कुछ तो लोग कहेंगे….

कई बार मुझ पर इल्ज़ाम लगाया गया कि क्या हर बार लड़कियों के बारे में लिखती रहती वही रोना रोती है. क्या करे मजबूर करता है मुझे ये समाज लिखने पर. आज का ही एक किस्सा लेते है

एक लडक़ी कार से उतरी और बाजू में पार्क की हुई स्कूटी लेकर गयी. एक आदमी ने तुरंत मुस्कुराते हुए टिप्पणी की “लेडीज पे भी क्या भरोसा रखें अब, स्कूटी यहाँ खड़ी करके किसी की गाड़ी में बैठकर चली जाती है”.

तुम कौन होते हो उसकी आलोचना करने वाले. वो कार से जाए, हवाईजहाज़ से जाए,या साइकल से जाए. क्यों हर किसीको बिना वकालत किये जज बने बैठना है. वकालत करके,कोट पहना हुआ जज भी पहले सबूत मांगता है, सबकी बाजू सुनता है और फैसला सुनाता है. पर यहाँ कोर्ट भी इनका,वकील भी ये खुद और जज भी ये खुद ही और सबूत वगैरह की जरूरत इनको लगती नही. “लड़की शादीशुदा है मैडम हमको पता नही क्या”. खुदकी अपनी जिंदगी का तुम्हे अता पता नही सालो पर किसी और कि ज़िन्दगी का तमाशा बना ना तुम्हे आता है.

तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी अपनी और हमारी क्या मंदिर की घण्टी, जो चाहे अपने मजे के लिए बजा कर चले जाए

आदमी तो अपना किरदार इन सबमे बडी बेखूबी निभा रहा है पर फिर कुछ औरते भी है जिन्हें कमज़ोर बने रहने में कुछ गर्व सा महसूस होता और इन सब मे ख़ुदको नीचा दिखाने में भी मज़ा ही आता है. इसका भी एक किस्सा बताती हु :

22 जून 2018 को नागपुर से पुणे गरीबरथ ट्रेन के G2 बोगी में हम चढ़े. मेरा सीट नंबर 51. रात को 10.45 बजे करीब ट्रेन अकोला से निकली. आधी नींद में मैं जा ही चुकी थी कि अचानक बाजू के अपर बर्थ से किसी की आवाज़ सुनाई दी. एक लड़की बैठी थी उस बर्थ पर सीट नंबर 56 जितना मुझे याद है. एक लड़का नीचे खड़ा हो उसे बता रहा था “मैडम आप मेरी सीट पर है”.पहले वो इसपे थोड़ा भड़की की ‘नही ये मेरी सीट है,मेरी कन्फर्म थी सीट” पर लड़का भी अड़ा हुआ था “नही मेरी सीट है”. तभी वहां से TC गुजर रहे थे तो ये दोनों ने आवाज़ लगाई. TC ने लड़की से टिकट मांगी. टिकट देखने पर पता चला कि लडक़ी का टिकट G2 56 नही GS2 56 है, गरीबरथ में जो एक्स्ट्रा बोगी लगाई जाती है उसमें.

लड़की के चेहरे की हवा गुल. लड़की करीब 30-35 की होगी और हा बिल्कुल चुस्त तंदरुस्त और हा समान के नाम पर बस एक हैंडबैग था और एक साइड बैग. फिर भी चेहरा अपने हाथ मे लेके बेचारी सी शक्ल बनाके बोल पड़ी “मैं अकेली लड़की अभी किधर जाऊंगी उतने दूर इतने बजे” उसका बोलना पूरा हुआ भी नही था कि नीचे की बर्थ वाले कुछ होशियार बोल पड़े “ती एकटी बेचारी कुठे जाणार आता इतक्या रात्री”. अकेली लड़की काफी नही था तो अब वो बेचारी भी हो गयी. मन कर रहा था 2 खिचके थप्पड़ वही लगा दु.

यहाँ एक तरफ हम लड़ते रहते है हक़ के लिए, बराबरी के लिए और फिर ये कुछ महारानियां आ जाती है अपनी सहूलियत के हिसाब से बेचारी और सहूलियत के हिसाब से women empowerment का झंडा उठाने और हमारी मेहनत पे पानी फेरने.

पर सीट की कहानी यहाँ खत्म नही हुई थी. वो लड़का वहाँ से चला गया फिर थोड़ी देर में वापस आया “मैडम वो सीट तो TC ने किसी और को दे दी आपने टिकट नही चेक करवाई थी क्या”. ये मैडम अमरावती से बैठी थे और अब अकोला आ चुका था तो सीट दे दी गयी थी किसीको. लड़की के चेहरे पर अब और ज्यादा टेंशन, पर बेचरिपना, ना ना वो कहा छोड़ेंगे. “भैया आप मेरा बैग ऊपर से ले लोगे प्लीज” 2 बैग मैडम से उठ नही रहे थे. “भैया आप बोगी तक चलो ना प्लीज मेरे साथ मैं कैसे जाऊंगी”. हवाई जहाज़ मंगाते इनके जाने के लिए हम. मेरी अच्छी खासी नींद की पूरी बैंड बजा चुकी थी वो “बेचारी लड़की”.

सुनो सारी बेचारी लड़कियों/औरतो अगर तुम हमारे लिए कुछ कर सकती हो तो हमे बदनाम करना छोड़ो. बोहोत लड़ना पड़ता है अपनी पहचान के लिये. उसे बेचारा बनके खत्म मत करो.

बोहोत लड़ाई लड़नी पड़ती है तब कही एक लड़की को जन्म मिलता है,
फिर लड़ना पड़ता है स्कूल की सीढ़ी चढ़ने के लिए,
स्कूल के बाद शुरू होती है लड़ाई कॉलेज की,
अब लगता है जीत ही गए है तो फिर लड़ना पड़ता है नौकरी के लिए,
नौकरी मिल जाए तो लड़ना पड़ता है वहाँ हम मर्दो से कम नही साबित करने के लिए,
फिर आती है शादी ये तो ऐसी जंग है जहाँ लड़ाई अपनी इज़्ज़त बनाये रखने से शुरू होती है तो वो लड़ाई खत्म होती ही नही,
दुर्योधन के वध के बाद महाभारत भी खत्म हो गया था पर हमारी लड़ाई है कि जिसका अंत ही नही….

हा बाकी जिन्हें परेशानी है कि ये हर बार यही सब पोस्ट करते रहती है,ऐसी पोस्ट्स मैं तब तक लिखती रहूंगी जब तक वो औरत हो या आदमी उसे शर्म ना आने लगे किसी पे लालछन लगाने में, बदनाम करने में.

 

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तेरा ना होना

पास तेरे होने से शायद मैं कुछ और होती
खुदकी तलाश की जगह तुझे ढूंढ रही होती

आज जो ख़ुदको पाया है
दिल तेरा शुक्रगुज़ार है
ठोकर ना लगती
तो कहा मैं खुदमे झांकती

तेरी नज़र से ही ख़ुदको देखा था अब तक
तेरे ही रंग में ख़ुदको ढाल था
तू नही है अब तो पर्दा हटा है
रंग बस चार नही पचास होने का पता चला है
किसी भी रंग में रंगने की कोई शर्त नही होती

पास तेरे होने से शायद मैं कुछ और होती
खुदकी तलाश की जगह तुझे ढूंढ रही होती

बैसाखी

जितने की दौड़ में इतने तेज़ दौड़े
ख़ुदको ही “स्टार्टिंग लाइन” पर छोड़ दिया
और पता भी नही चला

रोज़ ही तुझे मुट्ठी से छूटने दिया
अब हिसाब ढूंढते है
ज़िन्दगी में हमने क्या किया

सुरक्षाकवच अपने इर्द गिर्द बनाकर
खुद को महफूज रखा
कवच टूटा नज़र खुली, देखा तो
कितना कुछ देखना ही रह गया

हर दिन रोजमर्रा की दौड़ में
मेरे आँखों के सामने
तू गुजरती चली गयी
ऐ जिंदगी, अब पकड़ने के लिए तुझे
ये बैसाखी साथ नही देती…

-स्नेहल

राजमची नाईट ट्रेक

24 जून ये मेरे लिए सेलिब्रेशन का दिन,इसी दिन 2016 में मैंने लद्दाख के लिए राइड शुरू की थी. तब से हर साल ये दिन सेलिब्रेट होता है. इस बार ये दिन हमने सेलिब्रेट किया राजमाची जाकर. 23 सुबह 10 बजे हम नागपुर से पुणे पहुँचे. लंच और थोड़े आराम के बाद शाम करीब 6 बजे हम पहुँचे लोनावला और 7 बजे शुरू किया हमारा सफर राजमाची के लिए. पहले तय किया था कि लोनावला स्टेशन से ही सीधा ट्रेक शुरू करेंगे पर बारिश और ट्रेक खत्म होने के दूसरे दिन सफर करके नागपुर आना, ऑफिस जाना ये सब करना था इसलिए फिर तय हुआ कि जहाँ तक ऑटो जाता है वहाँ तक ऑटो से ही जायेंगे.

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इस ट्रेक में निकेश और मेरे अलावा साथ मे था मेरा भाई प्रशिक जो गाइड के रोल में भी था,उसका ये राजमची का एक महीने में दूसरा ट्रेक था और सब मिलाकर चौथा. जानकारी के मामले में पूरा पक्का था वो.इस बार पर ये उसका पहला टाइम था कि वो ऑटो से किसी पॉइंट तक जा रहा था वरना हर बार उसने स्टेशन से ही ट्रेक शुरू किया था. राजमची के लिए अलग अलग रास्तो से ट्रेक शुरू होता है.कुछ लोग कर्जत की तरफ से शुरू करते है, कुछ लोग लोनावला की तरफ से.

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हमने अपना ट्रेक शुरू किया लोनावला के डेला एडवेंचर होकर जाने वाले रास्ते से. वही तक बस पक्का रास्ता है आगे रास्ते का काम चालू है. ऑटो की सीमा वही तक है पर बड़े चक्के वाली गाड़ियों से आप और आगे जाकर भी रुक सकते है और ट्रेक शुरू कर सकते है. पर मेरी माने तो डेला से ही आप ट्रेक शुरू करे, अगर आधे रास्ते गाड़ी से ही पहुच जाए तो ट्रेक का मज़ा क्या रहेगा. डेला से राजमची ट्रेक का सफर करीब 12 km का है.

डेला से राजमची जाते हुए रास्ते मे देखने मिलते है काफी खूबसूरत नज़ारे जिनमे समावेश होता है 3 4 वाटरफॉल हरियाली से भरपूर रास्ते,पंछियो की आवाज़ और थोड़े थोड़े सफर के बाद चाय भुट्टे की दुकाने. क्योंकि हमने ट्रेक रात में शुरू किया था झरने हम देख तो नही पा रहे थे पर पानी की आवाज़ हमारे साथ थी, पंछियो कीड़ो की आवाज़ भी हमारे साथ थी. रात में राजमाची जाते हुए जिन बातो का आपको खास ध्यान रखना है वो है रास्ते मे मिलने वाले केकड़े साँप और बिछुओं का. टोर्च इसलिए साथ मे ही रखिए और रास्ते पर नज़र बनाये रखे. बातो बातो में हमारी नज़र थोड़ी भटकी क्या थी फन निकाले हुए साँप हमारे सामने खड़ा था.खुशकिस्मती से भाई का ध्यान रास्ते पर था उसने हमे आगाह कर दिया वरना मैं साँप को प्यारी हो चुकी होती.केकड़े करीब करीब 100 देखने मिले इनसे भी सावधान रहना जरूरी है वरना ये यू जकड़ेंगे की छोड़ने का नाम नही.

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बारिश में कुछ भीगते कुछ ख़ुदको बचाते हुए कीचड़ पानी से होकर हम बढ़ रहे थे राजमची के बेस विलेज उधेवाड़ी की तरफ. हमे किसी ने बता रखा था कि यहाँ चोरी लूटपाट की काफी वारदाते होती है पर सफर में हमे कुछ ऐसा महसूस नही हुआ. हो सकता है ये काफी पुरानी बात हो जब बोहोत लोग राजमची ट्रेक के लिए आते ना हो. अब तो हर थोड़ी थोड़ी दूरी पर आस पास के गाँव के लोगो ने चाय भुट्टे नाश्ते की दुकान लगा रखी थी. कई दुकानें तो रातभर खुली रहती है खासकर शुक्रवार शनिवार रविवार  के दिन क्योंकि आस पास के शहर के काफी लोग यहाँ आते है खासकर मुम्बई पुणे. डेला की गाड़ियां भी यहाँ रात भर चलती है,उसी रास्ते पर उनका कोई ट्रेनिंग कैम्प है. अब कोई डरने वाली बात हमे नज़र नही आई साँप केकड़े बिछुओ को छोड़कर😉. हमने ये ट्रेक बारिश का मौसम शुरू होने के बाद किया वरना ये ट्रेक जुगनुओं के लिए भी काफी फेमस है जो बारिश शुरू होने के पहले तक देखे जा सकते है. जुगनू रास्ते मे हमे भी देखने मिले पर बहुत ज्यादा नही.

कुछ रुकते और मजे लेते हुए बेस विलेज में हम पहुचे करीब रात 12 बजे. भाई ने एक घर मे हमारे रुकने और खाने की व्यवस्था करा रखी थी. उधेवाड़ी में हर घर मे रुकने और खाने की व्यवस्था हो जाती है और टॉयलेट्स भी साफ मिल जाते है. हमारे पहले कई ग्रुप वहाँ पहुच चुके थे और सो चुके थे. हम तीनों को इसलिए एक अलग कमरा मिल गया पर खाना खत्म हो चुका था. लोनावला से हम खाने का जो कुछ सामान लेकर चले थे केक चॉकलेट्स खजूर उस से ही पेट भरकर जो भुट्टे खाकर वैसे ही काफी कुछ भरा था, सो गए.

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ट्रैन का सफर फिर इतना ट्रेक इसकी वजह से 24 की सुबह हमारी आराम से ही हुई. फ्रेश होने के बाद नाश्ते में हमे मिले गरम गरम पोहे और चाय. दोपहर का खाने के लिए जो चाहिए वो बताकर हम निकले राजमाची फोर्ट के लिए. यहाँ के अगर खाने और रहने की व्यवस्था की बात करे तो काफी सस्ते में हो जाती है. हमसे रहने के लिए एक के 70 रुपये, नाश्ते के 50, और खाने में क्योंकि हमने बस बेसन और भाकर कहा था तो उसके भी बस 70. अगर हम पूरा खाना बोलते तो उसके होते 130 रुपये और अगर नॉन वेज बोलते तो उसके भी अलग. बाकी ट्रेक के बेस विलेज के हिसाब से ये काफी सस्ता था.

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9 बजे करीब निकले हम फोर्ट के लिए जो थोड़ी ही दूरी पर था. फोर्ट का टॉप वहाँ से बस 2 km ही है. सुबह 9 बजे भी कोहरा और धूप की आंख मिचौली चालू थी. बहुत ही सुंदर चढ़ाई थी गाँव से फोर्ट टॉप की. बारिश की वजह से हर तरफ हरियाली दिख रही थी. कोहरे की वजह से ज्यादा दूर का तो कुछ नही दिख रहा था पर आस पास सब हरा था और पानी था. 2 km के छोटे से ट्रेक के बाद हम पहुँचे टॉप पर जहाँ एक भगवा झंडा शान से फहरा रहा था. टॉप से वैसे तो हमे आस पास के सारे पहाड़ दिखने चाहिए थे पर कोहरे की वजह से सब ढका हुआ था. इसका भी अपना अलग मज़ा था, फ़ोटो खिंचने पर भी पीछे बस सफेद पर्दा दिख रहा था मानो फ़ोटो स्टूडियो में बैठकर फ़ोटो खिंचाई हो.टॉप पर कुछ समय बिताने के बाद हम बढ़े वापस गाँव की तरफ.

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ऊपर चढ़ते हुए जहाँ हमारे साथ कोहरे ने दिया वही कोहरा नीचे उतरते हुए अब हल्का हल्का छठ रहा था. थोड़ी देर के लिए हमे साफ साफ आस पास के पहाड़ देखने मिले और फिर कोहरे ने अपनी हुक़ूमशाही जमा ली. हमने मज़े पर पूरे लिए. करीब 12 बजे गाँव पहुँचकर हमने खाना खाया, बोला हमने बस बेसन भाकर ही था पर उन्होंने तैयारी हमे पूरा खाना खिलाने की ही कर रखी थी और वो भी बस 70 रुपये में ही. गाँव की मेहमाननवाजी की बात ही अलग होती है किसीको भूखा रखना उनके उसूलो में नही. खाना खाकर और थोड़ा आराम करने के बाद हमने सफर शुरू किया नीचे वापसी का.

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थकान काफी हो रखी थी. निकेश ने सुझाव रखा गाड़ी से जाने का . एक साइड तो ट्रेक कर चुके है अब गाड़ी से जा सकते है. गाँव से पर गाड़ी मिलती नही है अगर आपकी कोई पहले से बुकिंग नही है तो. हम निकले फिर पैदल पैदल. रास्ते रात से काफी खराब हो चुके थे बारिश की वजह से. कीचड़ कुछ ज़्यादा ही हो चुका था और कई जगह पानी भी जमा हो चुका था, जूते भी फिसल रहे थे. रात को अंधेरे में जो झरने हम नही देख पाए थे वो साफ साफ अब दिख रहे थे. दिल को सुकून देने वाले वो नज़ारे थे. लग रहा था राजमाची ट्रेक के हमने सारे लुत्फ उठा लिए है.

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राजमची से 3 km पर एक ब्रिज है जहाँ से टैक्सी की जा सकती है पर रेट उनके 1000 से शुरू होते है जो खर्च करना हमे बेफिजूल लग रहा था. वहाँ भी टैक्सी नही मिली तो हम ठान चुके थे पूरा सफर पैदल ही तय करेंगे. आगे चलकर चलते चलते युही निकेश ने एक कार को हाथ दिखाया. वो कार रुक गई और हम तीनों को अंदर बैठने की अनुमति दी. केरला नंबर प्लेट की एकदम साफ सुथरी कार जिसमे सामने दो लड़के थे. हम तीन पूरी तरीके से बारिश में भीगे हुए, कपड़े पर कीचड़ लगा हुआ,अगर कपड़े पर ही कीचड़ था तो जूतों की हालत तो आप सोच ही सकते है क्या होगी. इतनी गंदी हालत में भी उन्होंने हमें अंदर बिठाया. हमे लोनावला हाईवे तक लिफ्ट चाहिए थी जहाँ से हम स्टेशन के लिए ऑटो कर लेते.

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वो दोनों केरला से थे और मुम्बई में नौकरी कर रहे थे 6 7 साल से. राजमाची का प्लान बनाकर मुम्बई से निकले थे पर रास्ते की खराब हालत देखकर आधे से ही वापस जा रहे थे और बीच मे उन्हें हम मिल गए. बहुत ही बढ़िया वो दोनों लड़के. जो ड्राइविंग सीट पर थे उन्हें भी घूमने का काफी शौक था और उनके शौक को जाहिर करता कम्पास का टैटू उनके हाथ पर था. केरला के होने की वजह से वो वहाँ पर घूमने की अलग अलग जगह का नाम बता रहे थे और उसके साथ अपने काम के बारे में भी. बातो बातो में ही हम हाईवे पहुँच गए पर उन्होंने अपनी गाड़ी वहाँ नही रोकी. कार उन्होंने लोनावला की तरफ ली और स्टेशन के बिल्कुल पास वाली गली पर छोड़ा. वीकेंड की वजह से बहुत ट्रैफिक होता है वो चाहते तो हाईवे से बड़ी आसानी से निकल जाते.उस ट्रैफिक में भी उन्होंने कार लोनावला शहर में ली जहाँ पुलिस टूरिस्ट को स्पीकर पर बता रहे थे “वीकेंड की वजह से टाइगर हिल्स और बुशी डैम पर 5 km का ट्रैफिक जाम लगा तो यात्री कृपया वहाँ ना जाते हुए लोनावला शहर की दूसरी जगहों पर जाए”. उन्हें अलविदा कहकर थोड़ा नाश्ता करने के बाद हम बढ़े स्टेशन की तरफ. स्टेशन के क्लॉक रूम से अपना सामान उठाकर हम बैठे शाम 5 बजे की कोयना एक्सप्रेस में और निकल पड़े मुम्बई की और.

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पैर रखने को जगह नही इतनी खचाखच भरी हुई वो ट्रैन. ट्रेक करने के बाद बैठ के जाने की इच्छा थी पर वो तो नामुमकिन था.खड़े रहने को जगह मिल गई वही गनीमत.मुम्बई में हमे जाना था मीरा रोड. हम ठाणे में ही उतरे जहाँ से हमे बस लेनी थी. ट्रैन में हमे कल्याण से ठाणे तक बैठने की जगह मिल गई थी. 8 बजे हम ठाणे पहुँचे और 9 बजे शिवशाही से मीरा रोड. बस स्टॉप से 5 min में ही था गोपाल दादा का घर जो स्पेशल डिश के साथ हमारा इंतज़ार कर रहे थे.

दादा के बड़े सुंदर से घर मे पहुँचकर सबसे पहले तो फुर्सत में नहाया और फिर जमाई महफ़िल. पहले महफ़िल बातो की मेरी,उनकी,भाई की, दादा के बेटी की, भाभी की उसके बाद महफ़िल जमी खाने की. खाने में हमारे लिए थे स्पेशल ताज़े ताज़े केकड़े. मुझे और मेरे भाई को जो खाने नही आते थे तो हमे पूरी ट्रेनिंग भी मिली. बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट ऐसे वो केकड़े और उसपे दादा की मेहमाननवाजी, दिल खुश. रात के दो बजे तक गप्पे और मस्ती के साथ खत्म हुआ दिन.

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25 की सुबह नींद से उठने के बाद स्वागत किया हमारा जोरदार बारिश ने और उस जोरदार बारिश में दादा हमे लेकर गए नदी पर. नदी का नाम तो मालूम नही पर बह वो तूफानी रही थी. मज़ा आ गया खूब डांस किया, खूब मस्ती की, खूब भीगी और खूब खुश हुई. सब मस्ती खाना मिलना मिलाना और यादों के साथ फिर मैं वापस निकली अपने शहर नागपुर की ओर.

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कुछ वो लोग

कुछ वो लोग है
रूखी सुखी खाकर भी
बेफिक्रे बने
जीने में मदमस्त है

कुछ वो लोग है
सबकुछ पाकर भी
किसी खलती हुई कमी
को पूरा करने के ही
जदोजहद में है

कुछ वो लोग है
जिनकी रात की
जगह का ठिकाना नही होता
पर दिल मे सुकून
की कमी नही होती

कुछ वो लोग है
एक नही चार कमरों
में रहते है
पर सुकून के लिए
दर बदर
गली गली भटकते है

दोनो को जोड़ता है
जो शौक
वो नशा है
एक के नशे को
जहाँ इल्ज़ाम देते है
दूसरे के नशे
को शान का
नाम देते है.

-स्नेहल वानखेड़े