जिंदगी तुझे क्या लिखू

जिंदगी तुझे क्या लिखू
स्कूल में हारी हुई वो रेस लिखू
जिसने बहुत रुलाया था
या डांस में जीती हुई वो ट्रॉफी
जिसने खुद पे विश्वास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो जन्मदिन लिखू
जिसमे पूरा मोहल्ला आया था
या वो एक कॉल जिसके इंतज़ार में
पूरा दिन काटा था

जिंदगी तुझे वो रिजल्ट लिखू
जब नंबर पहला आया था
या वो नंबर जिसने फेल ठहराया था

जिंदगी तुझे वो तबादला लिखू
जिसने दोस्तो से अलग करवाया था
या वो चिट्ठी जिसमे दोस्तो का
हाल बया होकर आता था

जिंदगी तुझे वो नए शहर का डर लिखू
जब लोगो में पहचान बना ने की जदोजहद की थी
या वो ट्रैन का सफर
जिसे पूरा करने की पहली बार अकेले हिम्मत की थी

जिंदगी तुझे पहली नौकरी का
वो ऑफर लेटर लिखू
जिसने बड़े होने का एहसास दिलाया था
या होस्टल का वो कमरा
जहा कितने ही किस्से
कितने ही कहानियों को जिया था

जिंदगी तुझे वो दोस्त लिखू
जिसने हर मुश्किल को आसान बनाया था
या वो गलतफहमी जिसने
अपने कुछ ना होने का एहसास दिलाया था

जिंदगी तुझे वो लंबी सड़क लिखू
जिसपे चलकर अपने आप को पाया था
या दो कदम का वो फासला
गुरुर में जिसे ना चाहते हुए भी बढ़ाया था

जिंदगी तुझे वो ब्लाइंड टर्न लिखू
जिसने मौत से मिलाया था
या वो हेलमेट जिसने
फिर तुझसे मिलाया था…

अलग रंग अलग ढंग
अलग अंदाज़ अलग जज़्बात में
ऐ जिंदगी तू हर बार मिली
अब तू ही बता जिंदगी तुझे मैं क्या लिखू

-स्नेहल वानखेड़े

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ऐ लड़की फिर से सुनो तुम

हा मैंने कहा था
ऐ लडक़ी,सुनो तुम
निकलो घर के बाहर
निडर बनकर
लेती हूं आज अपने शब्द वापस
और करती हूं गुज़ारिश…

ए लड़की सुनो तुम
ये भूल ना करना,
अपने घर से
बाहर ना निकलना
तुम सोच के निकलोगी
दुनिया बदलनी है
वो सोच के बैठे है
जिस्म नोचना है
और नोचेंगे भी.

जब इज़्ज़त तुम्हारी लूट जाए
सोचोगी,उसके बाद ही शायद
कोई आवाज़ उठ जाए
मेरे गुनहगार को सज़ा मिल जाये
और गुनाह सोचने वाले भी
दहशत में आ जाये
इंसाफ बस मेरा नही
तो हर लड़की का हो जाए
बिना डरे उसे जीने का मौका मिल जाए

पर बता दु तुम्हे,
हर हादसों के लिए हंगामा नही होता
हर किसी के लिए
हर कोई नही रोता
कहते है कुछ लोग
हादसे तो कितने होते है हर रोज़

तुम रानी थोड़ी हो
जो खून खौल जाए
तुम राम रहीम थोड़ी हो
जो शहर जला दिया जाए
या तुम गाय भी नही हो
जो हंगामा किया जाए
मेरे धर्म की भी तो नही
जो जवाब मांगने बैठ जाए

और कहा किसने था
तुम्हे घर से निकलने
क्या पढ़े नही थे तुमने धर्म के शास्त्र
युही दादी नानी थोड़ी कहती थी
बचके रखने की सलाह देती थी
रसोई घर तक ही रहना
अपनी जिंदगी वही तक समेटना

आज भी तो वही कहते है
“बेटी बचाओ”
फिर भी तुम नही मानी
अब सुनो,
अगली बार ये गलती ना करना
इज़्ज़त बचानी हो
तो घर से बाहर ना निकलना
तुम्हारा चीरहरण रोकने
अब कोई कृष्णा नही आएगा
ना ही कोई अल्लाह
गुहार का तुम्हारी जवाब दे पायेगा
उनके ही घरों में
भक्षक बैठे हैं
उनके ही भक्त
भक्षक बने बैठे है
जमीर हमारा किसीका ही
जिंदा बचा नही
तकलीफ में किसीके शामिल हो
हमारी जिंदगी में अब इतना वक़्त नही

शामिल हो भी गए तो
दो चार नारे लगा देंगे
कुछ कैंडल भी जला लेंगे
ये देख तुम्हारी हिम्मत शायद
फिर थोड़ी और बढ़ जाये
पंख फैलाने के
अरमान जाग जाए
बदलना देखो पर कुछ है नही
बच्ची, लड़की, औरत
किसी बात से इन्हें फर्क नही

कांड के बाद बस
कांड होते जाने है
फिर कटघरे में
जात धर्म,नेता अभिनेता
अमीर गरीब देखकर
गुनहगार ठहराए जाने है
और पहला गुन्हेगार
तो तुम ही रहोगी
इसलिए सुनो ऐ लड़की
तुम ये भूल ना करना
अपनी इज़्ज़त नीलाम करने
घर से बाहर ना निकलना

-स्नेहल वानखेड़े

#DontMixMyBodyAndReligion #JusticeforAsifa #JusticeForEveryRapeVictim #RightToLiveFreely #RightToLiveWithoutFear #IamHumantoo

मेलघाट के रंग

जब भी हम घूमने निकले है हमेशा जो सोचा उस से कुछ अलग देखने और अनुभव करने मिला है. इस अलग अनुभव का हमेशा कारण रहा है दिल खोलकर लोगो से बात करना. जितना हमने दिल खोलके बात की उतना ही उन्होंने हमें अपनाया.चाय पीते पीते बातो बातो में समझा हम भारत के पहले “Digital Village” में बैठे है.
“1 Rupee Doctor” पद्ममश्री डॉ रविन्द्र कोल्हे से मिलने के इरादे से पहुँचे थे गाव कोलूपुर जो कि महाराष्ट्र के धारणी जिल्हे में पड़ता है. डॉ कोल्हे तो नही मिले पर उनकी बहू से मुलाकात हुई और जान ने मिला कुछ अलग ही काम.

उसके बाद हम पहुचे लवादा जहाँ पर है “बांबू सम्पूर्ण केंद्र”. यहाँ आदिवासी समाज के लोगो की कला को और उभारने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है. उन्हें स्वयं पूर्ण बनाया जाता है और स्वयंरोज़गार के लिए भी तैयार किया जाता है.वहाँ मुलाकात हुई काफी अलग लोगो से. अलग उम्र,अलग अलग गांव, अलग सोच पर सबको बांधती एक कला.उसी जगह से पता चला गांव चित्रि का, 70 घर का वो गांव और उसकी अपनी अलग खासियत.

और साथ ही मज़ा लिया हमने सेमाडोह जंगल, मेलघाट में छोटी सी ट्रेक और वहाँ के खास कोरकू तरीके से बनी चिकन करी का. कोरकू मेलघाट में बसे आदिवासी समाज मे से एक जाती है.
ये सारी कहानी और कुछ बाते लेकर आये है हम अपने चिखलदरा मेलघाट के दूसरे एपिसोड में.

लिंक पर क्लिक करके देख सकते है आप पूरा एपिसोड. एपिसोड पसंद आये तो चैनल सब्सक्राइब करके हमारा उत्साह बढाना ना भूले और ना पसंद आये या आगे एपिसोड्स में आप कुछ सुधार चाहते है तो वो भी आप यहाँ कमेंट बॉक्स पर बता सकते है.😊

चिखलदरा मेलघाट और बहुत कुछ

आ गए है हम हमारा यूट्यूब का पहला एपिसोड लेकर. आपको घुमाने ले चल रहे है हम चिखलदरा मेलघाट. वहाँ के सुन्दर नज़ारे, वहाँ के लोग उनकी संस्कृति और मिलाएंगे कुछ खास मेहमान से.

You Tube Channel

आ रहे है हम बहुत जल्द अपना यु ट्यूब चैनल लेकर ताकी आप जी सके वो कहानीया जो मैं अब तक आपको लिखकर सुना रही थी.पर इसकी वजह से मेरा लिखना बंद हो जाएगा ऐसा बिल्कुल नही.

अगर आपको प्रोमो पसंद आये तो सब्सक्राइब करना ना भूले. धन्यवाद 😊

 

 

और आखिरकार……

लेह तो पहुच गए, ससपोल से लेह के 70 का मलाल तो रहेगा पर पहुँच गए वो मायने रखता था|

लेह के आगे की कहानी क्या लिखी जाए,लिखी जाए भी या नही ये सोचते सोचते ही इतने दिन निकल गए, पर जब कोई भी सफर चाहे वो कितना भी मुश्किल हो अधूरा नहीं छोड़ा तो लिखने का सफर क्यों बीच मे छोड़ा जाए|

01/07/2016-Day 8-लेह पहुंचने में ही काफी देर हो गयी थी| ट्रक से सफर किया था तो कुछ थकान सी हो रही थी और कुछ मायूसी भी थी| इसलिए बस खाना खाकर सोने चले गए| नींद भी कुछ कच्ची पक्की सी ही आयी, अगली सुबह का बेसब्री से इंतज़ार जो था| सुबह उठकर गेराज जाकर अपनी वेगो देखनी थी| वेगो क्या ठीक हो पाएगी? ठीक हो भी गयी तो क्या आगे का सफर तय कर पायेगी? क्या मेरी वेगो को किया हुआ वादा पूरा हो पायेगा? क्या मैं मेरा सपना पूरा कर पाऊँगी? ऐसे कई सवाल उथल पुथल मचा रहे थे. सवालो के साथ उलझते जूझते नींद आ गयी और हुई अगली सुबह.

02/07/2016-Day 9-सुबह कुछ आराम से ही हुई| राइड करना हो तो आराम से उठने की सहूलियत मुश्किल से ही मिलती है| सुबह ५ या ६ बजे से ही सफर शुरू हो जाता है, पर आज राइड पर नहीं निकलना था तो हमने भी थोड़ी सहूलियत ले ली. तैयारी और नाश्ता कर हम पहुंचे, मैं और मेरे दोस्त, मेरी वेगो देखने। मैकेनिक से बात की, उन्होंने तसल्ली दी “गाडी बिलकुल अच्छी कंडीशन में है. आराम से आप इसके साथ आगे का सफर पूरा कर सकते है, बस कार्बोरेटर में कार्बन जमा हो चला था काफी समय से. जो सर्विसिंग के टाइम पर साफ़ नहीं किया गया इसलिए गाडी इग्निशन नहीं ले रही थी“| आधा दिन ख़तम हो ही चूका था। वेगो शाम के पहले ठीक होकर मिलनी नहीं थी| सबने सोचा यहाँ बैठकर हमने कुछ कर तो लेना है नहीं, सो चलो थोड़ा लेह देख लिया जाए|आपसी सहमति के साथ हम सबसे पहले देखने निकले गुरुद्वारा पत्थर साहिब।। मेरे दिल में थोड़ी हिचक सी थी| राइडिंग सीट छोड़कर बैक सीट पर बैठने की, पर मरता क्या ना करता वाले हालात,खैर .

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Pathar Sahib

लेह से कुछ २५ km दूर श्रीनगर लेह हाईवे पर बना है पत्थर साहिब गुरुद्वारा। इस से जुडी कहानी की बात करे तो बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी 1517 ई में नेपाल, सिक्किम, तिब्बत होते हुए लेह पहुंचे थे।तब उन्हें लेह की पहाड़ी पर रहने वाले एक राक्षस के बारे में लोगों ने बताया, जो उन्हें परेशान करता था।लोगों का परेशान देख गुरुनानक देव ने नदी के किनारे आसन लगाया। यह देख राक्षस बौखला उठा और उन्हें मारने की योजना बनाई। फिर एक दिन जब गुरुनानक देव जी ध्यान कर रहे थे , तब राक्षस ने पहाड़ से उन पर एक बड़ा पत्थर गिराया ताकि गुरूजी नीचे दबकर खत्म हो जाए। लेकिन एक अनोखी घटना घटी। गुरुनानक जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम बन गया और गुरूजी के शरीर का पिछला हिस्सा पत्थर में धंस गया। पत्थर में धंसा गुरुनानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद है।राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर मौजूद।जब पत्थर गुरुनानक जी से टकराया तो राक्षस को लगा कि गुरूजी पत्थर के नीचे दबे हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरुनानक  जी को जिंदा देखकर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर पत्थर में धंस गया।तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई और वो गुरुनानक देव जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान वाला पत्थर आज भी लेह में देखा जा सकता है।

ये कहानी सच्ची है या झूठी उसका तो नहीं पता पर गुरूद्वारे में अंदर जाकर जो महसूस हो रहा था वो बहुत सच्चा था. थोड़ी देर जब गुरूद्वारे में बैठी, मन को शांति मिल रही थी | मन के कमज़ोर कोने से भी मुलाकात हुयी, जिस से मिलकर आंसू अपने आप ही निकल आये| बड़ा फ्रेश लग रहा था उसके बाद| जैसे कोई बोझ हल्का हुआ हो पर क्या पता था एक बोझ हल्का हुआ तो दूसरा मिलने की तैयारी में था| गुरूद्वारे में लंगर कर हम निकले निम्मू।

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Nimmu

गुरुद्वारा से कुछ ११ km श्रीनगर रोड पर है निम्मू| जहा होता है सिंधु-जंस्कार का संगम। इस जगह को पहचान ने के लिए आपको किसी ख़ास टैलेंट की जरुरत नहीं है|पहाड़ पे गाडी दौड़ाते हुए दूर से ही दो मटमैली नदियों का संगम आपको दिख जाएगा और आप निम्मू में है जान जायेंगे। संगम देखने के लिए अलग से एक पॉइंट बनाया गया है| यहाँ से रिवर राफ्टिंग का मज़ा भी लिया जा सकता है|कुछ समय निम्मू में बिताने के बाद समय था लेह लौटने का और लौटते लौटते अद्भुत और जादुई मैग्नेटिक हिल अनुभव करने का|

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जब आप मैग्नेटिक हिल पहुंचेंगे आपको दिखेगा श्रीनगर की ओर जाता ढलान वाला रास्ता और लेह की तरफ जाता ऊंचाई वाला रास्ता। रोड पर एक बॉक्स बना हुआ है| कहते है जब आप अपनी गाडी न्यूट्रल पर लाकर उस बॉक्स में रखेंगे तो गाडी ढलान की तरफ ना खींचती हुई अपने आप ऊंचाई वाले रस्ते की तरफ बढ़ेगी। हमने कोशिश की पर हमे तो ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ| मैग्नेटिक हिल जाने के बाद आपका कुछ ऐसा अनुभव रहे तो बताइयेगा जरूर|

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Magnetic Hill

शाम हो चुकी थी,लेह घूमने के बाद अब समय था गेराज से अपनी वेगो लेने का. वेगो बिल्कुल चुस्त, दुरुस्त, तंदरुस्त गेराज में खड़ी थी. मैकेनिक से भी हरी झंडी मिल गयी थी “मैडम ले जाओ जहा ले जानी है ,गाडी कोई तकलीफ नहीं देगी“. गाडी  के जब पैसे देने की बात आयी तो मुझे लगा कोई बड़ा सा बिल हुआ होगा, १००० -२००० तो कही नहीं गए, पर जब बिल पूछा तो बस ३०० Rs| गाडी दुरुस्त वो भी कम पैसो में, ख़ुशी का तो कोई ठिकाना नहीं था| पर कहा ख़ुशी ज्यादा देर ठहरती है| कहा था ना आपसे गुरूद्वारे में जैसे लगा की मन से कोई बोझ उतरा हो पर दूसरा बोझ अपनी तैयारी में था|

बहुत ख़ुशी हो रही थी की अगली सुबह निश्चिन्त होकर मैं अपने सपनो की चढाई चढूँगी। मैं खारदुंगला चढूँगी, दुनिया का सबसे ऊंचा माने जाना वाला १८३८० फ़ीट पर बना पास चढूँगी, वेगो को किया हुआ मेरा वादा पूरा करुँगी। आँखे जैसे सोच सोच कर ही चमक रही थी, दिल में थोड़ी हलचल भी थी, डर था थोड़ा,सुन रखा था की कितना मुश्किल है खारदुंगला पहुंचने का रास्ता, ख़ुशी बैचनी डर सब उथल पुथल मचा रहे थे| अगले दिन क्युकी मुश्किल चढाई चढ़नी थी इसलिए जल्दी सोना भी था. वेगो लेकर रूम पर पहुंचकर फ्रेश होकर सीधा डिनर करने निकले।

बड़ी खिचाई हो रही थी मेरी बस इस एक बात को लेकर की “क्या बोलेगी तू की ७० km ट्रक से किया” ” ,”अरे अब तो तुझे लेह फिर से करना पड़ेगा, आधा तो तूने ट्रक से ही किया“|वो दोस्त ही क्या जो आपकी नाकामी को भी मजाक बनाकर उड़ा ना दे|हमारी अलग ही मस्ती चल रही थी| पर मेरे दिल की धड़कन खारदुंगला पर जा अटकी थी,हलचल सी हो रही थी कि तभी किसी ने कहा ” तुझे पता है तेरी प्रॉब्लम ही ये है की तू जो कुछ करती है वो दुनिया को  दिखाने के लिए करती है“| कुछ समझा ही नहीं क्या हुआ| कुछ बड़े अजीब तरीके से मेरा उस पर रिएक्शन आया और बहुत ऊंची आवाज़ में मैंने मेरे दोस्त को चिल्लाया। मेरी तरफ से पब्लिक प्लेस पर इतने जोरो से चिल्लाना गलत ही था| पर समझा ही नहीं, उस एक स्टेटमेंट से ऐसा लगा जैसे मेरा सब कुछ छीन लिया किसीने।

कोई और कहता तो इतना बुरा नहीं लगता | एक बहुत करीबी दोस्त ने कहा था |जिस पर मैं सबसे ज्यादा विश्वास करती थी| दिल कुछ ज्यादा ही दुखा। जिस से उम्मीद थी की मेरा सपना समझेगा उसने तो इलज़ाम लगा दिया |जिस सपने को जीने के लिए मैंने हर मुमकिन मेहनत, हर मुमकिन तैयारी की थी | उसे इतनी आसानी से बस दिखावे का नाम दे दिया गया|मैंने अपना सपना पूरा करने के लिए बाकी तैयारी तो की थी, रास्ते में जो मुश्किलें आएगी उनके लिए भी थोड़ी बहुत तैयार थी, पर ये झटका सपने से परे था| जिस दिन के सुबह के इंतज़ार में मैंने नींदे  गवाई थी  सोच सोचकर, कैसा होगा वो दिन जब मैं अपनी वेगो जम्मू कश्मीर के रास्तो पर चलाऊंगी|जब मैं लेह पहुँचूँगी| जब मैं खारदुंगला के लिए सफर शुरू करुँगी| आज भी कुछ अलग नहीं था | आज भी मैं नींद गवा रही थी, पर इसलिए की इतनी कमजोर पड़ गयी थी उस एक स्टेटमेंट से कि रोना रुक नहीं पा रहा था| 1.5 साल बाद उस किस्से के बारे में लिखते हुए भी उस समय की एक एक फीलिंग्स याद है| दुनिया से तो कैसे भी लड़ ले अपनों से कैसे लड़े |

03/07/2016-Day 10-हर रात की सुबह होती ही है| इस रात की भी हुई, रात कितनी भी बुरी गुजरी हो, सुबह तो राइड करनी ही थी| अपने सपनो की राइड | जैसा सोचा था वैसा तो बिलकुल नहीं निकला था दिन| रात जो कुछ झटके देकर गयी थी| ६ बजे सफर शुरू करने का सोचा था पर तैयारी करते करते ७ बजे आख़िरकार राइड शुरू हुई, मायूस सी.

लेह से खारदुंगला है ४० km| अगर  शुरुआत के २० km के रास्ते की बात की जाए तो बिल्कुल हाईवे जैसे पर असली चढ़ाई शुरू होती है उस २० km के बाद| २० km की राइड के बाद आता है साउथ पुल्लू चेक पोस्ट| जहा गाडी की एंट्री करवाई जाती है| राइट में जहा चेक पोस्ट है लेफ्ट मैं ब्रेकफास्ट के लिए छोटा सा ढाबा। नाश्ता करने के बाद हुयी असली चढ़ाई शुरू।

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Road to Khardungla

ऊँचाई बढ़ती जा रही थी, और रास्ते ख़राब और छोटे बहुत छोटे होते जा रहे थे। बिच में एक वाटर पास ऐसा आया जाहा वेगो फस गयी। दूसरी तरफ से आती एक टैक्सी ने टैक्सी रोक कर मदद करने की कोशिश की,पर मेरी ज़िद्द थी की वेगो तो मैं अपने दम पर ही आगे निकालूंगी और निकाली भी|आते जाते रास्ते में काफी राइडर्स मिले अपनी सुपर बाइक्स पर| सबको बड़ी ख़ुशी हो रही थी, मुझे वेगो जैसी मोपेड पर राइड करता देख वो भी अकेले। एक साइकिलिस्ट का भी ग्रुप था जिसमे हर उम्र के लोग थे, १८ से लेकर ७० तक, ये लोग पुणे से लेह साइकिल पर आये थे| इतना अच्छा लग रहा था मुझे उन्हें देखकर पर उन्हें मुझे देखकर ज्यादा ख़ुशी हो रही की अकेले ये इतना सफर कर रही है| हम तो ग्रुप में है, हिम्मत देने के लिए इतने लोग साथ है पर ये अकेली।

कितना पावर होता है ना एक अकेली लड़की में, पावर किसी की सोच बदलने का| ऊँचाई १७०० फिट से ऊपर थी,ऑक्सीजन लेवल कम होता जा रहा था,ठण्ड अलग और रास्ते में बस बड़े बड़े पत्थर और मिट्टी| कुछ जगह काम चालु होने की वजह से धूल| हर १० min बाद गाडी रोक कर मैं ब्रेक ले रही थी| हिम्मत जवाब दे रही थी, शरीर थक चूका था और दिमाग तो बस एक ही सवाल पूछ रहा था “क्यों मुझपर दिखावे का इलज़ाम लगाया गया“| इतनी दूर आकर पर हार मान ना मुश्किल था| कई लोग एक सवाल लेकर ऊपर चढ़ रहे थे “और कितना दूर है”, बाइक पर, टैक्सी पर, और बस पर सफर करने वाले भी| १० min आधे घंटे जैसे गुजर रहे थे| आखिर मैं भी उस पॉइंट पर पहुंच गयी जहा मैंने खारदुंगला से वापिस आती गाडी से पूछ ही लिया “और कितना दूर है“| जवाब मिला बस इस मोड़ के बाद सीधा खारदुंगला।

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Khardungla Top

सच्ची में उस मोड़ के बाद था सीधा खारदुंगला “खारदुंगला टॉप”. मेरे सपनो का टॉप, मेरे वादों का टॉप| राइट साइड पर बोर्ड था “Khardungla Top (18380 ft) Highest Motorable Road In The World “| जहा लोग झुण्ड बनाये खड़े थे और उसके थोड़ा आगे पत्थर पर लिखा खारदुंगला टॉप जहा कोई नहीं था| जाकर मैंने वेगो लगायी, अपने सपने का जशन मना ने शांति थी वहा.

वेगो लगा ही रही थी की बधाई देने एक लड़का आया,बधाई दी, सलूट किया और हालत देकर पूछने लगा ” Do You needsomething, anything, medicine, juice, fruit, I am group leader for the biker group,tell me, you dont look good”|शब्द मुँह से बहार ही नहीं आ रहे थे बस इतना बोल पायी “नहीं बस थोड़ा इमोशनल हो रही हु”| वो वहा से निकल गया कहकर की “take your own time”|वहा बैठी हु और बस ख़ुशी में रोई हु, ऑक्सीजन की कमी के बावजूद| जब खारदुंगला राइड प्लान कर रही थी तभी मुझे बता दिया गया था की “वहा जाकर ज्यादा इमोशनल मत होना, एनर्जी वेस्ट होगी, ऑक्सीजन पहले ही कम रहता है” | पर दिल का क्या करे साहिब, दिल ख़ुशी रोक ही नहीं पा रहा था| बस रोना था बोहोत सारा, ख़ुशी में,अपना सपना पूरा होने की ख़ुशी में| समझ नहीं आ रहा था कैसे जाहिर करू ये ख़ुशी।

खुदको थोड़ा संभाला जब लोग बधाई देने के लिए आकर मिलने लगे| वो लड़का जो पूछने आया था कुछ मदद चाहिए फिर आया अपने दोस्त को लेकर मुझे मिलाने| वो मुझे देखकर खुश हो गया,जब मैंने पूछा “Can you please click a picture of me”,जवाब मिला “I can click 100” और आज यहाँ जितने लोग आये है “should click a selfie with you”. प्राउड मोमेंट अगर बोलू तो था जब साइकिल ग्रुप में के ७० साल के अंकल जो पुणे से लेह आये उन्होंने सलूट किया “तेरी ज़िद्द को सलाम“| उसके बाद याद नहीं कितने ही ग्रुप, कितने ही राइडर्स के साथ फोटो खिचाई। साइकिल ग्रुप के सारे लोगो से मिली उनके साथ नाश्ता किया| मेरे दोस्त जिन्होंने मेरे बाद राइड शुरू की थी कुछ समय उनके साथ बिताकर वापिस निकली लेह की ओर।

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उस दिन की मायूसी और चमक दोनों आज भी वैसी ही कैद है आँखों में जैसे उस दिन थी। ज़िन्दगी बदली है उस राइड ने और कुछ रिश्ते भी। वो चमक आप तक पहुंचाने में कितनी सफल हुई नहीं पता पर ये पोस्ट लिखते लिखते वह पूरा एक दिन मैंने फिर से जी लिया।

ये मत सोचियेगा की बस यही कहानी ख़तम हुई,ये तो बस एक पार्ट था अभी तो लेह से बाहर निकलकर और कई सुन्दर और ख़राब रास्तो से मिलाना है, रास्तो पर मिले लोगो से मिलाना है. So Stay Tuned.

पापा

ये पोस्ट कुछ उन दहश्तवादियो के लिए जो बाप बेटी के खूबसूरत रिश्ते को बदनाम कर रहे है-

पापा, आप से रिश्ता ना जाने कब बना
तब, जब माँ की कोख पर कान रखकर
आपने मुझे महसूस किया था
जब आपने अस्पताल में
मूझे पहली बार देखा था
प्रिंसेस कह कर बुलाया था

जब पहली बार आपने मुझे
गोद मे उठाया था
बड़े प्यार से
सीने से लगाया था

जब हवा में उछाल उछाल
आपने मुझे खिलाया था
मुझे रोते हुए
हसाया था

जब मैंने पहली बार
आपकी उंगली पकड़ी थी
आपने मुझे उंगली थाम
चलना सिखाया था
मैंने पापा कह कर पुकारा था

जब आपने मुझे
साईकल चलाना सिखाया था
मेरी हर जिद्द को
मुस्कुराते हुए पूरा किया था

जब स्कूल मे मेरा नाम
आपके नाम के साथ ही पूरा होता था
या तब….
जब आपने बन्द कमरे में मुझसे जबरदस्ती कर
इन सारे एहसानों का हिसाब लिया

 

कारगील से लेह के वो आखरी 70 किलोमीटर

ये अकेली लड़की अपनी मोपेड (Wego) पर ज़ोज़ि ला जैसे खतरनाक रास्ते पार कर द्रास होते हुए कारगील पहुंचने के बाद अब शुरू करने वाली थी सफर अपनी अगली मंज़िल लेह का. कारगील से लेह का वो 218 किलोमीटर का सफर….

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Julley in July

Julley,लद्दाख रीजन में बोले जाना वाला ये खूबसूरत शब्द जो अपने आप मे ही एक वाक्य है. Hi… Hello… Namaste… के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला शब्द है Julley. हालांकि हर शब्द की अपनी खूबसूरती होती है, पर Julley की खूबसूरती बढ़ाता है लद्दाख के लोगो का मुस्कुराता हुआ चेहरा. 6 महीने दुनिया से संपर्क न होने और कई अलग मुसीबते झेलने के बाद भी उनके चेहरे की वो मुस्कान, वो सुकून, वो खुशी, उस शब्द में जैसै जान भर देती है. आप कभी लद्दाख में हो और समझ नही आ रहा हो कि कैसे किसी से बात की शुरुआत करे, तो यकीनन ये शब्द आपकी मदद कर देगा.

01/07/2016 से मैं जीने वाले थी लद्दाख की खूबसूरती को. करीब 6 बजे मैं निकली कारगिल से लेह की ओर. उतनी सुबह ही तोशी अपनी दुकान खोल चुका था. मैं सामान लेकर नीचे उतरी तो उसने आकर गाड़ी पर सामान बांधने में मदद की और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगी”.

कारगिल से बस कुछ 10-15 km का रास्ता ही काफी खराब था. उसके बाद रास्ता टार का ही था. आज खराब रास्ते की नही, चढ़ाई की मुश्किल का सामना करना था. श्रीनगर लेह हाईवे की दो ऊंची चढ़ाई ‘नमिक ला’ और ‘फोटू ला‘ चढ़ना था. पहली चढ़ाई पड़ती है नमिक ला की. नमकी ला की चढ़ाई शुरू करने के पहले मैं 2-3 जगह रुकी. एक जगह जब रुकी, सामने 2- 3 घर दिख रहे थे और उनके पीछे पहाड़. आस पास कोई नही, थोड़ी देर बाद वही कारगिल आते हुए पठानकोट के जिन 4 अंकल से मिली थी, उनसे फिर मुलाकात हो गयी. वो वही से गुजर रहे थे, मेरी गाड़ी देख कुछ देर बात करने के लिए रुक गए और आशीर्वाद देने के लिए भी.

एक जगह  मैं नाश्ता करने के लिए रुकी. छोटा सा ही कैंटीन जैसा कुछ था, अंदर जाकर लगा कहा तो सबके आराम में मैंने खलल डाल दिया हो. मुझसे पहले उस कैंटीन में कोई आया हो ऐसा लग नही रहा था. बड़े हिचकिचाते हिचकिचाते ही मैंने पूछा जैसे किसी की प्राइवेसी में दखल दे रही हु, कुछ नाश्ता मिलेगा? शुक्र है उन्होंने हा बोला. नाश्ता कर ही रही थी कि 2 आर्मी जवान आए और मैगी आर्डर की. उनमे से एक बैंगलोर के थे और दूसरे बिहार. मैंने बात शुरू करते हुए युही पूछ लिया-

कितने लकी है ना आप लोग रोज़ इन खूबसूरत पहाड़ो को देखने मिलता है, नेचर के बीच रहने मिल रहा है.”

मैम कितना देखेंगे रोज़ रोज़ इन पहाड़ो को, मैं बैंगलोर से हु, यहां रह रहा हु अपनी फैमिली से इतना दूर, बात करने का मन हो तो भी कई बार नेटवर्क की वजह से बात नही हो पाती है, कुछ अलग खाने का मन करे तो बस मैगी से काम चलाना पड़ता है, कुछ दिन के लिए ही अच्छा लगता है ये नेचर, ये पहाड़ फिर नार्मल लाइफ याद आने लगती है“.

मेरे मन में ख्याल आया कि कितना ग्रांटेड ले लेते है ना हम कभी कभी कुछ बातों को, नेचर के कोई इतना करीब हो तो खुश ही होगा, उसके साथ आई हुई मुसीबतों का बिना सोचे.

नाश्ता कर अब मैं आगे बढ़ी नमिक ला की ओर, बस अब कुछ 1 किलोमीटर ही होगा कि चढ़ते चढ़ते मुझे दूर कही पहाड़ पर कुछ भेड़ नज़र आए. साफ सुथरा चिकना सा भूरे रंग का पहाड़ और उसपे वो भेड. बड़ा ही खूबसूरत सा नज़ारा लग रहा था, तो ठहर गयी कुछ देर किनारे पर अपनी गाड़ी लगा उस नज़ारे का लुत्फ उठाने. लुत्फ उठाने के बाद पता नही था कि कसरत भी करनी पड़ेगी, किनारे लगी अपनी गाड़ी बस निकालने गयी कि गाड़ी नीचे रास्ते पर गिर पड़ी. सुबह की एक तो ठंड उसपे ऊंचाई, गाड़ी मुझसे उठने नही वाली ये समझ आ गया था. थोड़ी देर इधर उधर देखा और फिर दूर से एक लोकल टेम्पो आते हुए दिखा, पीछे कुछ सामान और सामने बीवी बैठी थी. मेरी गिरी हुई गाड़ी देखकर ही वो समझ गए और झट से आ कर मदद कर दी. मदद तो ठीक थी पर जिस जिंदादिली से मुस्कुराते हुए वो मेरी तरफ बड़े और वैसे ही मुस्कुराते हुए जो वो अपने टेम्पो तक वापस गए, मुझमे जैसे उन्होंने जोश भर दिया हो लगा. इसके बाद रुकते, गिरते, संभलते मैं पहुंची नमिक ला जिसकी ऊंचाई 12198 फ़ीट है.

यहा तक सही सलामत पहुंचने के लिए मैं धन्यवाद देना चाहुंगी की Border Roads Organisation (BRO) का, उन्होंने कश्मीर में ऐसे रास्ते बनाये की हम उसकी खूबसूरती को जी पा रहे है. नमिक ला आए हाए, वहां की हवा जादू वाली. आप गलती से ये ना समझ ले कि आपको जन्नत नसीब हो गयी है,उस हवा को महसुस कर के तो हवा का जादु कम करने के लिए आपको आस पास मिल जाऐंगे ऐसे लोग जो वहां बस सेल्फी खींचाने आते है. नामिक ला में कुछ समय बिताने के बाद मैं बढ़ी आगे की ओर.

37 किलोमीटर आगे था फोटू ला. श्रीनगर लेह हाईवे का सबसे ऊंचा पास, जिसकी ऊंचाई है 13479 फ़ीट. जितना मज़ा नमिक ला पर आया उस से दुगुना मज़ा यहां आ रहा था. पहले ही टेम्परेचर कम उसपे उस ऊंचाई पर चेहरे को चूमती वो ठंडी हवा. आपको जो हकीकत से दूर ले जाये. पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा था हर बोर्ड हर कार्नर पर बंदरो के जैसे चढ़कर सेल्फी खीचते लोग आपको वास्तविकता से ज्यादा दूर भटकने नही देंगे. वहां खड़े होकर आपको वो दुनिया कितनी ही अलग लग रही हो पर ये लोग अपना मेट्रो पोलियन शहर साथ लिए घूमते है. खैर,मेरा कोई हक़ नहीं बनता किसी के घूमने के तौर, तरीके, तह़जीब पर कमेंट करने का.

फोटू ला के बाद अब चढाई ख़तम हो गयी थी और राइड शुरू होने वाली थी बहुत ही खूबसूरत रास्ते ‘हेयरपिन बेंड’ से. सांप की तरह चलता ये रास्ता ले जाता है आपको लमायुरु और मून लैंड की तरफ. लमायुरु के लिए भले ही रास्ता नीचे की तरफ हो, पर लमायुरु की जगप्रसिद्ध मोनेस्ट्री ‘लमायुरु’, जो लद्दाख की पूरानी मोनस्टरीज़ में से एक है. उसके लिए चढाई करनी ही पड़ती है. सकरे से रास्ते से होते हुए आप पहुँचते है मोनेस्ट्री की तरफ. जब मैं गयी थी तब लमायुरू फेस्टिवल चल रहा था. रास्ते पर चहल पहल, अपने लद्दाखी ड्रेस में लोग, मस्ती करते बच्चे, बहुत ही रौनक थी. मास्क डांस शुरू था जब मैं पहुंची. कहा तो एक छत पर टूटी सी दीवार से चढ़कर वो देखा था, ताकि साफ़ साफ़ नज़र आ सके. अलग अलग मास्क, रंग बिरंगी कपडे और म्यूजिक. मोनेस्ट्री की अगर बात करे तो मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं आयी, कुछ कमी सी लग रही थी, मोनेस्ट्री में जाकर जो शांति मिलती है वो कही गुम सी थी.

मोनेस्ट्री के बाद अब समय था ‘मून लैंड’ अनुभव करने का. मैंने जब राइड का सोचा था तब इसके बारे में पता नही था. मैंने कम ही रिसर्च किया था लद्दाख के बारे में, क्युकी पहले से सब पता करके चले जाओ तो मुझे लगता है हम उस जगह को अपने से ज्यादा दुसरो की नज़र से देखने लगते है. जब राइड का सोचा था तब बस खारदुंगला मन में था और ये पता था की कश्मीर, लद्दाख, मनाली हाईवे बड़ा सुन्दर है. जब मून लैंड से गुजर रही थी तब उसकी खासियत नहीं पता थी पर जिस तरह रास्ते के दोनों तरफ स्पेस जैसे दिखने वाले हलके भूरे रंग के पहाड़ दिख रहे थे, 2 min रुक कर उनको निहारना और उनकी खूबसूरती को कैमरा में कैद करने से रोक पाना मुश्किल ही था.

मून लैंड पहाड़ो के साथ साथ मैं पहुंची ससपोल गांव, थकान हो रही थी और गाडी भी कुछ आवाज़ कर रही थी. इसलिए थोडा आराम करने का सोचा. रास्ते के किनारे गाडी लगायी और नहर के बाजू में आधे घंटे की नींद ली. ससपोल से लेह की दूरी थी 70 किलोमीटर.

गाडी शुरू की. 10 min गाडी चली होंगी की एक मोड़ पर गाडी अचानक बंद पड़ गयी. बहुत शुरू करने की कोशिश की पर फेल. जहा गाडी ख़राब हुई उसके सामने ही एक फैक्ट्री थी. वर्कर्स का शायद ब्रेक चल रहा था. बहार बैठे वो मेरी मेहनत देख रहे थे, फिर आये भी परेशानी पूछने पर कोई हल नहीं मिला. मैकेनिक लद्दाख में आपको हर जगह इतनी आसानी से नहीं मिलते. उस गांव में भी कोई मैकेनिक नही था. कारगिल से लेह की तरफ बढ़ते हुए काफी लोगों से जान पहचान हो गयी थी. कुछ उनकी उत्सुकता की वजह से की मैं मोपेड पर राइड कर रही हु, कुछ राइडर्स भी मिले थे, जिनसे उन रास्तो पर दोस्ती हो ही जाती है, क्युकी पता होता है की रास्ते मुश्किल है, हर जगह लोग मीले ये मुमकिन नहीं तो एक दूसरे के काम आना बिन कहे ही रूल सा बन जाता है. जब मैं रुकी हुई थी अपनी ख़राब गाडी के पास, तब पीछे मिले हुए काफी सारे लोग गुजरे और रुक कर पूछा भी की कोई मदद की जरुरत हो तो बताइये, पर मैंने ही मना कर दिया था. कह कर की “नहीं शायद गाडी बस गरम हो गयी है इसलिए शुरू नहीं हो रही. कुछ देर में हो जाएगी”.

 

हमे अपने शहर में कुछ अच्छे कुछ बुरे लोग मिलते है. पर जब आप सफर में होते हो तो आपको हर किसी में इंसानियत ही दिखेगी. आधा घंटा होने के बाद भी जब गाडी नहीं शुरू हुई, तब समझ गया था कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा. या तो यहाँ रुकने का या लेह पहुंचने का. कुछ मदद मिलती है क्या इस के लिए मैने नागपूर के एक फ्रेंड को फोन लगाया जो एयर फोर्स मे है. शुक्र इस बात का था की उस समय फोन में नेटवर्क था वरना अकसर लेह लद्दाख में नेटवर्क मिलना मुशकिल होता है. टहलते टहलते उनसे वहां कुछ अरेन्जमेंट हो सकती है क्या पुछ ही रही थी के रॉयल एनफील्ड की धड़ धड़ धड़ आवाज़ सुनाई दी. जैसे ही एनफील्ड मोड़ पर पहुंची,  देखा तो सामने अपने दो दोस्त.ये दोनो भी नागपुर से लद्दाख राईड पर निकले थे. प्लान हमने साथ ही बनाया था पर मेरी मोपेड होने की वजह से मैंने इनसे पहले सफर शुरु किया था. सफर मे बस एक बार हम सोनमर्ग मे मिले थे. मुझे देखने के बाद टेंशन तो नही, उल्टा हम तिनो जोर जोर से हसे. जब हसना ख़तम हुआ. फिर सोचा अब क्या करना है. मेरे गाडी में जो रस्सी थी उस से मेरी मोपेड को उनकी एनफील्ड से बांधकर खींचने का प्लान बना. गाड़ी मे एक रस्सी हमेशा साथ रखने का सबक भी मुझे रास्तो ने ही सीखाया था.जब कन्याकुमारी से वापस आते हुए गाडी खराब हो गयी थी और तब भी गाडी बाँधकर खींचि थी. उन रास्तो पर ही दोस्ती हुई थी एयर फोर्स वाले दोस्त से जिनसे आज बात हो रही थी.

मेरी मोपेड को एनफील्ड से बांधकर ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया. परिस्थीती गंभीर थी पर हमे मज़ा आ रहा था. मेरे दोस्तो को मुझसे थोड़ा ज्यादा क्योंकि जिन्दगी भर अब वो मेरी इ बात पर मज़ा ले सकते थे. हमने ससपोल की घाटी चढ़ना शुरू ही किया था की रस्सी टूटी. फिर जितनी रस्सी बाकी थी उस से खींचा, पर वो भी 5 min में दम तोड़ गयी.

रस्सी तुटी अब क्या? तो सोचा मेरी मोपेड को ट्रक में चढ़ाया जाए और लेह ले जाया जाए. ट्रक रोका भी. जब हम ट्रक वाले से बात कर रहे थे, तभी 10-12 राइडर्स जो लेह से श्रीनगर की तरफ जा रहे थे. हमे बिच रास्ते में ऐसे रूक कर ट्रक वाले से बात करते हुए देख हमारी परेशानी पूछने आ गए. अब 3 की जगह हम 15 लोग थे. गाडी ट्रक में चढ़ाने के लिए तैयार भी थे, पर मैंने यूँही सोचा की एक बार और किक मार के गाडी स्टार्ट करने की कोशिश की जाए. किस्मत देखिये गाडी शुरू हो गयी. क्या ख़ुशी मेरे चेहरे पर और पहला स्टेटमेन्ट जो मुँह से निकला वो था मुझे पता था, मेरी गाडी धोका दे ही नहीं सकती. बस थोड़ी गरम हो गयी होगी इसलिए परेशान किया, अब ये जाएगी लेह”. सभी खुश हो गए वो राइडर्स का ग्रुप चला गया, ट्रक जो गाडी ले जाने वाला था वो भी चला गया अब बचे थे हम 3, बस. हमने भी निकलने के लिए गाडी स्टार्ट की और मेरी मोपेड फिर बंद पड़ गयी.

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अब फिर एक ट्रक को रोका, दोनों दोस्तों ने गाडी चढ़ाई. ट्रक में गाडी को बाँधा ताकि गिरे नहीं और मैं भी ट्रक में चढ़ी. कुछ ऐसे पहुंचे हम, मैं और मेरी मोपेड लेह. पहुंच तो गयी थी पर थोड़ा दुःख हो रहा था की वो 70 किलोमीटर का सफर मैं अपनी मोपेड से नहीं कर पायी, लेह के एंट्री गेट से अपनी वेगो (मोपेड ) नहीं ला पायी पर कहते है ना अंत भला तो सब भला. ट्रक वाले अंकल ने मेरी मोपेड़ गैरेज पर छोडी,जो उनके ही पहचान मे था, और जो अंकल ट्रक वाले अंकल के साथ सामने सीट पर बैठकर आए थे उन्होने मुझे अपने दोस्तो तक पहुचाने मे मदद की.

Julley 😊

संस्कृति का ब्याज

कुछ दिन पहले बैंक में मेरे पास एक माँ बेटी आए थे फैमिली पेंशन पर लोन लेने के लिए. बड़ी जल्दी थी उन्हें लोन की, 12 dec को बेटी की शादी है इसलिए.जिसकी शादी है BA फाइनल में कुछ सब्जेक्ट नही निकाल पायी इसलिए घर पर ही है. जो बेटी साथ आई थी वो BA पास है वो भी घर पर ही रहती है.

जब उनकी बेटी को बोला गया फॉर्म भरो “मुझे नही समझता कहकर टालने की कोशिश की” पर मैने फॉर्म भरकर देने से मना किया और बस नाम पता जन्म तारीख खाता क्रमांक इतना ही लिखना है, फिर भी कोई परेशानी आयी तो पूछ लो कहकर मैंने उसे फॉर्म दे दिया.फॉर्म हिंदी में रहने के बाद भी वो ठीक से भर नही पा रही थी. ये देखकर ही थोड़ा गुस्सा आया, मैने चिल्लाया भी की BA हो और बहुत ही बेसिक जानकारी भर नही सकती. जैसे तैसे उसने फॉर्म भरकर दिया.

उनका पहले ही एक लोन चालू था जो उन्होंने सबसे बड़ी बेटी के शादी के लिए लिया था. ये लोन लेने के लिए पुराना बंद करना जरूरी था. कुछ तीस हजार बाकी थे, उन्हें हमारे बैंक मैनेजर ने पहले बताया था कि उनको डेढ लाख लोन मिल सकता है,इसलिए वो खुशी से तैयार हो गए थे पुराना बंद करने के लिए. पर जब मैंने देखा तो बस 90 हज़ार ही उन्हें मिल सकते थे.जैसे ही उन्हें ये बताया माँ बेटी के चेहरे का रंग उड़ गया. बिनती करने लगे “मैडम 1 लाख तो भी कर दो,तीस हज़ार तो भरने में ही जा रहे है बस 60 हज़ार हाथ मे मिलेंगे”. मैनेजर से भी बिनती की पर होना कुछ था नही और गुस्सा मुझे अब इस बात का ज्यादा आ रहा था कि जब पैसे नही तो क्यों इतनी झूठी शान दिखाके शादी.

जब लोन अमाउंट 90 का तय हुआ तो “मैडम जल्दी करवा दो जरूरत है, ये 30 हज़ार बड़ी बहन के सब गहने गिरवी रखकर लाए है”. मैं अब कुछ बोलने वाली कौन, बस इतना बोल के की कल आ जाओ पैसे मिल जाएंगे तब तक पुराना खाता बंद कर दो बोलकर जाने के लिए कह दिया. उनका कहना हुआ कि “मैडम कल लोन सैंक्शन हो जाए एक बार फिर पुराना बंद करते है”. मैंने हा कर दी, वो चले गए. जब मैनेजर को सब तैयार करके फ़ाइल दी तो बोले “मैडम पहले पुराना बंद करवाओ फिर 2 दिन बाद सैंक्शन दूंगा”. आखरी फैसला तो आखिर उनका ही था.

अगले दिन माँ बेटी फिर बैंक आए 30 हज़ार लेकर. “मैडम हो गया क्या लोन पास”. मैंने उन्हें सब बताया जो मैनेजर ने कहा था. सुनते ही बड़े उदास हो गए, कहने लगे “मैडम इमरजेंसी है थोड़ा कर दो आज ही”. मैंने चिल्ला दिया “कोइ हॉस्पिटल में हो, किसी की तबियत खराब हो, बच्चे की पढ़ाई रुक गयी हो, वो होती है इमरजेंसी, यहाँ कौनसी इमरजेंसी आपकी”. जवाब आया “मैडम टाइम पे लड़के के घर पर हुंडा (दहेज) पहुँचाना भी इमरजेंसी है, हुंडा नही पहुँचा तो लड़की की शादी टूट जाएगी, ज़िन्दगी खराब”. मैं दंग, जब पूछा लड़का क्या करता है तो पता चला जिल्हा परिषद स्कूल में टीचर है, 1 लाख उसे हुंडा चाहिए था.शादी का खर्चा अलग जो वो अपने 12 एकर खेत मे से 3 एकर बेचकर निकालने वाले थे. बड़ी बेटी की शादी में भी 40 हज़ार का हुंडा दिया था. मेरे थोड़े बोलने पर की क्यों आप लोग बढ़ावा दे रहे हो इन बातों को, जवाब मिला “रिवाज़ संस्कृति है अपनी,समाज मे करना ही पड़ता है”. ये तो बस कॅश की बात थी बाकी जो देंगे वो अलग. फैमिली पेंशन और खेत पर घर चल रहा है और उसपे ये सब.

एक मैनेजर की हैसियत से टेबल संभालते हुए लोन अप्रूवल के लिऐ दु बस इतना कर सकती थी पर जो अपने सामने होता देख रही थी, उस माँ के चेहरे पे चिंता, लोन कम होने पर पसीना आना, बहन के गहने छुड़ाने की चिंता, शुक्रवार की जगह सोमवार को लोन होने वाला है सुनकर बैचैनी, इन्तेज़ार उसके लिए कुछ भी करना मुमकिन नही था.

ये परिवार यवतमाल के पास के एक छोटे से गांव से था. जहाँ पढ़ाई भी बस फॉर्मेलिटी तौर पर ही होती होगी. पर शहर में हम कहा कुछ नया कर रहे है. हम शहरी लोग अच्छे स्कूल अच्छे कॉलेज से पढ़ने के बाद भी इस प्रथा को आगे बढ़ा रहे है. कितने तो IIT, IIM, IAS officers खुले छूट अपना रेट डिसाइड करते है. समाज में झूठी शान के लिए पता नही कहा कहा से पैसे जोड़कर शादी लगाते है. खासकर लड़की वाले. बँक को तो अपने लोन का ब्याज मिलेगा ही, लेकीन इस महान संस्कृती का पुराना ब्याज क्या सिर्फ औरत ही भरेगी. इस महान पुरुषप्रधान, उच्चवर्गीय, सरंजामी संस्कृती का बोझ कौन सर पर ले रहा है ? रिती रिवाज, संस्कृती का विद्रुप रुप हमेशा गरीब लोगो में ही ज्यादा वेदना लेकर आता है. शादी के इस नये मार्केट मे ये ज्यादा से ज्यादा भयानक होते जा रहा है.  हमेशा से ये होता आया है कोई भी बोझ लड़की को ही पहले उठाना पड़ता है, आज भी अगर वही हो रहा है, तो फिर किस दिशा में आगे बढ़ रहे है हम, और कौनसे आधुनिक भारत का जश्न मना रहे है हम.

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ऐ लड़की सुनो तुम

ऐ लड़की, सुनो तुम
ये जो दुनिया कह रही है ना
बाहर ना निकलना, लोग बड़े खराब है
बस सुनकर यकीन ना कर लेना
बाहर निकलकर देखना।

खूबसूरत बनकर निकलना
बस याद रहे खूबसूरती में सुंदर कपड़े मैचिंग इयररिंग्स, मैचिंग सैंडल्स नही
तो सवाल पूछती आँखों में आँखे डालने की हिम्मत,
बकवास करते लोगो को जवाब देकर चुप कराने की हिम्मत और
अपनी शक्ति को भी जोड़ना।

बताना उन्हें की लाज लज्जा शर्म हया ही नही
हिम्मत, आज़ादी,शक्ति भी
तुम्हारा गहना है और
हर उस गहने से खूबसूरत है जो तुम्हे सजाता है।

कोई रोके तुम्हे तो लड़ना तुम
बिना डरे लड़ना जमके लड़ना
अपने हर उस डर से लड़ना जो तुम्हे कमज़ोर बनाए
जो तुम्हे अपना हक़ ना लेने दे
आगे बढ़ने ना दे और
जीने की आज़ादी ना दे।

लड़ना अपने सपनो के लिए बिना हिचकिचाए
लड़ना अपनी पहचान के लिए
खुदके अपने नाम के लिए
लड़ना अपने मन की दुनिया सजाने के लिए।

ना साथ दे कोई पर विश्वास हो तुम्हे कि गलत तुम हो नहीं
तो लड़ना अकेले अपने उस विश्वास के लिए
लड़ना तुम आज कि
फिर लड़ना ना पड़े आने वाली पीढ़ी को
अपनी पहचान, अपने अधिकार, अपने नाम, अपनी हिफाजत,
अपनी आज़ादी,अपने सपनो के लिए।

ऐ लड़की, सुनो तुम निकलो घर के बाहर अपने लिए।

-स्नेहल वानखेड़े