कश्मीर के रंग


28th June 2016 : अपने सफर को आगे बढ़ाते हुए सुबह 7 बजे निकली मैं  सोनमर्ग का लक्ष्य लेकर. हल्का सा कोहरा, जून में नवंबर वाली ठण्ड और रास्ते के साथ साथ चलती झेलम नदी का मजा लेते हुए शुरू हुआ ये सफर. सोनमर्ग के लिए श्रीनगर होते हुए जाना होता है तो निकल पड़ी मैं बीआरओ द्वारा लगाए हुए रास्ता बताते हुए साइन बोर्ड के इशारो पे श्रीनगर की ओर.आज पहाड़ चढ़ने नहीं उतरने थे.सफर चालू तो कर दिया पर मुश्किल ये की इस ज़िन्दगी में  रंग भर देने वाले मौसम को छोड़कर आगे बढ़ा कैसे जाये.आगे नज़ारे और खूबसूरत ही होने वाले थे पर शर्त ये थी इन्हे छोड़ा जाए. जी कर रहा था वेगो को सड़क किनारे खड़ा करा बैठ जाऊ दिल को शांति देने वाले इन नज़ारो को देखते हुए पर एक नए लक्ष्य का मुझे भी इंतज़ार था .पटनीटॉप से बहार निकलकर जो सबसे पहला काम करना था वो था रकसैक को बारिश से बचाने के लिए ताड़पत्री लेने का.पटनीटॉप से पास ही एक शहर में मुझे काम का सामान मिल गया और फिर सफर कैसे आगे बढ़ रहा था इन मदमस्त हवाओ के साथ कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, की अचानक इस खुले मौसम में कुछ बंद बंद महसूस होने लगा और तब समझा की मेरी वेगो कुछ ही देर में पोहोचने वाली है धरती का स्वर्ग कश्मीर.

सुरक्षा इंतज़ाम एकदम कड़े जहा नज़र घुमाओ पहाड़ पेड़, खूबसूरती और उसके साथ बन्दुक ताने हमारे आर्मी जवान. दूकान के सामने, बनते हुए घर की छत पे, खेलते हुए बच्चो के पास, स्कूल के सामने, पेट्रोल पंप पर, सड़क के किनारे, जंगल के बिच, 2 sec के लिए तो लगा जैसे किसी और देश में आ गयी हु जो आज़ाद नहीं है. वादिया सुन्दर थी पर उनकी हवाओ में डर सा था. हर लोग वाहा 24 घंटे किसी की निगरानी में था. बुरा लग रहा था वो देखकर, बुरा लग रहा था उन लोगो के लिए जो इस निगरानी में जीते है, खुशकिस्मत महसूस कर रही थी खुदको की मैं ऐसे शहर ऐसे वातावरण में पली की आज़ाद भारत को आज़ाद ही देखा. बड़ा मुश्किल होता जीना अगर बंदूकों की निगरानी में जीना पड़ता. उस 10 15 min में बोहोत गुस्सा आया,डर भी लगा खुद पर शर्म भी आयी, कुछ आँखे नम हुयी ,50 सवाल मन में आये पर थी मैं लाचार।

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गलत न वाहा के लोग थे न हमारे आर्मी के जवान, हलात के आगे मजबूर थे सब बस. आगे का सफर अब ऐसे ही कटना था जवानो के समूह और निगरानी के साथ. पहली बार आर्मी को देखकर मेहफ़ूज़ नहीं डर लग रहा था. अब नज़ारे कुछ कम ही अपनी और खींच रहे थे, सफर कब ख़तम होगा इसका इंतज़ार ज्यादा था. सफर ख़तम करने के लिए आगे बढ़ना जरुरी था और बढ़ते बढ़ते वेगो पोहोची कश्मीर के प्रवेश द्वार जवाहर टनल.  1956 में बना गया 2.5 km लम्बा ये टनल जो ले चलता है आपको कश्मीर की वादियों में. किस्मत से जब मैं टनल में गयी मेरे आगे ही एक टैक्सी थी जिसकी लाइट की मदद से टनल पार कर पायी, वरना वेगो की हेड लाइट में उस अँधेरी सुरंग से निकलना मुश्किल ही ठहरता। अपने देश की एक और ऐतिहासिक जगह से होकर गुजरने की थोड़ी ख़ुशी हो रही थी. जवाहर टनल के बहार निकलते ही खड़ी थी हमारी आर्मी जवानो का समुह. इच्छा थी उस ऐतिहासिक टनल को कैमरा में कैद करने की पर  ध्यान ये भी था की सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए बिना इजाजत फोटो ना ली जाए. इजाजत मिलनी नहीं थी ये भी तय ही था और वही हुआ भी एक आर्मी अफसर से पूछने के बाद. कैमरा में ना सही दिल में वो अनुभव हमेशा कैद रहेगा.

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हरी भरी वादियों से होकर गुजरने के बाद समय था कश्मीर के शहरों से गुजरने का और ऐसे ही एक शहर क्वाजिगंड  से गुजरते हुए अचानक से मुझे रोक लिया पुलिस चौकी के बिलकुल आगे एक पुलिस सिपाही ने. मैं थी पूरी तरह से पैक हेलमेट स्क्राफ् जैकेट ग्लव्स जूते.देखते ही पहला सवाल उन्होंने पूछा “आप तो पेहले ये बताइये आपको मैं सर बोलू या मैडम”. तब मैंने अपना हेलमेट और स्क्राफ् हटाया-

” अच्छा तो आप मैडम है, मैडम ये बताइये आपने गाडी का लाइट क्यों चालू रखा है? बंद कीजिये उसे ,कहा से है आप और कहा से आ रही है आप इस स्कूटी पर? साथ में कौन है आपके? “.

उन्हें बताया मैंने टनल पार करने के बाद लाइट बंद करना भूल गयी , कोई साथ नहीं है नागपुर से आयी हु मैं ,सोनमर्ग जा रही हु. उन्हें चौकाने के लिए इतने जवाब काफी थे. “अकेले आयी है आप इतने दूर से”?. चाय पीना पसंद करेंगी.

आप सफर में हो कोई आपको चाय के लिए पूछे और आप मना कर दे इस से बड़ा और गुनाह कोई हो नही सकता, क्युकी जहा चाय को मना किया मतलब एक नए रिश्ते को भी आप मना कर गए और कुछ नया जान ने को भी.जवाब मेरा हां था सोचा चलो चौकी में बैठके चाय पि जाये कुछ यादे, कुछ रिश्ते बटोरे जाए और आराम भी चाइये ही था. पर चाय चौकी पे नहीं तो चौकी के कैंपस में बने कैंटीन में  पीनी थी. कैंटीन के बहार कुछ टेबल कुर्सियां लगी थी  पेड़ो से घिरी हुई, वही बैठने का सोचा. कैंटीन वाले को बोलकर मेरे लिए चाय बुलाई गयी, पुलिस वाले अंकल ने तो साथ में चाय पि नहीं वो मुझे बिठाकर वापस ड्यूटी पर चले गए “मैडम आप आराम से बैठिये चाय पीजिये”. चाय के साथ मुझे जरुरत थी नाश्ते की भी, सुबह से कुछ खाया नहीं था तो मैंने नाश्ता भी मंगवा लिया। पुलिस अंकल एक बार बिच में आकर देख गए कही मैं परेशान तो नहीं हो रही फिर नाश्ता ख़तम भी हो गया पर वो नहीं आये. मैंने कैंटीन में बिल के लिए कहा तो पता चला “बिल तो आपका दे दिया है वो पुलिस जो आपको लेकर आये थे” मैं थोड़ा चौकी ये सुनकर और थोड़ी मुस्कुरायी भी. बस दुःख इस बात का रहा की उन्हें धन्यवाद् नहीं कर पायी,उनकी ड्यूटी खत्म करके बिल देकर वो घर जा चुके थे. वाहा कुछ देर आराम करके वेगो आगे बढ़ी अपनी मंज़िल सोनमर्ग की तरफ.

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दिन चढ़ रहा था पर मौसम ऐसा की धुप का नामों निशाँ नहीं वरना नागपुर में तो जून के अंत में भी जलाने वाली धुप होती है. नज़ारे भी रास्तो के साथ बदलते हुए, ताज़ा कर देने वाले और इतने शहर इतने कस्बो से गुजरने के बाद आर्मी के मौजुदगी की की भी आदत हो ही गयी थी. हमारी हिफाज़त के लिए ही थे वो वाहा अपने परिवार से दूर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए.  अब डर नहीं मेहफ़ूज़ लगने लगा था उनके साथ, पता था कोई परेशानी आयी भी तो ये रहेंगे साथ, कही मैं अकेली नहीं हु.

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वेगो गुज़र रही थी कश्मीर के अलग अलग रास्तो और कस्बो से और ऐसे ही एक कस्बे संगम जो अनंतनाग में पड़ता है ,के पेहले रास्तो के दोनों तरफ दिखने लगी सुप्रसिद्ध कश्मीरी विलो बैट से सजी हुई दुकाने.दुकानों के साथ ही बैट वहा बनायीं भी जा रही थी. यहाँ की सड़के भी घाट रास्तो से अलग 4 लेन हो गयी थी कुछ देर उन रास्तो पर तेजी से वेगो दौड़ाने का मज़ा लिया। इस मज़े में कब गलत रास्ते चली गयी ध्यान ही नहीं रहा और फिर स्वागत किया आर्मी ने. बड़े सख्त से दिखने वाले एक अफसर ने रोक कर पुरे पेपर चेक किये, उतनी ही सख्ती से सही रास्ता बताया और जाने को कहा. मन ही मन मैं ये सोच रही थी की कितना मुश्किल होता होगा इतना सख्त रहना, कभी कभी ना चाहते हुए भी यु बेरुखी दिखाना, ड्यूटी तो पर ड्यूटी है और जिम्मेदारी जब देश की हो तो चूक की गुंजाइश कहा.

संगम से श्रीनगर अब ज्यादा दूर नहीं था लगभग 50 km. शाम करीब 4 4.15 बजे पोहोची मैं श्रीनगर। कैसा था श्रीनगर? बोहोत खूबसूरत, रास्तो के किनारे चिन्नार के लम्बे लम्बे पेड़ , आपके साथ चलता दल लेक, लेक के एक तरफ जहा था शहर वही बाकी तरफ घिरा हुआ था पहाड़ियों से , ठंडी बहती हवा. दल लेक पर कुछ देर समय बिताया पहाड़, पेड़, पानी, हवा,, खूबसूरती आप समझ ही सकते है क्या महसूस हो रहा होगा मुझे वाहा। श्रीनगर से मुझे दवाई लेनी थी और एक अड़चन थी बीएसएनएल की जिसे चालू करना था. दल लेक में समय बिताकर पोहोची मैं मेडिकल की दूकान, दवाइया ली और रास्ता भी पूछा सोनमर्ग के लिए. दूकान में मेरे बाजु में खड़े हुए अंकल और दूकान वाले अंकल ने सलाह मसहूरा कर  सही रास्ता बताया लाल चौक से भेजा जाये या नहीं ये वो सोच रहे थे. दूकान से बहार निकली तो जिन्होंने रास्ता बताया था वो अपनी कार निकालते हुए फिर मिल गए. मेरी वेगो देख थोड़ा चौक गए फिर बोले “बेटा याहा से चले जाओ, रास्ता अच्छा है, आराम से जाना, डरने की कोई कोई बात नहीं और अपना ध्यान रखना” केहकर वो निकल गए. अब बीएसएनएल की परेशानी हल करने का समय था, किस्मत ने इस बार बड़ा साथ दिया और कॉल सेण्टर में किसी समझदार ने फ़ोन उठा लिया और परेशानी 5 min में हल कर दी, कोशिश पटनीटॉप जिस दिन पोहोची थी उस दिन से ही चालू थी सिम चालू करने की और हल हुई श्रीनगर पोहोचकर इस बिच करीब २० कॉल सेण्टर एक्सेक्यूटिव्स से बात कर चुकी थी मैं. परेशानी हल हुई वो ज्यादा जरुरी था. अब शुरू होने वाला था आज की यात्रा का अंतिम पड़ाव। श्रीनगर से शाम 5 बजे निकली मैं सोनमर्ग की और. शाम यहाँ ८ बजे के बाद होती है तो और 3 घंटे का समय था मेरे पास 80 85 km पूरा करने के लिए.

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सोनमर्ग की तरफ बढ़ते हुए रस्ते कुछ और छोटे होते चले गए थोड़े ख़राब भी ,पहाड़ कुछ बड़े, नदियां सफ़ेद और दिखने लगे बर्फ से लदे पहाड़। कश्मीर को जन्नत क्यों कहा जाता है इसकी झलक मिलनी शुरू हुई उन रास्तो पर, समय की पाबंदी ना होती तो 3 घंटे का वो सफर मैं पूरा करती 6 घंटो में. थोड़ा ज्यादा समय बिताती में उन वादियों में अपनी वेगो के साथ. जब पटनीटॉप से सफर चालू किया था तो नदी कही कही साथ तो थी पर पास नहीं की छू सके पर सोनमर्ग से 1 घंटे पहले से जो नज़ारा देखने मिला वो आज भी ख़ुशी से भर देता है. सामने थोड़े भूरे रंग के पहाड़ कुछ बर्फ से ढ़के हुए सूरज की रौशनी से केसरी रंग लेते हुए,ऐसा लग रहा था जैसे कोई ब्रश लेकर रंगो की चित्रकारी कर रहा हो, उन्ही के बाजू में हरे रंग को लपेटे हुए पहाड़ और उन रंगो की जुगलबंदी करते पहाड़ो के नीचे बहती सफ़ेद पाक सिंध नदी. तभी कहा गया है ” जन्नत गर कही है तो यही है यही है यही है” .जन्नत जो जिंदगी को नयी उमंग से भर दे, जिंदगी ना मांगने वाले भी 100 साल के ऊपर जीने की दुआ मांगने लगे. उन रंगो को आँखों में भर उनके साथ अपना समय बिता कर निकली उन नज़ारो के साथ साथ सोनमर्ग. अब ये पहाड़ ये नदी ये रंग साथ ही चलने थे और इन्ही के साथ प्रवेश हुआ मेरा सोनमर्ग में. 8 बजे करीब मैं पोहोची सोनमर्ग और सोनमर्ग बाजार में जाहा गेस्ट हाउस होटल्स की लाइन लगी हुई थी उन्ही में से एक जगह कमरा लिया। इतनी सुंदरता आँखों में भरने के बाद अब समय था आराम का. कहानी और भी है पर अगली कड़ी में

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