जम्मू कश्मीर में स्वागत है


जुलाई 2016 और सेप्ट 2017 इस सवा साल में ज़िन्दगी इतनी बदल जाएगी लगा ही नहीं था. बदलना तो ये शुरू तभी से हो गयी थी जब लद्दाख जाने का सोचा था पर उसके बाद भी एक एक कर जो होता चला गया उसके लिए मैं तैयार नहीं थी. ये पोस्ट इतना देरी से आने का एक कारण रहा जुलाई 8 2016 की वो शाम जिसके निशान अभी भी मेरे साथ ही है. खैर क्या जिंदगी बदली और क्या हुआ था 8 जुलाई 2016 को ये आगे की पोस्ट में आपको पता चल ही जायेगा फ़िलहाल बात करते है उन रास्तो की जाहा वेगो चलाने का सपना ना जाने मैंने कब से देखा था. मेरा सपना पूरा करने के लिए जरूररत थी बस उस दरवाज़े को पार करने की. कौनसा दरवाज़ा आइये पता करते है.

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ये था वो दरवाज़ा था ” Excise Dept Toll Post Lakhanpur Welcomes You To Jammu & kashmir State”.उस पल को जीने के लिए कुछ देर गाडी पर बैठ कर उस दरवाज़े को निहारती रही और फिर उसे अपने कैमरे में कैद करने लगी. फिर अपनी वेगो चलाकर पोहोची मैं दरवाज़े के पार. जम्मू कश्मीर की चिकनी सड़क पर दौड़ती मेरी वेगो की ख़ुशी शब्दों से नहीं मेरे चेहरे की चमक से ही बयान हो सकती है. दोनों तरफ के नज़ारो को मैं देख रही थी, खुद ही खुद से बाते कर रही थी, खुद पर ही यकीन नहीं हो रहा था,अजीब सी ख़ुशी थी, और इन सब के बिच दिल से दो लोगो को शुक्रिया करना चाहा रही थी. थोड़ी देर बाद वेगो रोक उन्हें कॉल करने का सोचा पर जम्मू कश्मीर जितने तहे दिल से मुझे बुला रहा था उतने ही तहे दिल से फ़ोन के नेटवर्क को अलविदा भी कह चूका था. थोड़ा बुरा लगा और थोड़ा टेंशन आया पर सफर तो जारी रखना ही था. लक्ष्य था उस दिन का पटनीटॉप.

पूछते पूछते जाना था. साम्बा तक तो सफर बड़े आराम से कटा सीधी लम्बी चिकनी सड़क पर जब लद्दाख जाने की सोची हो तो इन सड़को से लेना ही क्या था. आगे रास्ते कैसे होंगे इनकी हलकी सी झलक साम्बा उधमपुर के रास्तो ने दे दी. जाना ऊंचा था, रास्ता ख़राब था, बिच में कही पूल का काम चालु था. दिमाग संतुलन खो ही रहा था पर ये नज़ारे और अपने लक्ष्य की और बढ़ते कदम ने संभाल लिया. चलती ,रूकती, थकी हुयी पोहोची में एक रेस्टॉरंट पेट पूजा और कुछ आराम के लिए,रेस्टोरेंट करीब खाली ही था तो जाकर बैठ गयी मैं एक टेबल पर. बैठी ही थी की वेटर आया और हालत देखकर बोला,टेबल की और इशारा करते हुए मैडम आप वहा बैठ जाइये अच्छी ठंडी हवा आएगी. जैसे ही बैठी उन्होंने खिड़की खोली और नज़ारा था हरी भरी वादियों का, थकान उन्हें देखते ही काहा चली गयी पता ही नहीं चला. बैठकर अपने फ़ोन का नेटवर्क देखने की सोची पर कुछ हासिल नहीं हुआ, फ़ोन बंद चालू करके देखा कुछ नहीं हुआ तो वेटर से पूछा, पता चला प्राइवेट नेटवर्क यही से बंद हो जाते है बीएसएनएल और यहाँ के नंबर ही चल पाएंगे.बीएसएनएल का सिम तो था मेरे पास पर माइक्रो नहीं और इसलिए उसे एक्टिव भी नहीं कर पा रही थी. ये बात उन्हें बताई तो बोले मैडम आप मेरे फ़ोन में सिम डाल लीजिये और एक्टिव कर लीजिये, आपको कुछ कॉल करने होंगे तो मेरे फ़ोन से भी कर सकते है आप जब तक है यहाँ रख लीजिये मेरा फ़ोन. जितनी खूबसूरत वो वादियां थी वैसी ही खूबसूरती की झलक दिखी मुझे उनमे. खाना तो खिलाया ही उन्होंने पर मेरी परेशानी में भी मदद करने की कोशिस की. उनकी मदद से बीएसएनएल एक्टिव तो हो गया था पर कॉल और इंटरनेट बंद थे. आराम और पेट पूजा करके बढ़ी मेरी वेगो आगे के सफर के लिए.

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शाम करीब 6 बजे पोहोची मैं अपनी मंज़िल पटनीटॉप. पहाड़ो से घिरा हुआ ये हिल स्टेशन, ठंडी हवा, बेहते पानी की आवाज़ और पहाड़ो को देखती मेरी वेगो. याहा मेरी थकान मेरी ख़ुशी पर हावी हो रही थी, इसलिए जल्दी ही चली गयी मैं रेहने के लिए रूम ढूंढ़ने. रूम थोड़े मेहँगे थे और उसपे लोगो को मुझपे विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,उन्होंने एनफील्ड और बाकी बड़ी गाड़ियों में लोगो को आते हुए देखा था पर एक अकेली लड़की मोपेड पर याहा,मुश्किल से एक रूम मिला. रूम साफ़ करने के लिए बोलके मैं निकली अपने बीएसएनएल सिम को माइक्रो करने. एक ही मोबाइल की छोटी सी टिन की दूकान थी वाहा जो मुझे होटल वालो ने ही बताई थी.

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Patnitop

दूकान में मशक्कत बड़ी लम्बी चली, दूकान में माइक्रो सिम कट करने के लिए साधन था नहीं और दुकानदार भी डर रहा था की कुछ गड़बड़ हो गयी कट करने में तो सिम ख़राब ना हो जाये. मैंने ही थोड़ा फाॅर्स किया फिर वो माने अब सिम कट हो गयी फ़ोन में डाल भी दी पर नेटवर्क आने का नाम नहीं. फिर थोड़ी देर में समझा की सिम वो गलत डाल रहे थे. ये सारि मशक्कत जब चल रही थी तब हम में कुछ बाते भी हुयी और बातो बातो में मुझे एक सवाल पूछा गया –

“इतने दूर अकेले आपको डर नहीं लगता? मैंने पूछा डर किस से सब अपने ही तो लोग है ना, हां पर फिर भी कुछ हो गया तो मेरा जवाब था क्या होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ हुआ भी तो बस जान ही जाएगी इस से ज्यादा और कुछ हो सकता है क्या?. जवाब सुनके वो थोड़े दंग हुए और फिर मुस्कुराये की हां और होगा भी क्या.”

फ़ोन का काम ख़तम हो गया था और बाते भी. फ़ोन पे मशक्कत उन्होंने काफी की पर पैसा एक नहीं लिया और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया. एक मुश्किल याहा हल हो गयी थी पर पता नहीं था की दूसरी मुश्किल सामने ही इंतज़ार कर रही थी. जब होटल पोहोची रूम पर तो मैनेजर ने ये बोलते हुए “मैडम रूम का एडवांस बुकिंग था, हमे लगा बुकिंग कैंसिल हो गयी है अभी तक कोई आया नहीं तो,पर अभी उनका कॉल आया था और उन्होंने बताया की वो आ रहे है”. मैं सामन लेकर निचे आयी अपनी वेगो के पास खड़ी हो गयी, समझ ही नहीं आ रहा था अब रात में क्या करू. थकान से शरीर भी जवाब दे रहा था, और मन भी कमज़ोर पड़ने ही वाला था कि 4 एनफील्ड आते हुए दिखी. राइडर्स को देखकर ख़ुशी हो ही रही थी और वह ख़ुशी जशन में बदल गयी जब उनमे से लास्ट राइडर ने मुझे से आगे निकलने के बाद अपनी एनफील्ड रूककर मुझे आवाज़ लगायी “अरे स्नेहल क्या कर रही है तू याहा,इधर आ” मैं गयी उस से गले मिली. ये थे मेरे फेसबुक फ्रेंड विशाल मयेकर जिनसे पहली बार ऐसे मुलाकात हो रही थी . अक्सर हम कहते है दुनिया बोहोत छोटी है,विशाल से मिलकर अनुभव भी कर लिया, मुझपे मुसीबत आने पर तो कुछ ज्यादा ही छोटी हो जाती है लगा. उसे जब मेरी परेशानी पता चली तुरंत बोले ” अरे टेंशन मत ले तू हमारे साथ रुकेगी”.और फिर हम रुके पटनीटॉप के उचाई पे बसे और बेहद खूबसूरत होटल ग्रीन टॉप के डबल सुइट में.

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Vishal aur Main

 

रूम के लिए इतना इंतज़ार, थोड़ी परेशानी, थोड़ी तकलीफ सब जायज़ लग रही थी उस सुइट, विशाल,जागृति और बाकी दोस्तों से मिलकर. मुलाकात, बात, खाना, बीएसएनएल से फ़ोन पर घंटो की लड़ाई इन सब के बाद समय था अगले दिन की शुरुआत के लिए अच्छी नींद लेने का.बिस्तर पर लेटे लेटे मिला जुला सा, कुछ अच्छा कुछ ख़राब सा दिन आँखो के से सामने गुजर रहा था. वो कहते है न “अंत भला तो सब भला”. जैसे खुशनुमा शुरू हुआ था दिन वैसे ही खुशनुमा तरीके से खत्म होने वाली थी रात,बस कुछ जवाब ढूंढ़ने की कोशिश के बाद .मोबाइल की दूकान पर मेरे ही जवाब “सब अपने ही तो लोग है ना” ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. जब सब अपने ही है तो क्यों हम लोगो से दर कर बहार नहीं निकल रहे है ? हम लोगो को अपना नहीं पा रहे है या लोग हमे? लिखते पढ़ते क्या हम रोबोट बनते जा रहे है जिनमे भावनाये नहीं होती?. जवाब ढूंढ़ते ढूंढ़ते तो मैं सो गयी पर क्या आप देंगे मुझे इन सवालो के जवाब.

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7 comments

  1. बहुत खुशी हुई फिर आपको पढ़ कर यूँ इंतजार लंबा था और कहूँ तो चिन्ता भी थी। आपसे एक अनोखा रिश्ता बन गया है। अगले पोस्ट के इंतजार में-

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    1. धन्यवाद, इस बार थोड़ी देर कर दी लिखने में, अगली पोस्ट बहुत जल्दी लिखूंगी. रिश्तो की खूबसूरती ही वही होती है शायद कब कैसे बन जाते है पता ही नही चलता.

      Liked by 1 person

  2. Although unintended, the most striking feature in this blog was the mention of change in your life in the last one year post the highlighted incident!
    Amen… did it change!!!!
    But all for the better n for a cause i suppose…
    Episode 1 of season 2 of the leh ladakh trip has started with a promise of the fantasy read yet to come… looking fwd to the same.
    Keep penning!!

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