Nostalgia

बस यादें, यादें, यादें रह जाती है
कुछ छोटी, छोटी बाते रह जाती है,बस यादें….

आज 16 साल बाद मौका आया मेरी स्कूल “Mennonite English Senior Secondary School,Dhamtari” जाकर देखने का और यादों को जीने का.इस स्कूल में मैंने 4th से 9th तक की पढ़ाई की थी फिर पापा के ट्रांसफर की वजह से नागपुर आ गयी. आज जाना हमे जगदलपुर तरफ था और उसके विपरीत दिशा में था धमतरी,बस 9 km. राइड पर होने की वजह से 9 km कुछ भी नही था और कुछ पुराने लम्हो की एहमियत भी थी.16 साल बाद स्कूल में काफी कुछ बदला और काफि कुछ नही भी.

IMG_20180920_163442

 

अपनी वो क्लास देखी,वो स्टेज देखा जहाँ उस स्कूल का मेरा पहला डांस परफॉर्मेंस किया था और सबसे जरूरी मिली अपनी 16 साल पुरानी दोस्त क्रिस्टीना से. फेसबुक पर बस हम नाम के दोस्त है ना कभी कोई चैटिंग की, ना किसी की पोस्ट पर लाइक या कमेंट ना ही कभी फ़ोन पर बात. आज जब स्कूल गयी तो स्कूल बंद हो चुका था,हमारे जमाने में स्कूल 5 बजे तक हुआ करती थी तो उम्मीद थी खुली रहेगी पर पता चला अब स्कूल 12 बजे तक की हो गयी है.

इस दोस्त का मेरे पास नंबर नही था पर आज भी उसका घर कुछ कुछ याद था की स्कूल के आगे वाले चौक से लेफ्ट लेकर ही है किसी बिल्डिंग में घर है. बाकी मदद स्कूल के पिउन ने लैंडमार्क बताकर करदी क्योंकि वो वही जहाँ कभी वो पढ़ा करती है आज खुद टीचर है.

IMG_20180920_175149.jpg

इतने साल बाद जब मैं घर गयी किसी की तरफ से कोई फॉर्मेलिटी नही थी. बाते बस अपने आप होती चली गयी. Nikesh मेरे साथ थे पर उनके साथ भी बात करने में कोई हिचकिचाहट नही. क्रिस्टीना की मम्मी भाई भाभी सभी ने इतने अच्छे से घुल मिलकर बात की. भाभी से तो मैं पहली बार मिल रही थी पर लगा नही. कुछ हम यादों का पिटारा खोलकर फिर अपनी वो जिंदगी जी गए कुछ मिनटों में और कुछ आज की जिंदगी से जुड़े.

बाकी कहानी और भी है पर वो सुन ने मिलेगी आपको बहुत जल्द हमारे चैनल रास्ता सफर और ज़िन्दगी में. कहानियां आप मिस नही करना चाहते है तो सब्सक्राइब करे..

https://www.youtube.com/channel/UC-9usNMKyxcBaQxxan_M9QA

 

Advertisements

राजमची नाईट ट्रेक

24 जून ये मेरे लिए सेलिब्रेशन का दिन,इसी दिन 2016 में मैंने लद्दाख के लिए राइड शुरू की थी. तब से हर साल ये दिन सेलिब्रेट होता है. इस बार ये दिन हमने सेलिब्रेट किया राजमाची जाकर. 23 सुबह 10 बजे हम नागपुर से पुणे पहुँचे. लंच और थोड़े आराम के बाद शाम करीब 6 बजे हम पहुँचे लोनावला और 7 बजे शुरू किया हमारा सफर राजमाची के लिए. पहले तय किया था कि लोनावला स्टेशन से ही सीधा ट्रेक शुरू करेंगे पर बारिश और ट्रेक खत्म होने के दूसरे दिन सफर करके नागपुर आना, ऑफिस जाना ये सब करना था इसलिए फिर तय हुआ कि जहाँ तक ऑटो जाता है वहाँ तक ऑटो से ही जायेंगे.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

इस ट्रेक में निकेश और मेरे अलावा साथ मे था मेरा भाई प्रशिक जो गाइड के रोल में भी था,उसका ये राजमची का एक महीने में दूसरा ट्रेक था और सब मिलाकर चौथा. जानकारी के मामले में पूरा पक्का था वो.इस बार पर ये उसका पहला टाइम था कि वो ऑटो से किसी पॉइंट तक जा रहा था वरना हर बार उसने स्टेशन से ही ट्रेक शुरू किया था. राजमची के लिए अलग अलग रास्तो से ट्रेक शुरू होता है.कुछ लोग कर्जत की तरफ से शुरू करते है, कुछ लोग लोनावला की तरफ से.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

हमने अपना ट्रेक शुरू किया लोनावला के डेला एडवेंचर होकर जाने वाले रास्ते से. वही तक बस पक्का रास्ता है आगे रास्ते का काम चालू है. ऑटो की सीमा वही तक है पर बड़े चक्के वाली गाड़ियों से आप और आगे जाकर भी रुक सकते है और ट्रेक शुरू कर सकते है. पर मेरी माने तो डेला से ही आप ट्रेक शुरू करे, अगर आधे रास्ते गाड़ी से ही पहुच जाए तो ट्रेक का मज़ा क्या रहेगा. डेला से राजमची ट्रेक का सफर करीब 12 km का है.

डेला से राजमची जाते हुए रास्ते मे देखने मिलते है काफी खूबसूरत नज़ारे जिनमे समावेश होता है 3 4 वाटरफॉल हरियाली से भरपूर रास्ते,पंछियो की आवाज़ और थोड़े थोड़े सफर के बाद चाय भुट्टे की दुकाने. क्योंकि हमने ट्रेक रात में शुरू किया था झरने हम देख तो नही पा रहे थे पर पानी की आवाज़ हमारे साथ थी, पंछियो कीड़ो की आवाज़ भी हमारे साथ थी. रात में राजमाची जाते हुए जिन बातो का आपको खास ध्यान रखना है वो है रास्ते मे मिलने वाले केकड़े साँप और बिछुओं का. टोर्च इसलिए साथ मे ही रखिए और रास्ते पर नज़र बनाये रखे. बातो बातो में हमारी नज़र थोड़ी भटकी क्या थी फन निकाले हुए साँप हमारे सामने खड़ा था.खुशकिस्मती से भाई का ध्यान रास्ते पर था उसने हमे आगाह कर दिया वरना मैं साँप को प्यारी हो चुकी होती.केकड़े करीब करीब 100 देखने मिले इनसे भी सावधान रहना जरूरी है वरना ये यू जकड़ेंगे की छोड़ने का नाम नही.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

बारिश में कुछ भीगते कुछ ख़ुदको बचाते हुए कीचड़ पानी से होकर हम बढ़ रहे थे राजमची के बेस विलेज उधेवाड़ी की तरफ. हमे किसी ने बता रखा था कि यहाँ चोरी लूटपाट की काफी वारदाते होती है पर सफर में हमे कुछ ऐसा महसूस नही हुआ. हो सकता है ये काफी पुरानी बात हो जब बोहोत लोग राजमची ट्रेक के लिए आते ना हो. अब तो हर थोड़ी थोड़ी दूरी पर आस पास के गाँव के लोगो ने चाय भुट्टे नाश्ते की दुकान लगा रखी थी. कई दुकानें तो रातभर खुली रहती है खासकर शुक्रवार शनिवार रविवार  के दिन क्योंकि आस पास के शहर के काफी लोग यहाँ आते है खासकर मुम्बई पुणे. डेला की गाड़ियां भी यहाँ रात भर चलती है,उसी रास्ते पर उनका कोई ट्रेनिंग कैम्प है. अब कोई डरने वाली बात हमे नज़र नही आई साँप केकड़े बिछुओ को छोड़कर😉. हमने ये ट्रेक बारिश का मौसम शुरू होने के बाद किया वरना ये ट्रेक जुगनुओं के लिए भी काफी फेमस है जो बारिश शुरू होने के पहले तक देखे जा सकते है. जुगनू रास्ते मे हमे भी देखने मिले पर बहुत ज्यादा नही.

कुछ रुकते और मजे लेते हुए बेस विलेज में हम पहुचे करीब रात 12 बजे. भाई ने एक घर मे हमारे रुकने और खाने की व्यवस्था करा रखी थी. उधेवाड़ी में हर घर मे रुकने और खाने की व्यवस्था हो जाती है और टॉयलेट्स भी साफ मिल जाते है. हमारे पहले कई ग्रुप वहाँ पहुच चुके थे और सो चुके थे. हम तीनों को इसलिए एक अलग कमरा मिल गया पर खाना खत्म हो चुका था. लोनावला से हम खाने का जो कुछ सामान लेकर चले थे केक चॉकलेट्स खजूर उस से ही पेट भरकर जो भुट्टे खाकर वैसे ही काफी कुछ भरा था, सो गए.

00100dPORTRAIT_00100_BURST20180623204557262_COVER

ट्रैन का सफर फिर इतना ट्रेक इसकी वजह से 24 की सुबह हमारी आराम से ही हुई. फ्रेश होने के बाद नाश्ते में हमे मिले गरम गरम पोहे और चाय. दोपहर का खाने के लिए जो चाहिए वो बताकर हम निकले राजमाची फोर्ट के लिए. यहाँ के अगर खाने और रहने की व्यवस्था की बात करे तो काफी सस्ते में हो जाती है. हमसे रहने के लिए एक के 70 रुपये, नाश्ते के 50, और खाने में क्योंकि हमने बस बेसन और भाकर कहा था तो उसके भी बस 70. अगर हम पूरा खाना बोलते तो उसके होते 130 रुपये और अगर नॉन वेज बोलते तो उसके भी अलग. बाकी ट्रेक के बेस विलेज के हिसाब से ये काफी सस्ता था.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

9 बजे करीब निकले हम फोर्ट के लिए जो थोड़ी ही दूरी पर था. फोर्ट का टॉप वहाँ से बस 2 km ही है. सुबह 9 बजे भी कोहरा और धूप की आंख मिचौली चालू थी. बहुत ही सुंदर चढ़ाई थी गाँव से फोर्ट टॉप की. बारिश की वजह से हर तरफ हरियाली दिख रही थी. कोहरे की वजह से ज्यादा दूर का तो कुछ नही दिख रहा था पर आस पास सब हरा था और पानी था. 2 km के छोटे से ट्रेक के बाद हम पहुँचे टॉप पर जहाँ एक भगवा झंडा शान से फहरा रहा था. टॉप से वैसे तो हमे आस पास के सारे पहाड़ दिखने चाहिए थे पर कोहरे की वजह से सब ढका हुआ था. इसका भी अपना अलग मज़ा था, फ़ोटो खिंचने पर भी पीछे बस सफेद पर्दा दिख रहा था मानो फ़ोटो स्टूडियो में बैठकर फ़ोटो खिंचाई हो.टॉप पर कुछ समय बिताने के बाद हम बढ़े वापस गाँव की तरफ.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

IMG_20180624_093607

ऊपर चढ़ते हुए जहाँ हमारे साथ कोहरे ने दिया वही कोहरा नीचे उतरते हुए अब हल्का हल्का छठ रहा था. थोड़ी देर के लिए हमे साफ साफ आस पास के पहाड़ देखने मिले और फिर कोहरे ने अपनी हुक़ूमशाही जमा ली. हमने मज़े पर पूरे लिए. करीब 12 बजे गाँव पहुँचकर हमने खाना खाया, बोला हमने बस बेसन भाकर ही था पर उन्होंने तैयारी हमे पूरा खाना खिलाने की ही कर रखी थी और वो भी बस 70 रुपये में ही. गाँव की मेहमाननवाजी की बात ही अलग होती है किसीको भूखा रखना उनके उसूलो में नही. खाना खाकर और थोड़ा आराम करने के बाद हमने सफर शुरू किया नीचे वापसी का.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

थकान काफी हो रखी थी. निकेश ने सुझाव रखा गाड़ी से जाने का . एक साइड तो ट्रेक कर चुके है अब गाड़ी से जा सकते है. गाँव से पर गाड़ी मिलती नही है अगर आपकी कोई पहले से बुकिंग नही है तो. हम निकले फिर पैदल पैदल. रास्ते रात से काफी खराब हो चुके थे बारिश की वजह से. कीचड़ कुछ ज़्यादा ही हो चुका था और कई जगह पानी भी जमा हो चुका था, जूते भी फिसल रहे थे. रात को अंधेरे में जो झरने हम नही देख पाए थे वो साफ साफ अब दिख रहे थे. दिल को सुकून देने वाले वो नज़ारे थे. लग रहा था राजमाची ट्रेक के हमने सारे लुत्फ उठा लिए है.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

राजमची से 3 km पर एक ब्रिज है जहाँ से टैक्सी की जा सकती है पर रेट उनके 1000 से शुरू होते है जो खर्च करना हमे बेफिजूल लग रहा था. वहाँ भी टैक्सी नही मिली तो हम ठान चुके थे पूरा सफर पैदल ही तय करेंगे. आगे चलकर चलते चलते युही निकेश ने एक कार को हाथ दिखाया. वो कार रुक गई और हम तीनों को अंदर बैठने की अनुमति दी. केरला नंबर प्लेट की एकदम साफ सुथरी कार जिसमे सामने दो लड़के थे. हम तीन पूरी तरीके से बारिश में भीगे हुए, कपड़े पर कीचड़ लगा हुआ,अगर कपड़े पर ही कीचड़ था तो जूतों की हालत तो आप सोच ही सकते है क्या होगी. इतनी गंदी हालत में भी उन्होंने हमें अंदर बिठाया. हमे लोनावला हाईवे तक लिफ्ट चाहिए थी जहाँ से हम स्टेशन के लिए ऑटो कर लेते.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

वो दोनों केरला से थे और मुम्बई में नौकरी कर रहे थे 6 7 साल से. राजमाची का प्लान बनाकर मुम्बई से निकले थे पर रास्ते की खराब हालत देखकर आधे से ही वापस जा रहे थे और बीच मे उन्हें हम मिल गए. बहुत ही बढ़िया वो दोनों लड़के. जो ड्राइविंग सीट पर थे उन्हें भी घूमने का काफी शौक था और उनके शौक को जाहिर करता कम्पास का टैटू उनके हाथ पर था. केरला के होने की वजह से वो वहाँ पर घूमने की अलग अलग जगह का नाम बता रहे थे और उसके साथ अपने काम के बारे में भी. बातो बातो में ही हम हाईवे पहुँच गए पर उन्होंने अपनी गाड़ी वहाँ नही रोकी. कार उन्होंने लोनावला की तरफ ली और स्टेशन के बिल्कुल पास वाली गली पर छोड़ा. वीकेंड की वजह से बहुत ट्रैफिक होता है वो चाहते तो हाईवे से बड़ी आसानी से निकल जाते.उस ट्रैफिक में भी उन्होंने कार लोनावला शहर में ली जहाँ पुलिस टूरिस्ट को स्पीकर पर बता रहे थे “वीकेंड की वजह से टाइगर हिल्स और बुशी डैम पर 5 km का ट्रैफिक जाम लगा तो यात्री कृपया वहाँ ना जाते हुए लोनावला शहर की दूसरी जगहों पर जाए”. उन्हें अलविदा कहकर थोड़ा नाश्ता करने के बाद हम बढ़े स्टेशन की तरफ. स्टेशन के क्लॉक रूम से अपना सामान उठाकर हम बैठे शाम 5 बजे की कोयना एक्सप्रेस में और निकल पड़े मुम्बई की और.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-YMaker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

पैर रखने को जगह नही इतनी खचाखच भरी हुई वो ट्रैन. ट्रेक करने के बाद बैठ के जाने की इच्छा थी पर वो तो नामुमकिन था.खड़े रहने को जगह मिल गई वही गनीमत.मुम्बई में हमे जाना था मीरा रोड. हम ठाणे में ही उतरे जहाँ से हमे बस लेनी थी. ट्रैन में हमे कल्याण से ठाणे तक बैठने की जगह मिल गई थी. 8 बजे हम ठाणे पहुँचे और 9 बजे शिवशाही से मीरा रोड. बस स्टॉप से 5 min में ही था गोपाल दादा का घर जो स्पेशल डिश के साथ हमारा इंतज़ार कर रहे थे.

दादा के बड़े सुंदर से घर मे पहुँचकर सबसे पहले तो फुर्सत में नहाया और फिर जमाई महफ़िल. पहले महफ़िल बातो की मेरी,उनकी,भाई की, दादा के बेटी की, भाभी की उसके बाद महफ़िल जमी खाने की. खाने में हमारे लिए थे स्पेशल ताज़े ताज़े केकड़े. मुझे और मेरे भाई को जो खाने नही आते थे तो हमे पूरी ट्रेनिंग भी मिली. बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट ऐसे वो केकड़े और उसपे दादा की मेहमाननवाजी, दिल खुश. रात के दो बजे तक गप्पे और मस्ती के साथ खत्म हुआ दिन.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

25 की सुबह नींद से उठने के बाद स्वागत किया हमारा जोरदार बारिश ने और उस जोरदार बारिश में दादा हमे लेकर गए नदी पर. नदी का नाम तो मालूम नही पर बह वो तूफानी रही थी. मज़ा आ गया खूब डांस किया, खूब मस्ती की, खूब भीगी और खूब खुश हुई. सब मस्ती खाना मिलना मिलाना और यादों के साथ फिर मैं वापस निकली अपने शहर नागपुर की ओर.

IMG_20180625_142554

बरसात की वो रात

Life is what you make it.

कल बड़े दिनों बाद मैं अकेले राइड पर निकली. ऑपरेशन के बाद कई दिनों तक एवेंजर चलाने के लिए ही मना था, जब परमिशन मिली तब भी अकेले जाने की हिम्मत नही होती थी. थोड़ा डर लगता ही था अगर पैर पर कोई झटका आ गया तो, पर कल वो दिन आ ही गया जब एवेंजर लेकर अकेले निकल पड़ी.

अपनी मर्ज़ी से ज्यादा दिमाग का खराब होना बड़ा कारण था राइड पर जाने का. राइडिंग से बेहतर तरीका और कोई समझ नही आ रहा था शांत होने का. ऑफिस में जैसे तैसे मन मार कर समय निकाला,ऑफिस खत्म करके रात को करीब 8 बजे राइड पर निकली. कहाँ जाना है, कौनसा रास्ता लेना है,कहाँ रुकना है कुछ पता नही, बस यवतमाल शहर से जल्दी बाहर निकलना है और चलते जाना है इतना पता था. कही पहुचने की कोई जल्दी नही 40-60 की स्पीड में एवेंजर बढ़ रही थी और पहुँची यवतमाल नांदेड़ हाईवे पर.मौसम भी बडा सुहाना हो रखा था, बढ़िया ठंडी हवा गालो को छू रही थी.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

बढ़ते बढ़ते एक बार मन मे आया नांदेड़ पहुच जाऊ 150 km दिख रहा था.कभी लगा लातूर जो काफी दूर था और समय हो रहा था करीब रात 9.45 बजे का. सुहाने मौसम में फिर तड़का लगा बिजली का. तब अपने मन को ब्रेक लगाकर मैंने वापस अपने घर यवतमाल आने का फैसला लिया. बस अपना मोबाइल,पैसे और एक पानी की बोतल के साथ घर से निकली थी तो आगे का सफर करना उचित ना था.इसलिए गाड़ी पलटाई लौटने के लिए.

वापसी का सफर शुरू हुआ और उसी के साथ शुरू हुई जोरो की आंधी, गाड़ी संभालना मुश्किल हो रहा था ऊपर से नागपुर मुम्बई हाईवे का काम जिसमे हमने घाट और सालो पुराने पेड़ तोड़ दिए. हर जगह बोर्ड लगे थे Go Slow, मन मे सवाल आ रहा था इसपे अगर सरकार भी थोड़ा सोच लेती तो. मैं डेवलोपमेन्ट के खिलाफ नही हु,वो तो बहुत जरूरी है पर at what cost. इसका हर्जाना कही तो हमे ही भरना है.

खैर ये तो अलग मुद्दा हो गया वापिस आते है राइडिंग पर. आंधी जब शुरू हो गयी थी तब बारिश कहाँ पीछे रहने वाली थी. जम के शुरू हुई बारिश और यवतमाल के आस पास 3 4 दिन में जितनी बारिश हो रही थी उसमें से सबसे तेज़ कल. राइड करने की तकलीफ बढ़ रही थी बारिश आंधी और सामने से आने वाली गाड़ियों की लाइट सब परेशान कर रहे थे. मैं बस अब कही रुकने की जगह ढूंढ रही थी. 10 15 मीन बाद जब बारिश अच्छी बढ़ चुकी थी एक ढाबा दिखा.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

ढाबे पर जाकर गाड़ी रोक दी.2 कार और एक कोई दूसरी गाड़ी थी जो बारिश में समझ नही आ रही थी. ढाबे के बरामदे में पहुची तो एक फैमिली दिखी जो निकल रही थी,एक कार उनकी थी. थोड़ा चौककर ही देखा उन्होंने मुझे क्योंकि घड़ी करीब 10.30 का समय दिखा रही थी और ये अकेली लड़की भारी बारिश में अपनी एवेंजर से उतरकर हाथ मे हेलमेट लिए ढाबे के अंदर आ रही थी. पूछा उन्होंने कुछ नही. ढाबे के मालिक किशोर सायरे ने टिन के छत के नीचे की जगह पक्की छत में अंदर जाकर रुकने के लिए कहा. ढाबे पर अब बस ढाबे पर काम करने वाले लड़के, ढाबे के मालिक और 2 दूसरे लड़के जो यवतमाल से अपनी कार से सफर कर रहे थे.

अंदर जाकर मैं एक चेयर पर बैठ गयी. मेरी यहाँ ठंड से हालात खराब हो रही थी और अंदर कूलर चल रहा था. एक कूलर की आवाज़ और दूसरी तेज़ आवाज़ जनरेटर की. मैं आजू बाजू देखते हुए कान में इयरफोन डाले गाने सुन ने की कोशिश कर रही थी. थोड़ा awkward सा हो ही रहा था. पहली बार ही यू अकेले इतनी रात में ढाबे पर बैठी थी. तभी आवाज़ आयी किशोर सायरे की “मैडम पानी वगैरह मँगाउ क्या”. उतना सवाल काफी था उनका मेरे लिए कान से इयरफोन निकालकर बातचीत का सिलिसिला शुरू करने का. समय तो काटना था ही.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

“नही बोतल है मेरे पास पानी की” कहकर मैंने बात को आगे बढ़ाया, “आज बारिश कुछ ज्यादा ही है ना”. “हां बारिश 3 4 दिन से रोज़ ही हो रही है पर इतनी जोर से आज ही”. किशोर ने कुछ सवाल पूछे आप कहा से आ रहे हो? कहा जा रहे हो?. उन्हें मैंने यवतमाल का भी पूछा “यवतमाल में भी इतनी ही बारिश शुरू है क्या?”. यवतमाल उनके ढाबे से कुछ 36 km था. उनका जवाब आया “वहाँ का तो पता नही, रुकिए मैं फ़ोन करके पूछता हूं”. उन्होंने तुरंत फ़ोन लगाया और यवतमाल का हाल पूछा. वहाँ भी बारिश उतनी ही थी.

हमारी ये सारी बाते पीछे के टेबल पर बैठे लड़के सुन रहे थे. उनका खाना खत्म करके जब वो निकलने लगे तब उन्होंने भी बातचीत शुरू की “इतनी रात को अब अकेले आगे नही जाना चाहिए, कार चलाने में ही दिक्कत हो रही है बाइक कहा चला पाओगे. बाइक भी आखिर मशीन ही है कुछ खराबी हो गयी तो अकेले क्या करोगे.आप एक काम करो बाइक यहाँ लगाकर थोड़ा पीछे जाकर ही बस स्टॉप है वहाँ से बस ले लो”. 11 बज रहे थे ढाबे पे ही काम करने वाले एक लड़के ने उन्हें बोला “इतनी रात को अब उन्हें बस कहा मिलेगी”. सब अपनी अपनी चर्चा में लगे हुए थे और मैं बैठे बैठे बस बारिश के रुकने का इंतज़ार कर रही थी.

अब वो दोनों लड़के भी चले गए,ढाबे में बचे अब बस ढाबे के लोग और मैं. 11 बजे उनका ढाबा बंद करने का टाइम था तो चेयर टेबल सब अपनी जगह पर लगा रहे थे बस मेरे लिए एक टेबल चेयर छोड़ दिया. ढाबे के बंद होने का टाइम देखकर मुझे ही थोड़ा बुरा लगा. मैंने उनसे बोला मेरी वजह से आपको देरी हो रही होगी. नही आप आराम से बैठो बोलकर वो रुक गए.

थोड़ी देर बाद फिर हिचकिचकार बोले “मैडम आप बैठिये यहाँ पर आराम से पर अगर बारिश नही रुकी तो आप मेरे घर पर भी रुक सकती है. घर पे मैं, मेरी Mrs और छोटा बच्चा है. बस आधा km है घर. बाहर वो बड़ी गाड़ी मेरी ही है उस से चले जाएंगे. एक रात की बात है आप हमारे घर मे एडजस्ट कर लीजियेगा. बाइक आप यहाँ ढाबे पर छोड़ सकती है,2 लड़के यही सोते है तो चिंता की बात नही”.

अब चिंता का तो मैं उनको क्या बता ती. चिंता का तो ऐसा है कि मैं ज्यादा करती नही खासकर सफर में क्योंकि सफर में जब भी मुसीबत आयी है अनजान से लोगो ने अपना बनकर मदद की है. आज भी कुछ वही हो रहा था.

Maker:0x4c,Date:2017-10-29,Ver:4,Lens:Kan03,Act:Lar01,E-Y

किशोर और मेरी बातें चल ही रही थी तभी ढाबे के लड़के खाना खाने बैठे. किशोर ने भी मुझे खाने के लिए पूछ लिया “मैडम कुछ खाया है आपने, लेंगी आप कुछ”. मूड ठीक नही होने की वजह से सुबह से ही मैंने कुछ खाया नही था और ना खाने की इच्छा भी हो रही थी पर उन्होंने इतने प्यार से पूछा कि मुह से हा ही निकला. फटाफट उन्होंने गरम गरम दाल और रोटियां लगाई और उतने ही फटाफट मैं खा भी गयी. रोटियां खत्म होती देख किशोर आकर बोले भी “मैडम और रोटी लगा दु. चावल खत्म हो गए है. रोटियां लगा देता हूं”.

कोई फॉर्मैल्टी नही थी. खाना खत्म होते होते बारिश बहुत हल्की हो गयी थी. 11.30 बज चुके थे फिर भी मैंने यवतमाल निकलने की ठानी, कुछ 36 km ही था क्योंकि वहाँ से यवतमाल.मैं बैग उठाकर पैसे देने के लिए उठी.किशोर तब किचन में थे उनके कोई पहचान वाले ढाबे पर आ गए थे बारिश की वजह से. उनके लिए कुछ बना ने के लिए.

मैंने किशोर से खाने के पैसे पूछे जो उन्होंने लेने से बिल्कुल इनकार कर दिया. “मैडम आज का खाना हमारी तरफ से था,अगली बार कभी फिर आ जाना आप तब पैसे लूंगा”.

IMG_20180608_231600

ऐसी कोई मेरी राइड या कोई सफर याद नही जहाँ मुझे ऐसे अच्छे लोग नही मिले. मेरा सफर पूरा होता ही है इन लोगो से. इन जैसे लोग ही मेरा सफर यादगार बनाते है और मेरे सफर को दिल से जोड़ते है. आज फिर ऐसी ही एक याद लेकर मैं बढ़ी आगे यवतमाल के लिए.

मेलघाट के रंग

जब भी हम घूमने निकले है हमेशा जो सोचा उस से कुछ अलग देखने और अनुभव करने मिला है. इस अलग अनुभव का हमेशा कारण रहा है दिल खोलकर लोगो से बात करना. जितना हमने दिल खोलके बात की उतना ही उन्होंने हमें अपनाया.चाय पीते पीते बातो बातो में समझा हम भारत के पहले “Digital Village” में बैठे है.
“1 Rupee Doctor” पद्ममश्री डॉ रविन्द्र कोल्हे से मिलने के इरादे से पहुँचे थे गाव कोलूपुर जो कि महाराष्ट्र के धारणी जिल्हे में पड़ता है. डॉ कोल्हे तो नही मिले पर उनकी बहू से मुलाकात हुई और जान ने मिला कुछ अलग ही काम.

उसके बाद हम पहुचे लवादा जहाँ पर है “बांबू सम्पूर्ण केंद्र”. यहाँ आदिवासी समाज के लोगो की कला को और उभारने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है. उन्हें स्वयं पूर्ण बनाया जाता है और स्वयंरोज़गार के लिए भी तैयार किया जाता है.वहाँ मुलाकात हुई काफी अलग लोगो से. अलग उम्र,अलग अलग गांव, अलग सोच पर सबको बांधती एक कला.उसी जगह से पता चला गांव चित्रि का, 70 घर का वो गांव और उसकी अपनी अलग खासियत.

और साथ ही मज़ा लिया हमने सेमाडोह जंगल, मेलघाट में छोटी सी ट्रेक और वहाँ के खास कोरकू तरीके से बनी चिकन करी का. कोरकू मेलघाट में बसे आदिवासी समाज मे से एक जाती है.
ये सारी कहानी और कुछ बाते लेकर आये है हम अपने चिखलदरा मेलघाट के दूसरे एपिसोड में.

लिंक पर क्लिक करके देख सकते है आप पूरा एपिसोड. एपिसोड पसंद आये तो चैनल सब्सक्राइब करके हमारा उत्साह बढाना ना भूले और ना पसंद आये या आगे एपिसोड्स में आप कुछ सुधार चाहते है तो वो भी आप यहाँ कमेंट बॉक्स पर बता सकते है.😊

और आखिरकार……

लेह तो पहुच गए, ससपोल से लेह के 70 का मलाल तो रहेगा पर पहुँच गए वो मायने रखता था|

लेह के आगे की कहानी क्या लिखी जाए,लिखी जाए भी या नही ये सोचते सोचते ही इतने दिन निकल गए, पर जब कोई भी सफर चाहे वो कितना भी मुश्किल हो अधूरा नहीं छोड़ा तो लिखने का सफर क्यों बीच मे छोड़ा जाए|

01/07/2016-Day 8-लेह पहुंचने में ही काफी देर हो गयी थी| ट्रक से सफर किया था तो कुछ थकान सी हो रही थी और कुछ मायूसी भी थी| इसलिए बस खाना खाकर सोने चले गए| नींद भी कुछ कच्ची पक्की सी ही आयी, अगली सुबह का बेसब्री से इंतज़ार जो था| सुबह उठकर गेराज जाकर अपनी वेगो देखनी थी| वेगो क्या ठीक हो पाएगी? ठीक हो भी गयी तो क्या आगे का सफर तय कर पायेगी? क्या मेरी वेगो को किया हुआ वादा पूरा हो पायेगा? क्या मैं मेरा सपना पूरा कर पाऊँगी? ऐसे कई सवाल उथल पुथल मचा रहे थे. सवालो के साथ उलझते जूझते नींद आ गयी और हुई अगली सुबह.

02/07/2016-Day 9-सुबह कुछ आराम से ही हुई| राइड करना हो तो आराम से उठने की सहूलियत मुश्किल से ही मिलती है| सुबह ५ या ६ बजे से ही सफर शुरू हो जाता है, पर आज राइड पर नहीं निकलना था तो हमने भी थोड़ी सहूलियत ले ली. तैयारी और नाश्ता कर हम पहुंचे, मैं और मेरे दोस्त, मेरी वेगो देखने। मैकेनिक से बात की, उन्होंने तसल्ली दी “गाडी बिलकुल अच्छी कंडीशन में है. आराम से आप इसके साथ आगे का सफर पूरा कर सकते है, बस कार्बोरेटर में कार्बन जमा हो चला था काफी समय से. जो सर्विसिंग के टाइम पर साफ़ नहीं किया गया इसलिए गाडी इग्निशन नहीं ले रही थी“| आधा दिन ख़तम हो ही चूका था। वेगो शाम के पहले ठीक होकर मिलनी नहीं थी| सबने सोचा यहाँ बैठकर हमने कुछ कर तो लेना है नहीं, सो चलो थोड़ा लेह देख लिया जाए|आपसी सहमति के साथ हम सबसे पहले देखने निकले गुरुद्वारा पत्थर साहिब।। मेरे दिल में थोड़ी हिचक सी थी| राइडिंग सीट छोड़कर बैक सीट पर बैठने की, पर मरता क्या ना करता वाले हालात,खैर .

4131269_orig

Pathar Sahib

लेह से कुछ २५ km दूर श्रीनगर लेह हाईवे पर बना है पत्थर साहिब गुरुद्वारा। इस से जुडी कहानी की बात करे तो बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी 1517 ई में नेपाल, सिक्किम, तिब्बत होते हुए लेह पहुंचे थे।तब उन्हें लेह की पहाड़ी पर रहने वाले एक राक्षस के बारे में लोगों ने बताया, जो उन्हें परेशान करता था।लोगों का परेशान देख गुरुनानक देव ने नदी के किनारे आसन लगाया। यह देख राक्षस बौखला उठा और उन्हें मारने की योजना बनाई। फिर एक दिन जब गुरुनानक देव जी ध्यान कर रहे थे , तब राक्षस ने पहाड़ से उन पर एक बड़ा पत्थर गिराया ताकि गुरूजी नीचे दबकर खत्म हो जाए। लेकिन एक अनोखी घटना घटी। गुरुनानक जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम बन गया और गुरूजी के शरीर का पिछला हिस्सा पत्थर में धंस गया। पत्थर में धंसा गुरुनानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद है।राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर मौजूद।जब पत्थर गुरुनानक जी से टकराया तो राक्षस को लगा कि गुरूजी पत्थर के नीचे दबे हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरुनानक  जी को जिंदा देखकर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर पत्थर में धंस गया।तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई और वो गुरुनानक देव जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान वाला पत्थर आज भी लेह में देखा जा सकता है।

ये कहानी सच्ची है या झूठी उसका तो नहीं पता पर गुरूद्वारे में अंदर जाकर जो महसूस हो रहा था वो बहुत सच्चा था. थोड़ी देर जब गुरूद्वारे में बैठी, मन को शांति मिल रही थी | मन के कमज़ोर कोने से भी मुलाकात हुयी, जिस से मिलकर आंसू अपने आप ही निकल आये| बड़ा फ्रेश लग रहा था उसके बाद| जैसे कोई बोझ हल्का हुआ हो पर क्या पता था एक बोझ हल्का हुआ तो दूसरा मिलने की तैयारी में था| गुरूद्वारे में लंगर कर हम निकले निम्मू।

26993769_1989824967698431_7587917424139739394_n

Nimmu

गुरुद्वारा से कुछ ११ km श्रीनगर रोड पर है निम्मू| जहा होता है सिंधु-जंस्कार का संगम। इस जगह को पहचान ने के लिए आपको किसी ख़ास टैलेंट की जरुरत नहीं है|पहाड़ पे गाडी दौड़ाते हुए दूर से ही दो मटमैली नदियों का संगम आपको दिख जाएगा और आप निम्मू में है जान जायेंगे। संगम देखने के लिए अलग से एक पॉइंट बनाया गया है| यहाँ से रिवर राफ्टिंग का मज़ा भी लिया जा सकता है|कुछ समय निम्मू में बिताने के बाद समय था लेह लौटने का और लौटते लौटते अद्भुत और जादुई मैग्नेटिक हिल अनुभव करने का|

26907485_1989824921031769_7545744664587074813_n

जब आप मैग्नेटिक हिल पहुंचेंगे आपको दिखेगा श्रीनगर की ओर जाता ढलान वाला रास्ता और लेह की तरफ जाता ऊंचाई वाला रास्ता। रोड पर एक बॉक्स बना हुआ है| कहते है जब आप अपनी गाडी न्यूट्रल पर लाकर उस बॉक्स में रखेंगे तो गाडी ढलान की तरफ ना खींचती हुई अपने आप ऊंचाई वाले रस्ते की तरफ बढ़ेगी। हमने कोशिश की पर हमे तो ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ| मैग्नेटिक हिल जाने के बाद आपका कुछ ऐसा अनुभव रहे तो बताइयेगा जरूर|

a-sign-board-at-magnetic

Magnetic Hill

शाम हो चुकी थी,लेह घूमने के बाद अब समय था गेराज से अपनी वेगो लेने का. वेगो बिल्कुल चुस्त, दुरुस्त, तंदरुस्त गेराज में खड़ी थी. मैकेनिक से भी हरी झंडी मिल गयी थी “मैडम ले जाओ जहा ले जानी है ,गाडी कोई तकलीफ नहीं देगी“. गाडी  के जब पैसे देने की बात आयी तो मुझे लगा कोई बड़ा सा बिल हुआ होगा, १००० -२००० तो कही नहीं गए, पर जब बिल पूछा तो बस ३०० Rs| गाडी दुरुस्त वो भी कम पैसो में, ख़ुशी का तो कोई ठिकाना नहीं था| पर कहा ख़ुशी ज्यादा देर ठहरती है| कहा था ना आपसे गुरूद्वारे में जैसे लगा की मन से कोई बोझ उतरा हो पर दूसरा बोझ अपनी तैयारी में था|

बहुत ख़ुशी हो रही थी की अगली सुबह निश्चिन्त होकर मैं अपने सपनो की चढाई चढूँगी। मैं खारदुंगला चढूँगी, दुनिया का सबसे ऊंचा माने जाना वाला १८३८० फ़ीट पर बना पास चढूँगी, वेगो को किया हुआ मेरा वादा पूरा करुँगी। आँखे जैसे सोच सोच कर ही चमक रही थी, दिल में थोड़ी हलचल भी थी, डर था थोड़ा,सुन रखा था की कितना मुश्किल है खारदुंगला पहुंचने का रास्ता, ख़ुशी बैचनी डर सब उथल पुथल मचा रहे थे| अगले दिन क्युकी मुश्किल चढाई चढ़नी थी इसलिए जल्दी सोना भी था. वेगो लेकर रूम पर पहुंचकर फ्रेश होकर सीधा डिनर करने निकले।

बड़ी खिचाई हो रही थी मेरी बस इस एक बात को लेकर की “क्या बोलेगी तू की ७० km ट्रक से किया” ” ,”अरे अब तो तुझे लेह फिर से करना पड़ेगा, आधा तो तूने ट्रक से ही किया“|वो दोस्त ही क्या जो आपकी नाकामी को भी मजाक बनाकर उड़ा ना दे|हमारी अलग ही मस्ती चल रही थी| पर मेरे दिल की धड़कन खारदुंगला पर जा अटकी थी,हलचल सी हो रही थी कि तभी किसी ने कहा ” तुझे पता है तेरी प्रॉब्लम ही ये है की तू जो कुछ करती है वो दुनिया को  दिखाने के लिए करती है“| कुछ समझा ही नहीं क्या हुआ| कुछ बड़े अजीब तरीके से मेरा उस पर रिएक्शन आया और बहुत ऊंची आवाज़ में मैंने मेरे दोस्त को चिल्लाया। मेरी तरफ से पब्लिक प्लेस पर इतने जोरो से चिल्लाना गलत ही था| पर समझा ही नहीं, उस एक स्टेटमेंट से ऐसा लगा जैसे मेरा सब कुछ छीन लिया किसीने।

कोई और कहता तो इतना बुरा नहीं लगता | एक बहुत करीबी दोस्त ने कहा था |जिस पर मैं सबसे ज्यादा विश्वास करती थी| दिल कुछ ज्यादा ही दुखा। जिस से उम्मीद थी की मेरा सपना समझेगा उसने तो इलज़ाम लगा दिया |जिस सपने को जीने के लिए मैंने हर मुमकिन मेहनत, हर मुमकिन तैयारी की थी | उसे इतनी आसानी से बस दिखावे का नाम दे दिया गया|मैंने अपना सपना पूरा करने के लिए बाकी तैयारी तो की थी, रास्ते में जो मुश्किलें आएगी उनके लिए भी थोड़ी बहुत तैयार थी, पर ये झटका सपने से परे था| जिस दिन के सुबह के इंतज़ार में मैंने नींदे  गवाई थी  सोच सोचकर, कैसा होगा वो दिन जब मैं अपनी वेगो जम्मू कश्मीर के रास्तो पर चलाऊंगी|जब मैं लेह पहुँचूँगी| जब मैं खारदुंगला के लिए सफर शुरू करुँगी| आज भी कुछ अलग नहीं था | आज भी मैं नींद गवा रही थी, पर इसलिए की इतनी कमजोर पड़ गयी थी उस एक स्टेटमेंट से कि रोना रुक नहीं पा रहा था| 1.5 साल बाद उस किस्से के बारे में लिखते हुए भी उस समय की एक एक फीलिंग्स याद है| दुनिया से तो कैसे भी लड़ ले अपनों से कैसे लड़े |

03/07/2016-Day 10-हर रात की सुबह होती ही है| इस रात की भी हुई, रात कितनी भी बुरी गुजरी हो, सुबह तो राइड करनी ही थी| अपने सपनो की राइड | जैसा सोचा था वैसा तो बिलकुल नहीं निकला था दिन| रात जो कुछ झटके देकर गयी थी| ६ बजे सफर शुरू करने का सोचा था पर तैयारी करते करते ७ बजे आख़िरकार राइड शुरू हुई, मायूस सी.

लेह से खारदुंगला है ४० km| अगर  शुरुआत के २० km के रास्ते की बात की जाए तो बिल्कुल हाईवे जैसे पर असली चढ़ाई शुरू होती है उस २० km के बाद| २० km की राइड के बाद आता है साउथ पुल्लू चेक पोस्ट| जहा गाडी की एंट्री करवाई जाती है| राइट में जहा चेक पोस्ट है लेफ्ट मैं ब्रेकफास्ट के लिए छोटा सा ढाबा। नाश्ता करने के बाद हुयी असली चढ़ाई शुरू।

26815502_1989825097698418_8710361683772089307_n

Road to Khardungla

ऊँचाई बढ़ती जा रही थी, और रास्ते ख़राब और छोटे बहुत छोटे होते जा रहे थे। बिच में एक वाटर पास ऐसा आया जाहा वेगो फस गयी। दूसरी तरफ से आती एक टैक्सी ने टैक्सी रोक कर मदद करने की कोशिश की,पर मेरी ज़िद्द थी की वेगो तो मैं अपने दम पर ही आगे निकालूंगी और निकाली भी|आते जाते रास्ते में काफी राइडर्स मिले अपनी सुपर बाइक्स पर| सबको बड़ी ख़ुशी हो रही थी, मुझे वेगो जैसी मोपेड पर राइड करता देख वो भी अकेले। एक साइकिलिस्ट का भी ग्रुप था जिसमे हर उम्र के लोग थे, १८ से लेकर ७० तक, ये लोग पुणे से लेह साइकिल पर आये थे| इतना अच्छा लग रहा था मुझे उन्हें देखकर पर उन्हें मुझे देखकर ज्यादा ख़ुशी हो रही की अकेले ये इतना सफर कर रही है| हम तो ग्रुप में है, हिम्मत देने के लिए इतने लोग साथ है पर ये अकेली।

कितना पावर होता है ना एक अकेली लड़की में, पावर किसी की सोच बदलने का| ऊँचाई १७०० फिट से ऊपर थी,ऑक्सीजन लेवल कम होता जा रहा था,ठण्ड अलग और रास्ते में बस बड़े बड़े पत्थर और मिट्टी| कुछ जगह काम चालु होने की वजह से धूल| हर १० min बाद गाडी रोक कर मैं ब्रेक ले रही थी| हिम्मत जवाब दे रही थी, शरीर थक चूका था और दिमाग तो बस एक ही सवाल पूछ रहा था “क्यों मुझपर दिखावे का इलज़ाम लगाया गया“| इतनी दूर आकर पर हार मान ना मुश्किल था| कई लोग एक सवाल लेकर ऊपर चढ़ रहे थे “और कितना दूर है”, बाइक पर, टैक्सी पर, और बस पर सफर करने वाले भी| १० min आधे घंटे जैसे गुजर रहे थे| आखिर मैं भी उस पॉइंट पर पहुंच गयी जहा मैंने खारदुंगला से वापिस आती गाडी से पूछ ही लिया “और कितना दूर है“| जवाब मिला बस इस मोड़ के बाद सीधा खारदुंगला।

26991619_1989825174365077_235420033236877438_n

Khardungla Top

सच्ची में उस मोड़ के बाद था सीधा खारदुंगला “खारदुंगला टॉप”. मेरे सपनो का टॉप, मेरे वादों का टॉप| राइट साइड पर बोर्ड था “Khardungla Top (18380 ft) Highest Motorable Road In The World “| जहा लोग झुण्ड बनाये खड़े थे और उसके थोड़ा आगे पत्थर पर लिखा खारदुंगला टॉप जहा कोई नहीं था| जाकर मैंने वेगो लगायी, अपने सपने का जशन मना ने शांति थी वहा.

वेगो लगा ही रही थी की बधाई देने एक लड़का आया,बधाई दी, सलूट किया और हालत देकर पूछने लगा ” Do You needsomething, anything, medicine, juice, fruit, I am group leader for the biker group,tell me, you dont look good”|शब्द मुँह से बहार ही नहीं आ रहे थे बस इतना बोल पायी “नहीं बस थोड़ा इमोशनल हो रही हु”| वो वहा से निकल गया कहकर की “take your own time”|वहा बैठी हु और बस ख़ुशी में रोई हु, ऑक्सीजन की कमी के बावजूद| जब खारदुंगला राइड प्लान कर रही थी तभी मुझे बता दिया गया था की “वहा जाकर ज्यादा इमोशनल मत होना, एनर्जी वेस्ट होगी, ऑक्सीजन पहले ही कम रहता है” | पर दिल का क्या करे साहिब, दिल ख़ुशी रोक ही नहीं पा रहा था| बस रोना था बोहोत सारा, ख़ुशी में,अपना सपना पूरा होने की ख़ुशी में| समझ नहीं आ रहा था कैसे जाहिर करू ये ख़ुशी।

खुदको थोड़ा संभाला जब लोग बधाई देने के लिए आकर मिलने लगे| वो लड़का जो पूछने आया था कुछ मदद चाहिए फिर आया अपने दोस्त को लेकर मुझे मिलाने| वो मुझे देखकर खुश हो गया,जब मैंने पूछा “Can you please click a picture of me”,जवाब मिला “I can click 100” और आज यहाँ जितने लोग आये है “should click a selfie with you”. प्राउड मोमेंट अगर बोलू तो था जब साइकिल ग्रुप में के ७० साल के अंकल जो पुणे से लेह आये उन्होंने सलूट किया “तेरी ज़िद्द को सलाम“| उसके बाद याद नहीं कितने ही ग्रुप, कितने ही राइडर्स के साथ फोटो खिचाई। साइकिल ग्रुप के सारे लोगो से मिली उनके साथ नाश्ता किया| मेरे दोस्त जिन्होंने मेरे बाद राइड शुरू की थी कुछ समय उनके साथ बिताकर वापिस निकली लेह की ओर।

26850840_1989833264364268_502304633637396433_o

उस दिन की मायूसी और चमक दोनों आज भी वैसी ही कैद है आँखों में जैसे उस दिन थी। ज़िन्दगी बदली है उस राइड ने और कुछ रिश्ते भी। वो चमक आप तक पहुंचाने में कितनी सफल हुई नहीं पता पर ये पोस्ट लिखते लिखते वह पूरा एक दिन मैंने फिर से जी लिया।

ये मत सोचियेगा की बस यही कहानी ख़तम हुई,ये तो बस एक पार्ट था अभी तो लेह से बाहर निकलकर और कई सुन्दर और ख़राब रास्तो से मिलाना है, रास्तो पर मिले लोगो से मिलाना है. So Stay Tuned.

कारगील से लेह के वो आखरी 70 किलोमीटर

ये अकेली लड़की अपनी मोपेड (Wego) पर ज़ोज़ि ला जैसे खतरनाक रास्ते पार कर द्रास होते हुए कारगील पहुंचने के बाद अब शुरू करने वाली थी सफर अपनी अगली मंज़िल लेह का. कारगील से लेह का वो 218 किलोमीटर का सफर….

23032568_1904023816278547_8779019885548279850_n

Julley in July

Julley,लद्दाख रीजन में बोले जाना वाला ये खूबसूरत शब्द जो अपने आप मे ही एक वाक्य है. Hi… Hello… Namaste… के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला शब्द है Julley. हालांकि हर शब्द की अपनी खूबसूरती होती है, पर Julley की खूबसूरती बढ़ाता है लद्दाख के लोगो का मुस्कुराता हुआ चेहरा. 6 महीने दुनिया से संपर्क न होने और कई अलग मुसीबते झेलने के बाद भी उनके चेहरे की वो मुस्कान, वो सुकून, वो खुशी, उस शब्द में जैसै जान भर देती है. आप कभी लद्दाख में हो और समझ नही आ रहा हो कि कैसे किसी से बात की शुरुआत करे, तो यकीनन ये शब्द आपकी मदद कर देगा.

01/07/2016 से मैं जीने वाले थी लद्दाख की खूबसूरती को. करीब 6 बजे मैं निकली कारगिल से लेह की ओर. उतनी सुबह ही तोशी अपनी दुकान खोल चुका था. मैं सामान लेकर नीचे उतरी तो उसने आकर गाड़ी पर सामान बांधने में मदद की और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगी”.

कारगिल से बस कुछ 10-15 km का रास्ता ही काफी खराब था. उसके बाद रास्ता टार का ही था. आज खराब रास्ते की नही, चढ़ाई की मुश्किल का सामना करना था. श्रीनगर लेह हाईवे की दो ऊंची चढ़ाई ‘नमिक ला’ और ‘फोटू ला‘ चढ़ना था. पहली चढ़ाई पड़ती है नमिक ला की. नमकी ला की चढ़ाई शुरू करने के पहले मैं 2-3 जगह रुकी. एक जगह जब रुकी, सामने 2- 3 घर दिख रहे थे और उनके पीछे पहाड़. आस पास कोई नही, थोड़ी देर बाद वही कारगिल आते हुए पठानकोट के जिन 4 अंकल से मिली थी, उनसे फिर मुलाकात हो गयी. वो वही से गुजर रहे थे, मेरी गाड़ी देख कुछ देर बात करने के लिए रुक गए और आशीर्वाद देने के लिए भी.

एक जगह  मैं नाश्ता करने के लिए रुकी. छोटा सा ही कैंटीन जैसा कुछ था, अंदर जाकर लगा कहा तो सबके आराम में मैंने खलल डाल दिया हो. मुझसे पहले उस कैंटीन में कोई आया हो ऐसा लग नही रहा था. बड़े हिचकिचाते हिचकिचाते ही मैंने पूछा जैसे किसी की प्राइवेसी में दखल दे रही हु, कुछ नाश्ता मिलेगा? शुक्र है उन्होंने हा बोला. नाश्ता कर ही रही थी कि 2 आर्मी जवान आए और मैगी आर्डर की. उनमे से एक बैंगलोर के थे और दूसरे बिहार. मैंने बात शुरू करते हुए युही पूछ लिया-

कितने लकी है ना आप लोग रोज़ इन खूबसूरत पहाड़ो को देखने मिलता है, नेचर के बीच रहने मिल रहा है.”

मैम कितना देखेंगे रोज़ रोज़ इन पहाड़ो को, मैं बैंगलोर से हु, यहां रह रहा हु अपनी फैमिली से इतना दूर, बात करने का मन हो तो भी कई बार नेटवर्क की वजह से बात नही हो पाती है, कुछ अलग खाने का मन करे तो बस मैगी से काम चलाना पड़ता है, कुछ दिन के लिए ही अच्छा लगता है ये नेचर, ये पहाड़ फिर नार्मल लाइफ याद आने लगती है“.

मेरे मन में ख्याल आया कि कितना ग्रांटेड ले लेते है ना हम कभी कभी कुछ बातों को, नेचर के कोई इतना करीब हो तो खुश ही होगा, उसके साथ आई हुई मुसीबतों का बिना सोचे.

नाश्ता कर अब मैं आगे बढ़ी नमिक ला की ओर, बस अब कुछ 1 किलोमीटर ही होगा कि चढ़ते चढ़ते मुझे दूर कही पहाड़ पर कुछ भेड़ नज़र आए. साफ सुथरा चिकना सा भूरे रंग का पहाड़ और उसपे वो भेड. बड़ा ही खूबसूरत सा नज़ारा लग रहा था, तो ठहर गयी कुछ देर किनारे पर अपनी गाड़ी लगा उस नज़ारे का लुत्फ उठाने. लुत्फ उठाने के बाद पता नही था कि कसरत भी करनी पड़ेगी, किनारे लगी अपनी गाड़ी बस निकालने गयी कि गाड़ी नीचे रास्ते पर गिर पड़ी. सुबह की एक तो ठंड उसपे ऊंचाई, गाड़ी मुझसे उठने नही वाली ये समझ आ गया था. थोड़ी देर इधर उधर देखा और फिर दूर से एक लोकल टेम्पो आते हुए दिखा, पीछे कुछ सामान और सामने बीवी बैठी थी. मेरी गिरी हुई गाड़ी देखकर ही वो समझ गए और झट से आ कर मदद कर दी. मदद तो ठीक थी पर जिस जिंदादिली से मुस्कुराते हुए वो मेरी तरफ बड़े और वैसे ही मुस्कुराते हुए जो वो अपने टेम्पो तक वापस गए, मुझमे जैसे उन्होंने जोश भर दिया हो लगा. इसके बाद रुकते, गिरते, संभलते मैं पहुंची नमिक ला जिसकी ऊंचाई 12198 फ़ीट है.

यहा तक सही सलामत पहुंचने के लिए मैं धन्यवाद देना चाहुंगी की Border Roads Organisation (BRO) का, उन्होंने कश्मीर में ऐसे रास्ते बनाये की हम उसकी खूबसूरती को जी पा रहे है. नमिक ला आए हाए, वहां की हवा जादू वाली. आप गलती से ये ना समझ ले कि आपको जन्नत नसीब हो गयी है,उस हवा को महसुस कर के तो हवा का जादु कम करने के लिए आपको आस पास मिल जाऐंगे ऐसे लोग जो वहां बस सेल्फी खींचाने आते है. नामिक ला में कुछ समय बिताने के बाद मैं बढ़ी आगे की ओर.

37 किलोमीटर आगे था फोटू ला. श्रीनगर लेह हाईवे का सबसे ऊंचा पास, जिसकी ऊंचाई है 13479 फ़ीट. जितना मज़ा नमिक ला पर आया उस से दुगुना मज़ा यहां आ रहा था. पहले ही टेम्परेचर कम उसपे उस ऊंचाई पर चेहरे को चूमती वो ठंडी हवा. आपको जो हकीकत से दूर ले जाये. पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा था हर बोर्ड हर कार्नर पर बंदरो के जैसे चढ़कर सेल्फी खीचते लोग आपको वास्तविकता से ज्यादा दूर भटकने नही देंगे. वहां खड़े होकर आपको वो दुनिया कितनी ही अलग लग रही हो पर ये लोग अपना मेट्रो पोलियन शहर साथ लिए घूमते है. खैर,मेरा कोई हक़ नहीं बनता किसी के घूमने के तौर, तरीके, तह़जीब पर कमेंट करने का.

फोटू ला के बाद अब चढाई ख़तम हो गयी थी और राइड शुरू होने वाली थी बहुत ही खूबसूरत रास्ते ‘हेयरपिन बेंड’ से. सांप की तरह चलता ये रास्ता ले जाता है आपको लमायुरु और मून लैंड की तरफ. लमायुरु के लिए भले ही रास्ता नीचे की तरफ हो, पर लमायुरु की जगप्रसिद्ध मोनेस्ट्री ‘लमायुरु’, जो लद्दाख की पूरानी मोनस्टरीज़ में से एक है. उसके लिए चढाई करनी ही पड़ती है. सकरे से रास्ते से होते हुए आप पहुँचते है मोनेस्ट्री की तरफ. जब मैं गयी थी तब लमायुरू फेस्टिवल चल रहा था. रास्ते पर चहल पहल, अपने लद्दाखी ड्रेस में लोग, मस्ती करते बच्चे, बहुत ही रौनक थी. मास्क डांस शुरू था जब मैं पहुंची. कहा तो एक छत पर टूटी सी दीवार से चढ़कर वो देखा था, ताकि साफ़ साफ़ नज़र आ सके. अलग अलग मास्क, रंग बिरंगी कपडे और म्यूजिक. मोनेस्ट्री की अगर बात करे तो मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं आयी, कुछ कमी सी लग रही थी, मोनेस्ट्री में जाकर जो शांति मिलती है वो कही गुम सी थी.

मोनेस्ट्री के बाद अब समय था ‘मून लैंड’ अनुभव करने का. मैंने जब राइड का सोचा था तब इसके बारे में पता नही था. मैंने कम ही रिसर्च किया था लद्दाख के बारे में, क्युकी पहले से सब पता करके चले जाओ तो मुझे लगता है हम उस जगह को अपने से ज्यादा दुसरो की नज़र से देखने लगते है. जब राइड का सोचा था तब बस खारदुंगला मन में था और ये पता था की कश्मीर, लद्दाख, मनाली हाईवे बड़ा सुन्दर है. जब मून लैंड से गुजर रही थी तब उसकी खासियत नहीं पता थी पर जिस तरह रास्ते के दोनों तरफ स्पेस जैसे दिखने वाले हलके भूरे रंग के पहाड़ दिख रहे थे, 2 min रुक कर उनको निहारना और उनकी खूबसूरती को कैमरा में कैद करने से रोक पाना मुश्किल ही था.

मून लैंड पहाड़ो के साथ साथ मैं पहुंची ससपोल गांव, थकान हो रही थी और गाडी भी कुछ आवाज़ कर रही थी. इसलिए थोडा आराम करने का सोचा. रास्ते के किनारे गाडी लगायी और नहर के बाजू में आधे घंटे की नींद ली. ससपोल से लेह की दूरी थी 70 किलोमीटर.

गाडी शुरू की. 10 min गाडी चली होंगी की एक मोड़ पर गाडी अचानक बंद पड़ गयी. बहुत शुरू करने की कोशिश की पर फेल. जहा गाडी ख़राब हुई उसके सामने ही एक फैक्ट्री थी. वर्कर्स का शायद ब्रेक चल रहा था. बहार बैठे वो मेरी मेहनत देख रहे थे, फिर आये भी परेशानी पूछने पर कोई हल नहीं मिला. मैकेनिक लद्दाख में आपको हर जगह इतनी आसानी से नहीं मिलते. उस गांव में भी कोई मैकेनिक नही था. कारगिल से लेह की तरफ बढ़ते हुए काफी लोगों से जान पहचान हो गयी थी. कुछ उनकी उत्सुकता की वजह से की मैं मोपेड पर राइड कर रही हु, कुछ राइडर्स भी मिले थे, जिनसे उन रास्तो पर दोस्ती हो ही जाती है, क्युकी पता होता है की रास्ते मुश्किल है, हर जगह लोग मीले ये मुमकिन नहीं तो एक दूसरे के काम आना बिन कहे ही रूल सा बन जाता है. जब मैं रुकी हुई थी अपनी ख़राब गाडी के पास, तब पीछे मिले हुए काफी सारे लोग गुजरे और रुक कर पूछा भी की कोई मदद की जरुरत हो तो बताइये, पर मैंने ही मना कर दिया था. कह कर की “नहीं शायद गाडी बस गरम हो गयी है इसलिए शुरू नहीं हो रही. कुछ देर में हो जाएगी”.

 

हमे अपने शहर में कुछ अच्छे कुछ बुरे लोग मिलते है. पर जब आप सफर में होते हो तो आपको हर किसी में इंसानियत ही दिखेगी. आधा घंटा होने के बाद भी जब गाडी नहीं शुरू हुई, तब समझ गया था कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा. या तो यहाँ रुकने का या लेह पहुंचने का. कुछ मदद मिलती है क्या इस के लिए मैने नागपूर के एक फ्रेंड को फोन लगाया जो एयर फोर्स मे है. शुक्र इस बात का था की उस समय फोन में नेटवर्क था वरना अकसर लेह लद्दाख में नेटवर्क मिलना मुशकिल होता है. टहलते टहलते उनसे वहां कुछ अरेन्जमेंट हो सकती है क्या पुछ ही रही थी के रॉयल एनफील्ड की धड़ धड़ धड़ आवाज़ सुनाई दी. जैसे ही एनफील्ड मोड़ पर पहुंची,  देखा तो सामने अपने दो दोस्त.ये दोनो भी नागपुर से लद्दाख राईड पर निकले थे. प्लान हमने साथ ही बनाया था पर मेरी मोपेड होने की वजह से मैंने इनसे पहले सफर शुरु किया था. सफर मे बस एक बार हम सोनमर्ग मे मिले थे. मुझे देखने के बाद टेंशन तो नही, उल्टा हम तिनो जोर जोर से हसे. जब हसना ख़तम हुआ. फिर सोचा अब क्या करना है. मेरे गाडी में जो रस्सी थी उस से मेरी मोपेड को उनकी एनफील्ड से बांधकर खींचने का प्लान बना. गाड़ी मे एक रस्सी हमेशा साथ रखने का सबक भी मुझे रास्तो ने ही सीखाया था.जब कन्याकुमारी से वापस आते हुए गाडी खराब हो गयी थी और तब भी गाडी बाँधकर खींचि थी. उन रास्तो पर ही दोस्ती हुई थी एयर फोर्स वाले दोस्त से जिनसे आज बात हो रही थी.

मेरी मोपेड को एनफील्ड से बांधकर ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया. परिस्थीती गंभीर थी पर हमे मज़ा आ रहा था. मेरे दोस्तो को मुझसे थोड़ा ज्यादा क्योंकि जिन्दगी भर अब वो मेरी इ बात पर मज़ा ले सकते थे. हमने ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया था की रस्सी टूटी. फिर जितनी रस्सी बाकी थी उस से खींचा, पर वो भी 5 min में दम तोड़ गयी.

रस्सी तुटी अब क्या? तो सोचा मेरी मोपेड को ट्रक में चढ़ाया जाए और लेह ले जाया जाए. ट्रक रोका भी. जब हम ट्रक वाले से बात कर रहे थे, तभी 10-12 राइडर्स जो लेह से श्रीनगर की तरफ जा रहे थे. हमे बिच रास्ते में ऐसे रूक कर ट्रक वाले से बात करते हुए देख हमारी परेशानी पूछने आ गए. अब 3 की जगह हम 15 लोग थे. गाडी ट्रक में चढ़ाने के लिए तैयार भी थे, पर मैंने यूँही सोचा की एक बार और किक मार के गाडी स्टार्ट करने की कोशिश की जाए. किस्मत देखिये गाडी शुरू हो गयी. क्या ख़ुशी मेरे चेहरे पर और पहला स्टेटमेन्ट जो मुँह से निकला वो था मुझे पता था, मेरी गाडी धोका दे ही नहीं सकती. बस थोड़ी गरम हो गयी होगी इसलिए परेशान किया, अब ये जाएगी लेह”. सभी खुश हो गए वो राइडर्स का ग्रुप चला गया, ट्रक जो गाडी ले जाने वाला था वो भी चला गया अब बचे थे हम 3, बस. हमने भी निकलने के लिए गाडी स्टार्ट की और मेरी मोपेड फिर बंद पड़ गयी.

IMAG0976

अब फिर एक ट्रक को रोका, दोनों दोस्तों ने गाडी चढ़ाई. ट्रक में गाडी को बाँधा ताकि गिरे नहीं और मैं भी ट्रक में चढ़ी. कुछ ऐसे पहुंचे हम, मैं और मेरी मोपेड लेह. पहुंच तो गयी थी पर थोड़ा दुःख हो रहा था की वो 70 किलोमीटर का सफर मैं अपनी मोपेड से नहीं कर पायी, लेह के एंट्री गेट से अपनी वेगो (मोपेड ) नहीं ला पायी पर कहते है ना अंत भला तो सब भला. ट्रक वाले अंकल ने मेरी मोपेड़ गैरेज पर छोडी,जो उनके ही पहचान मे था, और जो अंकल ट्रक वाले अंकल के साथ सामने सीट पर बैठकर आए थे उन्होने मुझे अपने दोस्तो तक पहुचाने मे मदद की.

Julley 😊

एक अकेली लड़की और ज़ोजि ला कारगिल का सफर

कही किसी मूवी में डायलॉग सुना था “ज़िन्दगी में कुछ बन ना हो, कुछ हासिल करना हो, कुछ जितना हो तो अपने दिल की सुनो”. ऐसे ही दिल की सुनके शुरू किया था सफर जम्मू कश्मीर का, पर बिना जोखिम लिए कहा कुछ हासिल होता है. दिल्ली से सोनमर्ग का सफर तो कर लिया था आराम से, अगर 10 15 km के ख़राब रास्तो की बात छोड़ दे तो बाकी रस्ते अच्छे ही थे और पहाड़ो की उचाई भी कम. अभी तक ऐसा रास्ता नहीं पार किया था जो सबसे खतरनाक रास्तो में से एक माना जाता है पर आज 30/06/2016 इस जोखिम से लड़कर लद्दाख में प्रवेश करना था .

एक दिन पहले सोचा था सुबह 6 बजे सोनमर्ग से निकलकर राइड शुरू की जाएगी पर ऐसा होना कहा था जब रात में कमीने दोस्त आपके साथ हो. मुझे टेंशन हो रही थी अगले दिन सुबह राइड की पर हम ज्यादा बिजी थे “सौ तरह के दर्द ले लू इश्क़ का दर्द क्या है,तू कहे तो जान दे दू कहने में हर्ज़ क्या है“,गाना मैं सही गा रही हु या नहीं ये पता करने में. मैं कोशिश कर रही थी कमीनो को मनाने की यार सामान गाडी पर बांध देना और ये मशगूल थे बहाने में “मैं नहीं उठ रहा इतनी सुबह मदद से ज्यादा नींद प्यारी है मुझे, ओये तू मदद कर देना सुबह स्नेहल को“. अभी तक रकसैक सामने वेगो के लेग स्पेस पर ही रख कर राइड किया था पर अब से 10 ltr की पेट्रोल कैन भी साथ में लेकर चलना था, साथ ही गाडी का बैलेंस भी रखना था. आगे पहाड़ ऊँचे होने वाले थे और रास्ते बदतर,तो सबसे सही ऑप्शन था रकसैक को पिछली सीट पर बांधना,पेट्रोल कैन और एक छोटी बैग जिसमे रास्ते के लिए जरुरत का सामान हो आगे रखना, पैर रखने को भी ज्यादा जगह मिल जाए. आज तक कभी बंजी रोप्स इस्तेमाल नहीं किये थे तो मदद चाहिए थी. रात की बहस और मस्ती के बाद सुबह ही 6 बजे हुई,दोस्त भी उठ चुके थे उन्होंने सामान बांध कर दिया वेगो पर, थोड़ा मुश्किल हो रहा था पर इंजीनियर दोस्त होने के बाद टेंशन ही क्या,कोई ना कोई जुगाड़ हो ही जाता है. सब निपटा कर 7 बजे करीब शुरू हुयी राइड.

23032771_1904024619611800_379464328695892636_n

23167871_1904023876278541_2624456857676756347_n

सोनमर्ग खत्म हुआ नहीं की शुरू हुई चढाई सबसे खतरनाक माने जाने वाले रास्ते में से एक रास्ता ज़ोजि ला की. चढाई शुरू हुई नहीं कि धूल मिट्टी स्वागत में तैयार मिले और रास्ता आधी लेन से भी कम. यही पे ट्रक चलनी थी, यही पे बाइक्स, यही पे कार भी वो भी दोनों तरफ से. पहाड़ के साथ चलते इस रास्ते पर गलती की गुंजाईश रखी नहीं जा सकती थी दूसरी तरफ खाई जो थी.वेगो और मैं पहली बार 3500 mtr की उचाई चढ़ने वाले थे.ये पास लद्दाख को श्रीनगर से जोड़ता है जो 6 महीना बर्फ जमा होने की वजह से बंद रहता है.लद्दाख का संपर्क टूट जाता है बाकी शहरों से यातायात बंद होने से और ये महीने बड़ी मुश्किल से भरे होते है यहां के लोगों के लिए . लोगो ने पहले ही काफी कुछ बता रखा था मुझे जोजी ला के बारे में तो मैं थोड़ा ज्यादा सावधान होकर ही वेगो चला रही थी. रास्ता छोटा होने की वजह से रुकने की ज्यादा जगह नहीं थी इसलिए जहा भी जगह दिखती की वेगो रोक के आराम किया जा सके तो गाडी रोक देती. ऐसी ही एक जगह मिली आधे घंटे के बाद ही. चढाई जितनी मुश्किल नहीं लग रही थी उतनी ज्यादा मुश्किल बन रही थी धूल. रास्ते काफी ख़राब थे पर इन ख़राब रास्तो का दर्द मिटाने के लिए थे कश्मीर के सुन्दर नज़ारे. थोड़े आराम के बाद शुरू हुआ आगे का सफर, अभी तक किसी बड़ी गाडी का सामना नहीं हुआ था . सफर के शुरुआत में सामने दिख रहे थे कुछ बर्फ से कुछ पेड़ से ढके पहाड़, दाए थे बंजर पहाड़ और बाएं तरफ खाई जहा दिख रहे थे रंग बिरंगी घर और बहती नदी. सफर जैसे आगे बढ़ा सामना हुआ बड़ी गाड़ियों से. यहाँ लगा था थोड़ी मुश्किल होगी पर उनकी समझदारी ने मेरी मदद कर दी सामने से आने वाले ट्रक जैसे मेरी गाडी देखते वो पहले मुझे जाने देते और फिर खुद आगे बढ़ते, उनकी मदद से तकलीफ कुछ कम हुयी. अभी तक तो रास्ते पर बस धूल पत्थर से मुलाकात हुई थी पर अब समय था पानी से सामना करने का, पहाड़ की बर्फ पिघलने से रास्ते पर ठंडा पानी जमा हो रहा था,पानी के बिच बड़े बड़े पत्थर पहली बार ही वेगो को सामना करना था वॉटर क्रॉसिंग का. पानी के पहले ही थोड़ी देर अपनी वेगो रोकी देखने के लिए की कहा से पार किया जाये और शंका भी थी बिना गिरे पार होगा या नहीं. पर बहार से जितना मुश्किल लग रहा था उतनी मुश्किल पार करते हुए नहीं हुई,शायद सभी मुश्किल के साथ कुछ ऐसा ही होता है जब तक उस से लड़ते नहीं तभी तक वो मुश्किल मुश्किल लगती है. पार करने के बाद ही खड़ी थी एक एवेंजर जिस पर कश्मीर का नंबर प्लेट था और २ नौजवान उस पर सवार थे. मैं जैसे ही पार पहुंची उन्होंने पूछ लिया आप इस गाडी से कहा जा रहे है? जब बताया उन्हें ” हम तो श्रीनगर से आये है वो भी एवेंजर पे फिर भी हमारे लिए मुश्किल हो रहा है,हम तो बस अब यही से वापस जायेंगे और आप इसपे इतना दूर जा रही है, All The Best“. बदलते नज़रो के साथ बदल रहा था सफर भी कुछ मुश्किल कुछ आसान, कुछ और छोटी सड़के, कही पे चलता सड़क का काम, कभी दिखती आर्मी की गाड़िया और इन्ही सब के मजे लेते पहुंची जीरो पॉइंट जहा थोड़ी देर रुक कर आराम करने का सोचा. मुश्किलों से भरा ज़ोजि ला अब खत्म होने वाला था. जितना मुझे डराया गया था ज़ोजि ला के नाम पर उतना खतरनाक मुझे लगा नहीं कुछ कारण इसके ये थे की बर्फ बहुत कम थी, बारिश नहीं हुई थी और लोगो का सुनकर मैंने खुदको बुरे से बुरे के लिए तैयार रखा था. हां पर उसे पार करके बड़ी राहत महसूस हो रही थी.

23032782_1904024099611852_1923824897501280182_n

23231292_1904025539611708_1882691495093440154_n

जीरो पॉइंट पर मैंने गाडी रोकी ही थी की एक SUV भी आकर रुकी. मुझे देखकर वो थोड़े चौके, इन लोगो से एक दिन पहले रात को मिल चुकी थी तब बस पति पत्नी दोनों से मुलकात हुई थी आज पूरा परिवार साथ था.पुणे से आये थे ये लोग इसलिए एक मराठी मुलगी से मिलकर इन्हे और थोड़ी ज्यादा ख़ुशी हो रही थी “एक अकेली लड़की” वो भी मोपेड पे इतनी दूर.उन्होंने मेरे साथ तस्वीर खींचने की इच्छा जताई, इतने सभ्य तरीके से उन्होंने पूछा था की मना करना लाजमी ना था पर पता नहीं था “Can I click a picture with you” आगे पुरे सफर में सुन ना पड़ेगा. आगे बढ़कर मैं फिर लद्दाख में वेलकम करते हुए बोर्ड के पास रुकी. वहा फिर मिला एक परिवार जिन्हे वेगो पर अकेले वहा पहुंचने पर आश्चर्य और ख़ुशी थी, पर न तो गाडी की इज्जत थी ना मेरे सामान की. उन्होंने एक बार वेगो पर तस्वीर खींचने और एक राउंड लेने की इच्छा जताई उन्हें मैंने हां कहा. पहले उन्होंने मेरा हेलमेट गिराया फिर गाडी पर सामने रखे हुए ग्लव्स, बोहोत गुस्सा आ रहा था. आगे से अब ये पता था की कही भी रुक जाओ मुझे शान्ति से समय नहीं बिताने मिलेगा. इस फॅमिली से मिलकर जो गुस्सा था सोचा आगे जाकर किसी ऐसी जगह जहा आस पास कोई ना हो वहा बिताकर कम किया जाए. ऐसी ही एक जगह पर वेगो रोकी और बस पीछे से ही एक गाडी आयी पठानकोट से रोड ट्रिप पर निकले 4 अंकल थे उन्होंने आकर बड़े प्यार से बात की ” बेटा हम लोग बस आगे पीछे ही चल रहे थे, आपको इस मोपेड पर देखकर ही थोड़ा झटका लगा, बड़ी गाडी में होकर भी हमे थोड़ी परेशानी हो रही है, पहले आप से मौका नहीं मिला बात करने का अभी आप यहाँ रुके हुए दिखे तो लगा कही कोई परेशानी तो नहीं पूछ लू , बेटा बहुत अच्छा लगा आपको देखकर कैसे आ गए आप इतना दूर, हम तो डरते है अपनी बेटियों को शहर में ही कही बहार अकेला भेजने में पर अब आपको देखकर हमे हिम्मत मिली है हम भी अपनी लड़कियों को अब बहार निकलने देंगे“. जितना गुस्सा था सारा शांत हो गया. अच्छा लग रहा था मेरी एक राइड किसी की सोच बदल रही है. थोड़ी बात करके वो निकले और कुछ ही देर में मैं भी आगे निकली.

23032556_1904024329611829_5687162858115698982_n23031247_1904024589611803_3162547048987345713_n

मैं बढ़ रही थी अब द्रास की और,और रास्ते ख़राब ही होते जा रहे थे.धूल मिट्टी अलग परेशान कर रही थी आधे पौन घण्टे के ऊपर गाडी चलाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए रुक रुक कर गाडी चलानी पड़ रही थी. ज़ोजि ला से द्रास करीब 40 km ही है पर रास्ते ख़राब होने से सफर का समय ज्यादा हो गया था. जब थक जाती तो साथ चलती द्रास नदी के साथ समय बिताने बैठ जाती. वहा की खूबसूरती को शब्दों में ढालना मेरे बस की बात नहीं इलसिए मैं ज्यादा मेरे अनुभवों की ही बात करुँगी. नदी किनारे मैं रुकी और 5 min में मेरे साथ रुकी 1 मारुती और 1 SUV. SUV पुणे की थी मेरे वेगो का नंबर प्लेट भी पुणे का, तो पहली ख़ुशी वही की “आपली महाराष्ट्रियन मुलगी” फिर उन्होंने काफी डिटेल्स ली. आपने वेगो को बताया है क्या, स्पॉन्सरशिप लेनी चाहिए थी, पर ये सारी चीज़ो से मैं थोड़ा परे थी तो उन्होंने खुद ही कहा हम बात करके देखते है, उन्हें मेल करते है और जो सबसे बड़ी बात उन्होंने कही वो थी “आपसे ज्यादा तारीफ़ आपके घरवालों की होनी चाहिए सही हिम्मत तो उन्होंने की है आपको यहाँ भेजकर“.ये मेरे लिए बहुत गर्व की बात थी. दूसरी गाडी जो मारुती रुकी थी उसमे 3 दोस्त इंदौर से चले आ रहे थे पर नज़ारो से ज्यादा वो कांच बंद करके AC की हवा खाने में खुश थे, स्किन ख़राब होने का डर उन्हें ज्यादा था, उन्होंने भी कुछ साथ में तस्वीरें ली.

23167531_1904024002945195_6458584416474602318_n

मेरा वहा कुछ देर और रुकने का मन हुआ,आते जाते बहुत सारे बाइकर्स दिखे कुछ अकेले कुछ ग्रुप में. उन्ही आते जाते बाइकर्स में से दो बाइकर्स पास आकर रुके “All Well“, बहुत अच्छा लग रहा था उनसे बात कर कर ,वो Royal Enfield लेकर आये थे मेरा वेगो का एक्सपीरियंस पूछा और सबसे ज्यादा ख़ुशी तो इसलिए हुई की आगे के रास्ते का पूरा पूरा हाल उन्होंने बता दिया, “द्रास कुछ ही दूर है और वहा से रास्ते अच्छे हो जायेंगे” सुनकर ही अलग एनर्जी आ गयी, उनमे से एक राइडर साहिल आनंद 8 9 बार लद्दाख जा चूका था उसे हर कोने हर चप्पे की खबर थी. उनके निकलने के थोड़ी देर बाद ही मैं भी निकली और पहुंची द्रास.

23213076_1904044532943142_913901474954217224_o

दुनिया की सबसे ठंडी जगह में दूसरे नंबर पर है द्रास और यहाँ पर तोलोलिंग परबत के निचे बसा 1999 के भारत पाकिस्तान लड़ाई में शहीद हुए हमारे आर्मी जवानो की याद में बना कारगिल वॉर मेमोरियल. तीनो तरफ पर्वतो से घिरा ये मेमोरियल. मेमोरियल में गाडी पार्क करके आप सीधा पहुंचते है विजय पथ पर, 1999 के विजय ऑपरेशन पर से दिया गया ये नाम. विजय पथ के दोनों तरफ आपको लहराते मिलेगा हमारा तिरंगा.विजय पथ आपको ले चलता है जवानो की समाधी के पास वहा श्रद्धा में जलती ज्योत. वहा पे खड़े हमारी आर्मी के जवान बयां करते है दास्ताँ ऐ कारगिल, सुनाते है हमें हमारे जवानो की बहादुरी, साहस, शौर्य,त्याग और जित की कहानी जो आपके रोंगटे खड़े कर दे और गर्व से भर दे. मेमोरियल की एक दिवार पर लगे बोर्ड पर लिखे हुए है शहीद हुए जवानो के नाम और बिच में शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी हुई कविता में से चार लाइन “शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालो का बस यही बाकी निशान होगा”.क्या होंगे वो लोग जो हमे बचाने के लिए अपनी जान गवा बैठे और हम है की अपने ही लोगो के दुश्मन बने बैठे है. मेमोरियल पर आपको देखने मिलेंगे कब्जे में किये हुए पाकिस्तान के बंकर्स पोस्ट्स भी. काफी समय वाहा बिताकर निकली मैं आर्मी के मैसेज “When you go home, tell them of us and say, for your tomorrow, we gave our today” के साथ कारगिल की ओर.

23132029_1904024706278458_6198436079700282460_n

23031169_1904024942945101_7156857267948630944_n

द्रास से कारगिल कुछ 60 km है और रास्ते भी ख़राब नहीं. अब सफर में तकलीफे कम थी. अभी तक नदी दाई और थी अब बायीं. शुब्र सफ़ेद नदी, रंग बदलते पहाड़, देखते देखते मैं पहुंची कारगिल. यहाँ पहाड़ हरे भरे नहीं बंजर थे पर उतने ही खूबसूरत. लद्दाख की खासियत ये की क्षेत्र के हिसाब से आपको अलग अलग तरीके के पहाड़ देखने मिलेंगे.कारगिल लद्दाख का लेह के बाद दूसरा बड़ा शहर है. कारगिल में समझ नहीं आ रहा था कौनसा होटल बुक किया जाए तभी दो बाइकर्स दिखे. उत्तराखंड से थे दोनों, मुझे लगा ये यही रुके हुए है तो इन्ही से पूछ लिया जाए, पर वो कारगिल में बस थोड़ी देर के लिए ही थे और आगे लेह जाने वाले थे फिर भी होटल ढूंढ़ने में उन्होंने मेरी मदद की और साथ ही पैसे भी कम करवाए. होटल की देख रेख थी तोशी के पास बड़े ही खुशमिजाज थे वो, पहले गाडी से सामान निकालने में मदद की, रूम तक सामान पहुंचाया और कारगिल में देखने के लिए जगह बताई. होटल के सामने ही उनकी छोटी सी दूकान भी थी. सामान रखके मैंने पहले कारगिल देखने का सोचा और तोशी के बताये मुताबिक निकली पाकिस्तान देखने जो की वहा से 10 15 km की दुरी पे था . रास्ता उन्होंने समझा दिया था यहाँ भी पहाड़ चढ़ना था और रास्ता भी सीधा नहीं तो घाटी थी और अब शुब्र सफ़ेद नहीं बल्कि बह रही थी मैली सी सुरु नदी जो कारगिल से होते हुए जा रही थी पाकिस्तान . मज़ा बड़ा आ रहा था ये पहाड़ चढ़ने में, अभी तक का सबसे मजेदार पहाड़ लग रहा था ये,मेरी वेगो के अलावा रास्ते पर और कोई गाडी नहीं . चढ़ते चढ़ते पहुंची मैं एक पॉइंट जहा पर छोटी सी पान की दूकान जैसी दूकान थी और उसके बाजू में छाया में बैठे कुछ लोग. कुछ पर्यटक भी दिख रहे थे. वेगो साइड में लगाकर पूछा यहाँ से पाकिस्तान दीखता है?, बोले हां मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कुछ भी पाकिस्तान कैसे दिखेगा. उन्होंने थोड़ा समझाया और मैं मानी दूरबीन से देखने के लिए .जिस देश जाने की मेरी दिल्ली तमन्ना है वो फ़िलहाल दूरबीन से देखने मिल रहा था. उन पहाड़ो में जादू सा था, बड़ी ख़ुशी और इतना लम्बा सफर तय करने के बाद भी फ्रेश लग रहा था. वो कहते है ना मन प्रसन्न हो तो चेहरे पर दीखता है. उसी ख़ुशी में सोचा यहाँ से और ऊपर चढ़ा जाए चढ़ते चढ़ते पहुंची वहां के आखरी गांव हुंडेरमान.

23032568_1904023816278547_8779019885548279850_n

उस गाँव में जाने के पहले थी हमारे मराठा बटालियन की चेक पोस्ट बड़ी रिक्वेस्ट करनी पड़ी उन्हें अंदर जाने की इजाजत के लिए ” अंदर हम जाने नहीं देते है हर किसीको पर आप को इजाजत दे रहा हु” वो खुद आर्मी में ना जाने कितने जोखिम उठाते होंगे पर हैरान हो रहे थे मेरे इतने दूर आने पर. बड़ी बाते भी हुयी उनसे, परिवार के बारे में, उनके आर्मी में शामिल होने के बारे में,फिर अंदर गांव पहुंची तो एक अलग कहानी इंतज़ार कर रही थी. गांव देखकर लौटते हुए रास्ते किनारे कुछ लोग बैठे थे वेगो क्युकी स्लो थी तो उन्होंने यूही पूछ लिया “देख आये बेटा” फिर कुछ बाते हुयी और फिर उन्होंने चाय का न्योता दिया. अंकल दौड़कर घर गए और नमकीन चाय (अंकल और नमकीन चाय की पूरी कहानी इस लिंक पर नमकीन चाय मीठी याद) के साथ मेरे लिए रोटी भी ले आये मैं बैठ गयी उन्ही के साथ रास्ते के किनारे एक पत्थर लेकर. नमकीन चाय इसके पहले कभी नहीं पी थी जितनी वो दिखने में मेरे लिए अजीब थी उतनी ही अजीब पिने में थी पर वो इतने प्यार से लाये थे तो पीना तो पूरा था ही. खूब बाते हुयी वहां की स्कूल के बारे में मेरे बारे में और फिर उन्होंने बहुत ही बढ़ी बात कही “बेटा आप पढ़ी लिखी हो ना इसलिए इतनी हिम्मत कर पायी” मैंने कभी ये सोचा भी नहीं था की पढाई है जो हिम्मत भी देती है. शाम हो रही थी इसलिए वहां से निकलना पड़ा वरना बाते और भी थी.

23167803_1904023919611870_4668522353312332681_n

नमकीन चाय

गाँव से निकलकर पहुंची मैं चेक पोस्ट और वहां अपने आर्मी जवान से कुछ और बाते की उन्होंने पहाड़ पे बसी हमारी आर्मी और दूसरे पहाड़ पे बसे पाकिस्तान आर्मी कैंप दिखाया और कौनसा पहाड़ चढ़कर उन तक सामान पहुंचाया जाता है वो भी बताया.1 घंटे में वो इतना मुश्किल पहाड़ चढ़ जाते है सुनकर तो धक्का ही लग गया.जब मैंने इच्छा जताई ऊपर कैंप जाने की पहाड़ चढ़कर तो जवाब मिला “मैडम आप जब तक चढ़ना चालू करोगे तब तक दुश्मन की गोलिया आपकी जान ले चुकी होगी“. ये अधूरा सपना भी करेंगे कभी पूरा .करीब 7 बजे मैं पहुंची वापस होटल. सबसे पहले तोशीब से खाने का पूछा तो न्योता मिला मुझे इफ्तारी का (तोशीब और इफ्तारी की पूरी कहानी इस लिंक पर पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी). इस से पहले मैंने कभी इफ्तारी नहीं खायी थी. जब तक मैं खाना खाने निचे नहीं आयी तोशीब ने भी खाना नहीं खाया था रोज़ा होते हुए भी. दूकान पर ही उसने निचे चटाई डाल सामने जिस थैले में खाना आया था उस पर रोटियां रखी और सब्जिया कटोरी में ही आयी थी. बड़ा स्वादिष्ट था इफ्तार का खाना और उस से कही ज्यादा मजेदार था चश्मे का पानी. पहले तो समझा ही नहीं की ये चश्मे का पानी क्या होता है फिर तोशीब ने अपने दोस्त की मदद से समझाया की चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. बड़ा अच्छा लगा बिना सजी धजी इस इफ्तार पार्टी में इफ्तारी खाने का. याद रखने वाला ऐसा था ये दिन अब उस यादगार दिन की याद लेकर समय था कल सुबह की तैयारी के लिए एक अच्छी नींद लेने का.

23032621_1904024422945153_2269028586152730537_n

इफ्तारी

जिद्द हिम्मत और दुआ

पटनीटॉप से सोनमर्ग की राइड के बाद अब समय था आराम का. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में रहने के कई विकल्प मौजूद है. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में पहुँचते ही आपके बाए और देखने मिलेंगे होटल्स, रेस्तरां और दुकाने और दाहिनी ओर GOVT रेस्ट हाउस, GOVT द्वारा संचालित कुछ दुकाने, बैंक और एटीएम.मैंने होटल्स की लाइन में से एक होटल में अपने लिए कमरा सुरक्षित किया. कमरा बहुत ही छोटा सा, डबल बेड के बाद बस चलने भर की जगह बाकी रही, पर रूम के बहार के मंज़र की बात की जाए तो कवी को कविता मिल जाये और चित्रकार को चित्र. जैसे ही कमरे की खिड़की खुली सामने थे पहाड़ जो अँधेरे से ढके जा चुके थे,हरा भरा मैदान, मैदान में कुछ तम्बू, लकड़ियों पर हलकी से जलती आग और भूरे रंग के घोड़े. थोड़ा आराम और फ्रेश होने के बाद अब समय था पेट पूजा और कुछ जरुरी सामान लेने का.

होटल से निकलते ही बिल्कुल बगल में ही दिखाई दी ऊनि कपड़ो की दूकान.पर्यटक स्थलों पर आम तौर पर ये धारणा होती है की खरीदारी थोड़ी महंगी होगी, पर सोनमर्ग में उच्च दर्जे के ऊनि कपडे मिल जाते है बिल्कुल वाजिब दाम में. दस्ताने, मोज़े, टोपी खरीदने के बाद पता करना था मुझे मैकेनिक के बारे में. मार्केट के आखरी छोर में एक दूकान पर पूछा तो पता चला अभी तो कोई नहीं मिलेगा आप सुबह पता कर लीजियेगा, अगर कोई मोपेड के जानकार हो तो. वेगो मुझे श्रीनगर में ही दिखाने की इच्छा थी पर क्युकी इतना समय मेरे पास था नहीं तो आगे निकल आयी. खाना खाने मैं पैदल ही निकली पर जब दूकान में मोपेड का जिक्र निकला तो दूकान में बैठे भैया की भी उत्सुकता बढ़ गयी. वेगो से आयी हु, अकेली आयी हु,लद्दाख जाना है सब जानकर वो थोड़ा हैरान भी हुए और खुश भी “यहाँ तो बाइकर्स आते रहते है पर मोपेड से इतनी दूर अकेले हमने नहीं देखा किसीको“. मैकेनिक तो अगली सुबह मिलना था अब बस खाना बाकि था. उनसे अच्छे होटल के बारे में पूछा तो वह अपने ही होटल ले गए जो दूकान के बिलकुल बाजू में था, रहने का इंतज़ाम भी था वहा उन्होंने उसके लिए भी पूछा पर मेरा रूम मैं पहले ही बुक कर चुकी थी. खाने में उन्होंने मुझे कश्मीरी स्पेशल वाज़वान खिलाया. खाते खाते बातचीत का सिलसिला जारी था और तभी मेरे मन में थोड़ा डर और थोड़ी उत्सुकता बनाये जो सवाल था मैंने पूछ लिया “कैसा है ज़ोजि ला,मोपेड जा पायेगी मेरी वहा. बहुत मुश्किल होगा क्या?“. ज़ोजि ला के बारे में मैंने बस सुन रखा था और कुछ अच्छा तो नहीं ही सुना था. पटनीटॉप में जब विशाल से मिली थी तब उसने भी अपनी चिंता जाहिर की थी “कैसे करेगी तू  ज़ोजि ला वेगो से, अच्छी अच्छी गाड़िया फेल होती है, इसका तो टार्क भी कम है “.ऐसा ही कुछ सभी ने कहा था इसलिए फोटो देखने की हिम्मत नहीं हुई. लग रहा था अभी पता नहीं तो ही चिंता खाये जा रही है फोटो में अगर देख लू तो कही आत्मविश्वास पे डर हावी ना हो जाए.

खतरनाक रास्तो में से एक है ज़ोजि ला और लद्दाख के लिए प्रवेश द्वार. लद्दाख की असली चढाई भी शुरू यही से होती है. होटल में सवाल पूछने का एक कारन ये भी था की जो मैं सुन ना चाहती हु वो मन को तसल्ली और हिम्मत देने वाला जवाब मिल जाये और वही हुआ भी ” मैडम आप इतनी दूर आयी है तो इंशाल्लाह आगे भी जरूर जाएँगी, आप कर लोगे ज़ोजि ला पार डरिये मत, हमारा तो रोज़ का आना जाना है यकीन मानिये कुछ नहीं होगा“. खाना ख़तम कर मैं दुआओ के साथ रूम पर लौटी. दिमाग तो अटका हुआ था ज़ोजि ला पर और किस्मत से बीएसएनएल चालू था तो अपने मेंटर को आखिर मैसेज कर ही दिया , ज़ोजि ला क्यों इतना मुश्किल माना जाता है?. जवाब में एक फोटो आयी, वो फोटो डाउनलोड करने से खुदको रोका और सोने चली गयी पर ” मनचला मन चला तेरी ओर” ओर फोटो देख ही ली, देखकर भी उस पार तो जाना ही था पर अब डर अच्छे से मन में घर कर गया था.दिमाग दिल की अपनी अलग लड़ाई शुरू हो चुकी थी ओर इस लड़ाई में नींद कब आयी समझा ही नहीं.

29th June 2016- सुबह कुछ आराम से ही हुई. उठते ही पहले खिड़की के बहार का नज़ारा देखा सुबह की हलकी धुप उजाले में साफ़ दीखते हरे भरे पहाड़, हरा भरा मैदान ओर मैदान में घोड़े.३ दिन से लगातार वेगो चलाने के बाद आज सोनमर्ग में ही रुकने का फैसला किया था .तैयार होकर पहला काम किया मैकेनिक के पास वेगो ले जाने का. मार्केट के आखरी छोर पर ही थी उनकी दुकाने. जब पहले मैकेनिक के पास गयी तो जवाब आया “बेटा मोपेड की तो जानकारी कुछ कम ही है यहाँ बस ट्रक का काम करना ही जानते है”. मुझे निराशा हो उसके पहले वहा खड़े ट्रक ड्राइवर अंकल बोल पड़े बेटा उस दूसरी दुकान में देख लो उसे थोड़ी जानकारी है इन गाड़ियों की. नाम लेकर उस दूसरे मैकेनिक को आवाज़ दी ओर मुझे वहा जाने के लिए कह दिया. मैकेनिक वहा किसी काम में व्यस्त थे पर फिर एक और ट्रक ड्राइवर अंकल ने उन्हें पहले मेरा काम करने के लिए कहा. मैकेनिक को मैंने बताया ज़ोजि ला जाना है इस गाडी से, आप देखिये कोई परेशानी तो नहीं होगी, जाएगी क्या ये ज़ोजि ला.वो वेगो स्टार्ट कर उसे थोड़ा घुमा कर वापस आये ” क्यों नहीं जाएगी बिलकुल जाएगी ये गाडी  बिल्कुल ठीक है“. आस पास काफी ट्रक ड्राइवर्स थे उनमे से भी किसीने कहा ” बेटा आराम से जा, हिम्मत ऐ मर्दा तो मदद ऐ खुदा“. दिन मतलब अच्छा गुजरना था, मैकेनिक ट्रक ड्राइवर्स इन्होने बोल दिया अब क्या डरना था. अब पेट्रोल का इंतज़ाम करना था, दूकान से कैन लेकर मैं पोहोची १३ कम दूर श्रीनगर हाईवे पर पेट्रोल पंप. वह ख़तम कर होटल रूम भी बदला शाम को मेरे दो दोस्त जो आने वाले थे. सब काम ख़तम कर अब समय था सोनमर्ग की वादियों को जीने का.

22852234_1896618137019115_7326862212487674232_n

वेगो लेकर मैं बढ़ी थाजीवास ग्लेशियर की तरफ, ३ कम की राइड फिर आपको ले चलती है खुशनुमा वादिया, खुला आसमान और आपको मोहब्बत से भर देने वाले नज़ारो में . पर बदकिस्मती देखिये की खूबसूरती के बिच भी नफरत आखिर जगह बना ही रही है.

22788954_1896633897017539_7792971243345919960_n
राइड करके मैं पहुंची जहा से शुरुआत होती है glaciers के तरफ चढाई की. वही कुछ छोटी चाय की दुकाने है पार्किंग और गाइड और घोड़े किराये पर ले सकते है. घोड़ो के लिए अलग से पगडण्डी बनी हुयी है पर अगर आप खुद चलकर जाना चाहा रहे है तो वो मैदान, वो वादी पूरी आपकी. और जब आप सफ़ेद पानी की बहती धारा में अपने पैर डालकर बैठ सकते हो ,उसकी ठंडक महसूस कर सकते हो, ठंडी बहती हवा को फुर्सत में अपने गालो को चूमने दे सकते हो,नंगे पैरो से जन्नत महसूस कर सकते हो, जब मन चाहे बर्फ से ढके पहाड़ और जब मन चाहे पलटकर दूसरी और हरी भरी घाटियों में बहता पानी, छोटे छोटे घर, दुकाने देख सकते हो तो क्यों भला घोड़ी चढ़ी जाए और बेज़ुबान जानवर को सताया जाए. मैंने फैसला किया पैदल चलने का और साथ ही हो लिया मेरे साथ एक १८ साल का बच्चा,उम्र जैसी उसने बताई थी हो सकता है कम ही हो, स्लेड्जिंग बोर्ड साथ लेकर मुझे मनाते हुए की दीदी ज्यादा पैसे नहीं लूंगा आप ही देख लो कितना दूर है. आपको स्लेड्जिंग भी करवा दूंगा मैं खुद ही . हां मैंने कहा नहीं था पर साथ साथ हम पोहोच गए स्लेड्जिंग पॉइंट.

22780425_1896618273685768_8105659817452817036_n

22861441_1896635777017351_7291117310689761190_o
स्लेड्जिंग करने में तो मुझे दिलचस्पी नहीं आयी पर बर्फीले पहाड़ की चोटी तक पहुंचने की इच्छा जाग उठी. बच्चे का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने मुझे गम बूट्स दिलवाये, स्लेड्जिंग बोर्ड कही छुपा कर रख दिया और हो लिया मेरे साथ “दीदी पर मैं ज्यादा दूर तक नहीं आऊंगा बस आधे रस्ते वहा से आप चली जाना,मेरा दिन वरना पूरा आप ही के साथ चला जायेगा“. तो चल पड़े हम साथ साथ, आधे रस्ते जहा तक तय हुआ था वो मेरे साथ आया फिर रुक गया “दीदी अब आप ही जाओ आगे”.

22851900_1896618247019104_8878099479279569087_n

 

 

22730271_1896633923684203_9067112355167003825_n

 

पहाड़ में पूरी बर्फ, कुछ छोटे छोटे पत्थर और बर्फ पिघलकर बहता हुआ पानी. कुछ कुछ जगह ऐसी की कही बर्फ पिघलकर आपका पैर अंदर ना चला जाए . अभी तक तो वो बच्चा साथ में था बहुत बार फिसलते फिसलते मुझे बचाया ,गिरी तो मुझे उठाया ,पैर कहा रखना है ये बताया पर आगे मुझे खुद ही खुदको संभालना था. थोड़ी ही दूर मैं अकेले पहुंची थी की पीछे से आवाज़ आ गयी “अरे दीदी कहा जा रहे हो,गलत जा रहे हो आप,रुको मैं आता हु, आप वाहा चले जाते तो कुत्ते खा जाते आपको,पहाड़ी कुत्ते है ये उनके आस पास भी जाने का मत सोचिये“. पहाड़ी कुत्ते जो रखे जाते है भेड़ की रखवाली के लिए और वह अपना काम पूरी निष्ठा से करते है, मजाल किसीकी की उनके रहते भेड़ को हाथ लगा ले. अरे पर तुम तो वापस जाने वाले थे, “कैसे चले जाता आपको छोड़कर, मेहमान हो आप हमारे आपको कुछ हो जाता तो क्या जवाब देते हम कश्मीर वाले”. और कुछ यु हमारी दोस्ती हुयी. फिर बाते आगे बढ़ी ,परिवार में कौन कौन है और क्या काम करते हो ” इस पर घर की सारी जिम्मेदारी थी सोनमर्ग में गाइड के अलावा अमरनाथ यात्रियों के लिए भी गाइड की सेवा देता था,बेहेन थी एक छोटी जो स्कूल में थी.

“तुम थके नहीं रोज़ा होगा ना तुम्हारा “

“नहीं मैं नहीं थका अल्लाह हिम्मत देता है”

हर कोई यहाँ रोज़ा नहीं करता क्या मार्केट में मैंने देखा कुछ लोग तो खाना खा रहे थे?

“हा तभी तो क़यामत आती है ना, देखा नहीं आपने २०१४ में जो बाढ़ आयी थी, अल्लाह सब देख रहा है”.

“अच्छा ये जो जगह है ना यही बजरंगी भाईजान के शूटिंग हुई थी जो सलमान खान को गोली लग जाती है वही वाला”.

मुझे बताओ तुम भारत में रहना पसंद करोगे या पकिस्तान?

“दीदी मुझे क्या पता पाकिस्तान, ये कुछ ३ % लोग है जो कश्मीर बेच आये है,नफरत फैला रहे है”

बातो बातो में काफी ऊपर चढ़ चुके थे हम,”दीदी आप पहले गेस्ट हो अभी तक के जो इतना ऊपर चढ़ के आये हो वरना कोई आना पसंद नहीं करता“. चोटी तक तो हम नहीं पहुंच पाए क्युकी शाम के पहले निचे भी उतरना था और उसे घर पे सामान देने भी जाना था. अपने आप में ही एक अलग दुनिया में आये जैसा लग रहा था उन पहाड़ो के बिच. निचे उतरते उतरते नदी के किनारे बानी चाय की दूकान पर कावा और मैगी का मज़ा लिया, पहली ही बार ही कावा का स्वाद चका था मैंने. मुझे वेगो के पास छोड़ वो तुरंत भागा घर की और सामान खरीदने के लिए.

22851738_1896618310352431_4602260815854008891_n

इस बार जो मैंने होटल बुक किया था वो मार्केट से काफी पहले ही था पर किसी कारन से मैं फिर मार्केट के लिए निकली. मार्केट में कल रात वाली दूकान पर जा ही थी की अचानक से आवाज़ आयी “The Wego Girl”. अनजान शहर में आपको कोई इस नाम से बुलाये तो चेहरे पर मुस्कान आना लाजमी ही था. तब तो मुस्कुराकर मैं दूकान के लिए आगे निकल गयी पर लौट ते वक़्त उनसे मिली. होटल वाली लाइन में ही एक होटल के बहार कुछ ३० ३१ उम्र के एक नौजवान और २ बुजुर्ग अंकल बैठे थे. होटल उन्ही का था. उन्होंने मुझे चाय के लिए पूछा और चाय के लिए तो मना हम करते ही नहीं. चाय और बिस्कुट मंगवाई गयी मेरे लिए.एक अंकल ने बातो का सिलसिला आगे बढ़ाया बेटा कहा से आये हो कौन है साथ में उन्हें जवाब दिए, थोड़ा वो चौके फिर बोले-

आप नागपुर से अकेले आये हो, बड़ी हिम्मत की है बेटा आपने , मेरी बेटी के उम्र के ही हो आप वो श्रीनगर में पढ़ती है, वो श्रीनगर से सोनमर्ग आने की भी हिम्मत नहीं कर पाती, कहा तक जाओगे आप “. बताया मैंने और फिर उनसे अपना सवाल पूछ ही लिया

” जोज़ि ला में चल जाएगी ये गाडी”.

बेटा आपने यहाँ तक आने की हिम्मत की है इंशाल्लाह आगे भी आप जरूर जाओगे, मैं आपके लिए दुआ करूँगा, जब आप नागपुर पहुुँच जाओ तो कॉल जरूर करना “.

इतनी शिद्दत और खूबसूरती से बोला जाता है यहाँ “इंशाल्लाह”, हाय, दुआ काबुल ही हो गयी समझो.

उनके बेटे ने भी कहा मैं आज ही आया हु जोज़ि ला पार करके चले जाओगे आप बस थोड़ा आराम से रुकते रुकते जाना और ध्यान रखना. कोई परेशानी आयी अगर तो मदद के लिए लोग भी मिल जाएंगे या मुझे कॉल कर देना. इनके जवाब ही थे जो हिम्मत दे रहे थे. उन्होंने शाम को खाने का न्योता दिया.
आजकल जहा लोगो को प्यार से नफरत और नफरत से मोहब्बत होती जा रही है ऐसे में ऐसे लोगो का मिलना , जिंदगी को उमंग और उम्मीद से भर देता है. फैलती नफरत और खौफ के बिच भी मोहब्बत अपनी जगह ढूंढ ही लेती है.

22814246_1896618377019091_2091526212677042921_n

हामी भरकर मैं होटल वापस आ गयी अपने दोस्तों के इंतज़ार में. सोनमर्ग में जहा नज़र उठा के देख लेंगे वहा आपको बस खूबसूरती ही दिखेगी और इसलिए इस होटल से भी खूबसूरत पहाड़ दिल जीत रहे थे. दोस्त आये हमने बोहोत मस्ती भी की पर जैसे जैसे रात चढ़ रही थी वैसे वैसे बैचनी बढ़ रही थी.ये बैचनी ख़तम तब ही होनी थी जब अगली सुबह उठकर जोज़ि ला नाम का पहाड़ पार लगता. उसके लिए जरुरी थी रात की अच्छी नींद. अपनी बैचैनी को साथ लेकर और अपने कुछ करीबी लोगो को मुझे आगे के सफर के लिए शुभेछा देने का मैसेज डालकर चली मैं अपनी नींद पूरी करने कल के मुश्किल सफर के लिए.

कश्मीर के रंग

28th June 2016 : अपने सफर को आगे बढ़ाते हुए सुबह 7 बजे निकली मैं  सोनमर्ग का लक्ष्य लेकर. हल्का सा कोहरा, जून में नवंबर वाली ठण्ड और रास्ते के साथ साथ चलती झेलम नदी का मजा लेते हुए शुरू हुआ ये सफर. सोनमर्ग के लिए श्रीनगर होते हुए जाना होता है तो निकल पड़ी मैं बीआरओ द्वारा लगाए हुए रास्ता बताते हुए साइन बोर्ड के इशारो पे श्रीनगर की ओर.आज पहाड़ चढ़ने नहीं उतरने थे.सफर चालू तो कर दिया पर मुश्किल ये की इस ज़िन्दगी में  रंग भर देने वाले मौसम को छोड़कर आगे बढ़ा कैसे जाये.आगे नज़ारे और खूबसूरत ही होने वाले थे पर शर्त ये थी इन्हे छोड़ा जाए. जी कर रहा था वेगो को सड़क किनारे खड़ा करा बैठ जाऊ दिल को शांति देने वाले इन नज़ारो को देखते हुए पर एक नए लक्ष्य का मुझे भी इंतज़ार था .पटनीटॉप से बहार निकलकर जो सबसे पहला काम करना था वो था रकसैक को बारिश से बचाने के लिए ताड़पत्री लेने का.पटनीटॉप से पास ही एक शहर में मुझे काम का सामान मिल गया और फिर सफर कैसे आगे बढ़ रहा था इन मदमस्त हवाओ के साथ कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, की अचानक इस खुले मौसम में कुछ बंद बंद महसूस होने लगा और तब समझा की मेरी वेगो कुछ ही देर में पोहोचने वाली है धरती का स्वर्ग कश्मीर.

सुरक्षा इंतज़ाम एकदम कड़े जहा नज़र घुमाओ पहाड़ पेड़, खूबसूरती और उसके साथ बन्दुक ताने हमारे आर्मी जवान. दूकान के सामने, बनते हुए घर की छत पे, खेलते हुए बच्चो के पास, स्कूल के सामने, पेट्रोल पंप पर, सड़क के किनारे, जंगल के बिच, 2 sec के लिए तो लगा जैसे किसी और देश में आ गयी हु जो आज़ाद नहीं है. वादिया सुन्दर थी पर उनकी हवाओ में डर सा था. हर लोग वाहा 24 घंटे किसी की निगरानी में था. बुरा लग रहा था वो देखकर, बुरा लग रहा था उन लोगो के लिए जो इस निगरानी में जीते है, खुशकिस्मत महसूस कर रही थी खुदको की मैं ऐसे शहर ऐसे वातावरण में पली की आज़ाद भारत को आज़ाद ही देखा. बड़ा मुश्किल होता जीना अगर बंदूकों की निगरानी में जीना पड़ता. उस 10 15 min में बोहोत गुस्सा आया,डर भी लगा खुद पर शर्म भी आयी, कुछ आँखे नम हुयी ,50 सवाल मन में आये पर थी मैं लाचार।

22552385_1888508984496697_6500155020362998168_n

गलत न वाहा के लोग थे न हमारे आर्मी के जवान, हलात के आगे मजबूर थे सब बस. आगे का सफर अब ऐसे ही कटना था जवानो के समूह और निगरानी के साथ. पहली बार आर्मी को देखकर मेहफ़ूज़ नहीं डर लग रहा था. अब नज़ारे कुछ कम ही अपनी और खींच रहे थे, सफर कब ख़तम होगा इसका इंतज़ार ज्यादा था. सफर ख़तम करने के लिए आगे बढ़ना जरुरी था और बढ़ते बढ़ते वेगो पोहोची कश्मीर के प्रवेश द्वार जवाहर टनल.  1956 में बना गया 2.5 km लम्बा ये टनल जो ले चलता है आपको कश्मीर की वादियों में. किस्मत से जब मैं टनल में गयी मेरे आगे ही एक टैक्सी थी जिसकी लाइट की मदद से टनल पार कर पायी, वरना वेगो की हेड लाइट में उस अँधेरी सुरंग से निकलना मुश्किल ही ठहरता। अपने देश की एक और ऐतिहासिक जगह से होकर गुजरने की थोड़ी ख़ुशी हो रही थी. जवाहर टनल के बहार निकलते ही खड़ी थी हमारी आर्मी जवानो का समुह. इच्छा थी उस ऐतिहासिक टनल को कैमरा में कैद करने की पर  ध्यान ये भी था की सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए बिना इजाजत फोटो ना ली जाए. इजाजत मिलनी नहीं थी ये भी तय ही था और वही हुआ भी एक आर्मी अफसर से पूछने के बाद. कैमरा में ना सही दिल में वो अनुभव हमेशा कैद रहेगा.

22519324_1888508367830092_2033814772898953914_n.jpg

हरी भरी वादियों से होकर गुजरने के बाद समय था कश्मीर के शहरों से गुजरने का और ऐसे ही एक शहर क्वाजिगंड  से गुजरते हुए अचानक से मुझे रोक लिया पुलिस चौकी के बिलकुल आगे एक पुलिस सिपाही ने. मैं थी पूरी तरह से पैक हेलमेट स्क्राफ् जैकेट ग्लव्स जूते.देखते ही पहला सवाल उन्होंने पूछा “आप तो पेहले ये बताइये आपको मैं सर बोलू या मैडम”. तब मैंने अपना हेलमेट और स्क्राफ् हटाया-

” अच्छा तो आप मैडम है, मैडम ये बताइये आपने गाडी का लाइट क्यों चालू रखा है? बंद कीजिये उसे ,कहा से है आप और कहा से आ रही है आप इस स्कूटी पर? साथ में कौन है आपके? “.

उन्हें बताया मैंने टनल पार करने के बाद लाइट बंद करना भूल गयी , कोई साथ नहीं है नागपुर से आयी हु मैं ,सोनमर्ग जा रही हु. उन्हें चौकाने के लिए इतने जवाब काफी थे. “अकेले आयी है आप इतने दूर से”?. चाय पीना पसंद करेंगी.

आप सफर में हो कोई आपको चाय के लिए पूछे और आप मना कर दे इस से बड़ा और गुनाह कोई हो नही सकता, क्युकी जहा चाय को मना किया मतलब एक नए रिश्ते को भी आप मना कर गए और कुछ नया जान ने को भी.जवाब मेरा हां था सोचा चलो चौकी में बैठके चाय पि जाये कुछ यादे, कुछ रिश्ते बटोरे जाए और आराम भी चाइये ही था. पर चाय चौकी पे नहीं तो चौकी के कैंपस में बने कैंटीन में  पीनी थी. कैंटीन के बहार कुछ टेबल कुर्सियां लगी थी  पेड़ो से घिरी हुई, वही बैठने का सोचा. कैंटीन वाले को बोलकर मेरे लिए चाय बुलाई गयी, पुलिस वाले अंकल ने तो साथ में चाय पि नहीं वो मुझे बिठाकर वापस ड्यूटी पर चले गए “मैडम आप आराम से बैठिये चाय पीजिये”. चाय के साथ मुझे जरुरत थी नाश्ते की भी, सुबह से कुछ खाया नहीं था तो मैंने नाश्ता भी मंगवा लिया। पुलिस अंकल एक बार बिच में आकर देख गए कही मैं परेशान तो नहीं हो रही फिर नाश्ता ख़तम भी हो गया पर वो नहीं आये. मैंने कैंटीन में बिल के लिए कहा तो पता चला “बिल तो आपका दे दिया है वो पुलिस जो आपको लेकर आये थे” मैं थोड़ा चौकी ये सुनकर और थोड़ी मुस्कुरायी भी. बस दुःख इस बात का रहा की उन्हें धन्यवाद् नहीं कर पायी,उनकी ड्यूटी खत्म करके बिल देकर वो घर जा चुके थे. वाहा कुछ देर आराम करके वेगो आगे बढ़ी अपनी मंज़िल सोनमर्ग की तरफ.

22519266_1888508447830084_5739443501269931972_n

दिन चढ़ रहा था पर मौसम ऐसा की धुप का नामों निशाँ नहीं वरना नागपुर में तो जून के अंत में भी जलाने वाली धुप होती है. नज़ारे भी रास्तो के साथ बदलते हुए, ताज़ा कर देने वाले और इतने शहर इतने कस्बो से गुजरने के बाद आर्मी के मौजुदगी की की भी आदत हो ही गयी थी. हमारी हिफाज़त के लिए ही थे वो वाहा अपने परिवार से दूर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए.  अब डर नहीं मेहफ़ूज़ लगने लगा था उनके साथ, पता था कोई परेशानी आयी भी तो ये रहेंगे साथ, कही मैं अकेली नहीं हु.

22687916_1888509501163312_4238781599266380982_n

 

वेगो गुज़र रही थी कश्मीर के अलग अलग रास्तो और कस्बो से और ऐसे ही एक कस्बे संगम जो अनंतनाग में पड़ता है ,के पेहले रास्तो के दोनों तरफ दिखने लगी सुप्रसिद्ध कश्मीरी विलो बैट से सजी हुई दुकाने.दुकानों के साथ ही बैट वहा बनायीं भी जा रही थी. यहाँ की सड़के भी घाट रास्तो से अलग 4 लेन हो गयी थी कुछ देर उन रास्तो पर तेजी से वेगो दौड़ाने का मज़ा लिया। इस मज़े में कब गलत रास्ते चली गयी ध्यान ही नहीं रहा और फिर स्वागत किया आर्मी ने. बड़े सख्त से दिखने वाले एक अफसर ने रोक कर पुरे पेपर चेक किये, उतनी ही सख्ती से सही रास्ता बताया और जाने को कहा. मन ही मन मैं ये सोच रही थी की कितना मुश्किल होता होगा इतना सख्त रहना, कभी कभी ना चाहते हुए भी यु बेरुखी दिखाना, ड्यूटी तो पर ड्यूटी है और जिम्मेदारी जब देश की हो तो चूक की गुंजाइश कहा.

संगम से श्रीनगर अब ज्यादा दूर नहीं था लगभग 50 km. शाम करीब 4 4.15 बजे पोहोची मैं श्रीनगर। कैसा था श्रीनगर? बोहोत खूबसूरत, रास्तो के किनारे चिन्नार के लम्बे लम्बे पेड़ , आपके साथ चलता दल लेक, लेक के एक तरफ जहा था शहर वही बाकी तरफ घिरा हुआ था पहाड़ियों से , ठंडी बहती हवा. दल लेक पर कुछ देर समय बिताया पहाड़, पेड़, पानी, हवा,, खूबसूरती आप समझ ही सकते है क्या महसूस हो रहा होगा मुझे वाहा। श्रीनगर से मुझे दवाई लेनी थी और एक अड़चन थी बीएसएनएल की जिसे चालू करना था. दल लेक में समय बिताकर पोहोची मैं मेडिकल की दूकान, दवाइया ली और रास्ता भी पूछा सोनमर्ग के लिए. दूकान में मेरे बाजु में खड़े हुए अंकल और दूकान वाले अंकल ने सलाह मसहूरा कर  सही रास्ता बताया लाल चौक से भेजा जाये या नहीं ये वो सोच रहे थे. दूकान से बहार निकली तो जिन्होंने रास्ता बताया था वो अपनी कार निकालते हुए फिर मिल गए. मेरी वेगो देख थोड़ा चौक गए फिर बोले “बेटा याहा से चले जाओ, रास्ता अच्छा है, आराम से जाना, डरने की कोई कोई बात नहीं और अपना ध्यान रखना” केहकर वो निकल गए. अब बीएसएनएल की परेशानी हल करने का समय था, किस्मत ने इस बार बड़ा साथ दिया और कॉल सेण्टर में किसी समझदार ने फ़ोन उठा लिया और परेशानी 5 min में हल कर दी, कोशिश पटनीटॉप जिस दिन पोहोची थी उस दिन से ही चालू थी सिम चालू करने की और हल हुई श्रीनगर पोहोचकर इस बिच करीब २० कॉल सेण्टर एक्सेक्यूटिव्स से बात कर चुकी थी मैं. परेशानी हल हुई वो ज्यादा जरुरी था. अब शुरू होने वाला था आज की यात्रा का अंतिम पड़ाव। श्रीनगर से शाम 5 बजे निकली मैं सोनमर्ग की और. शाम यहाँ ८ बजे के बाद होती है तो और 3 घंटे का समय था मेरे पास 80 85 km पूरा करने के लिए.

22519153_1888509434496652_4630910725864243813_n

सोनमर्ग की तरफ बढ़ते हुए रस्ते कुछ और छोटे होते चले गए थोड़े ख़राब भी ,पहाड़ कुछ बड़े, नदियां सफ़ेद और दिखने लगे बर्फ से लदे पहाड़। कश्मीर को जन्नत क्यों कहा जाता है इसकी झलक मिलनी शुरू हुई उन रास्तो पर, समय की पाबंदी ना होती तो 3 घंटे का वो सफर मैं पूरा करती 6 घंटो में. थोड़ा ज्यादा समय बिताती में उन वादियों में अपनी वेगो के साथ. जब पटनीटॉप से सफर चालू किया था तो नदी कही कही साथ तो थी पर पास नहीं की छू सके पर सोनमर्ग से 1 घंटे पहले से जो नज़ारा देखने मिला वो आज भी ख़ुशी से भर देता है. सामने थोड़े भूरे रंग के पहाड़ कुछ बर्फ से ढ़के हुए सूरज की रौशनी से केसरी रंग लेते हुए,ऐसा लग रहा था जैसे कोई ब्रश लेकर रंगो की चित्रकारी कर रहा हो, उन्ही के बाजू में हरे रंग को लपेटे हुए पहाड़ और उन रंगो की जुगलबंदी करते पहाड़ो के नीचे बहती सफ़ेद पाक सिंध नदी. तभी कहा गया है ” जन्नत गर कही है तो यही है यही है यही है” .जन्नत जो जिंदगी को नयी उमंग से भर दे, जिंदगी ना मांगने वाले भी 100 साल के ऊपर जीने की दुआ मांगने लगे. उन रंगो को आँखों में भर उनके साथ अपना समय बिता कर निकली उन नज़ारो के साथ साथ सोनमर्ग. अब ये पहाड़ ये नदी ये रंग साथ ही चलने थे और इन्ही के साथ प्रवेश हुआ मेरा सोनमर्ग में. 8 बजे करीब मैं पोहोची सोनमर्ग और सोनमर्ग बाजार में जाहा गेस्ट हाउस होटल्स की लाइन लगी हुई थी उन्ही में से एक जगह कमरा लिया। इतनी सुंदरता आँखों में भरने के बाद अब समय था आराम का. कहानी और भी है पर अगली कड़ी में

22687742_1888508704496725_5376353585066996729_n

जम्मू कश्मीर में स्वागत है

जुलाई 2016 और सेप्ट 2017 इस सवा साल में ज़िन्दगी इतनी बदल जाएगी लगा ही नहीं था. बदलना तो ये शुरू तभी से हो गयी थी जब लद्दाख जाने का सोचा था पर उसके बाद भी एक एक कर जो होता चला गया उसके लिए मैं तैयार नहीं थी. ये पोस्ट इतना देरी से आने का एक कारण रहा जुलाई 8 2016 की वो शाम जिसके निशान अभी भी मेरे साथ ही है. खैर क्या जिंदगी बदली और क्या हुआ था 8 जुलाई 2016 को ये आगे की पोस्ट में आपको पता चल ही जायेगा फ़िलहाल बात करते है उन रास्तो की जाहा वेगो चलाने का सपना ना जाने मैंने कब से देखा था. मेरा सपना पूरा करने के लिए जरूररत थी बस उस दरवाज़े को पार करने की. कौनसा दरवाज़ा आइये पता करते है.

22310566_1879792585368337_7299947924263544651_n

ये था वो दरवाज़ा था ” Excise Dept Toll Post Lakhanpur Welcomes You To Jammu & kashmir State”.उस पल को जीने के लिए कुछ देर गाडी पर बैठ कर उस दरवाज़े को निहारती रही और फिर उसे अपने कैमरे में कैद करने लगी. फिर अपनी वेगो चलाकर पोहोची मैं दरवाज़े के पार. जम्मू कश्मीर की चिकनी सड़क पर दौड़ती मेरी वेगो की ख़ुशी शब्दों से नहीं मेरे चेहरे की चमक से ही बयान हो सकती है. दोनों तरफ के नज़ारो को मैं देख रही थी, खुद ही खुद से बाते कर रही थी, खुद पर ही यकीन नहीं हो रहा था,अजीब सी ख़ुशी थी, और इन सब के बिच दिल से दो लोगो को शुक्रिया करना चाहा रही थी. थोड़ी देर बाद वेगो रोक उन्हें कॉल करने का सोचा पर जम्मू कश्मीर जितने तहे दिल से मुझे बुला रहा था उतने ही तहे दिल से फ़ोन के नेटवर्क को अलविदा भी कह चूका था. थोड़ा बुरा लगा और थोड़ा टेंशन आया पर सफर तो जारी रखना ही था. लक्ष्य था उस दिन का पटनीटॉप.

पूछते पूछते जाना था. साम्बा तक तो सफर बड़े आराम से कटा सीधी लम्बी चिकनी सड़क पर जब लद्दाख जाने की सोची हो तो इन सड़को से लेना ही क्या था. आगे रास्ते कैसे होंगे इनकी हलकी सी झलक साम्बा उधमपुर के रास्तो ने दे दी. जाना ऊंचा था, रास्ता ख़राब था, बिच में कही पूल का काम चालु था. दिमाग संतुलन खो ही रहा था पर ये नज़ारे और अपने लक्ष्य की और बढ़ते कदम ने संभाल लिया. चलती ,रूकती, थकी हुयी पोहोची में एक रेस्टॉरंट पेट पूजा और कुछ आराम के लिए,रेस्टोरेंट करीब खाली ही था तो जाकर बैठ गयी मैं एक टेबल पर. बैठी ही थी की वेटर आया और हालत देखकर बोला,टेबल की और इशारा करते हुए मैडम आप वहा बैठ जाइये अच्छी ठंडी हवा आएगी. जैसे ही बैठी उन्होंने खिड़की खोली और नज़ारा था हरी भरी वादियों का, थकान उन्हें देखते ही काहा चली गयी पता ही नहीं चला. बैठकर अपने फ़ोन का नेटवर्क देखने की सोची पर कुछ हासिल नहीं हुआ, फ़ोन बंद चालू करके देखा कुछ नहीं हुआ तो वेटर से पूछा, पता चला प्राइवेट नेटवर्क यही से बंद हो जाते है बीएसएनएल और यहाँ के नंबर ही चल पाएंगे.बीएसएनएल का सिम तो था मेरे पास पर माइक्रो नहीं और इसलिए उसे एक्टिव भी नहीं कर पा रही थी. ये बात उन्हें बताई तो बोले मैडम आप मेरे फ़ोन में सिम डाल लीजिये और एक्टिव कर लीजिये, आपको कुछ कॉल करने होंगे तो मेरे फ़ोन से भी कर सकते है आप जब तक है यहाँ रख लीजिये मेरा फ़ोन. जितनी खूबसूरत वो वादियां थी वैसी ही खूबसूरती की झलक दिखी मुझे उनमे. खाना तो खिलाया ही उन्होंने पर मेरी परेशानी में भी मदद करने की कोशिस की. उनकी मदद से बीएसएनएल एक्टिव तो हो गया था पर कॉल और इंटरनेट बंद थे. आराम और पेट पूजा करके बढ़ी मेरी वेगो आगे के सफर के लिए.

22310521_1880708861943376_1251826185485558251_n

Patnitop jaate huye

शाम करीब 6 बजे पोहोची मैं अपनी मंज़िल पटनीटॉप. पहाड़ो से घिरा हुआ ये हिल स्टेशन, ठंडी हवा, बेहते पानी की आवाज़ और पहाड़ो को देखती मेरी वेगो. याहा मेरी थकान मेरी ख़ुशी पर हावी हो रही थी, इसलिए जल्दी ही चली गयी मैं रेहने के लिए रूम ढूंढ़ने. रूम थोड़े मेहँगे थे और उसपे लोगो को मुझपे विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,उन्होंने एनफील्ड और बाकी बड़ी गाड़ियों में लोगो को आते हुए देखा था पर एक अकेली लड़की मोपेड पर याहा,मुश्किल से एक रूम मिला. रूम साफ़ करने के लिए बोलके मैं निकली अपने बीएसएनएल सिम को माइक्रो करने. एक ही मोबाइल की छोटी सी टिन की दूकान थी वाहा जो मुझे होटल वालो ने ही बताई थी.

22366576_1880708791943383_5323208554254394212_n.jpg

Patnitop

दूकान में मशक्कत बड़ी लम्बी चली, दूकान में माइक्रो सिम कट करने के लिए साधन था नहीं और दुकानदार भी डर रहा था की कुछ गड़बड़ हो गयी कट करने में तो सिम ख़राब ना हो जाये. मैंने ही थोड़ा फाॅर्स किया फिर वो माने अब सिम कट हो गयी फ़ोन में डाल भी दी पर नेटवर्क आने का नाम नहीं. फिर थोड़ी देर में समझा की सिम वो गलत डाल रहे थे. ये सारि मशक्कत जब चल रही थी तब हम में कुछ बाते भी हुयी और बातो बातो में मुझे एक सवाल पूछा गया –

“इतने दूर अकेले आपको डर नहीं लगता? मैंने पूछा डर किस से सब अपने ही तो लोग है ना, हां पर फिर भी कुछ हो गया तो मेरा जवाब था क्या होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ हुआ भी तो बस जान ही जाएगी इस से ज्यादा और कुछ हो सकता है क्या?. जवाब सुनके वो थोड़े दंग हुए और फिर मुस्कुराये की हां और होगा भी क्या.”

फ़ोन का काम ख़तम हो गया था और बाते भी. फ़ोन पे मशक्कत उन्होंने काफी की पर पैसा एक नहीं लिया और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया. एक मुश्किल याहा हल हो गयी थी पर पता नहीं था की दूसरी मुश्किल सामने ही इंतज़ार कर रही थी. जब होटल पोहोची रूम पर तो मैनेजर ने ये बोलते हुए “मैडम रूम का एडवांस बुकिंग था, हमे लगा बुकिंग कैंसिल हो गयी है अभी तक कोई आया नहीं तो,पर अभी उनका कॉल आया था और उन्होंने बताया की वो आ रहे है”. मैं सामन लेकर निचे आयी अपनी वेगो के पास खड़ी हो गयी, समझ ही नहीं आ रहा था अब रात में क्या करू. थकान से शरीर भी जवाब दे रहा था, और मन भी कमज़ोर पड़ने ही वाला था कि 4 एनफील्ड आते हुए दिखी. राइडर्स को देखकर ख़ुशी हो ही रही थी और वह ख़ुशी जशन में बदल गयी जब उनमे से लास्ट राइडर ने मुझे से आगे निकलने के बाद अपनी एनफील्ड रूककर मुझे आवाज़ लगायी “अरे स्नेहल क्या कर रही है तू याहा,इधर आ” मैं गयी उस से गले मिली. ये थे मेरे फेसबुक फ्रेंड विशाल मयेकर जिनसे पहली बार ऐसे मुलाकात हो रही थी . अक्सर हम कहते है दुनिया बोहोत छोटी है,विशाल से मिलकर अनुभव भी कर लिया, मुझपे मुसीबत आने पर तो कुछ ज्यादा ही छोटी हो जाती है लगा. उसे जब मेरी परेशानी पता चली तुरंत बोले ” अरे टेंशन मत ले तू हमारे साथ रुकेगी”.और फिर हम रुके पटनीटॉप के उचाई पे बसे और बेहद खूबसूरत होटल ग्रीन टॉप के डबल सुइट में.

13613586_1205795192772222_2929220704604023973_o

Vishal aur Main

 

रूम के लिए इतना इंतज़ार, थोड़ी परेशानी, थोड़ी तकलीफ सब जायज़ लग रही थी उस सुइट, विशाल,जागृति और बाकी दोस्तों से मिलकर. मुलाकात, बात, खाना, बीएसएनएल से फ़ोन पर घंटो की लड़ाई इन सब के बाद समय था अगले दिन की शुरुआत के लिए अच्छी नींद लेने का.बिस्तर पर लेटे लेटे मिला जुला सा, कुछ अच्छा कुछ ख़राब सा दिन आँखो के से सामने गुजर रहा था. वो कहते है न “अंत भला तो सब भला”. जैसे खुशनुमा शुरू हुआ था दिन वैसे ही खुशनुमा तरीके से खत्म होने वाली थी रात,बस कुछ जवाब ढूंढ़ने की कोशिश के बाद .मोबाइल की दूकान पर मेरे ही जवाब “सब अपने ही तो लोग है ना” ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. जब सब अपने ही है तो क्यों हम लोगो से दर कर बहार नहीं निकल रहे है ? हम लोगो को अपना नहीं पा रहे है या लोग हमे? लिखते पढ़ते क्या हम रोबोट बनते जा रहे है जिनमे भावनाये नहीं होती?. जवाब ढूंढ़ते ढूंढ़ते तो मैं सो गयी पर क्या आप देंगे मुझे इन सवालो के जवाब.

Comment   Share    Follow