देवताओं की अदालत

आज आपको मिलाते हैं उपाध्याय जी से. कभी बढ़े पत्रकार थे, आज भी हैं पर आजकल सोशल मीडिया पर ज्यादा लिखते हैं. इनसे हमारी पहचान ऐसी की पिछले साल जब जब हम ( मैं और निकेश) चित्रकोट राइड पर थे तब केशकाल में इनकी छोटी सी टपरी साथ ही वहीं पर दुकान है उनकी, वहां मूंग पकोड़े खाए थे.

मूंग पकोड़े तो इनके बेहतरीन थे ही पर उस से कहीं बेहतरीन थी इनकी बाते,इनका ज्ञान. केशकाल के आस पास की जगह और कहानियों के बारे में हमे पता ही नहीं चलता अगर इनसे मुलाकात नहीं होती. हम केशकाल जाते और वहां जाकर टाटामारी जो कि एक बहुत ही खुबसुरत पर्यटक स्थल बीना देखे ही निकल जाते अगर उपाध्याय जी नहीं बताते.

साथ ही टाटामारी के पास बने भंगाराम माई के दरबार में लगने वाली देवताओं कि अदालत की भी रोचक कहानी हमे उपाध्याय जी ने बताई. आम इंसानों को कटघरे में खड़ा होते देखा देखा था सुना था पर देवताओं कि अदालत अपने आप में ही आश्चर्यचकित करने वाली बात थी.

केशकाल की घाटी में बने भंगाराम माई के दरबार में साल में एक बार भादो महीने के अंतिम शनिवार विशाल जत्रा, मेला आयोजित होता हैं. आस पास के गांव वाले, आदिवासी समुदाय अपने गांव में प्रस्थापित देवी देवताओं को लेकर निर्धारित दिन पर दरबार में पहुंचते है. जहां भंगाराम खुद न्यायधीश होते है और देवी देवताओं को मेले में गांव से लेकर आए सिरहा,मांझी आदि आरोपों की दलील पेश करते है. देवी देवताओं को कटघरे में खड़ा किया जाता है और शुरू होता है मुकदमा.

मुकदमा चलाया जाता है उन देवी देवताओं पर जो श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते. श्रद्धालु आरोप करते है अपने देवी देवताओं पर की इतनी पूजा अर्चना श्रद्धा के बाद भी देवताओं ने उनकी क्यों नहीं सुनी. अमूमन अगर गांव पर कोई संकट आया है जिसके लिए पूजा अर्चना की गई है और फिर भी निवारण नहीं मिला तो उस देवी देवता को कटघरे में खड़ा किया जाता है. दिन भर चलने वाली इस अदालत का फैसला न्यायधिश शाम को सुनाते है.

जो देवी देवता गुनेहगार पाए गए वो सज़ा के हकदार होते है. सज़ा में उन्हें भंगाराम मंदिर के पास ही बने एक छोटी सी जेल याने की एक गड्ढे में फेक दिया जाता है या फिर जुर्माना भरकर भी देवताओं को छुड़ाया जा सकता है. जिन देवी देवताओं का गुन्हा साबित नहीं होता उन्हें पूरे सम्मान के साथ गांव वालो के साथ बिदाई दी जाती है और गांव में देवता स्थापित किए जाते है.

मजे की बात देखिए जहां न्यायधीश खुद एक माई है, जिसे सज़ा सुनाने का अधिकार है उसी के दरबार में इस परंपरा में औरतों को आने की अनुमति नहीं है. सालो से चली आ रही हैं इस परंपरा को अब श्रद्धा कहे कि अंधश्रद्धा पर चलिए कम से कम यहां भगवान और इंसानी के बीच के रिश्ते में एक आपसी समझ तो है. भाई हर बार इंसान ही क्यों सज़ा पाए कोई तो है जो भगवान से जवाब मांग रहा है और गलती की सज़ा भी सुना रहा है.

ऐसी कई रोचक कहानियां और जानकारी हमें उपाध्याय जी ने पिछले साल दी थी. जब उन्हें अलविदा कर के निकले थे तब ना तो उनका फोन नंबर हमने हमारे पास रखा था ना तो फ़ेसबुक से जुड़े थे और ना ही कोई फ़ोटो. उनकी बाते और वो हमारी यादों में कैद कर लिए थे. कुछ दिनों पहले फिर मौका आया बस्तर जाने का. इस बार बस्तर दशहरा देखने निकली थी मैं अकेले. फिर केशकाल की घाटी से उतरकर गाड़ी सबसे पहली रुकी इनकी दुकान पर. हेलमेट उतारकर जब इनकी तरफ बढ़ी खुशी हुई कि इन्होने पहचाना. और याद रखते हुए पूछ भी लिया इस बार अकेले आ गई, दोनों साथ में नहीं आए (मैं और निकेश).

फिर बैठकर इनके यहां चाय,पकोड़े और बातो का लुत्फ उठाया. बस्तर दशहरा की जानकारी के लिए भी इन्होंने मुझे कई जानकर लोगो से जोड़ा. इस बार याद से उपाध्याय जी के साथ बिताए पल को कैमरा में कैद किया.अब हर तरीके से जहन में रहेंगे ये. कभी आप कांकेर होते हुए बस्तर जाए तो केशकाल की घाटी पार करते ही जहां से रोड टाटामारी के लिए मुड़ती है उसी मोड़ को लग कर ही बस उनकी दुकान है वहां जरूर भेट दीजिए. शानदार पकोड़े तो मिलेंगे ही कुछ रोचक बातें भी मिलेंगी.

उपाध्याय जी के साथ