को बोलकर मेरे लिए चाय बुलाई गयी, पुलिस वाले अंकल ने तो साथ में चाय पि नहीं वो मुझे बिठाकर वापस ड्यूटी पर चले गए “मैडम आप आराम से बैठिये चाय पीजिये”. चाय के साथ मुझे जरुरत थी नाश्ते की भी, सुबह से कुछ खाया नहीं था तो मैंने नाश्ता भी मंगवा लिया। पुलिस अंकल एक बार बिच में आकर देख गए कही मैं परेशान तो नहीं हो रही फिर नाश्ता ख़तम भी हो गया पर वो नहीं आये. मैंने कैंटीन में बिल के लिए कहा तो पता चला “बिल तो आपका दे दिया है वो पुलिस जो आपको लेकर आये थे” मैं थोड़ा चौकी ये सुनकर और थोड़ी मुस्कुरायी भी. बस दुःख इस बात का रहा की उन्हें धन्यवाद् नहीं कर पायी,उनकी ड्यूटी खत्म करके बिल देकर वो घर जा चुके थे. वाहा कुछ देर आराम करके वेगो आगे बढ़ी अपनी मंज़िल सोनमर्ग की तरफ.

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दिन चढ़ रहा था पर मौसम ऐसा की धुप का नामों निशाँ नहीं वरना नागपुर में तो जून के अंत में भी जलाने वाली धुप होती है. नज़ारे भी रास्तो के साथ बदलते हुए, ताज़ा कर देने वाले और इतने शहर इतने कस्बो से गुजरने के बाद आर्मी के मौजुदगी की की भी आदत हो ही गयी थी. हमारी हिफाज़त के लिए ही थे वो वाहा अपने परिवार से दूर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए.  अब डर नहीं मेहफ़ूज़ लगने लगा था उनके साथ, पता था कोई परेशानी आयी भी तो ये रहेंगे साथ, कही मैं अकेली नहीं हु.

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वेगो गुज़र रही थी कश्मीर के अलग अलग रास्तो और कस्बो से और ऐसे ही एक कस्बे संगम जो अनंतनाग में पड़ता है ,के पेहले रास्तो के दोनों तरफ दिखने लगी सुप्रसिद्ध कश्मीरी विलो बैट से सजी हुई दुकाने.दुकानों के साथ ही बैट वहा बनायीं भी जा रही थी. यहाँ की सड़के भी घाट रास्तो से अलग 4 लेन हो गयी थी कुछ देर उन रास्तो पर तेजी से वेगो दौड़ाने का मज़ा लिया। इस मज़े में कब गलत रास्ते चली गयी ध्यान ही नहीं रहा और फिर स्वागत किया आर्मी ने. बड़े सख्त से दिखने वाले एक अफसर ने रोक कर पुरे पेपर चेक किये, उतनी ही सख्ती से सही रास्ता बताया और जाने को कहा. मन ही मन मैं ये सोच रही थी की कितना मुश्किल होता होगा इतना सख्त रहना, कभी कभी ना चाहते हुए भी यु बेरुखी दिखाना, ड्यूटी तो पर ड्यूटी है और जिम्मेदारी जब देश की हो तो चूक की गुंजाइश कहा.

संगम से श्रीनगर अब ज्यादा दूर नहीं था लगभग 50 km. शाम करीब 4 4.15 बजे पोहोची मैं श्रीनगर। कैसा था श्रीनगर? बोहोत खूबसूरत, रास्तो के किनारे चिन्नार के लम्बे लम्बे पेड़ , आपके साथ चलता दल लेक, लेक के एक तरफ जहा था शहर वही बाकी तरफ घिरा हुआ था पहाड़ियों से , ठंडी बहती हवा. दल लेक पर कुछ देर समय बिताया पहाड़, पेड़, पानी, हवा,, खूबसूरती आप समझ ही सकते है क्या महसूस हो रहा होगा मुझे वाहा। श्रीनगर से मुझे दवाई लेनी थी और एक अड़चन थी बीएसएनएल की जिसे चालू करना था. दल लेक में समय बिताकर पोहोची मैं मेडिकल की दूकान, दवाइया ली और रास्ता भी पूछा सोनमर्ग के लिए. दूकान में मेरे बाजु में खड़े हुए अंकल और दूकान वाले अंकल ने सलाह मसहूरा कर  सही रास्ता बताया लाल चौक से भेजा जाये या नहीं ये वो सोच रहे थे. दूकान से बहार निकली तो जिन्होंने रास्ता बताया था वो अपनी कार निकालते हुए फिर मिल गए. मेरी वेगो देख थोड़ा चौक गए फिर बोले “बेटा याहा से चले जाओ, रास्ता अच्छा है, आराम से जाना, डरने की कोई कोई बात नहीं और अपना ध्यान रखना” केहकर वो निकल गए. अब बीएसएनएल की परेशानी हल करने का समय था, किस्मत ने इस बार बड़ा साथ दिया और कॉल सेण्टर में किसी समझदार ने फ़ोन उठा लिया और परेशानी 5 min में हल कर दी, कोशिश पटनीटॉप जिस दिन पोहोची थी उस दिन से ही चालू थी सिम चालू करने की और हल हुई श्रीनगर पोहोचकर इस बिच करीब २० कॉल सेण्टर एक्सेक्यूटिव्स से बात कर चुकी थी मैं. परेशानी हल हुई वो ज्यादा जरुरी था. अब शुरू होने वाला था आज की यात्रा का अंतिम पड़ाव। श्रीनगर से शाम 5 बजे निकली मैं सोनमर्ग की और. शाम यहाँ ८ बजे के बाद होती है तो और 3 घंटे का समय था मेरे पास 80 85 km पूरा करने के लिए.

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सोनमर्ग की तरफ बढ़ते हुए रस्ते कुछ और छोटे होते चले गए थोड़े ख़राब भी ,पहाड़ कुछ बड़े, नदियां सफ़ेद और दिखने लगे बर्फ से लदे पहाड़। कश्मीर को जन्नत क्यों कहा जाता है इसकी झलक मिलनी शुरू हुई उन रास्तो पर, समय की पाबंदी ना होती तो 3 घंटे का वो सफर मैं पूरा करती 6 घंटो में. थोड़ा ज्यादा समय बिताती में उन वादियों में अपनी वेगो के साथ. जब पटनीटॉप से सफर चालू किया था तो नदी कही कही साथ तो थी पर पास नहीं की छू सके पर सोनमर्ग से 1 घंटे पहले से जो नज़ारा देखने मिला वो आज भी ख़ुशी से भर देता है. सामने थोड़े भूरे रंग के पहाड़ कुछ बर्फ से ढ़के हुए सूरज की रौशनी से केसरी रंग लेते हुए,ऐसा लग रहा था जैसे कोई ब्रश लेकर रंगो की चित्रकारी कर रहा हो, उन्ही के बाजू में हरे रंग को लपेटे हुए पहाड़ और उन रंगो की जुगलबंदी करते पहाड़ो के नीचे बहती सफ़ेद पाक सिंध नदी. तभी कहा गया है ” जन्नत गर कही है तो यही है यही है यही है” .जन्नत जो जिंदगी को नयी उमंग से भर दे, जिंदगी ना मांगने वाले भी 100 साल के ऊपर जीने की दुआ मांगने लगे. उन रंगो को आँखों में भर उनके साथ अपना समय बिता कर निकली उन नज़ारो के साथ साथ सोनमर्ग. अब ये पहाड़ ये नदी ये रंग साथ ही चलने थे और इन्ही के साथ प्रवेश हुआ मेरा सोनमर्ग में. 8 बजे करीब मैं पोहोची सोनमर्ग और सोनमर्ग बाजार में जाहा गेस्ट हाउस होटल्स की लाइन लगी हुई थी उन्ही में से एक जगह कमरा लिया। इतनी सुंदरता आँखों में भरने के बाद अब समय था आराम का. कहानी और भी है पर अगली कड़ी में

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अवार्ड्स

सकाळ ग्रुप की तरफ से नवाज़ा गया युथ इन्स्पिरेटर अवार्ड

 

युवा भरारी अवार्ड C P & Berar College,Nagpur की तरफ से

सावित्रीबाई बाई फुले अवार्ड से सम्मानित किया गया मुझे लार्ड बुद्धा टीवी चैनल की और से

जम्मू कश्मीर में स्वागत है

जुलाई 2016 और सेप्ट 2017 इस सवा साल में ज़िन्दगी इतनी बदल जाएगी लगा ही नहीं था. बदलना तो ये शुरू तभी से हो गयी थी जब लद्दाख जाने का सोचा था पर उसके बाद भी एक एक कर जो होता चला गया उसके लिए मैं तैयार नहीं थी. ये पोस्ट इतना देरी से आने का एक कारण रहा जुलाई 8 2016 की वो शाम जिसके निशान अभी भी मेरे साथ ही है. खैर क्या जिंदगी बदली और क्या हुआ था 8 जुलाई 2016 को ये आगे की पोस्ट में आपको पता चल ही जायेगा फ़िलहाल बात करते है उन रास्तो की जाहा वेगो चलाने का सपना ना जाने मैंने कब से देखा था. मेरा सपना पूरा करने के लिए जरूररत थी बस उस दरवाज़े को पार करने की. कौनसा दरवाज़ा आइये पता करते है.

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ये था वो दरवाज़ा था ” Excise Dept Toll Post Lakhanpur Welcomes You To Jammu & kashmir State”.उस पल को जीने के लिए कुछ देर गाडी पर बैठ कर उस दरवाज़े को निहारती रही और फिर उसे अपने कैमरे में कैद करने लगी. फिर अपनी वेगो चलाकर पोहोची मैं दरवाज़े के पार. जम्मू कश्मीर की चिकनी सड़क पर दौड़ती मेरी वेगो की ख़ुशी शब्दों से नहीं मेरे चेहरे की चमक से ही बयान हो सकती है. दोनों तरफ के नज़ारो को मैं देख रही थी, खुद ही खुद से बाते कर रही थी, खुद पर ही यकीन नहीं हो रहा था,अजीब सी ख़ुशी थी, और इन सब के बिच दिल से दो लोगो को शुक्रिया करना चाहा रही थी. थोड़ी देर बाद वेगो रोक उन्हें कॉल करने का सोचा पर जम्मू कश्मीर जितने तहे दिल से मुझे बुला रहा था उतने ही तहे दिल से फ़ोन के नेटवर्क को अलविदा भी कह चूका था. थोड़ा बुरा लगा और थोड़ा टेंशन आया पर सफर तो जारी रखना ही था. लक्ष्य था उस दिन का पटनीटॉप.

पूछते पूछते जाना था. साम्बा तक तो सफर बड़े आराम से कटा सीधी लम्बी चिकनी सड़क पर जब लद्दाख जाने की सोची हो तो इन सड़को से लेना ही क्या था. आगे रास्ते कैसे होंगे इनकी हलकी सी झलक साम्बा उधमपुर के रास्तो ने दे दी. जाना ऊंचा था, रास्ता ख़राब था, बिच में कही पूल का काम चालु था. दिमाग संतुलन खो ही रहा था पर ये नज़ारे और अपने लक्ष्य की और बढ़ते कदम ने संभाल लिया. चलती ,रूकती, थकी हुयी पोहोची में एक रेस्टॉरंट पेट पूजा और कुछ आराम के लिए,रेस्टोरेंट करीब खाली ही था तो जाकर बैठ गयी मैं एक टेबल पर. बैठी ही थी की वेटर आया और हालत देखकर बोला,टेबल की और इशारा करते हुए मैडम आप वहा बैठ जाइये अच्छी ठंडी हवा आएगी. जैसे ही बैठी उन्होंने खिड़की खोली और नज़ारा था हरी भरी वादियों का, थकान उन्हें देखते ही काहा चली गयी पता ही नहीं चला. बैठकर अपने फ़ोन का नेटवर्क देखने की सोची पर कुछ हासिल नहीं हुआ, फ़ोन बंद चालू करके देखा कुछ नहीं हुआ तो वेटर से पूछा, पता चला प्राइवेट नेटवर्क यही से बंद हो जाते है बीएसएनएल और यहाँ के नंबर ही चल पाएंगे.बीएसएनएल का सिम तो था मेरे पास पर माइक्रो नहीं और इसलिए उसे एक्टिव भी नहीं कर पा रही थी. ये बात उन्हें बताई तो बोले मैडम आप मेरे फ़ोन में सिम डाल लीजिये और एक्टिव कर लीजिये, आपको कुछ कॉल करने होंगे तो मेरे फ़ोन से भी कर सकते है आप जब तक है यहाँ रख लीजिये मेरा फ़ोन. जितनी खूबसूरत वो वादियां थी वैसी ही खूबसूरती की झलक दिखी मुझे उनमे. खाना तो खिलाया ही उन्होंने पर मेरी परेशानी में भी मदद करने की कोशिस की. उनकी मदद से बीएसएनएल एक्टिव तो हो गया था पर कॉल और इंटरनेट बंद थे. आराम और पेट पूजा करके बढ़ी मेरी वेगो आगे के सफर के लिए.

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शाम करीब 6 बजे पोहोची मैं अपनी मंज़िल पटनीटॉप. पहाड़ो से घिरा हुआ ये हिल स्टेशन, ठंडी हवा, बेहते पानी की आवाज़ और पहाड़ो को देखती मेरी वेगो. याहा मेरी थकान मेरी ख़ुशी पर हावी हो रही थी, इसलिए जल्दी ही चली गयी मैं रेहने के लिए रूम ढूंढ़ने. रूम थोड़े मेहँगे थे और उसपे लोगो को मुझपे विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,उन्होंने एनफील्ड और बाकी बड़ी गाड़ियों में लोगो को आते हुए देखा था पर एक अकेली लड़की मोपेड पर याहा,मुश्किल से एक रूम मिला. रूम साफ़ करने के लिए बोलके मैं निकली अपने बीएसएनएल सिम को माइक्रो करने. एक ही मोबाइल की छोटी सी टिन की दूकान थी वाहा जो मुझे होटल वालो ने ही बताई थी.

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दूकान में मशक्कत बड़ी लम्बी चली, दूकान में माइक्रो सिम कट करने के लिए साधन था नहीं और दुकानदार भी डर रहा था की कुछ गड़बड़ हो गयी कट करने में तो सिम ख़राब ना हो जाये. मैंने ही थोड़ा फाॅर्स किया फिर वो माने अब सिम कट हो गयी फ़ोन में डाल भी दी पर नेटवर्क आने का नाम नहीं. फिर थोड़ी देर में समझा की सिम वो गलत डाल रहे थे. ये सारि मशक्कत जब चल रही थी तब हम में कुछ बाते भी हुयी और बातो बातो में मुझे एक सवाल पूछा गया –

“इतने दूर अकेले आपको डर नहीं लगता? मैंने पूछा डर किस से सब अपने ही तो लोग है ना, हां पर फिर भी कुछ हो गया तो मेरा जवाब था क्या होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ हुआ भी तो बस जान ही जाएगी इस से ज्यादा और कुछ हो सकता है क्या?. जवाब सुनके वो थोड़े दंग हुए और फिर मुस्कुराये की हां और होगा भी क्या.”

फ़ोन का काम ख़तम हो गया था और बाते भी. फ़ोन पे मशक्कत उन्होंने काफी की पर पैसा एक नहीं लिया और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया. एक मुश्किल याहा हल हो गयी थी पर पता नहीं था की दूसरी मुश्किल सामने ही इंतज़ार कर रही थी. जब होटल पोहोची रूम पर तो मैनेजर ने ये बोलते हुए “मैडम रूम का एडवांस बुकिंग था, हमे लगा बुकिंग कैंसिल हो गयी है अभी तक कोई आया नहीं तो,पर अभी उनका कॉल आया था और उन्होंने बताया की वो आ रहे है”. मैं सामन लेकर निचे आयी अपनी वेगो के पास खड़ी हो गयी, समझ ही नहीं आ रहा था अब रात में क्या करू. थकान से शरीर भी जवाब दे रहा था, और मन भी कमज़ोर पड़ने ही वाला था कि 4 एनफील्ड आते हुए दिखी. राइडर्स को देखकर ख़ुशी हो ही रही थी और वह ख़ुशी जशन में बदल गयी जब उनमे से लास्ट राइडर ने मुझे से आगे निकलने के बाद अपनी एनफील्ड रूककर मुझे आवाज़ लगायी “अरे स्नेहल क्या कर रही है तू याहा,इधर आ” मैं गयी उस से गले मिली. ये थे मेरे फेसबुक फ्रेंड विशाल मयेकर जिनसे पहली बार ऐसे मुलाकात हो रही थी . अक्सर हम कहते है दुनिया बोहोत छोटी है,विशाल से मिलकर अनुभव भी कर लिया, मुझपे मुसीबत आने पर तो कुछ ज्यादा ही छोटी हो जाती है लगा. उसे जब मेरी परेशानी पता चली तुरंत बोले ” अरे टेंशन मत ले तू हमारे साथ रुकेगी”.और फिर हम रुके पटनीटॉप के उचाई पे बसे और बेहद खूबसूरत होटल ग्रीन टॉप के डबल सुइट में.

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Vishal aur Main

 

रूम के लिए इतना इंतज़ार, थोड़ी परेशानी, थोड़ी तकलीफ सब जायज़ लग रही थी उस सुइट, विशाल,जागृति और बाकी दोस्तों से मिलकर. मुलाकात, बात, खाना, बीएसएनएल से फ़ोन पर घंटो की लड़ाई इन सब के बाद समय था अगले दिन की शुरुआत के लिए अच्छी नींद लेने का.बिस्तर पर लेटे लेटे मिला जुला सा, कुछ अच्छा कुछ ख़राब सा दिन आँखो के से सामने गुजर रहा था. वो कहते है न “अंत भला तो सब भला”. जैसे खुशनुमा शुरू हुआ था दिन वैसे ही खुशनुमा तरीके से खत्म होने वाली थी रात,बस कुछ जवाब ढूंढ़ने की कोशिश के बाद .मोबाइल की दूकान पर मेरे ही जवाब “सब अपने ही तो लोग है ना” ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. जब सब अपने ही है तो क्यों हम लोगो से दर कर बहार नहीं निकल रहे है ? हम लोगो को अपना नहीं पा रहे है या लोग हमे? लिखते पढ़ते क्या हम रोबोट बनते जा रहे है जिनमे भावनाये नहीं होती?. जवाब ढूंढ़ते ढूंढ़ते तो मैं सो गयी पर क्या आप देंगे मुझे इन सवालो के जवाब.

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