THE DREAM RIDE (Part II)

साथ चलता है मेरे दुवाओ का काफिला, और ऐसी ही एक दुआ ने असर दिखाया 25 जून 2016 को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर. 25 को शुरू होने वाला था मेरा दिल्ली से लद्दाख तक का सफर. 25 को दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे नागपुर से पार्सल की हुई मेरी वेगो लेनी थी. 25 को सुबह अपना बड़ा सा रकसैक, एक बैग,हेलमेट और जैकेट लेकर मैं ट्रैन से उतरी. मैं एक अकेली और सामान इतना सारा, सामान लेकर पोहोची मैं प्लेटफार्म के पार्सल ऑफिस में. ऑफिस में 2 लोग मौजूद थे,उनमे से एक का नाम था मनोज . मुझे देखकर पहले तो शॉक ही लगा उन्हें,पतली दुबली सी लड़की इतने सारे सामान से लदी हुई और जून की गर्मी से पूरा पसीना पसीना. मैडम सामान रख दीजिये निचे और पहले आराम से बैठकर पानी पीजिये. सामान निचे रखकर कुछ देर मैं बैठी फिर उन्हें रिसिप्ट दिखाई. रिसिप्ट देखकर उन्होंने मुझे प्लेटफार्म के दूसरे पार्सल ऑफिस जाने के लिए कहा. मुझे दोनों ने सामान वही रखने के लिए कहा पर मैंने सोचा की जब गाडी वही से उठानी है तो फिर यहाँ वापस आकर फायदा नहीं इसलिए सामान लेकर ही मैं चल पड़ी प्लेटफार्म की दूसरी और. गलती बस इतनी कर दी की और आधे रस्ते पोहोचकर मैंने किसी और से पार्सल ऑफिस पूछ लिया और उन्होंने मुझे दूसरा रास्ता बता दिया ,उनका कहा हुआ मानकर मैं पोहोच गयी प्लेटफार्म 1 मेन पार्सल ऑफिस, वाहा अपनी गाडी के बारे में पूछा जवाब मिला यहाँ कोई गाडी नहीं है. पहले ही गर्मी इतनी ज्यादा और जवाब ये मिला तो मौसम के पारे से ज्यादा चढ़ गया मेरे दिमाग का पारा. गुस्से गुस्से में निकली मैं फिर से वापस दोनों से मिलने, ऑफिस के बहार पोहोच ही रही थी की दोनों ताला लगते हुए बहार मिल गए “अरे मैडम हमने तो आपको इसी प्लेटफार्म के आखिर में जो ऑफिस है वाहा जाने के लिए कहा था आप कहा चली गयी थी”. अब गुस्सा खुद पे आ रहा था, एक ही जगह के इतने सारे सामान के साथ 3 चक्कर. चलिए मैडम हम आपको ले चलते है, दोनों मेरे साथ ही ऑफिस तक चले मेरी रिसिप्ट की जाँच करवाई और गाडी लेने को कहा. दूसरी मुसीबत ऐसी की गाडी पूरी पैक और पेट्रोल 0. मैडम आप ले जाएँगी अकेली गाडी,सामान काहा रखेंगी,कोई साथ में हो तो बुला लो किसीको. साथ में तो कोई था नहीं,ये उन्हें भी बताया. अच्छा तो हम आपको प्लेटफार्म के दूसरे कोने तक छोड़ देते है वाहा से आप चला लीजियेगा गाडी और उस रस्ते निकल जाइएगा. अब हम पोहोचे दूसरे कोने तो फिर मनोज जी कहते है पर अब आप वाहा तक भी कैसे जाएँगी,रुकिए मैं पेट्रोल यही मंगवा देता हु. घुमाया उन्होंने एक फ़ोन और पेट्रोल लेकर आने के लिए कह दिया. पेट्रोल लाने के लिए आधे घंटे का समय लगने वाला था तो दोनों मेरे साथ ही पूरा समय धुप में खड़े रहे कहते हुए”जब आप धुप में खड़ी रह सकती है फिर हम तो राजस्थान से आये है”. आधे पौन घंटे बाद पेट्रोल आया अब समस्या थी गाडी पैक है, उसके लिए भी उन्होंने इंतज़ाम करवाया गाडी में पेट्रोल डाला मुझसे बिना पैसे लिए हुए और उस पर आगे भी जरुरत पड़े दिल्ली से गाडी नागपुर भेजनी हो तो बताइयेगा हम करवा देंगे,हमारा नंबर रख लीजिये. लद्दाख सफर का पहला पड़ाव था दिल्ली और उसकी इतनी अच्छी शुरुआत होगी ये मैंने सोचा नहीं था. दिल्ली शहर में बिना मतलब मदद मिल जाना ही अपने आप में अजूबा सा लगता है कुछ लोगो को क्युकी सुनाया ही कुछ ऐसा जाता है दिल्ली के बारे में,पर दिल्ली के मामले में भी मेरी किस्मत बुलंद ही रही है,इनसे मेरी पेहचान बस 5 min की ही थी और ये मदद के लिए आगे आ गए और आज भी बैंक के काम को लेकर कभी कोई दिक्कत हो तो कॉल कर लेते है. इसलिए मैं हमेशा कहती हु “हा दुनिया थोड़ी बुरी तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” .

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रेलवे कर्मचारी मदद करते हुए
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वेगो पार्सल

वेगो हाथ में आयी और साथ ही आयी उसके मेरी हिम्मत. गाडी लेने के बाद अब बारी थी रितेश सर से मिलने की जिन्होंने जाने कितने ही लोगो की किस्मत बदली है प्रेरणा देकर. यकीं नहीं हो रहा था की अपनी राजधानी में मैं मेरी वेगो चला रही हु. रितेश सर से मिलना तो तय था उसके साथ मुझे सरप्राइज मिला नवीन मामाजी का,3 साल बाद मिल रही थी दोनों से और उसपर घर के कड़ी पकोड़े,वो खाने के बाद तो लग रहा था ज़िन्दगी में और चाहिए क्या अब इसके आगे. चाहिए और बोहोत कुछ था इसलिए चंद घंटो की बोहोत ही जबरदस्त प्रेरणादायी मुलाकात के बाद निकली मेरी अगली टोली से मिलने. श्रीदीप और रंगा इन दोनों से ही मेरी मुलाकात हुई थी किसी सफर में और बस दोस्ती हो गयी. इन सभी ने मेरा मनोबल बोहोत बढ़ाया और अलविदा किया शुभकामनाओ के साथ.

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रितेश सर के आफिस के बाहर

 

26 जून 2016 निकली मेरी वेगो अपना अगला पड़ाव पूरा करने होशियारपुर की तरफ. थोड़ी हैरान परेशान,जो राइड सुबह 6 बजे शुरू होनी थी वो हुई 9 बजे शुरू ऊपर से दिल्ली इतना बड़ा की गाडी चले जा रही है और दिल्ली ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा. थोड़ी राहत मिली जब गाडी दिल्ली से बहार निकली. दिल्ली से बहार निकलने की ख़ुशी मनाना चालू ही था की एक और खुश खबर मिली मेरी राइड की खबर राजस्थान पत्रिका में छपने की. सोने पे सुहागा वाली बात थी ये फिर तो सफर और सुहाना हो गया इस जश्न के साथ. ख़ुशी और जश्न में कब होशियारपुर पोहोच गयी पता ही नहीं चला. होशियारपुर में रात बितानी थी और फिर सुबह तैयारी करनी थी आगे चलने की पर उसके पहले रात में इंतज़ाम करना था रकसैक को कवर करने के लिए कवर का,मेरे ड्यूल फ़ोन के सिम ट्रे का ताकि जम्मू कश्मीर पोहोचते ही मैं अपना बीएसएनएल चालू कर सकू पर ना सिम ट्रे का इंतज़ाम हो पाया ना कवर का. ऊपर से बीएसएनएल माइक्रो में भी कन्वर्ट नहीं हो पाया. छोड़ी वो टेंशन और रूम पर जाकर करणअर्जुन को उनके गाओं वापस आते हुए देखने में डूब गयी सोचा कवर और सिम ट्रे का जुगाड़ रास्ते में कर लेंगे.

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राजस्थान पत्रिकाओं

 

27 जून 2016 : आज सफर अपने समय सुबह 6 बजे शुरू किया. गाडी शहर के बहार भी बड़ी जल्दी निकल गयी क्युकी छोटा सा ही शहर है होशियारपुर. गाडी शहर के बहार निकली नहीं की रास्ते के दोनों तरफ दिखने लगे बड़े बड़े उचे उचे पेड़, हरियाली ही हरियाली पूरी पंजाब वाली फीलिंग. एन्जॉय करना बस चालू ही किया था की ऊपर वाले ने कुछ नया प्लान बना लिया, सोचा गर्मी से हमे थोड़ी आज़ादी दिलाये, 2 min में दिन से रात हो गयी और बादल जो बरसे की आगे का आप कुछ देख नहीं सकते, न रेनकोट तब किसी काम का रहा और बैग को कवर अपनी ही गलती से था नहीं. जब तक गाडी और खुदको बचाने का सहारा ढूंढ़ती बारिश अपना काम कर चुकी थी. फिर भी एक जगह जाकर शेड में रुकी, सामने खुली हुई दूकान दिखी किस्मत से एक,पहले तो काफी सोचा इतना भीगकर कैसे अंदर पर सफर क्युकी इतना लम्बा तय करना था तो और कोई चारा था नहीं. पूरी भीगी हुयी अंदर जाकर बैठी. उन्ही से कुछ और प्लास्टिक ली की अपना कैमरा फ़ोन जो आलरेडी मैंने एक पॉलिथीन में दाल रखा था पर एक और कवर के नाम पर ले ली. रकसैक के लिए कवर पूछा पर उनके पास था नहीं. बारिश पुरे जोरो शोरो से एक डेड घंटा बरसी उसके बाद कही कुछ कम हुयी तो सोचा चलो निकला जाए वरना कही आगे देरी न हो जाये. भीगी भागी सी निकली अपनी वेगो पे तो मजे की बात ये की 10 min बाद जिस रस्ते पर पोहोची वाहा ऐसा लग रहा था मानो मेघ देवता इनसे दोस्ती तोड़े बैठे है इसलिए रूठकर सालो से बरसे ही नहीं है. थोड़ी खुद पर हसी आ रही थी और थोड़ी कुदरत पर. थोड़ा और आगे पोहोचे तो मेहरबानी से बादल अपना काम पहले निपटा चुके थे,ठंडी हवा और गीली जमीं से उनका पैगाम मिल गया था. बारिश से लड़ते झगड़ते, पंजाब के मक्खन में डूबे परांठे खाते आखिर पोहोची मैं उन रास्तो पर जिन पर गाडी चलाने का सपना ना जाने कब से देखा था,युही बैठे बैठे दिमाग में ख्याल आ जाता था कब चलाऊंगी इन रास्तो पर गाडी,क्या फीलिंग रहेगी उन रास्तो पर गाडी चलाने की और आज बस एक गेट की दुरी थी उन रास्तो और मेरे गाडी की बिच. अगर आप सोच रहे है की मैं लद्दाख की बात कर रही हु तो ना जी ना लद्दाख पोहोचने विच तो लम्बा समय है.. किन रास्तो की बात कर रही हु मैं ये बताउंगी मैं मेरे अगले पोस्ट में तब तक आप भी मजा लीजिये पराठे और बारिश का 🙂

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बारिश का संकेत
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पंजाब का परांठा

The Dream Ride (Part I)

रास्ता सफर और ज़िन्दगी.लेह लददाख के उस सफर में ना तो रास्ता आसान न तो वाहा तक पोहोचने का सफर और ज़िन्दगी की तो अपनी एक अलग ही लड़ाई चली आ रही है बरसो से. पर सब अगर आसान होता तो रोमांच कहा रह जाता और मुश्किलें चाहे जितनी भी आये जब आप कुछ करने की ठान ही लेते है तो रास्ता तो कुदरत खुद ही बना देती है. मई 2016 जब अपने एक दोस्त के फ़ोन कॉल पर मैंने तय कर लिया था की मैं लददाख जा रही हु,बस ज़िद्द इतनी थी की जाउंगी तो अपने वेगो पर ही. मेरी मोपेड वेगो को वादा था मेरा उसे खारदुंगला टॉप जो की दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता माना जाता है, 18380 feet वाहा ले जाना. दोस्त ने काफी समझाने की कोशिश की “वेगो नहीं चल पायेगी वाहा” पर वादा किया था तो निभाना भी था और पता भी करना था आखिर क्या है ये लददाख का पागलपन और क्यों वेगो नहीं चल सकती. अभी तक कश्मीर, उसकी वादियाँ, वहा का डर,लेह तक जाने वाला मुश्किल रास्ता और आने वाली मुश्किलों के बारे में बस सुन रखा था पर अब खुद जाने का तय किया था,डर लग रहा था. कई सवाल थे मन में क्या मैं सही में तैयार हु ये करने के लिए? क्या मैंने अपने दोस्तों की बात मान लेनी चाइये वेगो से ना जाने की ? क्या मैं ये कर पाऊँगी?. अपने डर और सवाल के जवाबो के लिए व्हाट्सप्प किया मेरे मार्गदर्शक डॉ अमित निकम ये खुद 3 बार लेह जा चुके है और 8 साल से राइडिंग कर रहे है. मुझे पता था इनसे बेहतर मुझे और कोई सही तरीके से नहीं समझा पायेगा. मेरी पेहले की राइड्स में भी इनका काफी सपोर्ट रहा था. उठाया फ़ोन किया मैसेज “खारदुंगला जाना है वेगो से” जवाब था जाओ. आत्मविश्वास जैसे सातवे आसमान पर था, अमित ने कह दिया मतलब तो पक्का वेगो जाएगी खारदुंगला. उसके बाद काफी सारी बाते, क्या तैयारी लगेगी, कैसे है वाहा के रास्ते,काहा काहा ज्यादा दिक्कते आ सकती है,साथ में क्या क्या रखना होगा, मुश्किल आयी तो किस से मदद ले सकती हु, गाडी में क्या क्या ध्यान देना होगा और उन सबके पहले क्युकी गाडी अभी तक किसी ऊंचाई पर नहीं चढ़ी थी तो मुझे सुझाव दिया गया- गाडी का टेस्ट पचमारी के धूपगढ़ पर चढ़ाकर. धूपगढ़ मध्य भारत की सबसे ऊँची जगह है. मई महीने के अंत तक ये सुझाव का पालन भी कर लिया था मैंने और गाडी में क्या क्या ठीक करना होगा ये भी समझ आ गया था.

 

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Wego at Dhupgarh

गाडी की तैयारी तो समझ आ गयी थी अब बारी थी खुदके तैयारी की. लददाख का मौसम,ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी इन बातो के लिए भी खुदको तैयार करना था. तो तय हुआ की शारीरिक रूप से तैयार होने के लिए ज़ुम्बा लगाया जाये. मई के आखरी हफ्ते में शुरू हुई जुम्बा क्लासेज.मेरा ऑफिस नागपुर से कुछ 85 km की दुरी पर है,10.30 बजे ऑफिस का समय होता है तो 8 बजे घर से निकल जाना होता था,आधे दिन मैं ऑफिस इसलिए नहीं जाती थी क्युकी सुबह 7 बजे उठने से ज्यादा मुश्किल काम मुझे कोई और लगता नहीं था. जहा मुझे 7 बजे उठना जान पे आता था वही जुम्बा की क्लास ही 7 बजे शुरू होती थी मतलब सुबह 6-6.30 की बिच उठना होता था. ऑफिस के लिए घरवाले 7 बजे से 10 बार आवाज़े देकर हार जाते थे तब कही मैं 7.30 तक उठती थी. पर यकीन मानिये उस एक महीने बिना किसीके आवाज़ लगाए मैं खुद अपनी मर्ज़ी से 6 बजे उठकर 15 min पहले क्लास पोहोचति थी ताकि डंबल्स, थोड़ा वार्म उप करने का टाइम मिल जाये. 7 से 7.45 तक ज़ुम्बा फिर भागे भागे घर आती थी 15 min में तैयारी कर निकल जाती थी अपने ऑफिस की बस पकड़ने. फिट बनने की लिए डाइट भी जरुरी थी तो भागादौड़ी में दूध पीकर निकल जाती थी और नाश्ते से लेकर खाने का डब्बा साथ ले जाती थी. जिस लड़की को फल किसी जहर से कम नहीं लगता था उसने दिन में 3 बार फल खाना शुरू किया, खाने का महत्त्व भी कम ही था जिंदगी में इसलिए 40 kg के ऊपर बढ़ना मुश्किल हो रखा था पर बस उस खारदुंगला राइड के लिए हर 2 घंटे में खाना शुरू रहता था और वह भी बिलकुल समय पे. सुबह 8.30 बजे बस में अंडा, फल, ऑफिस पोहोचकर 10-10.15 के बिच नाश्ता,12.30 बजे फिर फल,2.30 बजे खाना , शाम 5 बजे केला और रात 9 बजे तक खाना. सारी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी कई सपने रचे जा रहे थे.और असर ये था की एक दिन ऑफिस जाते जाते बस में सोच रही थी खारदुंगला पोहोचने के बाद की ख़ुशी के बारे में और बस आँखों का पानी रोके नहीं रुक रहा था,टप टप पानी बहे जा रहा है,आँखों में एक चमक है और होटो पे मुस्कान, आसुओ को रोकना ही था वरना बस के लोग पागल समझ लेते. डूब चुकी थी मैं पूरी तरीके से उस सपने में,जीने लगी थी सपने का हर लम्हा अपनी तैयारी के साथ. तैयारी का असर भी अच्छा ही आया था, एक महीने में 40 kg से में 42 पर पोहोच गयी थी.

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Koshish mat kijiye isme weight nahi samjhega 😛

गाडी और खुदकी तैयारी तो जोरो पर चालू थी और उतने ही जोरो पर चालू थी मेरे घरवालों की हर वह कोशिश जिस से की मैं खारदुंगला ना पोहोच पाउ.

11 जून 2016 मम्मी पापा की शादी की सालगिरह का दिन, जिसे मना ने के लिए मौजूद थी 3 फॅमिली कुल 3 आंटी मम्मी पापा सोनल दादा और मैं. जश्न उसे कहना बिलकुल ही गलत है क्युकी उस दिन तो जंग लड़ी गयी थी बस तलवारे नहीं थी. जंग में मेरी तरफ थी मैं और दादा और दूसरी तरफ परिवार. मुश्किल था उनसे लड़ना उन्हें समझाना, TVS Scooty Pep की Ad में खारदुंगला और वाहा के रास्ते देखकर उन्होंने मुझे पूछा था ” जिन्दा आएगी तू”, जायज़ थी उनकी हर चिंता, चिंता ख़राब सड़क की, चिंता सड़क पर मिलने वाले लोगो की, की रेप हो जाएगा, वही भारत परोसा जाता है रोज़ टीवी और अखबारों में वही उनके लिए पूरा सच भी था, चिंता थी उन्हें की क्यों इतने फिजूलखर्ची करनी है,चिंता थी उन्हें क्या हासिल कर लेगी वाहा जाकर, क्यों ये ज़िद्द और क्यों ये सपना, वेगो ही क्यों, चिंता की क्या ये सही में वापस फिर हमे मिलेगी. मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं, मैंने थोड़ी फाइट मारी और फिर सोनल दादा का सपोर्ट उनके समझाने का तरीका उसके आगे मान ही गए. 5 घंटे में शांति प्रिय तरीके से जंग ख़तम हो ही गयी कुछ गीले शिकवे बाकी थे वो भी दूर होने ही थे.

गाडी की तैयारी खुद की तैयारी और घरवालों की तैयारी इन सब तैयारियों के बिच आखिर वह दिन आ ही गया 23 जून 2016 जब सुबह सुबह मैं पोहोची रेलवे स्टेशन अपनी गाडी दिल्ली पार्सल करवाने. गाडी पार्सल करने वालो को तो इतनी मिन्नतें “भैया ध्यान से पैक कीजिये, गाडी का ध्यान रखिये, अपना सबकुछ दे रही हु मैं आपको, गाडी को कुछ होना नहीं चाइये,बोहोत लम्बा सफर ये तय कर चुकी है और बोहोत लम्बा सफर तय करना है इसे”. गाडी हुई पार्सल, एक और काम ख़तम. फिर हुई 24 जून 2016 की सुबह, सुबह 7 बजे रोज़ के ही जैसे जुम्बा क्लास पोहोची,7.45 को क्लास से निकलने से पेहले अपनी दोस्त को मिलने गयी, की निकल रही हु मैं आज शाम को दिल्ली,कुछ अलग फीलिंग थी तब कुछ छूट रहा हो जैसे, कुछ डर भी, कुछ अलग बस पर जाना तो था ही. शाम को बैठी मैं दिल्ली की गाडी में और आख़िरकार शुरू हुआ मेरे सपनो का सफर…..

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Wego at Delhi Railway Station

उत्सुकता बनाये रखिये सफर थोड़ा लम्बा है, धीरे धीरे तय करेंगे. आगे का सफर अगली पोस्ट मे…..

TO ALL THE FATHERS

कुछ दिन पेहले ट्रैन में एक बच्ची के पापा को उसको अप्पर बर्थ पे चढ़ाने की प्रैक्टिस करवाते हुए देख अपने पुराने दिन याद आ गये थे.

जब सारी लड़किया स्कूटी चलाना सिख रही थी पता नहीं काहा से मुझे बजाज स्कूटर चलाने का शौक आया, शायद घर पर तब वही गाडी मौजूद थी हो सकता है इसलिए. 9th में थी तब मैं.मुझे याद नहीं मैंने पापा से क्या काहा था की उन्होंने सिखने के लिए मना नहीं किया पर वो ग्राउंड याद है जहा स्कूटर सीखी थी. तब धमतरी (छत्तीसगढ़) में रेह्ते थे, वाहा जिस घर में किराये से रहते थे उसके पीछे ही हमारी स्कूल की प्राइमरी बिल्डिंग का ग्राउंड था. घर से वो ग्राउंड साफ़ साफ़ नज़र आता था. रविवार के दिन वही स्कूटर सिखाने ले जाते थे पापा. पेहला रविवार तो याद नहीं क्या किया था जरूर कुछ ध्यान से सीखा नहीं होगा तभी याद नहीं पर दूसरा रविवार बड़े अच्छे से याद है. पापा मुझे ग्राउंड पर स्कूटर चलाना सीखा रहे थे और मम्मी हमारी पड़ोस वाली आंटी के साथ घर की गैलरी से मुझे सीखता हुए देख रही थी . पापा मुझे गाडी का हैंडल सभालना सीखा रहे थे,पेहले उन्होंने खुद गाडी चलाकर दिखाई फिर मेरी बारी थी. स्कूटर स्टार्ट करके पापा ने मेरे हाथ में दी, अपना एक हाथ उन्होंने स्कूटर के पीछे पकड़ा दूसरा सामने हैंडल पर. धीरे धीरे मैं स्कूटर चला रही थी जब थोड़ा बैलेंस समझा पापा ने हैंडल से अपना हाथ हटाया और बस स्कूटर के पीछे से सपोर्ट दे रहे थे. ग्राउंड में गोल गोल स्कूटर घुमा रही थी, एक दो बार पीछे मुड़कर देखा तो पापा पीछे से गाडी को पकडे हुए दिखे. एक दो चक्कर घुमाने के बाद बड़ा कॉन्फिडेंस आया और मैं चिल्लाने लगी “डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो गाडी मैं खुद चलाऊंगी,डैडी छोड़ो ना ” कुछ जवाब नहीं आया तो पीछे मुड़कर देखा पापा तो बड़ी दूर खड़े थे, मुड़कर देखने के बाद जवाब मिला मैं तो कबसे छोड़ चूका हु तू ही चला रही है. फिर क्या पूरा धमतरी घूमती थी अपनी स्कूटर पे, मम्मी को मार्किट ले जाना, टूशन लेकर जाना,. पेट्रोल पंप पर तो पेट्रोल डालने से पहले स्कूटर और मुझे पूरा टटोल कर देखते थे “इतनी सी लड़की इतनी बड़ी स्कूटर” फिर कही पेट्रोल डालते थे. मज़ा आता था.

स्कूटर का साथ कुछ महीनो का ही रहा. पापा की नागपुर ट्रांसफर हो गयी, स्कूटर उन्होंने धमतरी में बेच दी और नागपुर में हाथ में काइनेटिक थमा दी गयी. स्कूटर वाला मज़ा इस गाडी में नहीं था पर स्कूटर मिले ये होना नहीं था.12th में फिर शौक आया होण्डा स्प्लेंडर सिखने का भाई और सोनल दादा ने मिलकर सिखाई वो बोहोत चलाने का मौका नहीं मिला, स्कूटी दी हुयी थी मुझे अलग से और उसके बाद तो पुणे चली गयी थी हॉस्टल. आज जब अकेले अपनी वेगो लेकर भारत दर्शन करती हुयी दिखती हु तो कुछ जाने कुछ अनजाने लोग ये सवाल पूछ लेते है की तुम्हारे घर वालो को तुमने खुदपर कॉन्फिडेंस दिलाया कैसे, जवाब इसका मुझे भी नहीं पता. मैं उन्हें बताने लगती हु बचपन से ही ऐसा था, मुझे कभी मेरे पापा ने नहीं बताया की लड़किया ये नहीं कर सकती या वो नहीं कर सकती. घर में दो लड़के है, मेरे दो छोटे भाई पर उनसे ज्यादा मुझे ही सिखाया गया कराटे सीखा,कत्थक सीखा, क्रिकेट में अलग दिलचस्पी हुआ करती थी तब, तो स्टेट टीम सिलेक्शन के लिए गयी,टेबल टेनिस स्टेट लेवल पर खेला, लड़को के साथ ग्राउंड पर फुटबॉल खेला, डांस में स्कूल में नाम कमाया,पिकनिक जाने के लिए याद नहीं कभी कोई रोक टोक हुई हो,ग्रेजुएशन में जब हॉस्टल में रहती थी तब कॉलेज ट्रिप की परमिशन के लिए कॉल किया था, तो जवाब मिला था ” अब इतनी बड़ी तो हो ही गयी है की अपने डिसिशन खुद ले सके, क्या सही है क्या गलत हर बात मुझसे पूछने की जरुरत नहीं है” . पर इसमें लोगो को अपने सवाल का जवाब नहीं मिल पाता ” ये सब के लिए भी कही उनका कॉन्फिडेंस जीता होगा”. अब ये तो मुझे नहीं पता कब कहा कैसे मैंने ऐसा क्या किया और उनका कॉन्फिडेंस जीता, पर ये उनके ही कॉन्फिडेंस का नतीजा है की आज मैं इस मुकाम पर हु उन्होंने मुझे कभी डरना नहीं सिखाया, उन्होंने मुझे नहीं बताया की यहाँ जाने से पुलिस पकड़ लेगी, या कोई बाबा आ जायेगा या भूत ले जायेगा. आज भले ही वो थोड़ा डर जाते है,कभी कभी मेरे लड़की होने की याद भी दिला देते है,समाज की हालत देखकर और हो रहे घटनाओ की वजह से, पर बचपन की कुछ आदते इतनी आसानी से नहीं छूट ती और उसमे से एक आदत पापा ने सिखाई थी निडरता. आज जो भी मुझमे है उनकी ही देन है।

ट्रैन में भी उस बच्ची को उसके पापा बस बर्थ पर चढ़ना नहीं तो अपने डर पर जित पाना सीखा रहे थे. काश की सभी पापा अपनी बच्चियों को भी यही सिखाये ” बेटा बिना डरे लड़ना जमके लड़ना अपने हर उस डर से लड़ना जो तुम्हे कमजोर बनाये,जो तुम्हे अपना हक़ ना लेने दे,आगे बढ़ने ना दे और जीने की आज़ादी न दे,लड़ना अपने सपनो के लिए बिना हिचकिचाए, बनाना अपनी खुद की एक अलग पहचान खुदका एक अलग नाम,ना हो कोई साथ और हो खुद पे विश्वास की गलत तुम हो नहीं,तो लड़ना अकेले अपने उस विश्वास के लिए, लड़ना तुम आज की फिर लड़ना न पढ़े आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान,अपने अधिकार, अपने नाम,अपनी हिफाजत, अपने सपनो के लिए “.

Water Army

05/06/2017

जितना खूबसूरत आज का दिन था उस से कही ज्यादा खूबसूरत थी आज की शाम. शाम को नवाज़ा गया मुझे एक बोहोत बड़े पुरुस्कार से, वो पुरुस्कार मिला इसी साल चौथी और नवी कक्षा में प्रवेश किये हुए बच्चो से. पुरुस्कार मुझे घोषित कल ही कर दिया था इन्होने,मुझे पता बस आज चला जब शाम को ७ बजे मैं विहार के एंट्रेंस पर पोहोची. गाडी बस लगा ही रही थी और आर्या की आवाज़ आयी- क्या टाइमिंग है आपकी, आर्या के साथ साथ थे मिक्की और तनिष्क. अब आप पूछेंगे ये कौन तो ये है मेरी “वाटर आर्मी” के 3 जवान. जवान और भी है आर्मी में पर आज ये 3 ही थे.

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तनिष्क पेड़ो को पानी डालते हुए

गाडी मैंने खड़ी की हेलमेट निकाला और गाडी पे रखा हुआ पौधा उठाने झुकी ही थी की पौधा मिक्की ने अपने हाथ में ले लिया और हेलमेट आर्या, ये दोनों ही 4th में. अंदर जाकर गार्डन एरिया में हमने पौधा रखा और चालू हो गयी आर्या की बड़बड़ ” अरे दीदी आपको पता है क्या कल मिक्की ने क्या किया, कल ना अकेला ही डब्बे ( 5 लीटर के 2 कैन) लेकर हैंडपंप पर गया और पेड़ो को अकेले ही इसने पानी डाला” मैं थोड़ा चौक गयी. रोज़ हम ना तो मिक्की को हैंडपंप मारने देते है ना ही डब्बे उठाने क्युकी बाकी बच्चो से वो थोड़ा नाजुक और नखरे वाला है. कल सुबह 7 बजे से जो वृक्षारोपण के लिए बहार निकली थी तो सीधा शाम को 5 बजे घर पोहोची जिसकी वजह से थकान थी थोड़ी, अब जब ये इन बच्चो को बताया तो बोलते है ” आप थकते भी हो”. पहली बार सुन रहे है हम आपसे, आप कितना कुछ करते हो राइड पे जाते हो, ऑफिस भी करते हो पेड़ भी लगाते हो, पानी भी डालते हो,क्रिकेट भी खेलते हो इनकी छोटी सी दुनिया की मैं सुपरवूमन.

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और हम मैच जीत गए

ऑफिस से आकर जैसे ही मैं इन्हे ग्राउंड पर आते हुए दिखती हु तुरंत “दीदी आयी दीदी आयी” करके दौड़कर पास आते है और साथ में विहार चलते है कैन उठाने. इनसे मिलने के बाद मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं जब मैंने हैंडपंप चलाया हो या कैन खाली हो या भरी उठायी हु. तनिष्क मुझे करने ही नहीं देता, पंप को हाथ भी लगाया तो “दीदी आप ऑफिस से आये हो,थक गए रहोगे, मैं करता हु ना, आर्या दीदी को मत करने दे उन्हें मत थका”. पानी भी वही डालते है और जब क्रिकेट खेलने का टाइम होता है तो रनर आर्या बन जाता है, पैर की चोट के बारे में उन्हें पता है तो पैर के पास बॉल आयी भी तो “दीदी लगी तो नहीं,सॉरी दीदी”. थकान की वजह से कल पानी डालने के लिए लेट पोहोची तब ये बच्चे वाहा थे नहीं और मेरी हालत जवाब दे चुकी थी इसलिए वापस चली गयी.फिर आज पता चला की पानी तो दिया गया था और वह भी अकेले बस छोटे से मिक्की ने.आज लगा की मुझे ”आउटस्टैंडिंग एचीवर अवार्ड” देना सफल हुआ.

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सकाळ ग्रुप का मुझे दिया गया अवार्ड

कल मैं विहार में नहीं थी उन्हें बताने के लिए की पेड़ में पानी डालना और ना ही मैंने कोई उनकी ड्यूटी लगा रखी है पानी डालने की ना ही कोई जबरदस्ती पर फिर भी जो काम वो मेरे होते हुए बड़े जोश के साथ करते है मेरे ना होते हुए भी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया. और बड़ी इम्मान्दारी से मुझे ये भी बताया गया की दीदी ये दो पेड़ो को पानी नहीं दे पाया. आज उनसे पूछा भी अगर मैं नहीं रही फिर भी पानी डालोगे तुम लोग तो जवाब एक साथ सबने हां में ही दिया.आज भी जब एंट्रेंस पर हम मिले तो इन बच्चो की तैयारी पानी डालने जाने के लिए ही हो रही थी. ये बच्चे जुड़े भी मेरे काम से अपने मन से ही, मुझे रोज़ पेड़ लगाते हुए देखते थे आकर एक दिन मदद कर दी और तब से हमारी रोज़ की मुलाकात. ख़ुशी से ज्यादा गर्व हो रहा है खुद पर की कुछ अच्छे बदलाव मैं इन बच्चो में ला पायी बिना जबरदस्ती के.

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आओ पेड़ लगाए

किसीने मुझे कल ही सिखाया है अपनी छोटी से छोटी ख़ुशी लोगो से शेयर करनी चाहिए इसलिए नहीं की आप खुश हो पर इसलिए भी की उन्हें अच्छा लगेगा की आपने उन्हें अपनी ख़ुशी में शामिल किया. और फिर मैं तो खुश भी हु और गर्व भी महसूस कर रही हु.

शुरुआत हुई थी हर रविवार एक पेड़ लगाने से पर पता नहीं था इतने लोग और इतने रिश्ते जुड़ते चले जायेंगे इस सफर में. वाटर आर्मी के बाकि जवानो की कहानी भी बोहोत जल्दी लिखूंगी. वैसे बता दू हमारी सबसे छोटी जवान हाल ही में पहली कक्षा में गयी है.

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सबसे छोटी  चार्मी

India-The Other Side

आज tripoto पर एक सवाल देखा  “I am not sure about travelling Solo  in India. Can anyone suggest some safe destinations” और उस पर कुछ लोगो के जवाब थे की “भारत सुरक्षित नहीं  है,मैं खुद अपने लोगो के बिच सुरक्षित मेहसूस नहीं करती “. इस सच को झुटलाया नहीं जा सकता पर ये पूरा सच भी तो नहीं है. एक भारत वो भी तो है जहा अकेली लड़की को मौका  नहीं बल्कि  जिम्मेदारी समझकर रक्षा की जाती है. अगर आप सोच रहे होंगे की ये बस कहने, सुन ने, लिखने में ही अच्छा लगता है तो आइये आपको मिलवाती हु भारत के दूसरे पहलु से. इस भारत से मेरी मुलाकात हुई जब अकेली लड़की होते हुए मैंने भारत भ्रमण करने का सोचा इस जिज्ञासा के साथ के चलो अपने लोगो का जाने पेहचाने, तो शुरू से शुरुआत करती हु-

मेरा पहला सोलो ट्रिप दिल्ली अमृतसर- सच्च बताऊ तो बोहोत डरी हुई थी पर जब दिल्ली पोहोची हुमायूँ  के मकबरे पर सुबह  टहलने आयी एक आंटी ने मुझे अकेला देखकर बड़ी उत्सुकता से सवाल पूछा अकेले आये हो और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला जिसमे था कुछ इतिहास भी. अकेला बिलकुल मुझे लगा ही नहीं. दिल्ली की यात्रा ख़तम कर मैं पोहोची अमृतसर, सुबह 4 बजे गोल्डन टेम्पल जाना था तो सुबह के 3.30 बजे मैंने रस्ते से ऑटो पकड़ा सुरक्षित गोल्डन टेम्पल पोहोची  और गोल्डन टेम्पल से वाघा बॉर्डर के लिए भी ऑटो, शर्मा जी का ऑटो था वो. खूब बाते हुयी उनसे उनके परिवार के बारे में मेरे परिवार के बारे में. वो आस्चर्यचकित हो रहे थे की मेरे घरवालों ने मुझे अकेले इतनी दूर भेज दिया.”दीदी मेरी  3 बेहने है पर ना कभी वो हिम्मत कर पायी अकेले कही जाने की ना हमारी हिम्मत हो पायी उन्हें अकेला भेजने की”. मुझे कोई मंदिर देखना होता तो खुद मुझे दरवाज़े तक छोड़कर आते “दीदी हम है आपके साथ कोई परेशानी न होने देंगे”. फिर वाघा बॉर्डर पर मुलाकात हुई  कोलकता के एक परिवार से और आज भी उनके साथ मैं संपर्क में हु.जब कोलकाता जाने का प्लान बना और दादा भाभी को खबर पोहोचाई उनकी ख़ुशी तो पूछिए मत ” आपको हमारे घर पर ही रहना है, अच्छा आप चिकन और फिश खाते है ना”.

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Humayun Tomb Delhi

मेरी वाराणसी से रीवा की राइड– रीवा जाते हुए मैंने अल्लाहाबाद का रास्ता ले
लिया, अल्लाहाबाद तक तो सब ठीक रहा पर मुश्किल शुरू हुई उसके बाद. एक तो रास्ता बड़ा ख़राब शाम के 6 बज चुके थे 130 km और जाना था और गाडी थी मोपेड. रास्ते का काम चालू था सफ़ेद मिट्टी में गाडी फसे जा रही थी मुश्किल से चल रही थी मोपेड और रास्ता सही है गलत समझ नहीं रहा, तभी सामने एक रीवा के नंबर प्लेट की गाडी दिखी,मैं समझ गयी की ये भी रीवा जा रहे है हो ली मैं उनके पीछे पीछे. कुछ दूर तक तो पीछे चली फिर अचानक से उन्होंने अपनी गाडी मोड़ ली दूसरे रस्ते पर, मैंने जब बिच में रूककर लोगो से पूछा था तब मुझे बताया गया था की आपको बिलकुल सीधा सीधा जाना है. मुझे लगा हो सकता है उन्हें कही और जाना हो और मैं चली सीधा सीधा. रात हो चुकी थी,सीधा चलते चलते मैं ऐसी जगह जा फसी जहा रास्ता ही ख़तम हो गया था. रास्ते पर कोई लाइट नहीं और किसी से पूछ सकू ऐसा कोई इंसान भी नहीं. डरकर बस रोना ही बाकि था की पीछे से आवाज़ आयी अरे आप तो गलत रास्ते आ गयी,मैंने वाहा से गाडी मोड़ ली थी क्युकी वो रास्ता अच्छा था. मुझे लगा आप पीछे आ जाएगी, आप नहीं दिखी तो मैं आ गया आपको देखने अब साथ ही चलिएगा. 100 km का सफर हम दोनों ने साथ में तय किया उनकी बाइक और मेरी मोपेड. सुनसान रस्ते कोई कुछ कर ले तो खबर भी ना मिले ऐसे,बिच में बारिश भी मिली हम ढाबे पर रुके नाश्ता किया और 10 बजे हम रीवा पोहोचे बिलकुल सही सलामत. वाहा से मैं अपने होटल और वो अपने घर. आज भी हम संपर्क में है.

मेरी कन्याकुमारी राइड– कन्याकुमारी से कुछ 117 km पेहले मेरी मोपेड ख़राब हो गयी ख़राब हुई इंडस्ट्रियल एरिया में और किस्मत से एक इंडस्ट्री के सामने. गाडी स्टार्ट तो हो रही थी पर आगे नहीं बढ़ रही थी. इंडसट्री के गार्ड को समझा की कोई परेशानी जरूर है. वो देखने आये पर दिक्कत ऐसी की ना उन्हें हिंदी समझ रही थी ना इंग्लिश. उन्होंने और दो लोगो को बुलाया की कम से कम वो गाडी की परेशानी समझे पर ना वो गाडी की परेशानी   समझ पा रहे थे और ना मेरी भाषा.ऐसा करते करते लोग जमा होते चले गए और फिर आये उनके मेंटेनेंस मैनेजर उन्हें हिंदी इंग्लिश समझ रही थी पर गाडी की परेशानी नहीं. उन्होंने पेहले मुझे TVS को कॉल करने लगाया जब TVS से मदद नहीं मिल पायी तो उन्होंने अपने पहचान वाले मैकेनिक को कॉल लगाया और आने के लिए कहा, कॉल कट हुआ ही था की उनके कंपनी का एक वर्कर आया जिसे हिंदी भी आती थी इंग्लिश समजती थी और जिन्होंने गाडी की प्रॉब्लम भी पता लगा ली. उन्होंने तुरंत मैकेनिक को कॉल करके परेशानी बताई और हो पायेगा ठीक या नहीं पूछा जवाब हां ही था. जब ये सब लोग मिलके मेरी परेशानी का हल ढूंढ रहे थे मैं बैठकर कॉफ़ी पि रही थी “मैडम आप बैठ जाइये Have कॉफ़ी”. कुछ  देर बाद मैकेनिक आया मैंटेनस मैनेजर  उनके साथ गाडी को धक्का  देकर लेकर  गए और मुझे कार से वर्कशॉप तक छोड़ा गया. जब तक गाडी ठीक नहीं हो जाती मैनेजर मेरे साथ रहे तिरुनेलवेल्ली तक गाडी उन्होंने खुद चलायी और वाहा से 90 km दूर कन्याकुमारी का सफर रात को 11.30 बजे मैंने पूरा किया.

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Kanyakumari

अनुभव ऐसे और भी है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, बिना जान पहचान किसी ने बस युही रोटी खिला दी तो किसीने चाय पीला दी, मेरा फ़ोन बंद पड़ा तो कॉल के लिए मदद कर दी. एक किताब लिख दी जाए अनुभव इतने है, लिखूंगी उनके बारे में भी पर एक एक कर कर . आज जितने अनुभव लिखे है उम्मीद है उसमे आपको भारत के दूसरे पहलु की झलकियां जरूर दिखी होगी  . आप अगर मेरी नज़र से भारत पूछेंगे तो मैं बस यही कहूँगी “हां थोड़ा बुरा तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” थोड़ा नज़र बदलकर देखिये और एक बार हिम्मत कर कर देखिये. टीवी, पेपर, सोशल मीडिया इसके परे भी एक सच्च बस्ता है जो आप खुद अपने अनुभवों से जान और समझ सकते है. हर अनुभव अच्छा होगा जरुरी नहीं पर उसके डर से घर से बहार निकलना तो छोड़ा नहीं जा सकता, लड़ना नहीं सिखेंगें तो देश बदलेंगे कैसे,जीतेंगे कैसे. आपकी कमज़ोरी ही किसी और की ताकत बनती है, आप किसे ताकतवर देखना चाहते है तय आपको करना होगा.

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इनसे मिलिए ये है कालू. कालू से हम मिले कळसूबाई पीक  की नाईट ट्रेक पर कळसूबाई बोले तो महाराष्ट्र का एवेरेस्ट. हम हमारे गाइड के साथ निकले पीक के लिए और ये जनाब हमारे पीछे पीछे, थे ये गाइड के पेहचान वाले ही. 15 min ही हुए थे हमे शुरुवात किये हुए की गाइड को याद आया वो अपना फ़ोन शायद गाओं में ही भूल गए है. हमने कहा उनसे आप जाइये आपका फ़ोन लेकर आइये हम यही रुकते है. गाइड तो चले गए हमे लगा था कालू जनाब भी चले जायेंगे, पर नहीं ये बैठे रहे हमारे साथ हमारे बाजू में ही जब तक गाइड आये नहीं. गाइड आने के बाद शुरू की हमने फिर आगे की चढाई और कालू जी हमारे साथ साथ. हमे तो हिम्मत क्या ही देते ये खुद ही इतने डरपोक की थोड़ी भी आवाज़ हुई नहीं की हमारे पैरो के पास आ जाते. कालू ने तो कई बार हमे ही आजु बाजु छान बिन करने को मजबूर कर दिया था की कही कोई है तो नहीं. था कोई नहीं ये युही होशियार बने जा रहे थे. कुछ सुबह 3 बजे हम कळसूबाई टॉप से कुछ 10 min पेहले कुछ हॉटेल्स जाहा रात को रुका जा सकता है वहा पोहोचे. वाहा हमारे गाइड का भी एक होटल था जहा उन्होंने हमारे सोने का इंतज़ाम कर दिया. सुबह कुछ 6 बजे हम टॉप पर जाने के लिए निकले , इस बार गाइड साथ नहीं आने वाले थे क्युकी उन्हें नाश्ते चाय की तैयारी करनी थी ट्रेक के लिए आये और आने वाले बाकि लोगो के लिए भी. Saturday Sunday होने की वजह से काफी लोग ट्रेक के लिए आते है  तब  ऑफ सीजन में भी बिज़नेस इनका अच्छा  हो  जाता है. गाइड नहीं भी साथ आये तो भी कालू जनाब हमारे साथ साथ कळसूबाई टॉप चढ़े, जब तक हम वाहा रुके ये भी हमारे साथ और निचे उतरना चालू किया तो  भी हमारे पीछे पीछे ही. ट्रेक के लिए आये हुए एक ग्रुप के किसी मेमबर ने कमेंट भी किया ये आपके साथ साथ  आया है,हर किसीके साथ आते नहीं ये.

घर पर  कोई पालतू जानवर कभी रहा नहीं तो लोग जो इतना कहते है  कुत्ते आपके सबसे अच्छे दोस्त होते है, निष्ठावान होते है ये सब कभी महसूस करने मिला ही नहीं. फिर कालू से मिलकर समझा की लोग जो भी केहते है सच्च ही है. हमने तो कालू को एक बिस्किट भी नहीं खिलाया था,फिर भी वो हमारे साथ रहा. हर ट्रिप में अलग अलग लोगो से रिश्ते बनाये, वो रिश्ते बने उन लोगो से बात करके कुछ अपने बारे में बताकर कुछ उनके बारे में जानकार और फिर इस ट्रिप में बना ये एक अनोखा रिश्ता सारे रिश्तो से अलग, जहा ना कुछ बताने की जरुरत पड़ी ना कुछ जान ने की. उम्मीद है जब कभी अगली बार कळसूबाई गयी कालू इसी तरह हमारे साथ चलेगा.

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Kaalu

My India Green India

Almost everyday people discuss about environmental issues on different mediums and also really want to contribute to solve the issues but somehow fail to take out time from their hectic schedule. We understand your problem hence we will help you.

HOW : We are starting an initiative “Mera India Green India”. On any of your special occasion (Birthday’s, Anniversaries, Valentines,First Salary anything) give us a call,tell us which tree and how many trees you want to plant and we will do it for you. Buying saplings from nursery,selection of location (unless you want it in some specific place), plantation,maintenance of trees will be taken care by us. We will give your name to that tree/trees. You just need to pay for the service and sapling.So from next time instead of giving an excuse give us a call. Make your special day memorable and special for the world 😊

For Mumbai, Nikesh Jilthe : 90 96 133400
Nagpur, Snehal Wankhede : 9930322101

Last year on environment day 05.06.2016 we had taken a pledge to do plantation every Sunday and till now 47 Sunday’s are completed.

Friend’s this time only All the Best will not work,we will also need your support which starts by spreading the message. Share this with your friends family colleagues and enemies too even are part  of the Mother Earth.

#SaveEnvironment #MeraIndiaGreenIndia #TreePlantation #India #Joinhands #payback

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