निष्ठा और मुस्कान

👇इनसे मिलिए ये है रामलाल जी.आप पूछेंगे ये कौन तो रामलाल जी हमे रोज़ हमारी शाखा में चाय लाकर देते है.हमारी शाखा से आस पास ही है इनकी दुकान. अब आप पूछेंगे तो इसमें खास क्या, तो खास है इनकी मुस्कान और इनकी निष्ठा.

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मार्केटिंग में होने की वजह से बैंक की अलग अलग शाखा में जाना होता है. आज जाना हुआ इतवारी शाखा में. सुबह 10.30 बजे ऑफिस जाते हुए तो कोई बारिश नही थी पर दोपहर को शुरू हुई जमके बारिश. बाहर बारिश हो तो सबसे पहले याद आती है चाय की और पकोड़ो की भी,अब पकोड़ो का ऑफिस में सोचो और मिल जाये थोड़ा मुश्किल है पर चाय, वो तो मिल ही सकती है. चाय का ख्याल मन मे आया ही था कि सामने थे रामलाल जी. मार्केटिंग में होने की वजह से काम घूमने का है मेरा पर बारिश में रेनकोट पहनकर बाहर जाना थोड़ा जान पर ही आता है. पर रामलाल जी बारिश में भी बढ़िया रेनकोट पहने, हाथ मे केतली लिए और कुछ कप लिए शाखा में आए. चेहरे पर कोई चीड़ चीड़ या बारिश में जो थोड़ी कीच कीच होती है वो भी नही बढ़िया मुस्कुराते हुए जिनको जिनको चाहिए वो चाय दे रहे थे.

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बड़ा ही मजा आ रहा था मुझे उनको देखकर एक तो दिख बढ़े क्यूट रहे थे वो उसपे ना उनकी मुस्कान बड़ी आकर्षित कर रही थी मुझे. मतलब भाई बारिश हो या कुछ मैं तो अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाऊंगा. जो मेरा काम है वो करूँगा. अब आप बोलेंगे काम तो करेंगे ही पैसे कमाते है वो इसके. बात तो सही है पैसे कमाते है पर कितने ऐसे लोग है जो इस मुस्कान के साथ अपना काम करते है. मैं तो कितनी ही बार दिन भर में अपनी नौकरी को गालियां देती हूं जबकि मेरे सपने उसी से पूरे हो रहे है और हा पैसे भी बड़े अच्छे मिल जाते है. पर फिर भी किट किट कभी ये बोलकर “यार इतनी धूप में भी बाहर घूमना पड़ता है”, “यार मौसम कितना अच्छा है और मैं ऑफीस में बैठी हु”,”इस बारिश में कौन बाहर जाए”. रोज़ कोई नया बहाना ढूंढ ही लेती हूं और फिर मिलते है रामलाल जी जैसे लोग जो याद दिलाते है खुशी की,ईमानदारी की,निष्ठा की.

दोपहर के बाद से बारिश रुकी नही थी तो रामलाल जी शाम को फिर चाय देने आए फिर वही रेनकोट वही केतली और उसी मुस्कान के साथ. अच्छा लगता है जब दिनभर में कुछ ऐसे लोगो से मिल लेते है, इन्हें देखकर दिन बन गया मेरा.

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Toilet A Basic Need

प्रिय प्रधानसेवक,

राखी पर आपने देशवासियों को रक्षाबंधन पर बधाई देते हुए अलग अलग उम्र की लड़कियों से राखि बंधवाकर रक्षाबंधन मनाया.कुछ लड़कियों ने आपके के लिए खुद राखी भी बनाई .शायद उन्हें कही विश्वास होगा की आप उनकी रक्षा करेंगे, कुछ नए कानून लाएंगे,उन्हें नई उम्मीद देंगे. उन मासूम बच्चियों को शायद बड़ा सुरक्षित लग रहा होगा, लग रहा होगा वो डर पर नही तो बस अपने सपनो पर ध्यान दे सकती है.

काश की ऐसा ही विश्वास 25 साल की उस लड़की को होता जिसका वेस्टर्न कोल फील्ड के कच्चे बाथरूम में जिसे बाथरूम कहना भी लाजमी नही होगा गैंगरेप हुआ. 25 साल की वो लड़की, वेस्टर्न कोल फील्ड के वजन विभाग में काम करती थी. वेस्टर्न कोल फील्ड जो की एक बड़ा नाम है. जहाँ काम करना कई लोगो का सपना भी होगा, ऐसे बड़े नाम के एक विभाग में काम करने वाली वो लडक़ी. हर सुबह की तरह 14 Aug को भी वो घर से काम के लिए निकली. शायद कुछ सपने लेकर निकली या शायद कोई खुशी या शायद कोई टेंशन या कोई दुख पर जो उस दिन उसके साथ हुआ वो सोचकर तो जरूर नही निकली होगी.

आप भ्रूण हत्या कम करने की बात करते है पर उस हत्या का क्या जो बड़ी बेदर्दी से लड़की के बदन को नोचकर की जाती है.जिस लड़की की कहानी मैं बता रही हु वो आज नागपुर के एक अस्पताल में अपनी जिंदगी के लिए लड़ रही है. पहले तो उस लडक़ी का सामूहिक बलात्कार हुआ फिर स्क्रूड्राइवर से उसकी आंखे फोड़ी गयी और उसे पत्थर से इतना मारा की जबड़ा पूरी तरीके से टूटा है और लड़की बोल नही पा रही है. मजे की बात देखिए जब आप लाल किले पर चढ़कर आपने लड़कियों की ये फौज बनाई, लड़कियों के लिए ये किया वो किया इसका बखान कर रहे थे,जब आप बता रहे थे की सुप्रीम कोर्ट में 3 महिला जज आयुक्त हुई, उसके बस एक ही दिन पहले हुआ और वो भी भरी दोपहरी को हुआ.

आप सोच रहे होंगे की ये सब मुझे क्यों बताया जा रहा है. आप हमारे प्रधान सेवक है ये एक कारण तो है ही पर दूसरा कारण ये भी है की देश की परेशानियों पर हमने आपको भावुक होते देखा है. काले धन पर आपका वो भावुक भाषण हमने सुना है, #SelfieWithDaughter को आपका वो समर्थन देखा है जिसमे आपने कहा था गर्व से अपनी बेटी के साथ अपनी फ़ोटो शेयर करो और दुनिया को बताओ. आपने औरतों से अपील की थी जिस घर में टॉयलेट ना हो वहाँ औरते रक्षाबंधन और त्योहार ना मनाए,शादी ना करे पर यही टॉयलेट हमारे ऑफिस हमारे कॉलेज में ना हो तो हम क्या करे. क्या लड़किया,औरते घर के बाहर निकलना छोड़ दे. सुप्रीम कोर्ट में 3 औरते जज होने की खुशी बहुत है पर औरतो की बुनियादी जरूरतों को ऑफिस,स्कूल,कॉलेज में नज़रअंदाज़ करने का दुख खुशी से दुगुना है.

ये तथ्य बिल्कुल किसी से छुपा हुआ नही है की लड़किया जज,पायलट,डॉक्टर,अफसर बन ने के सपने देखे उस से पहले ही टॉयलेट नही है एक इस कारण से भी स्कूल छोड़ देती है. कैसे छेड़ छाड़ भी ज्यादा होती है. उमरेड की घटना भी उसी तथ्य को साबित करती है. वेस्टर्न कोल फील्ड पूरी तरह से असमर्थ रहा महिला कर्मचारियों की बुनियादी जरूरत को पूरा करने में. महिला कर्मचारी को मज़बूरन एक ऐसा टॉयलेट इस्तेमाल करना पड़ रहा था जो ऑफिस से 400 mtr तो दूर था ही और बस कुछ लकड़ियों और कपड़ो से बना था. जिसका पूरा पूरा फायदा आरोपियों ने उठाया. ये कहानी बस वेस्टर्न कोल फील्ड की नही तो भारत के कई नामी गिरामी दफ्तर,स्कूल, कॉलेजेस की है.

निर्भया के समय हमने आपके वो सवाल देखे है. हमने आपकी वो अपील सुनी थी जिसमे आपने कहा था “वोट देते समय निर्भया को मत भूलना”. तब हम निर्भया को नही भूले और आगे के वोट में हम उमरेड रेप केस नही भूलना चाहते. हम ये नही भूलना चाहेंगे की कैसे हमारे प्रधान सेवक ने उस केस पर कारवाई करवाई, कैसे बिना लोगो के सड़को पर उतरे उन्होंने उसे न्याय दिलाया,कैसे हमारी उम्मीद पर वो खरे उतरे, कैसे उन्होंने टॉयलेट में हुए एक रेप केस की वजह से रातो रात ये फरमान निकाला हर स्कूल,हर कॉलेज,हर दफ्तर में महिलाओं के लिए सुरक्षित साफ सुथरे टॉयलेट होंगे, कैसे उन्होंने महिलाओं के सम्मान को उच्च दर्जा दिया और हर लडक़ी हर महिला का भविष्य सुरक्षित रहेगा ये विश्वास दिलाया.

मेरा रंग नही मेरी पहचान

#YeNahiIndiakaNayaChehra

बोरोप्लस के विज्ञापन की एक तरफ जहाँ शुरुआत होती है “ये है इंडिया का नया चेहरा” वही इसका अंत होता है “सांवलापन हटाये” पर. विज्ञापन में दिखाई गयी एक लड़की fighter pilot दिखाई गई है तो दूसरी biker. ना तो पायलट बन ने के लिए गोरापन मापदंड होता है ना बाइकर बन ने के लिए. मैं खुद एक राइडर हु, राइडर की पहचान मुझे मेरे रंग से नही मेरे राइडिंग के जुनून से मिली. फिर आप ये कौनसा इंडिया का नया चेहरा बता रहे है…..

मेरा रंग नही मेरी पहचान.

#YeNahiIndiakaNayaChehra ये हैशटैग चलाकर इस मानसिकता का विरोध होना चाहिए

कुछ तो लोग कहेंगे….

कई बार मुझ पर इल्ज़ाम लगाया गया कि क्या हर बार लड़कियों के बारे में लिखती रहती वही रोना रोती है. क्या करे मजबूर करता है मुझे ये समाज लिखने पर. आज का ही एक किस्सा लेते है

एक लडक़ी कार से उतरी और बाजू में पार्क की हुई स्कूटी लेकर गयी. एक आदमी ने तुरंत मुस्कुराते हुए टिप्पणी की “लेडीज पे भी क्या भरोसा रखें अब, स्कूटी यहाँ खड़ी करके किसी की गाड़ी में बैठकर चली जाती है”.

तुम कौन होते हो उसकी आलोचना करने वाले. वो कार से जाए, हवाईजहाज़ से जाए,या साइकल से जाए. क्यों हर किसीको बिना वकालत किये जज बने बैठना है. वकालत करके,कोट पहना हुआ जज भी पहले सबूत मांगता है, सबकी बाजू सुनता है और फैसला सुनाता है. पर यहाँ कोर्ट भी इनका,वकील भी ये खुद और जज भी ये खुद ही और सबूत वगैरह की जरूरत इनको लगती नही. “लड़की शादीशुदा है मैडम हमको पता नही क्या”. खुदकी अपनी जिंदगी का तुम्हे अता पता नही सालो पर किसी और कि ज़िन्दगी का तमाशा बना ना तुम्हे आता है.

तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी अपनी और हमारी क्या मंदिर की घण्टी, जो चाहे अपने मजे के लिए बजा कर चले जाए

आदमी तो अपना किरदार इन सबमे बडी बेखूबी निभा रहा है पर फिर कुछ औरते भी है जिन्हें कमज़ोर बने रहने में कुछ गर्व सा महसूस होता और इन सब मे ख़ुदको नीचा दिखाने में भी मज़ा ही आता है. इसका भी एक किस्सा बताती हु :

22 जून 2018 को नागपुर से पुणे गरीबरथ ट्रेन के G2 बोगी में हम चढ़े. मेरा सीट नंबर 51. रात को 10.45 बजे करीब ट्रेन अकोला से निकली. आधी नींद में मैं जा ही चुकी थी कि अचानक बाजू के अपर बर्थ से किसी की आवाज़ सुनाई दी. एक लड़की बैठी थी उस बर्थ पर सीट नंबर 56 जितना मुझे याद है. एक लड़का नीचे खड़ा हो उसे बता रहा था “मैडम आप मेरी सीट पर है”.पहले वो इसपे थोड़ा भड़की की ‘नही ये मेरी सीट है,मेरी कन्फर्म थी सीट” पर लड़का भी अड़ा हुआ था “नही मेरी सीट है”. तभी वहां से TC गुजर रहे थे तो ये दोनों ने आवाज़ लगाई. TC ने लड़की से टिकट मांगी. टिकट देखने पर पता चला कि लडक़ी का टिकट G2 56 नही GS2 56 है, गरीबरथ में जो एक्स्ट्रा बोगी लगाई जाती है उसमें.

लड़की के चेहरे की हवा गुल. लड़की करीब 30-35 की होगी और हा बिल्कुल चुस्त तंदरुस्त और हा समान के नाम पर बस एक हैंडबैग था और एक साइड बैग. फिर भी चेहरा अपने हाथ मे लेके बेचारी सी शक्ल बनाके बोल पड़ी “मैं अकेली लड़की अभी किधर जाऊंगी उतने दूर इतने बजे” उसका बोलना पूरा हुआ भी नही था कि नीचे की बर्थ वाले कुछ होशियार बोल पड़े “ती एकटी बेचारी कुठे जाणार आता इतक्या रात्री”. अकेली लड़की काफी नही था तो अब वो बेचारी भी हो गयी. मन कर रहा था 2 खिचके थप्पड़ वही लगा दु.

यहाँ एक तरफ हम लड़ते रहते है हक़ के लिए, बराबरी के लिए और फिर ये कुछ महारानियां आ जाती है अपनी सहूलियत के हिसाब से बेचारी और सहूलियत के हिसाब से women empowerment का झंडा उठाने और हमारी मेहनत पे पानी फेरने.

पर सीट की कहानी यहाँ खत्म नही हुई थी. वो लड़का वहाँ से चला गया फिर थोड़ी देर में वापस आया “मैडम वो सीट तो TC ने किसी और को दे दी आपने टिकट नही चेक करवाई थी क्या”. ये मैडम अमरावती से बैठी थे और अब अकोला आ चुका था तो सीट दे दी गयी थी किसीको. लड़की के चेहरे पर अब और ज्यादा टेंशन, पर बेचरिपना, ना ना वो कहा छोड़ेंगे. “भैया आप मेरा बैग ऊपर से ले लोगे प्लीज” 2 बैग मैडम से उठ नही रहे थे. “भैया आप बोगी तक चलो ना प्लीज मेरे साथ मैं कैसे जाऊंगी”. हवाई जहाज़ मंगाते इनके जाने के लिए हम. मेरी अच्छी खासी नींद की पूरी बैंड बजा चुकी थी वो “बेचारी लड़की”.

सुनो सारी बेचारी लड़कियों/औरतो अगर तुम हमारे लिए कुछ कर सकती हो तो हमे बदनाम करना छोड़ो. बोहोत लड़ना पड़ता है अपनी पहचान के लिये. उसे बेचारा बनके खत्म मत करो.

बोहोत लड़ाई लड़नी पड़ती है तब कही एक लड़की को जन्म मिलता है,
फिर लड़ना पड़ता है स्कूल की सीढ़ी चढ़ने के लिए,
स्कूल के बाद शुरू होती है लड़ाई कॉलेज की,
अब लगता है जीत ही गए है तो फिर लड़ना पड़ता है नौकरी के लिए,
नौकरी मिल जाए तो लड़ना पड़ता है वहाँ हम मर्दो से कम नही साबित करने के लिए,
फिर आती है शादी ये तो ऐसी जंग है जहाँ लड़ाई अपनी इज़्ज़त बनाये रखने से शुरू होती है तो वो लड़ाई खत्म होती ही नही,
दुर्योधन के वध के बाद महाभारत भी खत्म हो गया था पर हमारी लड़ाई है कि जिसका अंत ही नही….

हा बाकी जिन्हें परेशानी है कि ये हर बार यही सब पोस्ट करते रहती है,ऐसी पोस्ट्स मैं तब तक लिखती रहूंगी जब तक वो औरत हो या आदमी उसे शर्म ना आने लगे किसी पे लालछन लगाने में, बदनाम करने में.

 

तेरा ना होना

पास तेरे होने से शायद मैं कुछ और होती
खुदकी तलाश की जगह तुझे ढूंढ रही होती

आज जो ख़ुदको पाया है
दिल तेरा शुक्रगुज़ार है
ठोकर ना लगती
तो कहा मैं खुदमे झांकती

तेरी नज़र से ही ख़ुदको देखा था अब तक
तेरे ही रंग में ख़ुदको ढाल था
तू नही है अब तो पर्दा हटा है
रंग बस चार नही पचास होने का पता चला है
किसी भी रंग में रंगने की कोई शर्त नही होती

पास तेरे होने से शायद मैं कुछ और होती
खुदकी तलाश की जगह तुझे ढूंढ रही होती

बैसाखी

जितने की दौड़ में इतने तेज़ दौड़े
ख़ुदको ही “स्टार्टिंग लाइन” पर छोड़ दिया
और पता भी नही चला

रोज़ ही तुझे मुट्ठी से छूटने दिया
अब हिसाब ढूंढते है
ज़िन्दगी में हमने क्या किया

सुरक्षाकवच अपने इर्द गिर्द बनाकर
खुद को महफूज रखा
कवच टूटा नज़र खुली, देखा तो
कितना कुछ देखना ही रह गया

हर दिन रोजमर्रा की दौड़ में
मेरे आँखों के सामने
तू गुजरती चली गयी
ऐ जिंदगी, अब पकड़ने के लिए तुझे
ये बैसाखी साथ नही देती…

-स्नेहल

जिंदगी तुझे क्या लिखू

जिंदगी तुझे क्या लिखू
स्कूल में हारी हुई वो रेस लिखू
जिसने बहुत रुलाया था
या डांस में जीती हुई वो ट्रॉफी
जिसने खुद पे विश्वास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो जन्मदिन लिखू
जिसमे पूरा मोहल्ला आया था
या वो एक कॉल जिसके इंतज़ार में
पूरा दिन काटा था

जिंदगी तुझे वो रिजल्ट लिखू
जब नंबर पहला आया था
या वो नंबर जिसने फेल ठहराया था

जिंदगी तुझे वो तबादला लिखू
जिसने दोस्तो से अलग करवाया था
या वो चिट्ठी जिसमे दोस्तो का
हाल बया होकर आता था

जिंदगी तुझे वो नए शहर का डर लिखू
जब लोगो में पहचान बना ने की जदोजहद की थी
या वो ट्रैन का सफर
जिसे पूरा करने की पहली बार अकेले हिम्मत की थी

जिंदगी तुझे पहली नौकरी का
वो ऑफर लेटर लिखू
जिसने बड़े होने का एहसास दिलाया था
या होस्टल का वो कमरा
जहा कितने ही किस्से
कितने ही कहानियों को जिया था

जिंदगी तुझे वो दोस्त लिखू
जिसने हर मुश्किल को आसान बनाया था
या वो गलतफहमी जिसने
अपने कुछ ना होने का एहसास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो लंबी सड़क लिखू
जिसपे चलकर अपने आप को पाया था
या दो कदम का वो फासला
गुरुर में जिसे ना चाहते हुए भी बढ़ाया था

जिंदगी तुझे वो ब्लाइंड टर्न लिखू
जिसने मौत से मिलाया था
या वो हेलमेट जिसने
फिर तुझसे मिलाया था…

अलग रंग अलग ढंग
अलग अंदाज़ अलग जज़्बात में
ऐ जिंदगी तू हर बार मिली
अब तू ही बता जिंदगी तुझे मैं क्या लिखू

-स्नेहल वानखेड़े

ऐ लड़की फिर से सुनो तुम

हा मैंने कहा था
ऐ लडक़ी,सुनो तुम
निकलो घर के बाहर
निडर बनकर
लेती हूं आज अपने शब्द वापस
और करती हूं गुज़ारिश…

ए लड़की सुनो तुम
ये भूल ना करना,
अपने घर से
बाहर ना निकलना
तुम सोच के निकलोगी
दुनिया बदलनी है
वो सोच के बैठे है
जिस्म नोचना है
और नोचेंगे भी.

जब इज़्ज़त तुम्हारी लूट जाए
सोचोगी,उसके बाद ही शायद
कोई आवाज़ उठ जाए
मेरे गुनहगार को सज़ा मिल जाये
और गुनाह सोचने वाले भी
दहशत में आ जाये
इंसाफ बस मेरा नही
तो हर लड़की का हो जाए
बिना डरे उसे जीने का मौका मिल जाए

पर बता दु तुम्हे,
हर हादसों के लिए हंगामा नही होता
हर किसी के लिए
हर कोई नही रोता
कहते है कुछ लोग
हादसे तो कितने होते है हर रोज़

तुम रानी थोड़ी हो
जो खून खौल जाए
तुम राम रहीम थोड़ी हो
जो शहर जला दिया जाए
या तुम गाय भी नही हो
जो हंगामा किया जाए
मेरे धर्म की भी तो नही
जो जवाब मांगने बैठ जाए

और कहा किसने था
तुम्हे घर से निकलने
क्या पढ़े नही थे तुमने धर्म के शास्त्र
युही दादी नानी थोड़ी कहती थी
बचके रखने की सलाह देती थी
रसोई घर तक ही रहना
अपनी जिंदगी वही तक समेटना

आज भी तो वही कहते है
“बेटी बचाओ”
फिर भी तुम नही मानी
अब सुनो,
अगली बार ये गलती ना करना
इज़्ज़त बचानी हो
तो घर से बाहर ना निकलना
तुम्हारा चीरहरण रोकने
अब कोई कृष्णा नही आएगा
ना ही कोई अल्लाह
गुहार का तुम्हारी जवाब दे पायेगा
उनके ही घरों में
भक्षक बैठे हैं
उनके ही भक्त
भक्षक बने बैठे है
जमीर हमारा किसीका ही
जिंदा बचा नही
तकलीफ में किसीके शामिल हो
हमारी जिंदगी में अब इतना वक़्त नही

शामिल हो भी गए तो
दो चार नारे लगा देंगे
कुछ कैंडल भी जला लेंगे
ये देख तुम्हारी हिम्मत शायद
फिर थोड़ी और बढ़ जाये
पंख फैलाने के
अरमान जाग जाए
बदलना देखो पर कुछ है नही
बच्ची, लड़की, औरत
किसी बात से इन्हें फर्क नही

कांड के बाद बस
कांड होते जाने है
फिर कटघरे में
जात धर्म,नेता अभिनेता
अमीर गरीब देखकर
गुनहगार ठहराए जाने है
और पहला गुन्हेगार
तो तुम ही रहोगी
इसलिए सुनो ऐ लड़की
तुम ये भूल ना करना
अपनी इज़्ज़त नीलाम करने
घर से बाहर ना निकलना

-स्नेहल वानखेड़े

#DontMixMyBodyAndReligion #JusticeforAsifa #JusticeForEveryRapeVictim #RightToLiveFreely #RightToLiveWithoutFear #IamHumantoo

पापा

ये पोस्ट कुछ उन दहश्तवादियो के लिए जो बाप बेटी के खूबसूरत रिश्ते को बदनाम कर रहे है-

पापा, आप से रिश्ता ना जाने कब बना
तब, जब माँ की कोख पर कान रखकर
आपने मुझे महसूस किया था
जब आपने अस्पताल में
मूझे पहली बार देखा था
प्रिंसेस कह कर बुलाया था

जब पहली बार आपने मुझे
गोद मे उठाया था
बड़े प्यार से
सीने से लगाया था

जब हवा में उछाल उछाल
आपने मुझे खिलाया था
मुझे रोते हुए
हसाया था

जब मैंने पहली बार
आपकी उंगली पकड़ी थी
आपने मुझे उंगली थाम
चलना सिखाया था
मैंने पापा कह कर पुकारा था

जब आपने मुझे
साईकल चलाना सिखाया था
मेरी हर जिद्द को
मुस्कुराते हुए पूरा किया था

जब स्कूल मे मेरा नाम
आपके नाम के साथ ही पूरा होता था
या तब….
जब आपने बन्द कमरे में मुझसे जबरदस्ती कर
इन सारे एहसानों का हिसाब लिया

 

संस्कृति का ब्याज

कुछ दिन पहले बैंक में मेरे पास एक माँ बेटी आए थे फैमिली पेंशन पर लोन लेने के लिए. बड़ी जल्दी थी उन्हें लोन की, 12 dec को बेटी की शादी है इसलिए.जिसकी शादी है BA फाइनल में कुछ सब्जेक्ट नही निकाल पायी इसलिए घर पर ही है. जो बेटी साथ आई थी वो BA पास है वो भी घर पर ही रहती है.

जब उनकी बेटी को बोला गया फॉर्म भरो “मुझे नही समझता कहकर टालने की कोशिश की” पर मैने फॉर्म भरकर देने से मना किया और बस नाम पता जन्म तारीख खाता क्रमांक इतना ही लिखना है, फिर भी कोई परेशानी आयी तो पूछ लो कहकर मैंने उसे फॉर्म दे दिया.फॉर्म हिंदी में रहने के बाद भी वो ठीक से भर नही पा रही थी. ये देखकर ही थोड़ा गुस्सा आया, मैने चिल्लाया भी की BA हो और बहुत ही बेसिक जानकारी भर नही सकती. जैसे तैसे उसने फॉर्म भरकर दिया.

उनका पहले ही एक लोन चालू था जो उन्होंने सबसे बड़ी बेटी के शादी के लिए लिया था. ये लोन लेने के लिए पुराना बंद करना जरूरी था. कुछ तीस हजार बाकी थे, उन्हें हमारे बैंक मैनेजर ने पहले बताया था कि उनको डेढ लाख लोन मिल सकता है,इसलिए वो खुशी से तैयार हो गए थे पुराना बंद करने के लिए. पर जब मैंने देखा तो बस 90 हज़ार ही उन्हें मिल सकते थे.जैसे ही उन्हें ये बताया माँ बेटी के चेहरे का रंग उड़ गया. बिनती करने लगे “मैडम 1 लाख तो भी कर दो,तीस हज़ार तो भरने में ही जा रहे है बस 60 हज़ार हाथ मे मिलेंगे”. मैनेजर से भी बिनती की पर होना कुछ था नही और गुस्सा मुझे अब इस बात का ज्यादा आ रहा था कि जब पैसे नही तो क्यों इतनी झूठी शान दिखाके शादी.

जब लोन अमाउंट 90 का तय हुआ तो “मैडम जल्दी करवा दो जरूरत है, ये 30 हज़ार बड़ी बहन के सब गहने गिरवी रखकर लाए है”. मैं अब कुछ बोलने वाली कौन, बस इतना बोल के की कल आ जाओ पैसे मिल जाएंगे तब तक पुराना खाता बंद कर दो बोलकर जाने के लिए कह दिया. उनका कहना हुआ कि “मैडम कल लोन सैंक्शन हो जाए एक बार फिर पुराना बंद करते है”. मैंने हा कर दी, वो चले गए. जब मैनेजर को सब तैयार करके फ़ाइल दी तो बोले “मैडम पहले पुराना बंद करवाओ फिर 2 दिन बाद सैंक्शन दूंगा”. आखरी फैसला तो आखिर उनका ही था.

अगले दिन माँ बेटी फिर बैंक आए 30 हज़ार लेकर. “मैडम हो गया क्या लोन पास”. मैंने उन्हें सब बताया जो मैनेजर ने कहा था. सुनते ही बड़े उदास हो गए, कहने लगे “मैडम इमरजेंसी है थोड़ा कर दो आज ही”. मैंने चिल्ला दिया “कोइ हॉस्पिटल में हो, किसी की तबियत खराब हो, बच्चे की पढ़ाई रुक गयी हो, वो होती है इमरजेंसी, यहाँ कौनसी इमरजेंसी आपकी”. जवाब आया “मैडम टाइम पे लड़के के घर पर हुंडा (दहेज) पहुँचाना भी इमरजेंसी है, हुंडा नही पहुँचा तो लड़की की शादी टूट जाएगी, ज़िन्दगी खराब”. मैं दंग, जब पूछा लड़का क्या करता है तो पता चला जिल्हा परिषद स्कूल में टीचर है, 1 लाख उसे हुंडा चाहिए था.शादी का खर्चा अलग जो वो अपने 12 एकर खेत मे से 3 एकर बेचकर निकालने वाले थे. बड़ी बेटी की शादी में भी 40 हज़ार का हुंडा दिया था. मेरे थोड़े बोलने पर की क्यों आप लोग बढ़ावा दे रहे हो इन बातों को, जवाब मिला “रिवाज़ संस्कृति है अपनी,समाज मे करना ही पड़ता है”. ये तो बस कॅश की बात थी बाकी जो देंगे वो अलग. फैमिली पेंशन और खेत पर घर चल रहा है और उसपे ये सब.

एक मैनेजर की हैसियत से टेबल संभालते हुए लोन अप्रूवल के लिऐ दु बस इतना कर सकती थी पर जो अपने सामने होता देख रही थी, उस माँ के चेहरे पे चिंता, लोन कम होने पर पसीना आना, बहन के गहने छुड़ाने की चिंता, शुक्रवार की जगह सोमवार को लोन होने वाला है सुनकर बैचैनी, इन्तेज़ार उसके लिए कुछ भी करना मुमकिन नही था.

ये परिवार यवतमाल के पास के एक छोटे से गांव से था. जहाँ पढ़ाई भी बस फॉर्मेलिटी तौर पर ही होती होगी. पर शहर में हम कहा कुछ नया कर रहे है. हम शहरी लोग अच्छे स्कूल अच्छे कॉलेज से पढ़ने के बाद भी इस प्रथा को आगे बढ़ा रहे है. कितने तो IIT, IIM, IAS officers खुले छूट अपना रेट डिसाइड करते है. समाज में झूठी शान के लिए पता नही कहा कहा से पैसे जोड़कर शादी लगाते है. खासकर लड़की वाले. बँक को तो अपने लोन का ब्याज मिलेगा ही, लेकीन इस महान संस्कृती का पुराना ब्याज क्या सिर्फ औरत ही भरेगी. इस महान पुरुषप्रधान, उच्चवर्गीय, सरंजामी संस्कृती का बोझ कौन सर पर ले रहा है ? रिती रिवाज, संस्कृती का विद्रुप रुप हमेशा गरीब लोगो में ही ज्यादा वेदना लेकर आता है. शादी के इस नये मार्केट मे ये ज्यादा से ज्यादा भयानक होते जा रहा है.  हमेशा से ये होता आया है कोई भी बोझ लड़की को ही पहले उठाना पड़ता है, आज भी अगर वही हो रहा है, तो फिर किस दिशा में आगे बढ़ रहे है हम, और कौनसे आधुनिक भारत का जश्न मना रहे है हम.

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