बैसाखी

जितने की दौड़ में इतने तेज़ दौड़े ख़ुदको ही “स्टार्टिंग लाइन” पर छोड़ दिया और पता भी नही चला रोज़ ही तुझे मुट्ठी से छूटने

कुछ वो लोग

कुछ वो लोग है रूखी सुखी खाकर भी बेफिक्रे बने जीने में मदमस्त है कुछ वो लोग है सबकुछ पाकर भी किसी खलती हुई कमी

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