कारगील से लेह के वो आखरी 70 किलोमीटर


ये अकेली लड़की अपनी मोपेड (Wego) पर ज़ोज़ि ला जैसे खतरनाक रास्ते पार कर द्रास होते हुए कारगील पहुंचने के बाद अब शुरू करने वाली थी सफर अपनी अगली मंज़िल लेह का. कारगील से लेह का वो 218 किलोमीटर का सफर….

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Julley in July

Julley,लद्दाख रीजन में बोले जाना वाला ये खूबसूरत शब्द जो अपने आप मे ही एक वाक्य है. Hi… Hello… Namaste… के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला शब्द है Julley. हालांकि हर शब्द की अपनी खूबसूरती होती है, पर Julley की खूबसूरती बढ़ाता है लद्दाख के लोगो का मुस्कुराता हुआ चेहरा. 6 महीने दुनिया से संपर्क न होने और कई अलग मुसीबते झेलने के बाद भी उनके चेहरे की वो मुस्कान, वो सुकून, वो खुशी, उस शब्द में जैसै जान भर देती है. आप कभी लद्दाख में हो और समझ नही आ रहा हो कि कैसे किसी से बात की शुरुआत करे, तो यकीनन ये शब्द आपकी मदद कर देगा.

01/07/2016 से मैं जीने वाले थी लद्दाख की खूबसूरती को. करीब 6 बजे मैं निकली कारगिल से लेह की ओर. उतनी सुबह ही तोशी अपनी दुकान खोल चुका था. मैं सामान लेकर नीचे उतरी तो उसने आकर गाड़ी पर सामान बांधने में मदद की और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगी”.

कारगिल से बस कुछ 10-15 km का रास्ता ही काफी खराब था. उसके बाद रास्ता टार का ही था. आज खराब रास्ते की नही, चढ़ाई की मुश्किल का सामना करना था. श्रीनगर लेह हाईवे की दो ऊंची चढ़ाई ‘नमिक ला’ और ‘फोटू ला‘ चढ़ना था. पहली चढ़ाई पड़ती है नमिक ला की. नमकी ला की चढ़ाई शुरू करने के पहले मैं 2-3 जगह रुकी. एक जगह जब रुकी, सामने 2- 3 घर दिख रहे थे और उनके पीछे पहाड़. आस पास कोई नही, थोड़ी देर बाद वही कारगिल आते हुए पठानकोट के जिन 4 अंकल से मिली थी, उनसे फिर मुलाकात हो गयी. वो वही से गुजर रहे थे, मेरी गाड़ी देख कुछ देर बात करने के लिए रुक गए और आशीर्वाद देने के लिए भी.

एक जगह  मैं नाश्ता करने के लिए रुकी. छोटा सा ही कैंटीन जैसा कुछ था, अंदर जाकर लगा कहा तो सबके आराम में मैंने खलल डाल दिया हो. मुझसे पहले उस कैंटीन में कोई आया हो ऐसा लग नही रहा था. बड़े हिचकिचाते हिचकिचाते ही मैंने पूछा जैसे किसी की प्राइवेसी में दखल दे रही हु, कुछ नाश्ता मिलेगा? शुक्र है उन्होंने हा बोला. नाश्ता कर ही रही थी कि 2 आर्मी जवान आए और मैगी आर्डर की. उनमे से एक बैंगलोर के थे और दूसरे बिहार. मैंने बात शुरू करते हुए युही पूछ लिया-

कितने लकी है ना आप लोग रोज़ इन खूबसूरत पहाड़ो को देखने मिलता है, नेचर के बीच रहने मिल रहा है.”

मैम कितना देखेंगे रोज़ रोज़ इन पहाड़ो को, मैं बैंगलोर से हु, यहां रह रहा हु अपनी फैमिली से इतना दूर, बात करने का मन हो तो भी कई बार नेटवर्क की वजह से बात नही हो पाती है, कुछ अलग खाने का मन करे तो बस मैगी से काम चलाना पड़ता है, कुछ दिन के लिए ही अच्छा लगता है ये नेचर, ये पहाड़ फिर नार्मल लाइफ याद आने लगती है“.

मेरे मन में ख्याल आया कि कितना ग्रांटेड ले लेते है ना हम कभी कभी कुछ बातों को, नेचर के कोई इतना करीब हो तो खुश ही होगा, उसके साथ आई हुई मुसीबतों का बिना सोचे.

नाश्ता कर अब मैं आगे बढ़ी नमिक ला की ओर, बस अब कुछ 1 किलोमीटर ही होगा कि चढ़ते चढ़ते मुझे दूर कही पहाड़ पर कुछ भेड़ नज़र आए. साफ सुथरा चिकना सा भूरे रंग का पहाड़ और उसपे वो भेड. बड़ा ही खूबसूरत सा नज़ारा लग रहा था, तो ठहर गयी कुछ देर किनारे पर अपनी गाड़ी लगा उस नज़ारे का लुत्फ उठाने. लुत्फ उठाने के बाद पता नही था कि कसरत भी करनी पड़ेगी, किनारे लगी अपनी गाड़ी बस निकालने गयी कि गाड़ी नीचे रास्ते पर गिर पड़ी. सुबह की एक तो ठंड उसपे ऊंचाई, गाड़ी मुझसे उठने नही वाली ये समझ आ गया था. थोड़ी देर इधर उधर देखा और फिर दूर से एक लोकल टेम्पो आते हुए दिखा, पीछे कुछ सामान और सामने बीवी बैठी थी. मेरी गिरी हुई गाड़ी देखकर ही वो समझ गए और झट से आ कर मदद कर दी. मदद तो ठीक थी पर जिस जिंदादिली से मुस्कुराते हुए वो मेरी तरफ बड़े और वैसे ही मुस्कुराते हुए जो वो अपने टेम्पो तक वापस गए, मुझमे जैसे उन्होंने जोश भर दिया हो लगा. इसके बाद रुकते, गिरते, संभलते मैं पहुंची नमिक ला जिसकी ऊंचाई 12198 फ़ीट है.

यहा तक सही सलामत पहुंचने के लिए मैं धन्यवाद देना चाहुंगी की Border Roads Organisation (BRO) का, उन्होंने कश्मीर में ऐसे रास्ते बनाये की हम उसकी खूबसूरती को जी पा रहे है. नमिक ला आए हाए, वहां की हवा जादू वाली. आप गलती से ये ना समझ ले कि आपको जन्नत नसीब हो गयी है,उस हवा को महसुस कर के तो हवा का जादु कम करने के लिए आपको आस पास मिल जाऐंगे ऐसे लोग जो वहां बस सेल्फी खींचाने आते है. नामिक ला में कुछ समय बिताने के बाद मैं बढ़ी आगे की ओर.

37 किलोमीटर आगे था फोटू ला. श्रीनगर लेह हाईवे का सबसे ऊंचा पास, जिसकी ऊंचाई है 13479 फ़ीट. जितना मज़ा नमिक ला पर आया उस से दुगुना मज़ा यहां आ रहा था. पहले ही टेम्परेचर कम उसपे उस ऊंचाई पर चेहरे को चूमती वो ठंडी हवा. आपको जो हकीकत से दूर ले जाये. पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा था हर बोर्ड हर कार्नर पर बंदरो के जैसे चढ़कर सेल्फी खीचते लोग आपको वास्तविकता से ज्यादा दूर भटकने नही देंगे. वहां खड़े होकर आपको वो दुनिया कितनी ही अलग लग रही हो पर ये लोग अपना मेट्रो पोलियन शहर साथ लिए घूमते है. खैर,मेरा कोई हक़ नहीं बनता किसी के घूमने के तौर, तरीके, तह़जीब पर कमेंट करने का.

फोटू ला के बाद अब चढाई ख़तम हो गयी थी और राइड शुरू होने वाली थी बहुत ही खूबसूरत रास्ते ‘हेयरपिन बेंड’ से. सांप की तरह चलता ये रास्ता ले जाता है आपको लमायुरु और मून लैंड की तरफ. लमायुरु के लिए भले ही रास्ता नीचे की तरफ हो, पर लमायुरु की जगप्रसिद्ध मोनेस्ट्री ‘लमायुरु’, जो लद्दाख की पूरानी मोनस्टरीज़ में से एक है. उसके लिए चढाई करनी ही पड़ती है. सकरे से रास्ते से होते हुए आप पहुँचते है मोनेस्ट्री की तरफ. जब मैं गयी थी तब लमायुरू फेस्टिवल चल रहा था. रास्ते पर चहल पहल, अपने लद्दाखी ड्रेस में लोग, मस्ती करते बच्चे, बहुत ही रौनक थी. मास्क डांस शुरू था जब मैं पहुंची. कहा तो एक छत पर टूटी सी दीवार से चढ़कर वो देखा था, ताकि साफ़ साफ़ नज़र आ सके. अलग अलग मास्क, रंग बिरंगी कपडे और म्यूजिक. मोनेस्ट्री की अगर बात करे तो मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं आयी, कुछ कमी सी लग रही थी, मोनेस्ट्री में जाकर जो शांति मिलती है वो कही गुम सी थी.

मोनेस्ट्री के बाद अब समय था ‘मून लैंड’ अनुभव करने का. मैंने जब राइड का सोचा था तब इसके बारे में पता नही था. मैंने कम ही रिसर्च किया था लद्दाख के बारे में, क्युकी पहले से सब पता करके चले जाओ तो मुझे लगता है हम उस जगह को अपने से ज्यादा दुसरो की नज़र से देखने लगते है. जब राइड का सोचा था तब बस खारदुंगला मन में था और ये पता था की कश्मीर, लद्दाख, मनाली हाईवे बड़ा सुन्दर है. जब मून लैंड से गुजर रही थी तब उसकी खासियत नहीं पता थी पर जिस तरह रास्ते के दोनों तरफ स्पेस जैसे दिखने वाले हलके भूरे रंग के पहाड़ दिख रहे थे, 2 min रुक कर उनको निहारना और उनकी खूबसूरती को कैमरा में कैद करने से रोक पाना मुश्किल ही था.

मून लैंड पहाड़ो के साथ साथ मैं पहुंची ससपोल गांव, थकान हो रही थी और गाडी भी कुछ आवाज़ कर रही थी. इसलिए थोडा आराम करने का सोचा. रास्ते के किनारे गाडी लगायी और नहर के बाजू में आधे घंटे की नींद ली. ससपोल से लेह की दूरी थी 70 किलोमीटर.

गाडी शुरू की. 10 min गाडी चली होंगी की एक मोड़ पर गाडी अचानक बंद पड़ गयी. बहुत शुरू करने की कोशिश की पर फेल. जहा गाडी ख़राब हुई उसके सामने ही एक फैक्ट्री थी. वर्कर्स का शायद ब्रेक चल रहा था. बहार बैठे वो मेरी मेहनत देख रहे थे, फिर आये भी परेशानी पूछने पर कोई हल नहीं मिला. मैकेनिक लद्दाख में आपको हर जगह इतनी आसानी से नहीं मिलते. उस गांव में भी कोई मैकेनिक नही था. कारगिल से लेह की तरफ बढ़ते हुए काफी लोगों से जान पहचान हो गयी थी. कुछ उनकी उत्सुकता की वजह से की मैं मोपेड पर राइड कर रही हु, कुछ राइडर्स भी मिले थे, जिनसे उन रास्तो पर दोस्ती हो ही जाती है, क्युकी पता होता है की रास्ते मुश्किल है, हर जगह लोग मीले ये मुमकिन नहीं तो एक दूसरे के काम आना बिन कहे ही रूल सा बन जाता है. जब मैं रुकी हुई थी अपनी ख़राब गाडी के पास, तब पीछे मिले हुए काफी सारे लोग गुजरे और रुक कर पूछा भी की कोई मदद की जरुरत हो तो बताइये, पर मैंने ही मना कर दिया था. कह कर की “नहीं शायद गाडी बस गरम हो गयी है इसलिए शुरू नहीं हो रही. कुछ देर में हो जाएगी”.

 

हमे अपने शहर में कुछ अच्छे कुछ बुरे लोग मिलते है. पर जब आप सफर में होते हो तो आपको हर किसी में इंसानियत ही दिखेगी. आधा घंटा होने के बाद भी जब गाडी नहीं शुरू हुई, तब समझ गया था कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा. या तो यहाँ रुकने का या लेह पहुंचने का. कुछ मदद मिलती है क्या इस के लिए मैने नागपूर के एक फ्रेंड को फोन लगाया जो एयर फोर्स मे है. शुक्र इस बात का था की उस समय फोन में नेटवर्क था वरना अकसर लेह लद्दाख में नेटवर्क मिलना मुशकिल होता है. टहलते टहलते उनसे वहां कुछ अरेन्जमेंट हो सकती है क्या पुछ ही रही थी के रॉयल एनफील्ड की धड़ धड़ धड़ आवाज़ सुनाई दी. जैसे ही एनफील्ड मोड़ पर पहुंची,  देखा तो सामने अपने दो दोस्त.ये दोनो भी नागपुर से लद्दाख राईड पर निकले थे. प्लान हमने साथ ही बनाया था पर मेरी मोपेड होने की वजह से मैंने इनसे पहले सफर शुरु किया था. सफर मे बस एक बार हम सोनमर्ग मे मिले थे. मुझे देखने के बाद टेंशन तो नही, उल्टा हम तिनो जोर जोर से हसे. जब हसना ख़तम हुआ. फिर सोचा अब क्या करना है. मेरे गाडी में जो रस्सी थी उस से मेरी मोपेड को उनकी एनफील्ड से बांधकर खींचने का प्लान बना. गाड़ी मे एक रस्सी हमेशा साथ रखने का सबक भी मुझे रास्तो ने ही सीखाया था.जब कन्याकुमारी से वापस आते हुए गाडी खराब हो गयी थी और तब भी गाडी बाँधकर खींचि थी. उन रास्तो पर ही दोस्ती हुई थी एयर फोर्स वाले दोस्त से जिनसे आज बात हो रही थी.

मेरी मोपेड को एनफील्ड से बांधकर ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया. परिस्थीती गंभीर थी पर हमे मज़ा आ रहा था. मेरे दोस्तो को मुझसे थोड़ा ज्यादा क्योंकि जिन्दगी भर अब वो मेरी इ बात पर मज़ा ले सकते थे. हमने ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया था की रस्सी टूटी. फिर जितनी रस्सी बाकी थी उस से खींचा, पर वो भी 5 min में दम तोड़ गयी.

रस्सी तुटी अब क्या? तो सोचा मेरी मोपेड को ट्रक में चढ़ाया जाए और लेह ले जाया जाए. ट्रक रोका भी. जब हम ट्रक वाले से बात कर रहे थे, तभी 10-12 राइडर्स जो लेह से श्रीनगर की तरफ जा रहे थे. हमे बिच रास्ते में ऐसे रूक कर ट्रक वाले से बात करते हुए देख हमारी परेशानी पूछने आ गए. अब 3 की जगह हम 15 लोग थे. गाडी ट्रक में चढ़ाने के लिए तैयार भी थे, पर मैंने यूँही सोचा की एक बार और किक मार के गाडी स्टार्ट करने की कोशिश की जाए. किस्मत देखिये गाडी शुरू हो गयी. क्या ख़ुशी मेरे चेहरे पर और पहला स्टेटमेन्ट जो मुँह से निकला वो था मुझे पता था, मेरी गाडी धोका दे ही नहीं सकती. बस थोड़ी गरम हो गयी होगी इसलिए परेशान किया, अब ये जाएगी लेह”. सभी खुश हो गए वो राइडर्स का ग्रुप चला गया, ट्रक जो गाडी ले जाने वाला था वो भी चला गया अब बचे थे हम 3, बस. हमने भी निकलने के लिए गाडी स्टार्ट की और मेरी मोपेड फिर बंद पड़ गयी.

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अब फिर एक ट्रक को रोका, दोनों दोस्तों ने गाडी चढ़ाई. ट्रक में गाडी को बाँधा ताकि गिरे नहीं और मैं भी ट्रक में चढ़ी. कुछ ऐसे पहुंचे हम, मैं और मेरी मोपेड लेह. पहुंच तो गयी थी पर थोड़ा दुःख हो रहा था की वो 70 किलोमीटर का सफर मैं अपनी मोपेड से नहीं कर पायी, लेह के एंट्री गेट से अपनी वेगो (मोपेड ) नहीं ला पायी पर कहते है ना अंत भला तो सब भला. ट्रक वाले अंकल ने मेरी मोपेड़ गैरेज पर छोडी,जो उनके ही पहचान मे था, और जो अंकल ट्रक वाले अंकल के साथ सामने सीट पर बैठकर आए थे उन्होने मुझे अपने दोस्तो तक पहुचाने मे मदद की.

Julley 😊

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One comment

  1. Wow.. Sis your experience is so awesome. I read your experience and i felt that i should also go to our Beautiful JANNAT by bike..
    You share your experience very nicely. And during reading your experience i felt i am with you and experiencing the beauty and enjoying the bike ride.
    But I thought that your real experience cannot be put within word limit. It is only true experience which one need to understand by going there.
    But your experience fill power and enthusiasm to go there. So thanks for sharing your amazing bike ride.

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