एक अकेली लड़की और ज़ोजि ला कारगिल का सफर


कही किसी मूवी में डायलॉग सुना था “ज़िन्दगी में कुछ बन ना हो, कुछ हासिल करना हो, कुछ जितना हो तो अपने दिल की सुनो”. ऐसे ही दिल की सुनके शुरू किया था सफर जम्मू कश्मीर का, पर बिना जोखिम लिए कहा कुछ हासिल होता है. दिल्ली से सोनमर्ग का सफर तो कर लिया था आराम से, अगर 10 15 km के ख़राब रास्तो की बात छोड़ दे तो बाकी रस्ते अच्छे ही थे और पहाड़ो की उचाई भी कम. अभी तक ऐसा रास्ता नहीं पार किया था जो सबसे खतरनाक रास्तो में से एक माना जाता है पर आज 30/06/2016 इस जोखिम से लड़कर लद्दाख में प्रवेश करना था .

एक दिन पहले सोचा था की सुबह 6 बजे सोनमर्ग से निकलकर राइड शुरू की जाएगी पर ऐसा होना कहा था जब रात में कमीने दोस्त आपके साथ हो. मुझे टेंशन हो रही थी अगले दिन सुबह राइड की पर हम ज्यादा बिजी थे “सौ तरह के दर्द ले लू इश्क़ का दर्द क्या है,तू कहे तो जान दे दू कहने में हर्ज़ क्या है“,गाना मैं सही गा रही हु या नहीं ये पता करने में. मैं कोशिश कर रही थी कमीनो को मनाने की यार सामान गाडी पर बांध देना और ये मशगूल थे बहाने में “मैं नहीं उठ रहा इतनी सुबह मदद से ज्यादा नींद प्यारी है मुझे, ओये तू मदद कर देना सुबह स्नेहल को“. अभी तक रकसैक सामने वेगो के लेग स्पेस पर ही रख कर राइड किया था पर अब से 10 ltr की पेट्रोल कैन भी साथ में लेकर चलना था, साथ ही गाडी का बैलेंस भी रखना था. आगे पहाड़ ऊँचे होने वाले थे और रास्ते बदतर,तो सबसे सही ऑप्शन था रकसैक को पिछली सीट पर बांधना,पेट्रोल कैन और एक छोटी बैग जिसमे रास्ते के लिए जरुरत का सामान हो आगे रखना, पैर रखने को भी ज्यादा जगह मिल जाए. आज तक कभी बंजी रोप्स इस्तेमाल नहीं किये थे तो मदद चाहिए थी. रात की बहस और मस्ती के बाद सुबह ही 6 बजे हुई,दोस्त भी उठ चुके थे उन्होंने सामान बांध कर दिया वेगो पर, थोड़ा मुश्किल हो रहा था पर इंजीनियर दोस्त होने के बाद टेंशन ही क्या,कोई ना कोई जुगाड़ हो ही जाता है. सब निपटा कर 7 बजे करीब शुरू हुयी राइड.

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सोनमर्ग खत्म हुआ नहीं की शुरू हुई चढाई सबसे खतरनाक माने जाने वाले रास्ते में से एक रास्ता ज़ोजि ला की. चढाई शुरू हुई नहीं की धूल मिट्टी स्वागत में तैयार मिले और रास्ता आधी लेन से भी कम. यही पे ट्रक चलनी थी, यही पे बाइक्स, यही पे कार भी वो भी दोनों तरफ से. पहाड़ के साथ चलते इस रास्ते पर गलती की गुंजाईश रखी नहीं जा सकती थी क्युकी दूसरी और थी खाई.वेगो और मैं पहली बार 3500 mtr की उचाई चढ़ने वाले थे.ये पास लद्दाख को श्रीनगर से जोड़ता है जो 6 महीना बर्फ जमा होने की वजह से बंद रहता है.लद्दाख का संपर्क टूट जाता है बाकी शहरों से यातायात बंद होने से और ये महीने बड़ी मुश्किल से भरे होते है यहां के लोगों के लिए . लोगो ने पहले ही काफी कुछ बता रखा था मुझे जोजी ला के बारे में तो मैं थोड़ा ज्यादा सावधान होकर ही वेगो चला रही थी. रास्ता छोटा होने की वजह से रुकने की ज्यादा जगह नहीं थी इसलिए जहा भी जगह दिखती की वेगो रोक के आराम किया जा सके तो गाडी रोक देती. ऐसी ही एक जगह मिली आधे घंटे के बाद ही. चढाई जितनी मुश्किल नहीं लग रही थी उतनी ज्यादा मुश्किल बन रही थी धूल. रास्ते काफी ख़राब थे पर इन ख़राब रास्तो का दर्द मिटाने के लिए थे कश्मीर के सुन्दर नज़ारे. थोड़े आराम के बाद शुरू हुआ आगे का सफर, अभी तक किसी बड़ी गाडी का सामना नहीं हुआ था . सफर के शुरुआत में सामने दिख रहे थे कुछ बर्फ से कुछ पेड़ से ढके पहाड़, दाए थे बंजर पहाड़ और बाएं तरफ खाई जहा दिख रहे थे रंग बिरंगी घर और बहती नदी. सफर जैसे आगे बढ़ा सामना हुआ बड़ी गाड़ियों से. यहाँ लगा था थोड़ी मुश्किल होगी पर उनकी समझदारी ने मेरी मदद कर दी सामने से आने वाले ट्रक जैसे मेरी गाडी देखते वो पहले मुझे जाने देते और फिर खुद आगे बढ़ते, उनकी मदद से तकलीफ कुछ कम हुयी. अभी तक तो रास्ते पर बस धूल पत्थर से मुलाकात हुई थी पर अब समय था पानी से सामना करने का, पहाड़ की बर्फ पिघलने से रास्ते पर ठंडा पानी जमा हो रहा था,पानी के बिच बड़े बड़े पत्थर पहली बार ही वेगो को सामना करना था वॉटर क्रॉसिंग का. पानी के पहले ही थोड़ी देर अपनी वेगो रोकी देखने के लिए की कहा से पार किया जाये और शंका भी थी बिना गिरे पार होगा या नहीं. पर बहार से जितना मुश्किल लग रहा था उतनी मुश्किल पार करते हुए नहीं हुई,शायद सभी मुश्किल के साथ कुछ ऐसा ही होता है जब तक उस से लड़ते नहीं तभी तक वो मुश्किल मुश्किल लगती है. पार करने के बाद ही खड़ी थी एक एवेंजर जिस पर कश्मीर का नंबर प्लेट था और २ नौजवान उस पर सवार थे. मैं जैसे ही पार पहुंची उन्होंने पूछ लिया आप इस गाडी से कहा जा रहे है? जब बताया उन्हें ” हम तो श्रीनगर से आये है वो भी एवेंजर पे फिर भी हमारे लिए मुश्किल हो रहा है,हम तो बस अब यही से वापस जायेंगे और आप इसपे इतना दूर जा रही है, All The Best“. बदलते नज़रो के साथ बदल रहा था सफर भी कुछ मुश्किल कुछ आसान, कुछ और छोटी सड़के, कही पे चलता सड़क का काम, कभी दिखती आर्मी की गाड़िया और इन्ही सब के मजे लेते पहुंची जीरो पॉइंट जहा थोड़ी देर रुक कर आराम करने का सोचा. मुश्किलों से भरा ज़ोजि ला अब खत्म होने वाला था. जितना मुझे डराया गया था ज़ोजि ला के नाम पर उतना खतरनाक मुझे लगा नहीं कुछ कारण इसके ये थे की बर्फ बहुत कम थी, बारिश नहीं हुई थी और लोगो का सुनकर मैंने खुदको बुरे से बुरे के लिए तैयार रखा था. हां पर उसे पार करके बड़ी राहत महसूस हो रही थी.

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जीरो पॉइंट पर मैंने गाडी रोकी ही थी की एक SUV भी आकर रुकी. मुझे देखकर वो थोड़े चौके, इन लोगो से एक दिन पहले रात को मिल चुकी थी तब बस पति पत्नी दोनों से मुलकात हुई थी आज पूरा परिवार साथ था.पुणे से आये थे ये लोग इसलिए एक मराठी मुलगी से मिलकर इन्हे और थोड़ी ज्यादा ख़ुशी हो रही थी “एक अकेली लड़की” वो भी मोपेड पे इतनी दूर.उन्होंने मेरे साथ तस्वीर खींचने की इच्छा जताई, इतने सभ्य तरीके से उन्होंने पूछा था की मना करना लाजमी ना था पर पता नहीं था “Can I click a picture with you” आगे पुरे सफर में सुन ना पड़ेगा. आगे बढ़कर मैं फिर लद्दाख में वेलकम करते हुए बोर्ड के पास रुकी. वहा फिर मिला एक परिवार जिन्हे वेगो पर अकेले वहा पहुंचने पर आश्चर्य और ख़ुशी थी, पर न तो गाडी की इज्जत थी ना मेरे सामान की. उन्होंने एक बार वेगो पर तस्वीर खींचने और एक राउंड लेने की इच्छा जताई उन्हें मैंने हां कहा. पहले उन्होंने मेरा हेलमेट गिराया फिर गाडी पर सामने रखे हुए ग्लव्स, बोहोत गुस्सा आ रहा था. आगे से अब ये पता था की कही भी रुक जाओ मुझे शान्ति से समय नहीं बिताने मिलेगा. इस फॅमिली से मिलकर जो गुस्सा था सोचा आगे जाकर किसी ऐसी जगह जहा आस पास कोई ना हो वहा बिताकर कम किया जाए. ऐसी ही एक जगह पर वेगो रोकी और बस पीछे से ही एक गाडी आयी पठानकोट से रोड ट्रिप पर निकले 4 अंकल थे उन्होंने आकर बड़े प्यार से बात की ” बेटा हम लोग बस आगे पीछे ही चल रहे थे, आपको इस मोपेड पर देखकर ही थोड़ा झटका लगा, बड़ी गाडी में होकर भी हमे थोड़ी परेशानी हो रही है, पहले आप से मौका नहीं मिला बात करने का अभी आप यहाँ रुके हुए दिखे तो लगा कही कोई परेशानी तो नहीं पूछ लू , बेटा बहुत अच्छा लगा आपको देखकर कैसे आ गए आप इतना दूर, हम तो डरते है अपनी बेटियों को शहर में ही कही बहार अकेला भेजने में पर अब आपको देखकर हमे हिम्मत मिली है हम भी अपनी लड़कियों को अब बहार निकलने देंगे“. जितना गुस्सा था सारा शांत हो गया. अच्छा लग रहा था मेरी एक राइड किसी की सोच बदल रही है. थोड़ी बात करके वो निकले और कुछ ही देर में मैं भी आगे निकली.

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मैं बढ़ रही थी अब द्रास की और,और रास्ते ख़राब ही होते जा रहे थे.धूल मिट्टी अलग परेशान कर रही थी आधे पौन घण्टे के ऊपर गाडी चलाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए रुक रुक कर गाडी चलानी पड़ रही थी. ज़ोजि ला से द्रास करीब 40 km ही है पर रास्ते ख़राब होने से सफर का समय ज्यादा हो गया था. जब थक जाती तो साथ चलती द्रास नदी के साथ समय बिताने बैठ जाती. वहा की खूबसूरती को शब्दों में ढालना मेरे बस की बात नहीं इलसिए मैं ज्यादा मेरे अनुभवों की ही बात करुँगी. नदी किनारे मैं रुकी और 5 min में मेरे साथ रुकी 1 मारुती और 1 SUV. SUV पुणे की थी मेरे वेगो का नंबर प्लेट भी पुणे का, तो पहली ख़ुशी वही की “आपली महाराष्ट्रियन मुलगी” फिर उन्होंने काफी डिटेल्स ली. आपने वेगो को बताया है क्या, स्पॉन्सरशिप लेनी चाहिए थी, पर ये सारी चीज़ो से मैं थोड़ा परे थी तो उन्होंने खुद ही कहा हम बात करके देखते है, उन्हें मेल करते है और जो सबसे बड़ी बात उन्होंने कही वो थी “आपसे ज्यादा तारीफ़ आपके घरवालों की होनी चाहिए सही हिम्मत तो उन्होंने की है आपको यहाँ भेजकर“.ये मेरे लिए बहुत गर्व की बात थी. दूसरी गाडी जो मारुती रुकी थी उसमे 3 दोस्त इंदौर से चले आ रहे थे पर नज़ारो से ज्यादा वो कांच बंद करके AC की हवा खाने में खुश थे, स्किन ख़राब होने का डर उन्हें ज्यादा था, उन्होंने भी कुछ साथ में तस्वीरें ली.

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मेरा वहा कुछ देर और रुकने का मन हुआ,आते जाते बहुत सारे बाइकर्स दिखे कुछ अकेले कुछ ग्रुप में. उन्ही आते जाते बाइकर्स में से दो बाइकर्स पास आकर रुके “All Well“, बहुत अच्छा लग रहा था उनसे बात कर कर ,वो Royal Enfield लेकर आये थे मेरा वेगो का एक्सपीरियंस पूछा और सबसे ज्यादा ख़ुशी तो इसलिए हुई की आगे के रास्ते का पूरा पूरा हाल उन्होंने बता दिया, “द्रास कुछ ही दूर है और वहा से रास्ते अच्छे हो जायेंगे” सुनकर ही अलग एनर्जी आ गयी, उनमे से एक राइडर साहिल आनंद 8 9 बार लद्दाख जा चूका था उसे हर कोने हर चप्पे की खबर थी. उनके निकलने के थोड़ी देर बाद ही मैं भी निकली और पहुंची द्रास.

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दुनिया की सबसे ठंडी जगह में दूसरे नंबर पर है द्रास और यहाँ पर तोलोलिंग परबत के निचे बसा 1999 के भारत पाकिस्तान लड़ाई में शहीद हुए हमारे आर्मी जवानो की याद में बना कारगिल वॉर मेमोरियल. तीनो तरफ पर्वतो से घिरा ये मेमोरियल. मेमोरियल में गाडी पार्क करके आप सीधा पहुंचते है विजय पथ पर, 1999 के विजय ऑपरेशन पर से दिया गया ये नाम. विजय पथ के दोनों तरफ आपको लहराते मिलेगा हमारा तिरंगा.विजय पथ आपको ले चलता है जवानो की समाधी के पास वहा श्रद्धा में जलती ज्योत. वहा पे खड़े हमारी आर्मी के जवान बयां करते है दास्ताँ ऐ कारगिल, सुनाते है हमें हमारे जवानो की बहादुरी, साहस, शौर्य,त्याग और जित की कहानी जो आपके रोंगटे खड़े कर दे और गर्व से भर दे. मेमोरियल की एक दिवार पर लगे बोर्ड पर लिखे हुए है शहीद हुए जवानो के नाम और बिच में शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी हुई कविता में से चार लाइन “शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालो का बस यही बाकी निशान होगा”.क्या होंगे वो लोग जो हमे बचाने के लिए अपनी जान गवा बैठे और हम है की अपने ही लोगो के दुश्मन बने बैठे है. मेमोरियल पर आपको देखने मिलेंगे कब्जे में किये हुए पाकिस्तान के बंकर्स पोस्ट्स भी. काफी समय वाहा बिताकर निकली मैं आर्मी के मैसेज “When you go home, tell them of us and say, for your tomorrow, we gave our today” के साथ कारगिल की ओर.

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द्रास से कारगिल कुछ 60 km है और रास्ते भी ख़राब नहीं. अब सफर में तकलीफे कम थी. अभी तक नदी दाई और थी अब बायीं. शुब्र सफ़ेद नदी, रंग बदलते पहाड़, देखते देखते मैं पहुंची कारगिल. यहाँ पहाड़ हरे भरे नहीं बंजर थे पर उतने ही खूबसूरत. लद्दाख की खासियत ये की क्षेत्र के हिसाब से आपको अलग अलग तरीके के पहाड़ देखने मिलेंगे.कारगिल लद्दाख का लेह के बाद दूसरा बड़ा शहर है. कारगिल में समझ नहीं आ रहा था कौनसा होटल बुक किया जाए तभी दो बाइकर्स दिखे. उत्तराखंड से थे दोनों, मुझे लगा ये यही रुके हुए है तो इन्ही से पूछ लिया जाए, पर वो कारगिल में बस थोड़ी देर के लिए ही थे और आगे लेह जाने वाले थे फिर भी होटल ढूंढ़ने में उन्होंने मेरी मदद की और साथ ही पैसे भी कम करवाए. होटल की देख रेख थी तोशी के पास बड़े ही खुशमिजाज थे वो, पहले गाडी से सामान निकालने में मदद की, रूम तक सामान पहुंचाया और कारगिल में देखने के लिए जगह बताई. होटल के सामने ही उनकी छोटी सी दूकान भी थी. सामान रखके मैंने पहले कारगिल देखने का सोचा और तोशी के बताये मुताबिक निकली पाकिस्तान देखने जो की वहा से 10 15 km की दुरी पे था . रास्ता उन्होंने समझा दिया था यहाँ भी पहाड़ चढ़ना था और रास्ता भी सीधा नहीं तो घाटी थी और अब शुब्र सफ़ेद नहीं बल्कि बह रही थी मैली सी सुरु नदी जो कारगिल से होते हुए जा रही थी पाकिस्तान . मज़ा बड़ा आ रहा था ये पहाड़ चढ़ने में, अभी तक का सबसे मजेदार पहाड़ लग रहा था ये,मेरी वेगो के अलावा रास्ते पर और कोई गाडी नहीं . चढ़ते चढ़ते पहुंची मैं एक पॉइंट जहा पर छोटी सी पान की दूकान जैसी दूकान थी और उसके बाजू में छाया में बैठे कुछ लोग. कुछ पर्यटक भी दिख रहे थे. वेगो साइड में लगाकर पूछा यहाँ से पाकिस्तान दीखता है?, बोले हां मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कुछ भी पाकिस्तान कैसे दिखेगा. उन्होंने थोड़ा समझाया और मैं मानी दूरबीन से देखने के लिए .जिस देश जाने की मेरी दिल्ली तमन्ना है वो फ़िलहाल दूरबीन से देखने मिल रहा था. उन पहाड़ो में जादू सा था, बड़ी ख़ुशी और इतना लम्बा सफर तय करने के बाद भी फ्रेश लग रहा था. वो कहते है ना मन प्रसन्न हो तो चेहरे पर दीखता है. उसी ख़ुशी में सोचा यहाँ से और ऊपर चढ़ा जाए चढ़ते चढ़ते पहुंची वहां के आखरी गांव हुंडेरमान.

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उस गाँव में जाने के पहले थी हमारे मराठा बटालियन की चेक पोस्ट बड़ी रिक्वेस्ट करनी पड़ी उन्हें अंदर जाने की इजाजत के लिए ” अंदर हम जाने नहीं देते है हर किसीको पर आप को इजाजत दे रहा हु” वो खुद आर्मी में ना जाने कितने जोखिम उठाते होंगे पर हैरान हो रहे थे मेरे इतने दूर आने पर. बड़ी बाते भी हुयी उनसे, परिवार के बारे में, उनके आर्मी में शामिल होने के बारे में,फिर अंदर गांव पहुंची तो एक अलग कहानी इंतज़ार कर रही थी. गांव देखकर लौटते हुए रास्ते किनारे कुछ लोग बैठे थे वेगो क्युकी स्लो थी तो उन्होंने यूही पूछ लिया “देख आये बेटा” फिर कुछ बाते हुयी और फिर उन्होंने चाय का न्योता दिया. अंकल दौड़कर घर गए और नमकीन चाय (अंकल और नमकीन चाय की पूरी कहानी इस लिंक पर नमकीन चाय मीठी याद) के साथ मेरे लिए रोटी भी ले आये मैं बैठ गयी उन्ही के साथ रास्ते के किनारे एक पत्थर लेकर. नमकीन चाय इसके पहले कभी नहीं पी थी जितनी वो दिखने में मेरे लिए अजीब थी उतनी ही अजीब पिने में थी पर वो इतने प्यार से लाये थे तो पीना तो पूरा था ही. खूब बाते हुयी वहां की स्कूल के बारे में मेरे बारे में और फिर उन्होंने बहुत ही बढ़ी बात कही “बेटा आप पढ़ी लिखी हो ना इसलिए इतनी हिम्मत कर पायी” मैंने कभी ये सोचा भी नहीं था की पढाई है जो हिम्मत भी देती है. शाम हो रही थी इसलिए वहां से निकलना पड़ा वरना बाते और भी थी.

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नमकीन चाय

गाँव से निकलकर पहुंची मैं चेक पोस्ट और वहां अपने आर्मी जवान से कुछ और बाते की उन्होंने पहाड़ पे बसी हमारी आर्मी और दूसरे पहाड़ पे बसे पाकिस्तान आर्मी कैंप दिखाया और कौनसा पहाड़ चढ़कर उन तक सामान पहुंचाया जाता है वो भी बताया.1 घंटे में वो इतना मुश्किल पहाड़ चढ़ जाते है सुनकर तो धक्का ही लग गया.जब मैंने इच्छा जताई ऊपर कैंप जाने की पहाड़ चढ़कर तो जवाब मिला “मैडम आप जब तक चढ़ना चालू करोगे तब तक दुश्मन की गोलिया आपकी जान ले चुकी होगी“. ये अधूरा सपना भी करेंगे कभी पूरा .करीब 7 बजे मैं पहुंची वापस होटल. सबसे पहले तोशीब से खाने का पूछा तो न्योता मिला मुझे इफ्तारी का (तोशीब और इफ्तारी की पूरी कहानी इस लिंक पर पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी). इस से पहले मैंने कभी इफ्तारी नहीं खायी थी. जब तक मैं खाना खाने निचे नहीं आयी तोशीब ने भी खाना नहीं खाया था रोज़ा होते हुए भी. दूकान पर ही उसने निचे चटाई डाल सामने जिस थैले में खाना आया था उस पर रोटियां रखी और सब्जिया कटोरी में ही आयी थी. बड़ा स्वादिष्ट था इफ्तार का खाना और उस से कही ज्यादा मजेदार था चश्मे का पानी. पहले तो समझा ही नहीं की ये चश्मे का पानी क्या होता है फिर तोशीब ने अपने दोस्त की मदद से समझाया की चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. बड़ा अच्छा लगा बिना सजी धजी इस इफ्तार पार्टी में इफ्तारी खाने का. याद रखने वाला ऐसा था ये दिन अब उस यादगार दिन की याद लेकर समय था कल सुबह की तैयारी के लिए एक अच्छी नींद लेने का.

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इफ्तारी
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2 comments

  1. Another piece of your novel.Another piece of riding extravagance.Another slice of pure virtual ecstasy.
    I rue the day u crashed
    .. not cos u got hurt bad but cos thts gonna be the end of this ride(post crash stories are no less awe inspiring!)
    Wish i wore a hat.. which i could have taken off for u..
    Atta gal… looking fwd to more of your experiences.

    Liked by 1 person

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