The Dream Ride (Part I)

रास्ता सफर और ज़िन्दगी.लेह लददाख के उस सफर में ना तो रास्ता आसान न तो वाहा तक पोहोचने का सफर और ज़िन्दगी की तो अपनी एक अलग ही लड़ाई चली आ रही है बरसो से. पर सब अगर आसान होता तो रोमांच कहा रह जाता और मुश्किलें चाहे जितनी भी आये जब आप कुछ करने की ठान ही लेते है तो रास्ता तो कुदरत खुद ही बना देती है. मई 2016 जब अपने एक दोस्त के फ़ोन कॉल पर मैंने तय कर लिया था की मैं लददाख जा रही हु,बस ज़िद्द इतनी थी की जाउंगी तो अपने वेगो पर ही. मेरी मोपेड वेगो को वादा था मेरा उसे खारदुंगला टॉप जो की दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता माना जाता है, 18380 feet वाहा ले जाना. दोस्त ने काफी समझाने की कोशिश की “वेगो नहीं चल पायेगी वाहा” पर वादा किया था तो निभाना भी था और पता भी करना था आखिर क्या है ये लददाख का पागलपन और क्यों वेगो नहीं चल सकती. अभी तक कश्मीर, उसकी वादियाँ, वहा का डर,लेह तक जाने वाला मुश्किल रास्ता और आने वाली मुश्किलों के बारे में बस सुन रखा था पर अब खुद जाने का तय किया था,डर लग रहा था. कई सवाल थे मन में क्या मैं सही में तैयार हु ये करने के लिए? क्या मैंने अपने दोस्तों की बात मान लेनी चाइये वेगो से ना जाने की ? क्या मैं ये कर पाऊँगी?. अपने डर और सवाल के जवाबो के लिए व्हाट्सप्प किया मेरे मार्गदर्शक डॉ अमित निकम ये खुद 3 बार लेह जा चुके है और 8 साल से राइडिंग कर रहे है. मुझे पता था इनसे बेहतर मुझे और कोई सही तरीके से नहीं समझा पायेगा. मेरी पेहले की राइड्स में भी इनका काफी सपोर्ट रहा था. उठाया फ़ोन किया मैसेज “खारदुंगला जाना है वेगो से” जवाब था जाओ. आत्मविश्वास जैसे सातवे आसमान पर था, अमित ने कह दिया मतलब तो पक्का वेगो जाएगी खारदुंगला. उसके बाद काफी सारी बाते, क्या तैयारी लगेगी, कैसे है वाहा के रास्ते,काहा काहा ज्यादा दिक्कते आ सकती है,साथ में क्या क्या रखना होगा, मुश्किल आयी तो किस से मदद ले सकती हु, गाडी में क्या क्या ध्यान देना होगा और उन सबके पहले क्युकी गाडी अभी तक किसी ऊंचाई पर नहीं चढ़ी थी तो मुझे सुझाव दिया गया- गाडी का टेस्ट पचमारी के धूपगढ़ पर चढ़ाकर. धूपगढ़ मध्य भारत की सबसे ऊँची जगह है. मई महीने के अंत तक ये सुझाव का पालन भी कर लिया था मैंने और गाडी में क्या क्या ठीक करना होगा ये भी समझ आ गया था.

 

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Wego at Dhupgarh

गाडी की तैयारी तो समझ आ गयी थी अब बारी थी खुदके तैयारी की. लददाख का मौसम,ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी इन बातो के लिए भी खुदको तैयार करना था. तो तय हुआ की शारीरिक रूप से तैयार होने के लिए ज़ुम्बा लगाया जाये. मई के आखरी हफ्ते में शुरू हुई जुम्बा क्लासेज.मेरा ऑफिस नागपुर से कुछ 85 km की दुरी पर है,10.30 बजे ऑफिस का समय होता है तो 8 बजे घर से निकल जाना होता था,आधे दिन मैं ऑफिस इसलिए नहीं जाती थी क्युकी सुबह 7 बजे उठने से ज्यादा मुश्किल काम मुझे कोई और लगता नहीं था. जहा मुझे 7 बजे उठना जान पे आता था वही जुम्बा की क्लास ही 7 बजे शुरू होती थी मतलब सुबह 6-6.30 की बिच उठना होता था. ऑफिस के लिए घरवाले 7 बजे से 10 बार आवाज़े देकर हार जाते थे तब कही मैं 7.30 तक उठती थी. पर यकीन मानिये उस एक महीने बिना किसीके आवाज़ लगाए मैं खुद अपनी मर्ज़ी से 6 बजे उठकर 15 min पहले क्लास पोहोचति थी ताकि डंबल्स, थोड़ा वार्म उप करने का टाइम मिल जाये. 7 से 7.45 तक ज़ुम्बा फिर भागे भागे घर आती थी 15 min में तैयारी कर निकल जाती थी अपने ऑफिस की बस पकड़ने. फिट बनने की लिए डाइट भी जरुरी थी तो भागादौड़ी में दूध पीकर निकल जाती थी और नाश्ते से लेकर खाने का डब्बा साथ ले जाती थी. जिस लड़की को फल किसी जहर से कम नहीं लगता था उसने दिन में 3 बार फल खाना शुरू किया, खाने का महत्त्व भी कम ही था जिंदगी में इसलिए 40 kg के ऊपर बढ़ना मुश्किल हो रखा था पर बस उस खारदुंगला राइड के लिए हर 2 घंटे में खाना शुरू रहता था और वह भी बिलकुल समय पे. सुबह 8.30 बजे बस में अंडा, फल, ऑफिस पोहोचकर 10-10.15 के बिच नाश्ता,12.30 बजे फिर फल,2.30 बजे खाना , शाम 5 बजे केला और रात 9 बजे तक खाना. सारी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी कई सपने रचे जा रहे थे.और असर ये था की एक दिन ऑफिस जाते जाते बस में सोच रही थी खारदुंगला पोहोचने के बाद की ख़ुशी के बारे में और बस आँखों का पानी रोके नहीं रुक रहा था,टप टप पानी बहे जा रहा है,आँखों में एक चमक है और होटो पे मुस्कान, आसुओ को रोकना ही था वरना बस के लोग पागल समझ लेते. डूब चुकी थी मैं पूरी तरीके से उस सपने में,जीने लगी थी सपने का हर लम्हा अपनी तैयारी के साथ. तैयारी का असर भी अच्छा ही आया था, एक महीने में 40 kg से में 42 पर पोहोच गयी थी.

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Koshish mat kijiye isme weight nahi samjhega 😛

गाडी और खुदकी तैयारी तो जोरो पर चालू थी और उतने ही जोरो पर चालू थी मेरे घरवालों की हर वह कोशिश जिस से की मैं खारदुंगला ना पोहोच पाउ.

11 जून 2016 मम्मी पापा की शादी की सालगिरह का दिन, जिसे मना ने के लिए मौजूद थी 3 फॅमिली कुल 3 आंटी मम्मी पापा सोनल दादा और मैं. जश्न उसे कहना बिलकुल ही गलत है क्युकी उस दिन तो जंग लड़ी गयी थी बस तलवारे नहीं थी. जंग में मेरी तरफ थी मैं और दादा और दूसरी तरफ परिवार. मुश्किल था उनसे लड़ना उन्हें समझाना, TVS Scooty Pep की Ad में खारदुंगला और वाहा के रास्ते देखकर उन्होंने मुझे पूछा था ” जिन्दा आएगी तू”, जायज़ थी उनकी हर चिंता, चिंता ख़राब सड़क की, चिंता सड़क पर मिलने वाले लोगो की, की रेप हो जाएगा, वही भारत परोसा जाता है रोज़ टीवी और अखबारों में वही उनके लिए पूरा सच भी था, चिंता थी उन्हें की क्यों इतने फिजूलखर्ची करनी है,चिंता थी उन्हें क्या हासिल कर लेगी वाहा जाकर, क्यों ये ज़िद्द और क्यों ये सपना, वेगो ही क्यों, चिंता की क्या ये सही में वापस फिर हमे मिलेगी. मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं, मैंने थोड़ी फाइट मारी और फिर सोनल दादा का सपोर्ट उनके समझाने का तरीका उसके आगे मान ही गए. 5 घंटे में शांति प्रिय तरीके से जंग ख़तम हो ही गयी कुछ गीले शिकवे बाकी थे वो भी दूर होने ही थे.

गाडी की तैयारी खुद की तैयारी और घरवालों की तैयारी इन सब तैयारियों के बिच आखिर वह दिन आ ही गया 23 जून 2016 जब सुबह सुबह मैं पोहोची रेलवे स्टेशन अपनी गाडी दिल्ली पार्सल करवाने. गाडी पार्सल करने वालो को तो इतनी मिन्नतें “भैया ध्यान से पैक कीजिये, गाडी का ध्यान रखिये, अपना सबकुछ दे रही हु मैं आपको, गाडी को कुछ होना नहीं चाइये,बोहोत लम्बा सफर ये तय कर चुकी है और बोहोत लम्बा सफर तय करना है इसे”. गाडी हुई पार्सल, एक और काम ख़तम. फिर हुई 24 जून 2016 की सुबह, सुबह 7 बजे रोज़ के ही जैसे जुम्बा क्लास पोहोची,7.45 को क्लास से निकलने से पेहले अपनी दोस्त को मिलने गयी, की निकल रही हु मैं आज शाम को दिल्ली,कुछ अलग फीलिंग थी तब कुछ छूट रहा हो जैसे, कुछ डर भी, कुछ अलग बस पर जाना तो था ही. शाम को बैठी मैं दिल्ली की गाडी में और आख़िरकार शुरू हुआ मेरे सपनो का सफर…..

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Wego at Delhi Railway Station

उत्सुकता बनाये रखिये सफर थोड़ा लम्बा है, धीरे धीरे तय करेंगे. आगे का सफर अगली पोस्ट मे…..

India-The Other Side

आज tripoto पर एक सवाल देखा  “I am not sure about travelling Solo  in India. Can anyone suggest some safe destinations” और उस पर कुछ लोगो के जवाब थे की “भारत सुरक्षित नहीं  है,मैं खुद अपने लोगो के बिच सुरक्षित मेहसूस नहीं करती “. इस सच को झुटलाया नहीं जा सकता पर ये पूरा सच भी तो नहीं है. एक भारत वो भी तो है जहा अकेली लड़की को मौका  नहीं बल्कि  जिम्मेदारी समझकर रक्षा की जाती है. अगर आप सोच रहे होंगे की ये बस कहने, सुन ने, लिखने में ही अच्छा लगता है तो आइये आपको मिलवाती हु भारत के दूसरे पहलु से. इस भारत से मेरी मुलाकात हुई जब अकेली लड़की होते हुए मैंने भारत भ्रमण करने का सोचा इस जिज्ञासा के साथ के चलो अपने लोगो का जाने पेहचाने, तो शुरू से शुरुआत करती हु-

मेरा पहला सोलो ट्रिप दिल्ली अमृतसर- सच्च बताऊ तो बोहोत डरी हुई थी पर जब दिल्ली पोहोची हुमायूँ  के मकबरे पर सुबह  टहलने आयी एक आंटी ने मुझे अकेला देखकर बड़ी उत्सुकता से सवाल पूछा अकेले आये हो और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला जिसमे था कुछ इतिहास भी. अकेला बिलकुल मुझे लगा ही नहीं. दिल्ली की यात्रा ख़तम कर मैं पोहोची अमृतसर, सुबह 4 बजे गोल्डन टेम्पल जाना था तो सुबह के 3.30 बजे मैंने रस्ते से ऑटो पकड़ा सुरक्षित गोल्डन टेम्पल पोहोची  और गोल्डन टेम्पल से वाघा बॉर्डर के लिए भी ऑटो, शर्मा जी का ऑटो था वो. खूब बाते हुयी उनसे उनके परिवार के बारे में मेरे परिवार के बारे में. वो आस्चर्यचकित हो रहे थे की मेरे घरवालों ने मुझे अकेले इतनी दूर भेज दिया.”दीदी मेरी  3 बेहने है पर ना कभी वो हिम्मत कर पायी अकेले कही जाने की ना हमारी हिम्मत हो पायी उन्हें अकेला भेजने की”. मुझे कोई मंदिर देखना होता तो खुद मुझे दरवाज़े तक छोड़कर आते “दीदी हम है आपके साथ कोई परेशानी न होने देंगे”. फिर वाघा बॉर्डर पर मुलाकात हुई  कोलकता के एक परिवार से और आज भी उनके साथ मैं संपर्क में हु.जब कोलकाता जाने का प्लान बना और दादा भाभी को खबर पोहोचाई उनकी ख़ुशी तो पूछिए मत ” आपको हमारे घर पर ही रहना है, अच्छा आप चिकन और फिश खाते है ना”.

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Humayun Tomb Delhi

मेरी वाराणसी से रीवा की राइड– रीवा जाते हुए मैंने अल्लाहाबाद का रास्ता ले
लिया, अल्लाहाबाद तक तो सब ठीक रहा पर मुश्किल शुरू हुई उसके बाद. एक तो रास्ता बड़ा ख़राब शाम के 6 बज चुके थे 130 km और जाना था और गाडी थी मोपेड. रास्ते का काम चालू था सफ़ेद मिट्टी में गाडी फसे जा रही थी मुश्किल से चल रही थी मोपेड और रास्ता सही है गलत समझ नहीं रहा, तभी सामने एक रीवा के नंबर प्लेट की गाडी दिखी,मैं समझ गयी की ये भी रीवा जा रहे है हो ली मैं उनके पीछे पीछे. कुछ दूर तक तो पीछे चली फिर अचानक से उन्होंने अपनी गाडी मोड़ ली दूसरे रस्ते पर, मैंने जब बिच में रूककर लोगो से पूछा था तब मुझे बताया गया था की आपको बिलकुल सीधा सीधा जाना है. मुझे लगा हो सकता है उन्हें कही और जाना हो और मैं चली सीधा सीधा. रात हो चुकी थी,सीधा चलते चलते मैं ऐसी जगह जा फसी जहा रास्ता ही ख़तम हो गया था. रास्ते पर कोई लाइट नहीं और किसी से पूछ सकू ऐसा कोई इंसान भी नहीं. डरकर बस रोना ही बाकि था की पीछे से आवाज़ आयी अरे आप तो गलत रास्ते आ गयी,मैंने वाहा से गाडी मोड़ ली थी क्युकी वो रास्ता अच्छा था. मुझे लगा आप पीछे आ जाएगी, आप नहीं दिखी तो मैं आ गया आपको देखने अब साथ ही चलिएगा. 100 km का सफर हम दोनों ने साथ में तय किया उनकी बाइक और मेरी मोपेड. सुनसान रस्ते कोई कुछ कर ले तो खबर भी ना मिले ऐसे,बिच में बारिश भी मिली हम ढाबे पर रुके नाश्ता किया और 10 बजे हम रीवा पोहोचे बिलकुल सही सलामत. वाहा से मैं अपने होटल और वो अपने घर. आज भी हम संपर्क में है.

मेरी कन्याकुमारी राइड– कन्याकुमारी से कुछ 117 km पेहले मेरी मोपेड ख़राब हो गयी ख़राब हुई इंडस्ट्रियल एरिया में और किस्मत से एक इंडस्ट्री के सामने. गाडी स्टार्ट तो हो रही थी पर आगे नहीं बढ़ रही थी. इंडसट्री के गार्ड को समझा की कोई परेशानी जरूर है. वो देखने आये पर दिक्कत ऐसी की ना उन्हें हिंदी समझ रही थी ना इंग्लिश. उन्होंने और दो लोगो को बुलाया की कम से कम वो गाडी की परेशानी समझे पर ना वो गाडी की परेशानी   समझ पा रहे थे और ना मेरी भाषा.ऐसा करते करते लोग जमा होते चले गए और फिर आये उनके मेंटेनेंस मैनेजर उन्हें हिंदी इंग्लिश समझ रही थी पर गाडी की परेशानी नहीं. उन्होंने पेहले मुझे TVS को कॉल करने लगाया जब TVS से मदद नहीं मिल पायी तो उन्होंने अपने पहचान वाले मैकेनिक को कॉल लगाया और आने के लिए कहा, कॉल कट हुआ ही था की उनके कंपनी का एक वर्कर आया जिसे हिंदी भी आती थी इंग्लिश समजती थी और जिन्होंने गाडी की प्रॉब्लम भी पता लगा ली. उन्होंने तुरंत मैकेनिक को कॉल करके परेशानी बताई और हो पायेगा ठीक या नहीं पूछा जवाब हां ही था. जब ये सब लोग मिलके मेरी परेशानी का हल ढूंढ रहे थे मैं बैठकर कॉफ़ी पि रही थी “मैडम आप बैठ जाइये Have कॉफ़ी”. कुछ  देर बाद मैकेनिक आया मैंटेनस मैनेजर  उनके साथ गाडी को धक्का  देकर लेकर  गए और मुझे कार से वर्कशॉप तक छोड़ा गया. जब तक गाडी ठीक नहीं हो जाती मैनेजर मेरे साथ रहे तिरुनेलवेल्ली तक गाडी उन्होंने खुद चलायी और वाहा से 90 km दूर कन्याकुमारी का सफर रात को 11.30 बजे मैंने पूरा किया.

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Kanyakumari

अनुभव ऐसे और भी है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, बिना जान पहचान किसी ने बस युही रोटी खिला दी तो किसीने चाय पीला दी, मेरा फ़ोन बंद पड़ा तो कॉल के लिए मदद कर दी. एक किताब लिख दी जाए अनुभव इतने है, लिखूंगी उनके बारे में भी पर एक एक कर कर . आज जितने अनुभव लिखे है उम्मीद है उसमे आपको भारत के दूसरे पहलु की झलकियां जरूर दिखी होगी  . आप अगर मेरी नज़र से भारत पूछेंगे तो मैं बस यही कहूँगी “हां थोड़ा बुरा तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” थोड़ा नज़र बदलकर देखिये और एक बार हिम्मत कर कर देखिये. टीवी, पेपर, सोशल मीडिया इसके परे भी एक सच्च बस्ता है जो आप खुद अपने अनुभवों से जान और समझ सकते है. हर अनुभव अच्छा होगा जरुरी नहीं पर उसके डर से घर से बहार निकलना तो छोड़ा नहीं जा सकता, लड़ना नहीं सिखेंगें तो देश बदलेंगे कैसे,जीतेंगे कैसे. आपकी कमज़ोरी ही किसी और की ताकत बनती है, आप किसे ताकतवर देखना चाहते है तय आपको करना होगा.

Kaalu

इनसे मिलिए ये है कालू. कालू से हम मिले कळसूबाई पीक  की नाईट ट्रेक पर कळसूबाई बोले तो महाराष्ट्र का एवेरेस्ट. हम हमारे गाइड के साथ निकले पीक के लिए और ये जनाब हमारे पीछे पीछे, थे ये गाइड के पेहचान वाले ही. 15 min ही हुए थे हमे शुरुवात किये हुए की गाइड को याद आया वो अपना फ़ोन शायद गाओं में ही भूल गए है. हमने कहा उनसे आप जाइये आपका फ़ोन लेकर आइये हम यही रुकते है. गाइड तो चले गए हमे लगा था कालू जनाब भी चले जायेंगे, पर नहीं ये बैठे रहे हमारे साथ हमारे बाजू में ही जब तक गाइड आये नहीं. गाइड आने के बाद शुरू की हमने फिर आगे की चढाई और कालू जी हमारे साथ साथ. हमे तो हिम्मत क्या ही देते ये खुद ही इतने डरपोक की थोड़ी भी आवाज़ हुई नहीं की हमारे पैरो के पास आ जाते. कालू ने तो कई बार हमे ही आजु बाजु छान बिन करने को मजबूर कर दिया था की कही कोई है तो नहीं. था कोई नहीं ये युही होशियार बने जा रहे थे. कुछ सुबह 3 बजे हम कळसूबाई टॉप से कुछ 10 min पेहले कुछ हॉटेल्स जाहा रात को रुका जा सकता है वहा पोहोचे. वाहा हमारे गाइड का भी एक होटल था जहा उन्होंने हमारे सोने का इंतज़ाम कर दिया. सुबह कुछ 6 बजे हम टॉप पर जाने के लिए निकले , इस बार गाइड साथ नहीं आने वाले थे क्युकी उन्हें नाश्ते चाय की तैयारी करनी थी ट्रेक के लिए आये और आने वाले बाकि लोगो के लिए भी. Saturday Sunday होने की वजह से काफी लोग ट्रेक के लिए आते है  तब  ऑफ सीजन में भी बिज़नेस इनका अच्छा  हो  जाता है. गाइड नहीं भी साथ आये तो भी कालू जनाब हमारे साथ साथ कळसूबाई टॉप चढ़े, जब तक हम वाहा रुके ये भी हमारे साथ और निचे उतरना चालू किया तो  भी हमारे पीछे पीछे ही. ट्रेक के लिए आये हुए एक ग्रुप के किसी मेमबर ने कमेंट भी किया ये आपके साथ साथ  आया है,हर किसीके साथ आते नहीं ये.

घर पर  कोई पालतू जानवर कभी रहा नहीं तो लोग जो इतना कहते है  कुत्ते आपके सबसे अच्छे दोस्त होते है, निष्ठावान होते है ये सब कभी महसूस करने मिला ही नहीं. फिर कालू से मिलकर समझा की लोग जो भी केहते है सच्च ही है. हमने तो कालू को एक बिस्किट भी नहीं खिलाया था,फिर भी वो हमारे साथ रहा. हर ट्रिप में अलग अलग लोगो से रिश्ते बनाये, वो रिश्ते बने उन लोगो से बात करके कुछ अपने बारे में बताकर कुछ उनके बारे में जानकार और फिर इस ट्रिप में बना ये एक अनोखा रिश्ता सारे रिश्तो से अलग, जहा ना कुछ बताने की जरुरत पड़ी ना कुछ जान ने की. उम्मीद है जब कभी अगली बार कळसूबाई गयी कालू इसी तरह हमारे साथ चलेगा.

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Kaalu

युथ सेन्टर (Youth Center)

कुछ रिश्ते बनाते बनाते जहा पूरी ज़िन्दगी निकल जाती है वही कुछ रिश्ते बस एक मुस्कुराहट से ही बन जाते है. ऐसा ही कुछ प्यारा सा रिश्ता बना मेरा झाँसी से १६ km दूर बसे ओरछा गांव के बच्चो से.यु तो ओरछा में कई आकर्षण है पर मुझे जिसने सबसे ज्यादा आकर्षित किया वह है वाहा का “युथ सेन्टर” और वाहा के बच्चे. जितने मासूम ये बच्चे है उतने ही अनुशाषित भी. इस युथ सेण्टर की शुरुआत की फ्रेंड्स ऑफ़ ओरछा की आशा डिसूज़ा ने जो अल्मोड़ा,उत्तराखंड की निवासी है. जहा युथ सेन्टर की शुरुआत इन्होंने की उसे सँभालते ओरछा के होम स्टे के होस्ट के बच्चे है. आशा डिसूज़ा महीने में एक बार आकर नए नए गेम्स लाकर देती है और बच्चो को सिखाकर भी जाती है. उसके अलावा युथ सेन्टर में योगदान रहता है होम स्टे में रुके हुए मेहमानों का जो दुनियाभर से आते है और इन्हें कुछ नया सीखा जाते है.

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Wall Painting
युथ सेंन्टर खुलने का निर्धारित समय है दोपहर के ३ से ४ जिसमे करीब २० से २५ बच्चो के नाम रजिस्टर्ड है. इसे खोलने की जिम्मेदारी किसी टीचर मेंटर या गाइड की नहीं तो युथ सेन्टर की ही एक बच्ची खुशि जो ५ वि कक्षा में पढ़ती है उसे दी गयी है. गुरुवार जो की छुट्टी का दिन निर्धारित है उस दिन छोड़कर बाकि दिन अपने समय पर ये युथ सेन्टर खोल दिया जाता है. बिना अपनी ख़ुशी दीदी से परमिशन लिए ये बच्चे अंदर नहीं आते, अंदर आते ही गुड आफ्टरनून विश करते है .ये है सारे हमउम्र ही पर उस एक घंटे के लिए ख़ुशी दीदी उनकी टीचर बन जाती है जिसे वे बिना किसी जबरदस्ती और कोई न देख रहा हो तो भी आदर देना जानते है. अंदर आकर बिना कोई शोर किये बच्चे अपने लिए गेम्स सेलेक्ट करते है. गेम्स भी ऐसे जो उन्हें कुछ सिखाये जैसे मास्टरमाइंड पजल फिर कुछ देर इंग्लिश सीखते है और थोड़े आउटडोर गेम जैसे फोर बॉक्स और हर संडे ड्राइंग.

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Spider Man Puzzle जिसमे थोड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन मेरा भी है 😉

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और काऊ की हैडलाइन पर ड्राइंग फ्लैग की

जहा उनका अनुशाषण ईमानदारी देखकर मैं अचम्भे में थी उतनी ही हैरानियत हुई उनकी बाते सुनकर.जब मैंने उनसे उनके सपनो के बारे में पूछा तो जवाब मिले पेंटर,नेवी,आर्मी,कलेक्टर और जो मेरा फेवरेट जवाब था मुझे ना पैसे कमाकर अमेरिका अफ्रीका घूमना है दुनिया देखनी है :). और फिर जब बात चली की स्कूल में पढाई के अलावा आप लोग और किन एक्टिविटीज में भाग लेते हो तो एक जवाब आया मैडम मुझे न डांस करना बोहोत पसंद  है और इस बार २६ जनवरी को पार्टिसिपेट भी करना था. पर ड्रेस लेने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे तो मैं नहीं कर पाया. इस पर मैं कुछ बोलू उसके पेह्ले ख़ुशी और बाकि बच्चो ने ही बोलना चालू कर दिया. अरे तो हर बार जरूरी थोड़ी है की नयी ड्रेस ली जाये अपने दोस्तों से भी तो ली जा सकती है. मुझे भी “बुमरो बुमरो” डांस में ड्रेस की जरुरत पड़ी थी तब मैंने अपने दीदी से ड्रेस ले लिया था. और पैसे हम भी तो बचा सकते है,अगर कोई रिश्तेदार या हमारे घर आये  मेहमान पैसे देकर जाते है तो जमा करके रखना चाहिये. फिर जब कभी जरुरत पड़े तो उसी में से निकाल सकते है. अगर कभी मम्मी पापा को पैसो को लेकर टेंशन हो तो उन्हें भी मदद कर सकते है,बिना ये सोचे की ये बस हमारे पैसे है. मैंने १३०० रूपए जमा कर लिए थे उसमे से ५०० की मैंने ड्रेस खरीद ली अपने लिए और ८०० अभी भी बाकि है,तुम भी ऐसे कर सकते हो.

इन बच्चो की समझदारी बस इतनी ही नहीं तो जहा आधी दुनिया धर्म के नाम पर लड़ती है वही ये सभी धर्म का आदर भी करना जानते है. बाहर खेलते खेलते किसीने “अल्लाह हु अकबर ” बड़ी ही मस्ती में गाना शुरू किया और उसी मस्ती में सारे बच्चे वैसे ही गाने लगे.2 ही सेकंड हुए होंगे की सब रुक गए और खुद ही सबने  सॉरी बोल दिया ये कहकर की “ये किसीके धर्म का गाना है उसका मजाक  नहीं उड़ाना चाहिए अगली बार हम ऐसा नहीं करेंगे”. खेलने के बाद इनका समय ख़तम होता है अटेंडेंस के बाद ही.

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Four Square

फक्र हो रहा था इन बच्चो से मिलकर। जहां शहर के बच्चो को देखकर हमेशा एक सोच में पढ़ जाती हु की कहा खो गया है इनका बचपन, वही उस छोटे से गाँव के कुछ बच्चो को देखकर फिर बच्चा बन जाने की इच्छा जाग उठी. ख़ुशी हो रही थी ये देखकर की आज भी ऐसा बचपन कही जिन्दा है. युथ सेन्टर पर जाकर मेरी कोशिश चालू थी की इन्हें कुछ नया सिखाकर जाऊ. पर हुआ कुछ उल्टा दो दिन के उस एक एक घंटे ने मुझे  ही बोहोत कुछ सीखा दिया. उन छोटे बच्चो को देखकर लगा था इन्हें कुछ समझदारी की बाते सिखाकर जाउंगी पर मेरी समझदारी की बाते जाहा किताबो से निकालकर आयी होती वही उनकी समझदारी जिंदगी को जीकर आ रही थी.इसलिए निदा फाजली कहेते है की

घटाओ में निकलो धुप में नहाकर देखो

ज़िन्दगी क्या है किताबो को हटाकर देखो

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बच्चो की गैंग
अगर कभी ओरछा जाये तो अपना कुछ समय इस युथ सेन्टर में जरूर बिताये.उन बच्चो के लिए नहीं तो अपने लिए,कुछ नया जरूर सीखकर आएंगे.