बरसात की वो रात

Life is what you make it.

कल बड़े दिनों बाद मैं अकेले राइड पर निकली. ऑपरेशन के बाद कई दिनों तक एवेंजर चलाने के लिए ही मना था, जब परमिशन मिली तब भी अकेले जाने की हिम्मत नही होती थी. थोड़ा डर लगता ही था अगर पैर पर कोई झटका आ गया तो, पर कल वो दिन आ ही गया जब एवेंजर लेकर अकेले निकल पड़ी.

अपनी मर्ज़ी से ज्यादा दिमाग का खराब होना बड़ा कारण था राइड पर जाने का. राइडिंग से बेहतर तरीका और कोई समझ नही आ रहा था शांत होने का. ऑफिस में जैसे तैसे मन मार कर समय निकाला,ऑफिस खत्म करके रात को करीब 8 बजे राइड पर निकली. कहाँ जाना है, कौनसा रास्ता लेना है,कहाँ रुकना है कुछ पता नही, बस यवतमाल शहर से जल्दी बाहर निकलना है और चलते जाना है इतना पता था. कही पहुचने की कोई जल्दी नही 40-60 की स्पीड में एवेंजर बढ़ रही थी और पहुँची यवतमाल नांदेड़ हाईवे पर.मौसम भी बडा सुहाना हो रखा था, बढ़िया ठंडी हवा गालो को छू रही थी.

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बढ़ते बढ़ते एक बार मन मे आया नांदेड़ पहुच जाऊ 150 km दिख रहा था.कभी लगा लातूर जो काफी दूर था और समय हो रहा था करीब रात 9.45 बजे का. सुहाने मौसम में फिर तड़का लगा बिजली का. तब अपने मन को ब्रेक लगाकर मैंने वापस अपने घर यवतमाल आने का फैसला लिया. बस अपना मोबाइल,पैसे और एक पानी की बोतल के साथ घर से निकली थी तो आगे का सफर करना उचित ना था.इसलिए गाड़ी पलटाई लौटने के लिए.

वापसी का सफर शुरू हुआ और उसी के साथ शुरू हुई जोरो की आंधी, गाड़ी संभालना मुश्किल हो रहा था ऊपर से नागपुर मुम्बई हाईवे का काम जिसमे हमने घाट और सालो पुराने पेड़ तोड़ दिए. हर जगह बोर्ड लगे थे Go Slow, मन मे सवाल आ रहा था इसपे अगर सरकार भी थोड़ा सोच लेती तो. मैं डेवलोपमेन्ट के खिलाफ नही हु,वो तो बहुत जरूरी है पर at what cost. इसका हर्जाना कही तो हमे ही भरना है.

खैर ये तो अलग मुद्दा हो गया वापिस आते है राइडिंग पर. आंधी जब शुरू हो गयी थी तब बारिश कहाँ पीछे रहने वाली थी. जम के शुरू हुई बारिश और यवतमाल के आस पास 3 4 दिन में जितनी बारिश हो रही थी उसमें से सबसे तेज़ कल. राइड करने की तकलीफ बढ़ रही थी बारिश आंधी और सामने से आने वाली गाड़ियों की लाइट सब परेशान कर रहे थे. मैं बस अब कही रुकने की जगह ढूंढ रही थी. 10 15 मीन बाद जब बारिश अच्छी बढ़ चुकी थी एक ढाबा दिखा.

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ढाबे पर जाकर गाड़ी रोक दी.2 कार और एक कोई दूसरी गाड़ी थी जो बारिश में समझ नही आ रही थी. ढाबे के बरामदे में पहुची तो एक फैमिली दिखी जो निकल रही थी,एक कार उनकी थी. थोड़ा चौककर ही देखा उन्होंने मुझे क्योंकि घड़ी करीब 10.30 का समय दिखा रही थी और ये अकेली लड़की भारी बारिश में अपनी एवेंजर से उतरकर हाथ मे हेलमेट लिए ढाबे के अंदर आ रही थी. पूछा उन्होंने कुछ नही. ढाबे के मालिक किशोर सायरे ने टिन के छत के नीचे की जगह पक्की छत में अंदर जाकर रुकने के लिए कहा. ढाबे पर अब बस ढाबे पर काम करने वाले लड़के, ढाबे के मालिक और 2 दूसरे लड़के जो यवतमाल से अपनी कार से सफर कर रहे थे.

अंदर जाकर मैं एक चेयर पर बैठ गयी. मेरी यहाँ ठंड से हालात खराब हो रही थी और अंदर कूलर चल रहा था. एक कूलर की आवाज़ और दूसरी तेज़ आवाज़ जनरेटर की. मैं आजू बाजू देखते हुए कान में इयरफोन डाले गाने सुन ने की कोशिश कर रही थी. थोड़ा awkward सा हो ही रहा था. पहली बार ही यू अकेले इतनी रात में ढाबे पर बैठी थी. तभी आवाज़ आयी किशोर सायरे की “मैडम पानी वगैरह मँगाउ क्या”. उतना सवाल काफी था उनका मेरे लिए कान से इयरफोन निकालकर बातचीत का सिलिसिला शुरू करने का. समय तो काटना था ही.

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“नही बोतल है मेरे पास पानी की” कहकर मैंने बात को आगे बढ़ाया, “आज बारिश कुछ ज्यादा ही है ना”. “हां बारिश 3 4 दिन से रोज़ ही हो रही है पर इतनी जोर से आज ही”. किशोर ने कुछ सवाल पूछे आप कहा से आ रहे हो? कहा जा रहे हो?. उन्हें मैंने यवतमाल का भी पूछा “यवतमाल में भी इतनी ही बारिश शुरू है क्या?”. यवतमाल उनके ढाबे से कुछ 36 km था. उनका जवाब आया “वहाँ का तो पता नही, रुकिए मैं फ़ोन करके पूछता हूं”. उन्होंने तुरंत फ़ोन लगाया और यवतमाल का हाल पूछा. वहाँ भी बारिश उतनी ही थी.

हमारी ये सारी बाते पीछे के टेबल पर बैठे लड़के सुन रहे थे. उनका खाना खत्म करके जब वो निकलने लगे तब उन्होंने भी बातचीत शुरू की “इतनी रात को अब अकेले आगे नही जाना चाहिए, कार चलाने में ही दिक्कत हो रही है बाइक कहा चला पाओगे. बाइक भी आखिर मशीन ही है कुछ खराबी हो गयी तो अकेले क्या करोगे.आप एक काम करो बाइक यहाँ लगाकर थोड़ा पीछे जाकर ही बस स्टॉप है वहाँ से बस ले लो”. 11 बज रहे थे ढाबे पे ही काम करने वाले एक लड़के ने उन्हें बोला “इतनी रात को अब उन्हें बस कहा मिलेगी”. सब अपनी अपनी चर्चा में लगे हुए थे और मैं बैठे बैठे बस बारिश के रुकने का इंतज़ार कर रही थी.

अब वो दोनों लड़के भी चले गए,ढाबे में बचे अब बस ढाबे के लोग और मैं. 11 बजे उनका ढाबा बंद करने का टाइम था तो चेयर टेबल सब अपनी जगह पर लगा रहे थे बस मेरे लिए एक टेबल चेयर छोड़ दिया. ढाबे के बंद होने का टाइम देखकर मुझे ही थोड़ा बुरा लगा. मैंने उनसे बोला मेरी वजह से आपको देरी हो रही होगी. नही आप आराम से बैठो बोलकर वो रुक गए.

थोड़ी देर बाद फिर हिचकिचकार बोले “मैडम आप बैठिये यहाँ पर आराम से पर अगर बारिश नही रुकी तो आप मेरे घर पर भी रुक सकती है. घर पे मैं, मेरी Mrs और छोटा बच्चा है. बस आधा km है घर. बाहर वो बड़ी गाड़ी मेरी ही है उस से चले जाएंगे. एक रात की बात है आप हमारे घर मे एडजस्ट कर लीजियेगा. बाइक आप यहाँ ढाबे पर छोड़ सकती है,2 लड़के यही सोते है तो चिंता की बात नही”.

अब चिंता का तो मैं उनको क्या बता ती. चिंता का तो ऐसा है कि मैं ज्यादा करती नही खासकर सफर में क्योंकि सफर में जब भी मुसीबत आयी है अनजान से लोगो ने अपना बनकर मदद की है. आज भी कुछ वही हो रहा था.

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किशोर और मेरी बातें चल ही रही थी तभी ढाबे के लड़के खाना खाने बैठे. किशोर ने भी मुझे खाने के लिए पूछ लिया “मैडम कुछ खाया है आपने, लेंगी आप कुछ”. मूड ठीक नही होने की वजह से सुबह से ही मैंने कुछ खाया नही था और ना खाने की इच्छा भी हो रही थी पर उन्होंने इतने प्यार से पूछा कि मुह से हा ही निकला. फटाफट उन्होंने गरम गरम दाल और रोटियां लगाई और उतने ही फटाफट मैं खा भी गयी. रोटियां खत्म होती देख किशोर आकर बोले भी “मैडम और रोटी लगा दु. चावल खत्म हो गए है. रोटियां लगा देता हूं”.

कोई फॉर्मैल्टी नही थी. खाना खत्म होते होते बारिश बहुत हल्की हो गयी थी. 11.30 बज चुके थे फिर भी मैंने यवतमाल निकलने की ठानी, कुछ 36 km ही था क्योंकि वहाँ से यवतमाल.मैं बैग उठाकर पैसे देने के लिए उठी.किशोर तब किचन में थे उनके कोई पहचान वाले ढाबे पर आ गए थे बारिश की वजह से. उनके लिए कुछ बना ने के लिए.

मैंने किशोर से खाने के पैसे पूछे जो उन्होंने लेने से बिल्कुल इनकार कर दिया. “मैडम आज का खाना हमारी तरफ से था,अगली बार कभी फिर आ जाना आप तब पैसे लूंगा”.

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ऐसी कोई मेरी राइड या कोई सफर याद नही जहाँ मुझे ऐसे अच्छे लोग नही मिले. मेरा सफर पूरा होता ही है इन लोगो से. इन जैसे लोग ही मेरा सफर यादगार बनाते है और मेरे सफर को दिल से जोड़ते है. आज फिर ऐसी ही एक याद लेकर मैं बढ़ी आगे यवतमाल के लिए.

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जिंदगी तुझे क्या लिखू

जिंदगी तुझे क्या लिखू
स्कूल में हारी हुई वो रेस लिखू
जिसने बहुत रुलाया था
या डांस में जीती हुई वो ट्रॉफी
जिसने खुद पे विश्वास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो जन्मदिन लिखू
जिसमे पूरा मोहल्ला आया था
या वो एक कॉल जिसके इंतज़ार में
पूरा दिन काटा था

जिंदगी तुझे वो रिजल्ट लिखू
जब नंबर पहला आया था
या वो नंबर जिसने फेल ठहराया था

जिंदगी तुझे वो तबादला लिखू
जिसने दोस्तो से अलग करवाया था
या वो चिट्ठी जिसमे दोस्तो का
हाल बया होकर आता था

जिंदगी तुझे वो नए शहर का डर लिखू
जब लोगो में पहचान बना ने की जदोजहद की थी
या वो ट्रैन का सफर
जिसे पूरा करने की पहली बार अकेले हिम्मत की थी

जिंदगी तुझे पहली नौकरी का
वो ऑफर लेटर लिखू
जिसने बड़े होने का एहसास दिलाया था
या होस्टल का वो कमरा
जहा कितने ही किस्से
कितने ही कहानियों को जिया था

जिंदगी तुझे वो दोस्त लिखू
जिसने हर मुश्किल को आसान बनाया था
या वो गलतफहमी जिसने
अपने कुछ ना होने का एहसास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो लंबी सड़क लिखू
जिसपे चलकर अपने आप को पाया था
या दो कदम का वो फासला
गुरुर में जिसे ना चाहते हुए भी बढ़ाया था

जिंदगी तुझे वो ब्लाइंड टर्न लिखू
जिसने मौत से मिलाया था
या वो हेलमेट जिसने
फिर तुझसे मिलाया था…

अलग रंग अलग ढंग
अलग अंदाज़ अलग जज़्बात में
ऐ जिंदगी तू हर बार मिली
अब तू ही बता जिंदगी तुझे मैं क्या लिखू

-स्नेहल वानखेड़े