THE DREAM RIDE (Part II)

साथ चलता है मेरे दुवाओ का काफिला, और ऐसी ही एक दुआ ने असर दिखाया 25 जून 2016 को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर. 25 को शुरू होने वाला था मेरा दिल्ली से लद्दाख तक का सफर. 25 को दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे नागपुर से पार्सल की हुई मेरी वेगो लेनी थी. 25 को सुबह अपना बड़ा सा रकसैक, एक बैग,हेलमेट और जैकेट लेकर मैं ट्रैन से उतरी. मैं एक अकेली और सामान इतना सारा, सामान लेकर पोहोची मैं प्लेटफार्म के पार्सल ऑफिस में. ऑफिस में 2 लोग मौजूद थे,उनमे से एक का नाम था मनोज . मुझे देखकर पहले तो शॉक ही लगा उन्हें,पतली दुबली सी लड़की इतने सारे सामान से लदी हुई और जून की गर्मी से पूरा पसीना पसीना. मैडम सामान रख दीजिये निचे और पहले आराम से बैठकर पानी पीजिये. सामान निचे रखकर कुछ देर मैं बैठी फिर उन्हें रिसिप्ट दिखाई. रिसिप्ट देखकर उन्होंने मुझे प्लेटफार्म के दूसरे पार्सल ऑफिस जाने के लिए कहा. मुझे दोनों ने सामान वही रखने के लिए कहा पर मैंने सोचा की जब गाडी वही से उठानी है तो फिर यहाँ वापस आकर फायदा नहीं इसलिए सामान लेकर ही मैं चल पड़ी प्लेटफार्म की दूसरी और. गलती बस इतनी कर दी की और आधे रस्ते पोहोचकर मैंने किसी और से पार्सल ऑफिस पूछ लिया और उन्होंने मुझे दूसरा रास्ता बता दिया ,उनका कहा हुआ मानकर मैं पोहोच गयी प्लेटफार्म 1 मेन पार्सल ऑफिस, वाहा अपनी गाडी के बारे में पूछा जवाब मिला यहाँ कोई गाडी नहीं है. पहले ही गर्मी इतनी ज्यादा और जवाब ये मिला तो मौसम के पारे से ज्यादा चढ़ गया मेरे दिमाग का पारा. गुस्से गुस्से में निकली मैं फिर से वापस दोनों से मिलने, ऑफिस के बहार पोहोच ही रही थी की दोनों ताला लगते हुए बहार मिल गए “अरे मैडम हमने तो आपको इसी प्लेटफार्म के आखिर में जो ऑफिस है वाहा जाने के लिए कहा था आप कहा चली गयी थी”. अब गुस्सा खुद पे आ रहा था, एक ही जगह के इतने सारे सामान के साथ 3 चक्कर. चलिए मैडम हम आपको ले चलते है, दोनों मेरे साथ ही ऑफिस तक चले मेरी रिसिप्ट की जाँच करवाई और गाडी लेने को कहा. दूसरी मुसीबत ऐसी की गाडी पूरी पैक और पेट्रोल 0. मैडम आप ले जाएँगी अकेली गाडी,सामान काहा रखेंगी,कोई साथ में हो तो बुला लो किसीको. साथ में तो कोई था नहीं,ये उन्हें भी बताया. अच्छा तो हम आपको प्लेटफार्म के दूसरे कोने तक छोड़ देते है वाहा से आप चला लीजियेगा गाडी और उस रस्ते निकल जाइएगा. अब हम पोहोचे दूसरे कोने तो फिर मनोज जी कहते है पर अब आप वाहा तक भी कैसे जाएँगी,रुकिए मैं पेट्रोल यही मंगवा देता हु. घुमाया उन्होंने एक फ़ोन और पेट्रोल लेकर आने के लिए कह दिया. पेट्रोल लाने के लिए आधे घंटे का समय लगने वाला था तो दोनों मेरे साथ ही पूरा समय धुप में खड़े रहे कहते हुए”जब आप धुप में खड़ी रह सकती है फिर हम तो राजस्थान से आये है”. आधे पौन घंटे बाद पेट्रोल आया अब समस्या थी गाडी पैक है, उसके लिए भी उन्होंने इंतज़ाम करवाया गाडी में पेट्रोल डाला मुझसे बिना पैसे लिए हुए और उस पर आगे भी जरुरत पड़े दिल्ली से गाडी नागपुर भेजनी हो तो बताइयेगा हम करवा देंगे,हमारा नंबर रख लीजिये. लद्दाख सफर का पहला पड़ाव था दिल्ली और उसकी इतनी अच्छी शुरुआत होगी ये मैंने सोचा नहीं था. दिल्ली शहर में बिना मतलब मदद मिल जाना ही अपने आप में अजूबा सा लगता है कुछ लोगो को क्युकी सुनाया ही कुछ ऐसा जाता है दिल्ली के बारे में,पर दिल्ली के मामले में भी मेरी किस्मत बुलंद ही रही है,इनसे मेरी पेहचान बस 5 min की ही थी और ये मदद के लिए आगे आ गए और आज भी बैंक के काम को लेकर कभी कोई दिक्कत हो तो कॉल कर लेते है. इसलिए मैं हमेशा कहती हु “हा दुनिया थोड़ी बुरी तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” .

13533100_1352524561428478_8358764463169823634_n
रेलवे कर्मचारी मदद करते हुए
13528905_1352525001428434_8040237785857880852_n
वेगो पार्सल

वेगो हाथ में आयी और साथ ही आयी उसके मेरी हिम्मत. गाडी लेने के बाद अब बारी थी रितेश सर से मिलने की जिन्होंने जाने कितने ही लोगो की किस्मत बदली है प्रेरणा देकर. यकीं नहीं हो रहा था की अपनी राजधानी में मैं मेरी वेगो चला रही हु. रितेश सर से मिलना तो तय था उसके साथ मुझे सरप्राइज मिला नवीन मामाजी का,3 साल बाद मिल रही थी दोनों से और उसपर घर के कड़ी पकोड़े,वो खाने के बाद तो लग रहा था ज़िन्दगी में और चाहिए क्या अब इसके आगे. चाहिए और बोहोत कुछ था इसलिए चंद घंटो की बोहोत ही जबरदस्त प्रेरणादायी मुलाकात के बाद निकली मेरी अगली टोली से मिलने. श्रीदीप और रंगा इन दोनों से ही मेरी मुलाकात हुई थी किसी सफर में और बस दोस्ती हो गयी. इन सभी ने मेरा मनोबल बोहोत बढ़ाया और अलविदा किया शुभकामनाओ के साथ.

13592646_1136235776436745_4454091041217722198_n
रितेश सर के आफिस के बाहर

 

26 जून 2016 निकली मेरी वेगो अपना अगला पड़ाव पूरा करने होशियारपुर की तरफ. थोड़ी हैरान परेशान,जो राइड सुबह 6 बजे शुरू होनी थी वो हुई 9 बजे शुरू ऊपर से दिल्ली इतना बड़ा की गाडी चले जा रही है और दिल्ली ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा. थोड़ी राहत मिली जब गाडी दिल्ली से बहार निकली. दिल्ली से बहार निकलने की ख़ुशी मनाना चालू ही था की एक और खुश खबर मिली मेरी राइड की खबर राजस्थान पत्रिका में छपने की. सोने पे सुहागा वाली बात थी ये फिर तो सफर और सुहाना हो गया इस जश्न के साथ. ख़ुशी और जश्न में कब होशियारपुर पोहोच गयी पता ही नहीं चला. होशियारपुर में रात बितानी थी और फिर सुबह तैयारी करनी थी आगे चलने की पर उसके पहले रात में इंतज़ाम करना था रकसैक को कवर करने के लिए कवर का,मेरे ड्यूल फ़ोन के सिम ट्रे का ताकि जम्मू कश्मीर पोहोचते ही मैं अपना बीएसएनएल चालू कर सकू पर ना सिम ट्रे का इंतज़ाम हो पाया ना कवर का. ऊपर से बीएसएनएल माइक्रो में भी कन्वर्ट नहीं हो पाया. छोड़ी वो टेंशन और रूम पर जाकर करणअर्जुन को उनके गाओं वापस आते हुए देखने में डूब गयी सोचा कवर और सिम ट्रे का जुगाड़ रास्ते में कर लेंगे.

13508993_1353132224701045_2128321579432980291_n.jpg
राजस्थान पत्रिकाओं

 

27 जून 2016 : आज सफर अपने समय सुबह 6 बजे शुरू किया. गाडी शहर के बहार भी बड़ी जल्दी निकल गयी क्युकी छोटा सा ही शहर है होशियारपुर. गाडी शहर के बहार निकली नहीं की रास्ते के दोनों तरफ दिखने लगे बड़े बड़े उचे उचे पेड़, हरियाली ही हरियाली पूरी पंजाब वाली फीलिंग. एन्जॉय करना बस चालू ही किया था की ऊपर वाले ने कुछ नया प्लान बना लिया, सोचा गर्मी से हमे थोड़ी आज़ादी दिलाये, 2 min में दिन से रात हो गयी और बादल जो बरसे की आगे का आप कुछ देख नहीं सकते, न रेनकोट तब किसी काम का रहा और बैग को कवर अपनी ही गलती से था नहीं. जब तक गाडी और खुदको बचाने का सहारा ढूंढ़ती बारिश अपना काम कर चुकी थी. फिर भी एक जगह जाकर शेड में रुकी, सामने खुली हुई दूकान दिखी किस्मत से एक,पहले तो काफी सोचा इतना भीगकर कैसे अंदर पर सफर क्युकी इतना लम्बा तय करना था तो और कोई चारा था नहीं. पूरी भीगी हुयी अंदर जाकर बैठी. उन्ही से कुछ और प्लास्टिक ली की अपना कैमरा फ़ोन जो आलरेडी मैंने एक पॉलिथीन में दाल रखा था पर एक और कवर के नाम पर ले ली. रकसैक के लिए कवर पूछा पर उनके पास था नहीं. बारिश पुरे जोरो शोरो से एक डेड घंटा बरसी उसके बाद कही कुछ कम हुयी तो सोचा चलो निकला जाए वरना कही आगे देरी न हो जाये. भीगी भागी सी निकली अपनी वेगो पे तो मजे की बात ये की 10 min बाद जिस रस्ते पर पोहोची वाहा ऐसा लग रहा था मानो मेघ देवता इनसे दोस्ती तोड़े बैठे है इसलिए रूठकर सालो से बरसे ही नहीं है. थोड़ी खुद पर हसी आ रही थी और थोड़ी कुदरत पर. थोड़ा और आगे पोहोचे तो मेहरबानी से बादल अपना काम पहले निपटा चुके थे,ठंडी हवा और गीली जमीं से उनका पैगाम मिल गया था. बारिश से लड़ते झगड़ते, पंजाब के मक्खन में डूबे परांठे खाते आखिर पोहोची मैं उन रास्तो पर जिन पर गाडी चलाने का सपना ना जाने कब से देखा था,युही बैठे बैठे दिमाग में ख्याल आ जाता था कब चलाऊंगी इन रास्तो पर गाडी,क्या फीलिंग रहेगी उन रास्तो पर गाडी चलाने की और आज बस एक गेट की दुरी थी उन रास्तो और मेरे गाडी की बिच. अगर आप सोच रहे है की मैं लद्दाख की बात कर रही हु तो ना जी ना लद्दाख पोहोचने विच तो लम्बा समय है.. किन रास्तो की बात कर रही हु मैं ये बताउंगी मैं मेरे अगले पोस्ट में तब तक आप भी मजा लीजिये पराठे और बारिश का 🙂

IMAG0725
बारिश का संकेत
13537760_1353714904642777_4858465406423703020_n
पंजाब का परांठा

The Dream Ride (Part I)

रास्ता सफर और ज़िन्दगी.लेह लददाख के उस सफर में ना तो रास्ता आसान न तो वाहा तक पोहोचने का सफर और ज़िन्दगी की तो अपनी एक अलग ही लड़ाई चली आ रही है बरसो से. पर सब अगर आसान होता तो रोमांच कहा रह जाता और मुश्किलें चाहे जितनी भी आये जब आप कुछ करने की ठान ही लेते है तो रास्ता तो कुदरत खुद ही बना देती है. मई 2016 जब अपने एक दोस्त के फ़ोन कॉल पर मैंने तय कर लिया था की मैं लददाख जा रही हु,बस ज़िद्द इतनी थी की जाउंगी तो अपने वेगो पर ही. मेरी मोपेड वेगो को वादा था मेरा उसे खारदुंगला टॉप जो की दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता माना जाता है, 18380 feet वाहा ले जाना. दोस्त ने काफी समझाने की कोशिश की “वेगो नहीं चल पायेगी वाहा” पर वादा किया था तो निभाना भी था और पता भी करना था आखिर क्या है ये लददाख का पागलपन और क्यों वेगो नहीं चल सकती. अभी तक कश्मीर, उसकी वादियाँ, वहा का डर,लेह तक जाने वाला मुश्किल रास्ता और आने वाली मुश्किलों के बारे में बस सुन रखा था पर अब खुद जाने का तय किया था,डर लग रहा था. कई सवाल थे मन में क्या मैं सही में तैयार हु ये करने के लिए? क्या मैंने अपने दोस्तों की बात मान लेनी चाइये वेगो से ना जाने की ? क्या मैं ये कर पाऊँगी?. अपने डर और सवाल के जवाबो के लिए व्हाट्सप्प किया मेरे मार्गदर्शक डॉ अमित निकम ये खुद 3 बार लेह जा चुके है और 8 साल से राइडिंग कर रहे है. मुझे पता था इनसे बेहतर मुझे और कोई सही तरीके से नहीं समझा पायेगा. मेरी पेहले की राइड्स में भी इनका काफी सपोर्ट रहा था. उठाया फ़ोन किया मैसेज “खारदुंगला जाना है वेगो से” जवाब था जाओ. आत्मविश्वास जैसे सातवे आसमान पर था, अमित ने कह दिया मतलब तो पक्का वेगो जाएगी खारदुंगला. उसके बाद काफी सारी बाते, क्या तैयारी लगेगी, कैसे है वाहा के रास्ते,काहा काहा ज्यादा दिक्कते आ सकती है,साथ में क्या क्या रखना होगा, मुश्किल आयी तो किस से मदद ले सकती हु, गाडी में क्या क्या ध्यान देना होगा और उन सबके पहले क्युकी गाडी अभी तक किसी ऊंचाई पर नहीं चढ़ी थी तो मुझे सुझाव दिया गया- गाडी का टेस्ट पचमारी के धूपगढ़ पर चढ़ाकर. धूपगढ़ मध्य भारत की सबसे ऊँची जगह है. मई महीने के अंत तक ये सुझाव का पालन भी कर लिया था मैंने और गाडी में क्या क्या ठीक करना होगा ये भी समझ आ गया था.

 

13312798_1332398220107779_2553789271519954135_n
Wego at Dhupgarh

गाडी की तैयारी तो समझ आ गयी थी अब बारी थी खुदके तैयारी की. लददाख का मौसम,ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी इन बातो के लिए भी खुदको तैयार करना था. तो तय हुआ की शारीरिक रूप से तैयार होने के लिए ज़ुम्बा लगाया जाये. मई के आखरी हफ्ते में शुरू हुई जुम्बा क्लासेज.मेरा ऑफिस नागपुर से कुछ 85 km की दुरी पर है,10.30 बजे ऑफिस का समय होता है तो 8 बजे घर से निकल जाना होता था,आधे दिन मैं ऑफिस इसलिए नहीं जाती थी क्युकी सुबह 7 बजे उठने से ज्यादा मुश्किल काम मुझे कोई और लगता नहीं था. जहा मुझे 7 बजे उठना जान पे आता था वही जुम्बा की क्लास ही 7 बजे शुरू होती थी मतलब सुबह 6-6.30 की बिच उठना होता था. ऑफिस के लिए घरवाले 7 बजे से 10 बार आवाज़े देकर हार जाते थे तब कही मैं 7.30 तक उठती थी. पर यकीन मानिये उस एक महीने बिना किसीके आवाज़ लगाए मैं खुद अपनी मर्ज़ी से 6 बजे उठकर 15 min पहले क्लास पोहोचति थी ताकि डंबल्स, थोड़ा वार्म उप करने का टाइम मिल जाये. 7 से 7.45 तक ज़ुम्बा फिर भागे भागे घर आती थी 15 min में तैयारी कर निकल जाती थी अपने ऑफिस की बस पकड़ने. फिट बनने की लिए डाइट भी जरुरी थी तो भागादौड़ी में दूध पीकर निकल जाती थी और नाश्ते से लेकर खाने का डब्बा साथ ले जाती थी. जिस लड़की को फल किसी जहर से कम नहीं लगता था उसने दिन में 3 बार फल खाना शुरू किया, खाने का महत्त्व भी कम ही था जिंदगी में इसलिए 40 kg के ऊपर बढ़ना मुश्किल हो रखा था पर बस उस खारदुंगला राइड के लिए हर 2 घंटे में खाना शुरू रहता था और वह भी बिलकुल समय पे. सुबह 8.30 बजे बस में अंडा, फल, ऑफिस पोहोचकर 10-10.15 के बिच नाश्ता,12.30 बजे फिर फल,2.30 बजे खाना , शाम 5 बजे केला और रात 9 बजे तक खाना. सारी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी कई सपने रचे जा रहे थे.और असर ये था की एक दिन ऑफिस जाते जाते बस में सोच रही थी खारदुंगला पोहोचने के बाद की ख़ुशी के बारे में और बस आँखों का पानी रोके नहीं रुक रहा था,टप टप पानी बहे जा रहा है,आँखों में एक चमक है और होटो पे मुस्कान, आसुओ को रोकना ही था वरना बस के लोग पागल समझ लेते. डूब चुकी थी मैं पूरी तरीके से उस सपने में,जीने लगी थी सपने का हर लम्हा अपनी तैयारी के साथ. तैयारी का असर भी अच्छा ही आया था, एक महीने में 40 kg से में 42 पर पोहोच गयी थी.

19657370_1072061806268215_1651657500683806653_n
Koshish mat kijiye isme weight nahi samjhega 😛

गाडी और खुदकी तैयारी तो जोरो पर चालू थी और उतने ही जोरो पर चालू थी मेरे घरवालों की हर वह कोशिश जिस से की मैं खारदुंगला ना पोहोच पाउ.

11 जून 2016 मम्मी पापा की शादी की सालगिरह का दिन, जिसे मना ने के लिए मौजूद थी 3 फॅमिली कुल 3 आंटी मम्मी पापा सोनल दादा और मैं. जश्न उसे कहना बिलकुल ही गलत है क्युकी उस दिन तो जंग लड़ी गयी थी बस तलवारे नहीं थी. जंग में मेरी तरफ थी मैं और दादा और दूसरी तरफ परिवार. मुश्किल था उनसे लड़ना उन्हें समझाना, TVS Scooty Pep की Ad में खारदुंगला और वाहा के रास्ते देखकर उन्होंने मुझे पूछा था ” जिन्दा आएगी तू”, जायज़ थी उनकी हर चिंता, चिंता ख़राब सड़क की, चिंता सड़क पर मिलने वाले लोगो की, की रेप हो जाएगा, वही भारत परोसा जाता है रोज़ टीवी और अखबारों में वही उनके लिए पूरा सच भी था, चिंता थी उन्हें की क्यों इतने फिजूलखर्ची करनी है,चिंता थी उन्हें क्या हासिल कर लेगी वाहा जाकर, क्यों ये ज़िद्द और क्यों ये सपना, वेगो ही क्यों, चिंता की क्या ये सही में वापस फिर हमे मिलेगी. मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं, मैंने थोड़ी फाइट मारी और फिर सोनल दादा का सपोर्ट उनके समझाने का तरीका उसके आगे मान ही गए. 5 घंटे में शांति प्रिय तरीके से जंग ख़तम हो ही गयी कुछ गीले शिकवे बाकी थे वो भी दूर होने ही थे.

गाडी की तैयारी खुद की तैयारी और घरवालों की तैयारी इन सब तैयारियों के बिच आखिर वह दिन आ ही गया 23 जून 2016 जब सुबह सुबह मैं पोहोची रेलवे स्टेशन अपनी गाडी दिल्ली पार्सल करवाने. गाडी पार्सल करने वालो को तो इतनी मिन्नतें “भैया ध्यान से पैक कीजिये, गाडी का ध्यान रखिये, अपना सबकुछ दे रही हु मैं आपको, गाडी को कुछ होना नहीं चाइये,बोहोत लम्बा सफर ये तय कर चुकी है और बोहोत लम्बा सफर तय करना है इसे”. गाडी हुई पार्सल, एक और काम ख़तम. फिर हुई 24 जून 2016 की सुबह, सुबह 7 बजे रोज़ के ही जैसे जुम्बा क्लास पोहोची,7.45 को क्लास से निकलने से पेहले अपनी दोस्त को मिलने गयी, की निकल रही हु मैं आज शाम को दिल्ली,कुछ अलग फीलिंग थी तब कुछ छूट रहा हो जैसे, कुछ डर भी, कुछ अलग बस पर जाना तो था ही. शाम को बैठी मैं दिल्ली की गाडी में और आख़िरकार शुरू हुआ मेरे सपनो का सफर…..

13528905_1352525001428434_8040237785857880852_n
Wego at Delhi Railway Station

उत्सुकता बनाये रखिये सफर थोड़ा लम्बा है, धीरे धीरे तय करेंगे. आगे का सफर अगली पोस्ट मे…..

Pehli Iftari aur Chasme ka Paani (पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी)

IMAG090630 जून 2016 की वो शाम, हलकी सी ठण्ड और कारगिल के एक होटल का वो बरामदा.

तोशिब : आ गए आप कारगिल देखकर,कैसा लगा आपको हमारा कारगिल, यकीन हुआ आपको की पाकिस्तान भी दिखता है यहाँ से.

मैं : मज़ा आया कुछ नए लोगो से भी मिली, नमकीन चाय भी पि. अच्छा खाना  कहा अच्छा मिल जायेगा यहाँ

तोशिब: मैडम इफ्तारी खायी है आपने कभी

मैं :नहीं आज तक तो नहीं खायी

तोशिब: अच्छा खाना पसंद करेंगी आप, घर से शाम में आने ही वाली है आपके लिए भी मंगवा देते है

मैं :हां चलेगा

तोशिब: तो आप फ्रेश हो जाइये जैसे ही इफ्तारी आती है मैं आपको बुलाने आ जाऊंगा

पेहचान  इनसे तब तक बस इतनी थी की कुछ दो घंटे पेहले इनके होटल में रूम बुक किया था. रूम बुक करने में मदद मिली थी २ राइडर्स की, जो बस राह चलते युही मिल गए थे. मुझे कुछ समझ नहीं रहा था की कारगिल में कहा ठहरा जाये तो इन दोनों राइडर्स की मदद ले ली थी. होटल के सामने ही था तोशिब का जनरल स्टोर्स. होटल और जनरल स्टोर्स दोनों ही सँभालने की जिम्मेदारी तोशिब  पर. २ घंटे की पहचान में बात हमने की थी बस १५ min, तोशिब ने मेरी मदद की थी मेरे वेगो पर बंधे सामान को निकालकर रूम तक पोहोचाने में और फिर कारगिल में क्या देखा जा सकता है ये बताने में. जब कारगिल देखकर वापस लौटी तो पता नहीं था अपनी पहली इफ्तारी खाने का मौका मिलेगा

रूम पर जैसी ही पोहोची थकान की वजह से नींद आ गयी. दो तीन बार दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़ आयी पर नींद से उठकर दरवाज़ा खोलने की इच्छा ना हुयी. और आख़िरकार उठकर जब घडी देखि तो ८ बज चुके थे. उठकर फ्रेश होती की फिर से दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़. तोशिब  खाना खाने बुलाने आया था. १० min बाद जब निचे दुकान पर पोहोची तो पता चला मेरे इंतज़ार में तोशिब ने रोज़ा नहीं तोडा है. आप मेहमान है आपके पेहले मैं कैसे खा लेता. दुकान पर तोशिब के अलावा और एक उनके पहचान वाले जिनका टूर्स एंड ट्रेवल्स का बिज़नस था वो भी मौजूद थे. हमारी बात चित शुरू हो उसके पेहले तोशिब  ने जमीन पर ही मेरे बैठने के लिए एक चटाई बिछाई, थैले में से सब्ज़ी मेरे सामने रखी और फिर वही थैला मेरे सामने रखकर उस पर रोटी रख दी.

IMAG0928

इफ्तारी

और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला. दुकान पर मौजूद मेहमान मुझे लेह में रुकने के लिए अलग अलग होटल बता रहे थे. तोशिब के हाव भाव से मुझे समझ आ रहा था की मैंने उनकी बातो में ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. और बिच में ही होटल के टोपीक को रोककर तोशिब ने पूछा मैडम आपने कभी चश्मे का पानी पिया है, बोहोत ही मीठा पानी होता है और मिनरल वाटर से भी अच्छा. मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की आखिर चश्मे का पानी होता क्या है. और तोशिब उसका हिंदी शब्द ढूंढ नहीं पा रहा था.  तभी हमारे 3 की मेहफिल में आये एक और शक्श रात के 8 बजे के अँधेरे और सनाटे को चीरते हुए. नाम तो उनका  याद नहीं पर ये थे तोशिब के  बचपन के दोस्त. इन्होंने अपनी SBI PO की नौकरी छोड़ स्कूल में टीचर बन ना पसंद किया. कह रहे थे नहीं होता मैडम इतना काम हमसे जाने का समय तो था आने का नहीं, लाइफ भी तो कोई चीज़ है. वो नौकरी ही किस काम की जिसके चलते सुकून से शाम को दोस्तों के साथ वक़्त ही न बिताने मिले,छोड़ दी मैंने नौकरी. काश मेरे लिए भी इतना ही आसान होता नौकरी छोड़ पाना.

और इन शख्स ने बताया मुझे चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. उस पानी से मीठा और स्वाद वाला पानी मैंने आज तक नहीं पिया है,प्राकृतिक ठंडा पानी. बातो का काफिला फिर थोड़ा और आगे बढ़ा. मैडम मेरे दोस्त का भी पास ही में होटल है, रात को वाहा कैंपिंग भी होती है. मैडम अभी धुप है तो हम सब्ज़िया सुखाकर रख देते है ताकि ठण्ड में खा सके. वरना तो बस दाल उबालकर खाओ ऐसा लगता है पेट में पूरी दाल दाल ही हो गयी है. रास्ते सभी बंद हो जाते है बर्फ की वजह से तो कुछ मिलना भी मुश्किल. बड़ी मुश्किल से निकलती है ठण्ड,कुछ काम भी नहीं मिलता.

कारगिल के उस जनरल स्टोर में जमीन पर चटाई पर बैठी हुई मैं अकेली इन दोनों लड़को की बाते सुन रही थी. रास्ते पर लड़की तो दूर की बात है पर कोई इंसान भी उस समय मौजूद नहीं था. बस कुछ कुत्तो के भौकने की आवाज़.फिर भी जितना महफूज मैं अपने घर पर बैठकर खुदको मेहसूस करती उतना ही महफूज मुझे वाहा लग रहा था. घर से दूर भी कुछ घर जैसा लग रहा था. ना तो कोई डर था ना ही कोई हिचक और ना शंका. होना भी शायद लाजमी ना था क्योंकि फॉर्मेलिटी कम और अपनापन ज्यादा था,एक रिस्पेक्ट थी. रिस्पेक्ट अपने काम के लिए,अपने मेहमान के लिए,अपनी संस्कृति के लिए. वो काफी था मुझे विश्वास दिलाने के लिए. कारगिल के उस शहर की वो दिखने में तो साधारण दावत पर मुझसे पूछा जाये तो ऐसी दावत के लिए किसी 5 सितारा होटल की दावत छोड़ने का मलाल न होगा. वाहा होता है एक दिखावा सजावट का काटे छुरी का टेबल चेयर का क्रोकेरी  का अंग्रेजी का किसको प्रभावित करने का यहाँ था बस अपनापन.ना कोई ढोंग ना कोई दिखावा बस सादगी और सरल  निश्छल  मन. अगर ये खूबसूरती साथ हो तो किसी और श्रृंगार की क्या कीमत.

बाते कुछ और भी होती पर दूसरे दिन जल्दी निकलना था इसलिए बातो का सिलिसिला वही ख़तम करना पड़ा . दूसरे दिन तोशिब ने सामान गाडी पर बाँधने में मेरी मदद की और दुआ के साथ “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगे” अलविदा किया. वो इफ्तारी और चश्मे का पानी थी मेरी ईदी जो ईद के पेहले ही नसीब हो गयी थी.लौटूंगी शायद फिर कभी कारगिल, परिंदो की तरह.

पेहली मुलाकात

Happiness is when you are struggling to find a hotel to stay in an unknown city as they are skeptical of a girl travelling alone on her scooty and suddenly enters a Hero :p

तो ये कहानी है पटनीटॉप की. पोहोच तो गयी थी मैं पटनीटॉप अब परेशानी हो रही थी रहने की.२ होटल  में पूछ चुकी थी पर अकेली लड़की स्कूटी पे इतना दूर ५० सवाल और थोड़ा शक, होना भी जायज़ था लोगो पे विश्वास वैसे ही कम करते है आजकल हम और फिर एरिया जम्मू कश्मीर का. होशियारपुर से पटनीटॉप का सफर भी कुछ मिला जुला सा ही था कुछ अच्छा कुछ बुरा और अब फिर होटल के लिए मेहनत.निराश होकर एक होटल के निचे खड़ी ही थी तभी ४ रॉयल एनफील्ड गुजरी और उसमे से आखरी रॉयल एनफील्ड थोड़ा आगे जाकर रुकी राइडर ने हेलमेट का गिलास ऊपर किया और आवाज़ दि “ओये Snehal इधर आ” बाइक के पास जाकर देखा Vishal  there he was लाइफ में इतनी ख़ुशी कभी किसी और से मिलकर नहीं हुई थी जितनी उस दिन हुई वह भी पहली मुलाकात मे.हम दोस्त बने FB से राइडिंग के कॉमन पैशन की वजह से. Vishal मुम्बई से और मैं नागपुर से , नागपुर तो लोग कम ही आते है तो हमारा तय हुआ था की अगर कभी मैं  मुम्बई या फिर पुणे भी आयी तो हम मिलेंगे पर ये तीनो शहर छोड़कर हम मिले पटनीटॉप मे एक अनजान शहर मे.मिले और उसके बाद तो टेंशन की बात ही नहीं “चल तू हमारे साथ रहेगी हम ये होटल मे रुके है “. दुनिया बोहोत छोटी है और जब मुझपे मुसीबत आती है तो शायद और थोड़ी छोटी हो जाती है ;p.

13613586_1205795192772222_2929220704604023973_o

नमकीन चाय मीठी याद (Namkin Chai Mithi Yaada)

करगिल बॉर्डर से थोड़ा आगे हुंडरमान गाँव जो पाकिस्तान से 1971 वॉर में हमारे पास आ गया था. उसी से थोड़ा ऊपर सेना चौकी के बाद एक छोटी बस्ती उन लोगो की जो लड़ाई के बाद भारत में ही रह गए. वाहा जाने की इजाज़त हर किसीको तो नहीं है जैसा कि आर्मी जवान ने मुझे बताया पर महाराष्ट्र की गाडी होने का मुझे थोड़ा फायदा मिला और बस्ती में जाने मिल गया.

IMAG0911
Hunderman Village

चेक पोस्ट के थोड़ा आगे पोहोचते ही एक कार को टेककर रास्ते के किनारे दो लोग बैठे हुए दिखे. एक कुछ ९० साल के बुजुर्ग और एक अंकल.मैंने गाडी रोकी पूछने के लिए की और आगे जा सकते है ना बड़े मुस्कुराते हुए उन्होंने जवाब दिया हा हा देख आओ आगे.देखने के लिए तो कुछ था नहीं पर कुछ अलग ख़ुशी मिल रही थी. कुछ बच्चे भी दौड़ते हुए आये मिलने के लिए तो और अच्छा लग रहा था. नाम के अलावा बात उन्होंने कुछ की नहीं. वापसी में वो दोनों वही बैठे थे गाडी काफी धीमी गति में थी तो आवाज़ देकर पूछ लिया देख आये बेटा, मैंने जवाब दिया हा अंकल. फिर थोड़ी पूछताछ आप कहा से आये हो अकेले आये हो वो भी स्कूटी पे जवाब दिए उनके सवालो के और फिर अगला सवाल चाय पिओगे बेटा, जवाब हा ही था. अंकल दौड़कर घर गए,घर थोड़ी उचाई पे था और  बस चाय ही नहीं तो साथ रोटी भी लेकर आये. मुझे बैठने के लिए एक पत्थर दिया और बस बैठ गए हम गप्पे मारने. सबसे पहले तो वो मुझे चाय के बारे में बताने लगे. नमकीन चाय पीते है हम यहाँ .ठण्ड में ये चाय काफी मदद करती है और एसिडिटी की प्रॉब्लम भी नहीं करती और भी अलग अलग फायदे.  रंग देखकर ही मुझे कुछ अजीब सा लग रहा था पर पीनी तो थी ही.जैसे  ही एक घुट पि आगे पिने की इच्छा ख़तम  सी हो गयी थी पर वो मुमकिन नहीं था की किसीका दिल तोडा जाये. होटल होता तो चाय वही छोड़कर चली जाती पर यहाँ तो मेहमाननवाज़ी थी. चाय के साथ वो रोटी खाने के लिए भी बोलने लगे कुछ खाया नहीं होगा आपने , भूक लगी होगी आपको,दूर से सफर करके आ रहे हो , थोड़ी खा लो पर वो मुमकिन नहीं था, हाथो में पेट्रोल लगा हुआ था.जब तक मैं चाय पीती एक और अंकल आ गए और उनके साथ उनका बेटा. अब हम ३ से ५ हो गए थे .वो अंकल के भी वही सवाल अकेले आये हो इतनी दूर से वो भी स्कूटी से. जब सारे जवाब हा में मिले तो वो कहते है आप पढ़े लिखे हो ना बेटा  इसलिए ये हिम्मत कर पाए हमारी बच्चिया तो नहीं कर पायेगी. कारगिल से ऊपर आने में ही डर जाती है.

पढ़ने के काफी फायदे होते है हम तो नहीं पढ़ पाए.स्कूल आधे समय बंद रहती थी हमारी और आधे समय टीचर नहीं, छोड़ दी हमने पढाई. अब बनी है थोड़ी अच्छी स्कूल,8th क्लास तक है पर, टीचर कभी आते है कभी नहीं.उनकी बातो के साथ चाय धीरे धीरे चल रही थी फिर भी आधी ही हो पायी थी और ये मुझे पता था अगर ऐसे एक एक घुट लेकर चाय पि गयी तो आज ना ख़तम होनी. तो उठाया गिलास और पि ली एक साथ. चाय पीकर कैसा लगा बोहोत गन्दा क्योंकि इसके पहले कभी नहीं पि थी. सच कहा जाये तो अगर मैं किसी और जगह बैठी होती तो उलटी कर देती पर याहा मेरे दिल, दिमाग, तन, मन का भी शुक्रिया की जिस प्यार से एक अनजान के लिए वो चाय और रोटी लाये थे उस प्यार की लाज रख ली. अगर वो उस समय एक और गिलास चाय लाकर रख देते तो शायद उनके मुस्कुराते चेहरे के लिए वो भी पि जाती.चाय ख़तम हुई पर हमारी बाते नहीं भारत पाकिस्तान के किस्से, यादे.गाँव में रहकर जो वो काम करते है उसकी बाते,छोटे छोटे खेत और ज़िन्दगी. बाते और भी होती पर अँधेरा होने से पेह्ले गेस्ट हाउस पोहोचना था. तो अलविदा कहकर निकल पड़ी उनकी दुवाओ  और कुछ सवाल के साथ.जो सबसे बड़ा सवाल मन में आया, वो ये  की कुछ लोग है जो चाह कर भी पढ़ नहीं पा रहे और कुछ हम जैसे खुदको एडुकेटेड कहने वाले लोग क्या इसका सही इस्तेमाल कर रहे है. क्या इसकी एहमियत समझ पा रहे है. क्या ये समझ पा रहे है की कितने खुशनसीब है हम. जवाब मिलना बाकी है,जवाब कब मिलेंगे वो   तो  नही पता पर सवाल जहा से आये वोह लम्हा हमेशा एक मीठी याद बनकर साथ रहेगा.

सुचना  चाय बुरी इसलिए नहीं लगी की बुरी बानी थी चाय बुरी इसलये लगी की कभी पहले पि ही नहीं थी

IMAG0912
Namkin Chai