और आखिरकार……

लेह तो पहुच गए, ससपोल से लेह के 70 का मलाल तो रहेगा पर पहुँच गए वो मायने रखता था|

लेह के आगे की कहानी क्या लिखी जाए,लिखी जाए भी या नही ये सोचते सोचते ही इतने दिन निकल गए, पर जब कोई भी सफर चाहे वो कितना भी मुश्किल हो अधूरा नहीं छोड़ा तो लिखने का सफर क्यों बीच मे छोड़ा जाए|

01/07/2016-Day 8-लेह पहुंचने में ही काफी देर हो गयी थी| ट्रक से सफर किया था तो कुछ थकान सी हो रही थी और कुछ मायूसी भी थी| इसलिए बस खाना खाकर सोने चले गए| नींद भी कुछ कच्ची पक्की सी ही आयी, अगली सुबह का बेसब्री से इंतज़ार जो था| सुबह उठकर गेराज जाकर अपनी वेगो देखनी थी| वेगो क्या ठीक हो पाएगी? ठीक हो भी गयी तो क्या आगे का सफर तय कर पायेगी? क्या मेरी वेगो को किया हुआ वादा पूरा हो पायेगा? क्या मैं मेरा सपना पूरा कर पाऊँगी? ऐसे कई सवाल उथल पुथल मचा रहे थे. सवालो के साथ उलझते जूझते नींद आ गयी और हुई अगली सुबह.

02/07/2016-Day 9-सुबह कुछ आराम से ही हुई| राइड करना हो तो आराम से उठने की सहूलियत मुश्किल से ही मिलती है| सुबह ५ या ६ बजे से ही सफर शुरू हो जाता है, पर आज राइड पर नहीं निकलना था तो हमने भी थोड़ी सहूलियत ले ली. तैयारी और नाश्ता कर हम पहुंचे, मैं और मेरे दोस्त, मेरी वेगो देखने। मैकेनिक से बात की, उन्होंने तसल्ली दी “गाडी बिलकुल अच्छी कंडीशन में है. आराम से आप इसके साथ आगे का सफर पूरा कर सकते है, बस कार्बोरेटर में कार्बन जमा हो चला था काफी समय से. जो सर्विसिंग के टाइम पर साफ़ नहीं किया गया इसलिए गाडी इग्निशन नहीं ले रही थी“| आधा दिन ख़तम हो ही चूका था। वेगो शाम के पहले ठीक होकर मिलनी नहीं थी| सबने सोचा यहाँ बैठकर हमने कुछ कर तो लेना है नहीं, सो चलो थोड़ा लेह देख लिया जाए|आपसी सहमति के साथ हम सबसे पहले देखने निकले गुरुद्वारा पत्थर साहिब।। मेरे दिल में थोड़ी हिचक सी थी| राइडिंग सीट छोड़कर बैक सीट पर बैठने की, पर मरता क्या ना करता वाले हालात,खैर .

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Pathar Sahib

लेह से कुछ २५ km दूर श्रीनगर लेह हाईवे पर बना है पत्थर साहिब गुरुद्वारा। इस से जुडी कहानी की बात करे तो बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी 1517 ई में नेपाल, सिक्किम, तिब्बत होते हुए लेह पहुंचे थे।तब उन्हें लेह की पहाड़ी पर रहने वाले एक राक्षस के बारे में लोगों ने बताया, जो उन्हें परेशान करता था।लोगों का परेशान देख गुरुनानक देव ने नदी के किनारे आसन लगाया। यह देख राक्षस बौखला उठा और उन्हें मारने की योजना बनाई। फिर एक दिन जब गुरुनानक देव जी ध्यान कर रहे थे , तब राक्षस ने पहाड़ से उन पर एक बड़ा पत्थर गिराया ताकि गुरूजी नीचे दबकर खत्म हो जाए। लेकिन एक अनोखी घटना घटी। गुरुनानक जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम बन गया और गुरूजी के शरीर का पिछला हिस्सा पत्थर में धंस गया। पत्थर में धंसा गुरुनानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद है।राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर मौजूद।जब पत्थर गुरुनानक जी से टकराया तो राक्षस को लगा कि गुरूजी पत्थर के नीचे दबे हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरुनानक  जी को जिंदा देखकर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर पत्थर में धंस गया।तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई और वो गुरुनानक देव जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान वाला पत्थर आज भी लेह में देखा जा सकता है।

ये कहानी सच्ची है या झूठी उसका तो नहीं पता पर गुरूद्वारे में अंदर जाकर जो महसूस हो रहा था वो बहुत सच्चा था. थोड़ी देर जब गुरूद्वारे में बैठी, मन को शांति मिल रही थी | मन के कमज़ोर कोने से भी मुलाकात हुयी, जिस से मिलकर आंसू अपने आप ही निकल आये| बड़ा फ्रेश लग रहा था उसके बाद| जैसे कोई बोझ हल्का हुआ हो पर क्या पता था एक बोझ हल्का हुआ तो दूसरा मिलने की तैयारी में था| गुरूद्वारे में लंगर कर हम निकले निम्मू।

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Nimmu

गुरुद्वारा से कुछ ११ km श्रीनगर रोड पर है निम्मू| जहा होता है सिंधु-जंस्कार का संगम। इस जगह को पहचान ने के लिए आपको किसी ख़ास टैलेंट की जरुरत नहीं है|पहाड़ पे गाडी दौड़ाते हुए दूर से ही दो मटमैली नदियों का संगम आपको दिख जाएगा और आप निम्मू में है जान जायेंगे। संगम देखने के लिए अलग से एक पॉइंट बनाया गया है| यहाँ से रिवर राफ्टिंग का मज़ा भी लिया जा सकता है|कुछ समय निम्मू में बिताने के बाद समय था लेह लौटने का और लौटते लौटते अद्भुत और जादुई मैग्नेटिक हिल अनुभव करने का|

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जब आप मैग्नेटिक हिल पहुंचेंगे आपको दिखेगा श्रीनगर की ओर जाता ढलान वाला रास्ता और लेह की तरफ जाता ऊंचाई वाला रास्ता। रोड पर एक बॉक्स बना हुआ है| कहते है जब आप अपनी गाडी न्यूट्रल पर लाकर उस बॉक्स में रखेंगे तो गाडी ढलान की तरफ ना खींचती हुई अपने आप ऊंचाई वाले रस्ते की तरफ बढ़ेगी। हमने कोशिश की पर हमे तो ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ| मैग्नेटिक हिल जाने के बाद आपका कुछ ऐसा अनुभव रहे तो बताइयेगा जरूर|

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Magnetic Hill

शाम हो चुकी थी,लेह घूमने के बाद अब समय था गेराज से अपनी वेगो लेने का. वेगो बिल्कुल चुस्त, दुरुस्त, तंदरुस्त गेराज में खड़ी थी. मैकेनिक से भी हरी झंडी मिल गयी थी “मैडम ले जाओ जहा ले जानी है ,गाडी कोई तकलीफ नहीं देगी“. गाडी  के जब पैसे देने की बात आयी तो मुझे लगा कोई बड़ा सा बिल हुआ होगा, १००० -२००० तो कही नहीं गए, पर जब बिल पूछा तो बस ३०० Rs| गाडी दुरुस्त वो भी कम पैसो में, ख़ुशी का तो कोई ठिकाना नहीं था| पर कहा ख़ुशी ज्यादा देर ठहरती है| कहा था ना आपसे गुरूद्वारे में जैसे लगा की मन से कोई बोझ उतरा हो पर दूसरा बोझ अपनी तैयारी में था|

बहुत ख़ुशी हो रही थी की अगली सुबह निश्चिन्त होकर मैं अपने सपनो की चढाई चढूँगी। मैं खारदुंगला चढूँगी, दुनिया का सबसे ऊंचा माने जाना वाला १८३८० फ़ीट पर बना पास चढूँगी, वेगो को किया हुआ मेरा वादा पूरा करुँगी। आँखे जैसे सोच सोच कर ही चमक रही थी, दिल में थोड़ी हलचल भी थी, डर था थोड़ा,सुन रखा था की कितना मुश्किल है खारदुंगला पहुंचने का रास्ता, ख़ुशी बैचनी डर सब उथल पुथल मचा रहे थे| अगले दिन क्युकी मुश्किल चढाई चढ़नी थी इसलिए जल्दी सोना भी था. वेगो लेकर रूम पर पहुंचकर फ्रेश होकर सीधा डिनर करने निकले।

बड़ी खिचाई हो रही थी मेरी बस इस एक बात को लेकर की “क्या बोलेगी तू की ७० km ट्रक से किया” ” ,”अरे अब तो तुझे लेह फिर से करना पड़ेगा, आधा तो तूने ट्रक से ही किया“|वो दोस्त ही क्या जो आपकी नाकामी को भी मजाक बनाकर उड़ा ना दे|हमारी अलग ही मस्ती चल रही थी| पर मेरे दिल की धड़कन खारदुंगला पर जा अटकी थी,हलचल सी हो रही थी कि तभी किसी ने कहा ” तुझे पता है तेरी प्रॉब्लम ही ये है की तू जो कुछ करती है वो दुनिया को  दिखाने के लिए करती है“| कुछ समझा ही नहीं क्या हुआ| कुछ बड़े अजीब तरीके से मेरा उस पर रिएक्शन आया और बहुत ऊंची आवाज़ में मैंने मेरे दोस्त को चिल्लाया। मेरी तरफ से पब्लिक प्लेस पर इतने जोरो से चिल्लाना गलत ही था| पर समझा ही नहीं, उस एक स्टेटमेंट से ऐसा लगा जैसे मेरा सब कुछ छीन लिया किसीने।

कोई और कहता तो इतना बुरा नहीं लगता | एक बहुत करीबी दोस्त ने कहा था |जिस पर मैं सबसे ज्यादा विश्वास करती थी| दिल कुछ ज्यादा ही दुखा। जिस से उम्मीद थी की मेरा सपना समझेगा उसने तो इलज़ाम लगा दिया |जिस सपने को जीने के लिए मैंने हर मुमकिन मेहनत, हर मुमकिन तैयारी की थी | उसे इतनी आसानी से बस दिखावे का नाम दे दिया गया|मैंने अपना सपना पूरा करने के लिए बाकी तैयारी तो की थी, रास्ते में जो मुश्किलें आएगी उनके लिए भी थोड़ी बहुत तैयार थी, पर ये झटका सपने से परे था| जिस दिन के सुबह के इंतज़ार में मैंने नींदे  गवाई थी  सोच सोचकर, कैसा होगा वो दिन जब मैं अपनी वेगो जम्मू कश्मीर के रास्तो पर चलाऊंगी|जब मैं लेह पहुँचूँगी| जब मैं खारदुंगला के लिए सफर शुरू करुँगी| आज भी कुछ अलग नहीं था | आज भी मैं नींद गवा रही थी, पर इसलिए की इतनी कमजोर पड़ गयी थी उस एक स्टेटमेंट से कि रोना रुक नहीं पा रहा था| 1.5 साल बाद उस किस्से के बारे में लिखते हुए भी उस समय की एक एक फीलिंग्स याद है| दुनिया से तो कैसे भी लड़ ले अपनों से कैसे लड़े |

03/07/2016-Day 10-हर रात की सुबह होती ही है| इस रात की भी हुई, रात कितनी भी बुरी गुजरी हो, सुबह तो राइड करनी ही थी| अपने सपनो की राइड | जैसा सोचा था वैसा तो बिलकुल नहीं निकला था दिन| रात जो कुछ झटके देकर गयी थी| ६ बजे सफर शुरू करने का सोचा था पर तैयारी करते करते ७ बजे आख़िरकार राइड शुरू हुई, मायूस सी.

लेह से खारदुंगला है ४० km| अगर  शुरुआत के २० km के रास्ते की बात की जाए तो बिल्कुल हाईवे जैसे पर असली चढ़ाई शुरू होती है उस २० km के बाद| २० km की राइड के बाद आता है साउथ पुल्लू चेक पोस्ट| जहा गाडी की एंट्री करवाई जाती है| राइट में जहा चेक पोस्ट है लेफ्ट मैं ब्रेकफास्ट के लिए छोटा सा ढाबा। नाश्ता करने के बाद हुयी असली चढ़ाई शुरू।

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Road to Khardungla

ऊँचाई बढ़ती जा रही थी, और रास्ते ख़राब और छोटे बहुत छोटे होते जा रहे थे। बिच में एक वाटर पास ऐसा आया जाहा वेगो फस गयी। दूसरी तरफ से आती एक टैक्सी ने टैक्सी रोक कर मदद करने की कोशिश की,पर मेरी ज़िद्द थी की वेगो तो मैं अपने दम पर ही आगे निकालूंगी और निकाली भी|आते जाते रास्ते में काफी राइडर्स मिले अपनी सुपर बाइक्स पर| सबको बड़ी ख़ुशी हो रही थी, मुझे वेगो जैसी मोपेड पर राइड करता देख वो भी अकेले। एक साइकिलिस्ट का भी ग्रुप था जिसमे हर उम्र के लोग थे, १८ से लेकर ७० तक, ये लोग पुणे से लेह साइकिल पर आये थे| इतना अच्छा लग रहा था मुझे उन्हें देखकर पर उन्हें मुझे देखकर ज्यादा ख़ुशी हो रही की अकेले ये इतना सफर कर रही है| हम तो ग्रुप में है, हिम्मत देने के लिए इतने लोग साथ है पर ये अकेली।

कितना पावर होता है ना एक अकेली लड़की में, पावर किसी की सोच बदलने का| ऊँचाई १७०० फिट से ऊपर थी,ऑक्सीजन लेवल कम होता जा रहा था,ठण्ड अलग और रास्ते में बस बड़े बड़े पत्थर और मिट्टी| कुछ जगह काम चालु होने की वजह से धूल| हर १० min बाद गाडी रोक कर मैं ब्रेक ले रही थी| हिम्मत जवाब दे रही थी, शरीर थक चूका था और दिमाग तो बस एक ही सवाल पूछ रहा था “क्यों मुझपर दिखावे का इलज़ाम लगाया गया“| इतनी दूर आकर पर हार मान ना मुश्किल था| कई लोग एक सवाल लेकर ऊपर चढ़ रहे थे “और कितना दूर है”, बाइक पर, टैक्सी पर, और बस पर सफर करने वाले भी| १० min आधे घंटे जैसे गुजर रहे थे| आखिर मैं भी उस पॉइंट पर पहुंच गयी जहा मैंने खारदुंगला से वापिस आती गाडी से पूछ ही लिया “और कितना दूर है“| जवाब मिला बस इस मोड़ के बाद सीधा खारदुंगला।

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Khardungla Top

सच्ची में उस मोड़ के बाद था सीधा खारदुंगला “खारदुंगला टॉप”. मेरे सपनो का टॉप, मेरे वादों का टॉप| राइट साइड पर बोर्ड था “Khardungla Top (18380 ft) Highest Motorable Road In The World “| जहा लोग झुण्ड बनाये खड़े थे और उसके थोड़ा आगे पत्थर पर लिखा खारदुंगला टॉप जहा कोई नहीं था| जाकर मैंने वेगो लगायी, अपने सपने का जशन मना ने शांति थी वहा.

वेगो लगा ही रही थी की बधाई देने एक लड़का आया,बधाई दी, सलूट किया और हालत देकर पूछने लगा ” Do You needsomething, anything, medicine, juice, fruit, I am group leader for the biker group,tell me, you dont look good”|शब्द मुँह से बहार ही नहीं आ रहे थे बस इतना बोल पायी “नहीं बस थोड़ा इमोशनल हो रही हु”| वो वहा से निकल गया कहकर की “take your own time”|वहा बैठी हु और बस ख़ुशी में रोई हु, ऑक्सीजन की कमी के बावजूद| जब खारदुंगला राइड प्लान कर रही थी तभी मुझे बता दिया गया था की “वहा जाकर ज्यादा इमोशनल मत होना, एनर्जी वेस्ट होगी, ऑक्सीजन पहले ही कम रहता है” | पर दिल का क्या करे साहिब, दिल ख़ुशी रोक ही नहीं पा रहा था| बस रोना था बोहोत सारा, ख़ुशी में,अपना सपना पूरा होने की ख़ुशी में| समझ नहीं आ रहा था कैसे जाहिर करू ये ख़ुशी।

खुदको थोड़ा संभाला जब लोग बधाई देने के लिए आकर मिलने लगे| वो लड़का जो पूछने आया था कुछ मदद चाहिए फिर आया अपने दोस्त को लेकर मुझे मिलाने| वो मुझे देखकर खुश हो गया,जब मैंने पूछा “Can you please click a picture of me”,जवाब मिला “I can click 100” और आज यहाँ जितने लोग आये है “should click a selfie with you”. प्राउड मोमेंट अगर बोलू तो था जब साइकिल ग्रुप में के ७० साल के अंकल जो पुणे से लेह आये उन्होंने सलूट किया “तेरी ज़िद्द को सलाम“| उसके बाद याद नहीं कितने ही ग्रुप, कितने ही राइडर्स के साथ फोटो खिचाई। साइकिल ग्रुप के सारे लोगो से मिली उनके साथ नाश्ता किया| मेरे दोस्त जिन्होंने मेरे बाद राइड शुरू की थी कुछ समय उनके साथ बिताकर वापिस निकली लेह की ओर।

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उस दिन की मायूसी और चमक दोनों आज भी वैसी ही कैद है आँखों में जैसे उस दिन थी। ज़िन्दगी बदली है उस राइड ने और कुछ रिश्ते भी। वो चमक आप तक पहुंचाने में कितनी सफल हुई नहीं पता पर ये पोस्ट लिखते लिखते वह पूरा एक दिन मैंने फिर से जी लिया।

ये मत सोचियेगा की बस यही कहानी ख़तम हुई,ये तो बस एक पार्ट था अभी तो लेह से बाहर निकलकर और कई सुन्दर और ख़राब रास्तो से मिलाना है, रास्तो पर मिले लोगो से मिलाना है. So Stay Tuned.

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