एक अकेली लड़की और ज़ोजि ला कारगिल का सफर

कही किसी मूवी में डायलॉग सुना था “ज़िन्दगी में कुछ बन ना हो, कुछ हासिल करना हो, कुछ जितना हो तो अपने दिल की सुनो”. ऐसे ही दिल की सुनके शुरू किया था सफर जम्मू कश्मीर का, पर बिना जोखिम लिए कहा कुछ हासिल होता है. दिल्ली से सोनमर्ग का सफर तो कर लिया था आराम से, अगर 10 15 km के ख़राब रास्तो की बात छोड़ दे तो बाकी रस्ते अच्छे ही थे और पहाड़ो की उचाई भी कम. अभी तक ऐसा रास्ता नहीं पार किया था जो सबसे खतरनाक रास्तो में से एक माना जाता है पर आज 30/06/2016 इस जोखिम से लड़कर लद्दाख में प्रवेश करना था .

एक दिन पहले सोचा था सुबह 6 बजे सोनमर्ग से निकलकर राइड शुरू की जाएगी पर ऐसा होना कहा था जब रात में कमीने दोस्त आपके साथ हो. मुझे टेंशन हो रही थी अगले दिन सुबह राइड की पर हम ज्यादा बिजी थे “सौ तरह के दर्द ले लू इश्क़ का दर्द क्या है,तू कहे तो जान दे दू कहने में हर्ज़ क्या है“,गाना मैं सही गा रही हु या नहीं ये पता करने में. मैं कोशिश कर रही थी कमीनो को मनाने की यार सामान गाडी पर बांध देना और ये मशगूल थे बहाने में “मैं नहीं उठ रहा इतनी सुबह मदद से ज्यादा नींद प्यारी है मुझे, ओये तू मदद कर देना सुबह स्नेहल को“. अभी तक रकसैक सामने वेगो के लेग स्पेस पर ही रख कर राइड किया था पर अब से 10 ltr की पेट्रोल कैन भी साथ में लेकर चलना था, साथ ही गाडी का बैलेंस भी रखना था. आगे पहाड़ ऊँचे होने वाले थे और रास्ते बदतर,तो सबसे सही ऑप्शन था रकसैक को पिछली सीट पर बांधना,पेट्रोल कैन और एक छोटी बैग जिसमे रास्ते के लिए जरुरत का सामान हो आगे रखना, पैर रखने को भी ज्यादा जगह मिल जाए. आज तक कभी बंजी रोप्स इस्तेमाल नहीं किये थे तो मदद चाहिए थी. रात की बहस और मस्ती के बाद सुबह ही 6 बजे हुई,दोस्त भी उठ चुके थे उन्होंने सामान बांध कर दिया वेगो पर, थोड़ा मुश्किल हो रहा था पर इंजीनियर दोस्त होने के बाद टेंशन ही क्या,कोई ना कोई जुगाड़ हो ही जाता है. सब निपटा कर 7 बजे करीब शुरू हुयी राइड.

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सोनमर्ग खत्म हुआ नहीं की शुरू हुई चढाई सबसे खतरनाक माने जाने वाले रास्ते में से एक रास्ता ज़ोजि ला की. चढाई शुरू हुई नहीं कि धूल मिट्टी स्वागत में तैयार मिले और रास्ता आधी लेन से भी कम. यही पे ट्रक चलनी थी, यही पे बाइक्स, यही पे कार भी वो भी दोनों तरफ से. पहाड़ के साथ चलते इस रास्ते पर गलती की गुंजाईश रखी नहीं जा सकती थी दूसरी तरफ खाई जो थी.वेगो और मैं पहली बार 3500 mtr की उचाई चढ़ने वाले थे.ये पास लद्दाख को श्रीनगर से जोड़ता है जो 6 महीना बर्फ जमा होने की वजह से बंद रहता है.लद्दाख का संपर्क टूट जाता है बाकी शहरों से यातायात बंद होने से और ये महीने बड़ी मुश्किल से भरे होते है यहां के लोगों के लिए . लोगो ने पहले ही काफी कुछ बता रखा था मुझे जोजी ला के बारे में तो मैं थोड़ा ज्यादा सावधान होकर ही वेगो चला रही थी. रास्ता छोटा होने की वजह से रुकने की ज्यादा जगह नहीं थी इसलिए जहा भी जगह दिखती की वेगो रोक के आराम किया जा सके तो गाडी रोक देती. ऐसी ही एक जगह मिली आधे घंटे के बाद ही. चढाई जितनी मुश्किल नहीं लग रही थी उतनी ज्यादा मुश्किल बन रही थी धूल. रास्ते काफी ख़राब थे पर इन ख़राब रास्तो का दर्द मिटाने के लिए थे कश्मीर के सुन्दर नज़ारे. थोड़े आराम के बाद शुरू हुआ आगे का सफर, अभी तक किसी बड़ी गाडी का सामना नहीं हुआ था . सफर के शुरुआत में सामने दिख रहे थे कुछ बर्फ से कुछ पेड़ से ढके पहाड़, दाए थे बंजर पहाड़ और बाएं तरफ खाई जहा दिख रहे थे रंग बिरंगी घर और बहती नदी. सफर जैसे आगे बढ़ा सामना हुआ बड़ी गाड़ियों से. यहाँ लगा था थोड़ी मुश्किल होगी पर उनकी समझदारी ने मेरी मदद कर दी सामने से आने वाले ट्रक जैसे मेरी गाडी देखते वो पहले मुझे जाने देते और फिर खुद आगे बढ़ते, उनकी मदद से तकलीफ कुछ कम हुयी. अभी तक तो रास्ते पर बस धूल पत्थर से मुलाकात हुई थी पर अब समय था पानी से सामना करने का, पहाड़ की बर्फ पिघलने से रास्ते पर ठंडा पानी जमा हो रहा था,पानी के बिच बड़े बड़े पत्थर पहली बार ही वेगो को सामना करना था वॉटर क्रॉसिंग का. पानी के पहले ही थोड़ी देर अपनी वेगो रोकी देखने के लिए की कहा से पार किया जाये और शंका भी थी बिना गिरे पार होगा या नहीं. पर बहार से जितना मुश्किल लग रहा था उतनी मुश्किल पार करते हुए नहीं हुई,शायद सभी मुश्किल के साथ कुछ ऐसा ही होता है जब तक उस से लड़ते नहीं तभी तक वो मुश्किल मुश्किल लगती है. पार करने के बाद ही खड़ी थी एक एवेंजर जिस पर कश्मीर का नंबर प्लेट था और २ नौजवान उस पर सवार थे. मैं जैसे ही पार पहुंची उन्होंने पूछ लिया आप इस गाडी से कहा जा रहे है? जब बताया उन्हें ” हम तो श्रीनगर से आये है वो भी एवेंजर पे फिर भी हमारे लिए मुश्किल हो रहा है,हम तो बस अब यही से वापस जायेंगे और आप इसपे इतना दूर जा रही है, All The Best“. बदलते नज़रो के साथ बदल रहा था सफर भी कुछ मुश्किल कुछ आसान, कुछ और छोटी सड़के, कही पे चलता सड़क का काम, कभी दिखती आर्मी की गाड़िया और इन्ही सब के मजे लेते पहुंची जीरो पॉइंट जहा थोड़ी देर रुक कर आराम करने का सोचा. मुश्किलों से भरा ज़ोजि ला अब खत्म होने वाला था. जितना मुझे डराया गया था ज़ोजि ला के नाम पर उतना खतरनाक मुझे लगा नहीं कुछ कारण इसके ये थे की बर्फ बहुत कम थी, बारिश नहीं हुई थी और लोगो का सुनकर मैंने खुदको बुरे से बुरे के लिए तैयार रखा था. हां पर उसे पार करके बड़ी राहत महसूस हो रही थी.

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जीरो पॉइंट पर मैंने गाडी रोकी ही थी की एक SUV भी आकर रुकी. मुझे देखकर वो थोड़े चौके, इन लोगो से एक दिन पहले रात को मिल चुकी थी तब बस पति पत्नी दोनों से मुलकात हुई थी आज पूरा परिवार साथ था.पुणे से आये थे ये लोग इसलिए एक मराठी मुलगी से मिलकर इन्हे और थोड़ी ज्यादा ख़ुशी हो रही थी “एक अकेली लड़की” वो भी मोपेड पे इतनी दूर.उन्होंने मेरे साथ तस्वीर खींचने की इच्छा जताई, इतने सभ्य तरीके से उन्होंने पूछा था की मना करना लाजमी ना था पर पता नहीं था “Can I click a picture with you” आगे पुरे सफर में सुन ना पड़ेगा. आगे बढ़कर मैं फिर लद्दाख में वेलकम करते हुए बोर्ड के पास रुकी. वहा फिर मिला एक परिवार जिन्हे वेगो पर अकेले वहा पहुंचने पर आश्चर्य और ख़ुशी थी, पर न तो गाडी की इज्जत थी ना मेरे सामान की. उन्होंने एक बार वेगो पर तस्वीर खींचने और एक राउंड लेने की इच्छा जताई उन्हें मैंने हां कहा. पहले उन्होंने मेरा हेलमेट गिराया फिर गाडी पर सामने रखे हुए ग्लव्स, बोहोत गुस्सा आ रहा था. आगे से अब ये पता था की कही भी रुक जाओ मुझे शान्ति से समय नहीं बिताने मिलेगा. इस फॅमिली से मिलकर जो गुस्सा था सोचा आगे जाकर किसी ऐसी जगह जहा आस पास कोई ना हो वहा बिताकर कम किया जाए. ऐसी ही एक जगह पर वेगो रोकी और बस पीछे से ही एक गाडी आयी पठानकोट से रोड ट्रिप पर निकले 4 अंकल थे उन्होंने आकर बड़े प्यार से बात की ” बेटा हम लोग बस आगे पीछे ही चल रहे थे, आपको इस मोपेड पर देखकर ही थोड़ा झटका लगा, बड़ी गाडी में होकर भी हमे थोड़ी परेशानी हो रही है, पहले आप से मौका नहीं मिला बात करने का अभी आप यहाँ रुके हुए दिखे तो लगा कही कोई परेशानी तो नहीं पूछ लू , बेटा बहुत अच्छा लगा आपको देखकर कैसे आ गए आप इतना दूर, हम तो डरते है अपनी बेटियों को शहर में ही कही बहार अकेला भेजने में पर अब आपको देखकर हमे हिम्मत मिली है हम भी अपनी लड़कियों को अब बहार निकलने देंगे“. जितना गुस्सा था सारा शांत हो गया. अच्छा लग रहा था मेरी एक राइड किसी की सोच बदल रही है. थोड़ी बात करके वो निकले और कुछ ही देर में मैं भी आगे निकली.

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मैं बढ़ रही थी अब द्रास की और,और रास्ते ख़राब ही होते जा रहे थे.धूल मिट्टी अलग परेशान कर रही थी आधे पौन घण्टे के ऊपर गाडी चलाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए रुक रुक कर गाडी चलानी पड़ रही थी. ज़ोजि ला से द्रास करीब 40 km ही है पर रास्ते ख़राब होने से सफर का समय ज्यादा हो गया था. जब थक जाती तो साथ चलती द्रास नदी के साथ समय बिताने बैठ जाती. वहा की खूबसूरती को शब्दों में ढालना मेरे बस की बात नहीं इलसिए मैं ज्यादा मेरे अनुभवों की ही बात करुँगी. नदी किनारे मैं रुकी और 5 min में मेरे साथ रुकी 1 मारुती और 1 SUV. SUV पुणे की थी मेरे वेगो का नंबर प्लेट भी पुणे का, तो पहली ख़ुशी वही की “आपली महाराष्ट्रियन मुलगी” फिर उन्होंने काफी डिटेल्स ली. आपने वेगो को बताया है क्या, स्पॉन्सरशिप लेनी चाहिए थी, पर ये सारी चीज़ो से मैं थोड़ा परे थी तो उन्होंने खुद ही कहा हम बात करके देखते है, उन्हें मेल करते है और जो सबसे बड़ी बात उन्होंने कही वो थी “आपसे ज्यादा तारीफ़ आपके घरवालों की होनी चाहिए सही हिम्मत तो उन्होंने की है आपको यहाँ भेजकर“.ये मेरे लिए बहुत गर्व की बात थी. दूसरी गाडी जो मारुती रुकी थी उसमे 3 दोस्त इंदौर से चले आ रहे थे पर नज़ारो से ज्यादा वो कांच बंद करके AC की हवा खाने में खुश थे, स्किन ख़राब होने का डर उन्हें ज्यादा था, उन्होंने भी कुछ साथ में तस्वीरें ली.

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मेरा वहा कुछ देर और रुकने का मन हुआ,आते जाते बहुत सारे बाइकर्स दिखे कुछ अकेले कुछ ग्रुप में. उन्ही आते जाते बाइकर्स में से दो बाइकर्स पास आकर रुके “All Well“, बहुत अच्छा लग रहा था उनसे बात कर कर ,वो Royal Enfield लेकर आये थे मेरा वेगो का एक्सपीरियंस पूछा और सबसे ज्यादा ख़ुशी तो इसलिए हुई की आगे के रास्ते का पूरा पूरा हाल उन्होंने बता दिया, “द्रास कुछ ही दूर है और वहा से रास्ते अच्छे हो जायेंगे” सुनकर ही अलग एनर्जी आ गयी, उनमे से एक राइडर साहिल आनंद 8 9 बार लद्दाख जा चूका था उसे हर कोने हर चप्पे की खबर थी. उनके निकलने के थोड़ी देर बाद ही मैं भी निकली और पहुंची द्रास.

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दुनिया की सबसे ठंडी जगह में दूसरे नंबर पर है द्रास और यहाँ पर तोलोलिंग परबत के निचे बसा 1999 के भारत पाकिस्तान लड़ाई में शहीद हुए हमारे आर्मी जवानो की याद में बना कारगिल वॉर मेमोरियल. तीनो तरफ पर्वतो से घिरा ये मेमोरियल. मेमोरियल में गाडी पार्क करके आप सीधा पहुंचते है विजय पथ पर, 1999 के विजय ऑपरेशन पर से दिया गया ये नाम. विजय पथ के दोनों तरफ आपको लहराते मिलेगा हमारा तिरंगा.विजय पथ आपको ले चलता है जवानो की समाधी के पास वहा श्रद्धा में जलती ज्योत. वहा पे खड़े हमारी आर्मी के जवान बयां करते है दास्ताँ ऐ कारगिल, सुनाते है हमें हमारे जवानो की बहादुरी, साहस, शौर्य,त्याग और जित की कहानी जो आपके रोंगटे खड़े कर दे और गर्व से भर दे. मेमोरियल की एक दिवार पर लगे बोर्ड पर लिखे हुए है शहीद हुए जवानो के नाम और बिच में शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी हुई कविता में से चार लाइन “शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालो का बस यही बाकी निशान होगा”.क्या होंगे वो लोग जो हमे बचाने के लिए अपनी जान गवा बैठे और हम है की अपने ही लोगो के दुश्मन बने बैठे है. मेमोरियल पर आपको देखने मिलेंगे कब्जे में किये हुए पाकिस्तान के बंकर्स पोस्ट्स भी. काफी समय वाहा बिताकर निकली मैं आर्मी के मैसेज “When you go home, tell them of us and say, for your tomorrow, we gave our today” के साथ कारगिल की ओर.

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द्रास से कारगिल कुछ 60 km है और रास्ते भी ख़राब नहीं. अब सफर में तकलीफे कम थी. अभी तक नदी दाई और थी अब बायीं. शुब्र सफ़ेद नदी, रंग बदलते पहाड़, देखते देखते मैं पहुंची कारगिल. यहाँ पहाड़ हरे भरे नहीं बंजर थे पर उतने ही खूबसूरत. लद्दाख की खासियत ये की क्षेत्र के हिसाब से आपको अलग अलग तरीके के पहाड़ देखने मिलेंगे.कारगिल लद्दाख का लेह के बाद दूसरा बड़ा शहर है. कारगिल में समझ नहीं आ रहा था कौनसा होटल बुक किया जाए तभी दो बाइकर्स दिखे. उत्तराखंड से थे दोनों, मुझे लगा ये यही रुके हुए है तो इन्ही से पूछ लिया जाए, पर वो कारगिल में बस थोड़ी देर के लिए ही थे और आगे लेह जाने वाले थे फिर भी होटल ढूंढ़ने में उन्होंने मेरी मदद की और साथ ही पैसे भी कम करवाए. होटल की देख रेख थी तोशी के पास बड़े ही खुशमिजाज थे वो, पहले गाडी से सामान निकालने में मदद की, रूम तक सामान पहुंचाया और कारगिल में देखने के लिए जगह बताई. होटल के सामने ही उनकी छोटी सी दूकान भी थी. सामान रखके मैंने पहले कारगिल देखने का सोचा और तोशी के बताये मुताबिक निकली पाकिस्तान देखने जो की वहा से 10 15 km की दुरी पे था . रास्ता उन्होंने समझा दिया था यहाँ भी पहाड़ चढ़ना था और रास्ता भी सीधा नहीं तो घाटी थी और अब शुब्र सफ़ेद नहीं बल्कि बह रही थी मैली सी सुरु नदी जो कारगिल से होते हुए जा रही थी पाकिस्तान . मज़ा बड़ा आ रहा था ये पहाड़ चढ़ने में, अभी तक का सबसे मजेदार पहाड़ लग रहा था ये,मेरी वेगो के अलावा रास्ते पर और कोई गाडी नहीं . चढ़ते चढ़ते पहुंची मैं एक पॉइंट जहा पर छोटी सी पान की दूकान जैसी दूकान थी और उसके बाजू में छाया में बैठे कुछ लोग. कुछ पर्यटक भी दिख रहे थे. वेगो साइड में लगाकर पूछा यहाँ से पाकिस्तान दीखता है?, बोले हां मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कुछ भी पाकिस्तान कैसे दिखेगा. उन्होंने थोड़ा समझाया और मैं मानी दूरबीन से देखने के लिए .जिस देश जाने की मेरी दिल्ली तमन्ना है वो फ़िलहाल दूरबीन से देखने मिल रहा था. उन पहाड़ो में जादू सा था, बड़ी ख़ुशी और इतना लम्बा सफर तय करने के बाद भी फ्रेश लग रहा था. वो कहते है ना मन प्रसन्न हो तो चेहरे पर दीखता है. उसी ख़ुशी में सोचा यहाँ से और ऊपर चढ़ा जाए चढ़ते चढ़ते पहुंची वहां के आखरी गांव हुंडेरमान.

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उस गाँव में जाने के पहले थी हमारे मराठा बटालियन की चेक पोस्ट बड़ी रिक्वेस्ट करनी पड़ी उन्हें अंदर जाने की इजाजत के लिए ” अंदर हम जाने नहीं देते है हर किसीको पर आप को इजाजत दे रहा हु” वो खुद आर्मी में ना जाने कितने जोखिम उठाते होंगे पर हैरान हो रहे थे मेरे इतने दूर आने पर. बड़ी बाते भी हुयी उनसे, परिवार के बारे में, उनके आर्मी में शामिल होने के बारे में,फिर अंदर गांव पहुंची तो एक अलग कहानी इंतज़ार कर रही थी. गांव देखकर लौटते हुए रास्ते किनारे कुछ लोग बैठे थे वेगो क्युकी स्लो थी तो उन्होंने यूही पूछ लिया “देख आये बेटा” फिर कुछ बाते हुयी और फिर उन्होंने चाय का न्योता दिया. अंकल दौड़कर घर गए और नमकीन चाय (अंकल और नमकीन चाय की पूरी कहानी इस लिंक पर नमकीन चाय मीठी याद) के साथ मेरे लिए रोटी भी ले आये मैं बैठ गयी उन्ही के साथ रास्ते के किनारे एक पत्थर लेकर. नमकीन चाय इसके पहले कभी नहीं पी थी जितनी वो दिखने में मेरे लिए अजीब थी उतनी ही अजीब पिने में थी पर वो इतने प्यार से लाये थे तो पीना तो पूरा था ही. खूब बाते हुयी वहां की स्कूल के बारे में मेरे बारे में और फिर उन्होंने बहुत ही बढ़ी बात कही “बेटा आप पढ़ी लिखी हो ना इसलिए इतनी हिम्मत कर पायी” मैंने कभी ये सोचा भी नहीं था की पढाई है जो हिम्मत भी देती है. शाम हो रही थी इसलिए वहां से निकलना पड़ा वरना बाते और भी थी.

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नमकीन चाय

गाँव से निकलकर पहुंची मैं चेक पोस्ट और वहां अपने आर्मी जवान से कुछ और बाते की उन्होंने पहाड़ पे बसी हमारी आर्मी और दूसरे पहाड़ पे बसे पाकिस्तान आर्मी कैंप दिखाया और कौनसा पहाड़ चढ़कर उन तक सामान पहुंचाया जाता है वो भी बताया.1 घंटे में वो इतना मुश्किल पहाड़ चढ़ जाते है सुनकर तो धक्का ही लग गया.जब मैंने इच्छा जताई ऊपर कैंप जाने की पहाड़ चढ़कर तो जवाब मिला “मैडम आप जब तक चढ़ना चालू करोगे तब तक दुश्मन की गोलिया आपकी जान ले चुकी होगी“. ये अधूरा सपना भी करेंगे कभी पूरा .करीब 7 बजे मैं पहुंची वापस होटल. सबसे पहले तोशीब से खाने का पूछा तो न्योता मिला मुझे इफ्तारी का (तोशीब और इफ्तारी की पूरी कहानी इस लिंक पर पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी). इस से पहले मैंने कभी इफ्तारी नहीं खायी थी. जब तक मैं खाना खाने निचे नहीं आयी तोशीब ने भी खाना नहीं खाया था रोज़ा होते हुए भी. दूकान पर ही उसने निचे चटाई डाल सामने जिस थैले में खाना आया था उस पर रोटियां रखी और सब्जिया कटोरी में ही आयी थी. बड़ा स्वादिष्ट था इफ्तार का खाना और उस से कही ज्यादा मजेदार था चश्मे का पानी. पहले तो समझा ही नहीं की ये चश्मे का पानी क्या होता है फिर तोशीब ने अपने दोस्त की मदद से समझाया की चश्मे का पानी मतलब झरने का पानी. बड़ा अच्छा लगा बिना सजी धजी इस इफ्तार पार्टी में इफ्तारी खाने का. याद रखने वाला ऐसा था ये दिन अब उस यादगार दिन की याद लेकर समय था कल सुबह की तैयारी के लिए एक अच्छी नींद लेने का.

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इफ्तारी

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जिद्द हिम्मत और दुआ

पटनीटॉप से सोनमर्ग की राइड के बाद अब समय था आराम का. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में रहने के कई विकल्प मौजूद है. सोनमर्ग मार्केट प्लेस में पहुँचते ही आपके बाए और देखने मिलेंगे होटल्स, रेस्तरां और दुकाने और दाहिनी ओर GOVT रेस्ट हाउस, GOVT द्वारा संचालित कुछ दुकाने, बैंक और एटीएम.मैंने होटल्स की लाइन में से एक होटल में अपने लिए कमरा सुरक्षित किया. कमरा बहुत ही छोटा सा, डबल बेड के बाद बस चलने भर की जगह बाकी रही, पर रूम के बहार के मंज़र की बात की जाए तो कवी को कविता मिल जाये और चित्रकार को चित्र. जैसे ही कमरे की खिड़की खुली सामने थे पहाड़ जो अँधेरे से ढके जा चुके थे,हरा भरा मैदान, मैदान में कुछ तम्बू, लकड़ियों पर हलकी से जलती आग और भूरे रंग के घोड़े. थोड़ा आराम और फ्रेश होने के बाद अब समय था पेट पूजा और कुछ जरुरी सामान लेने का.

होटल से निकलते ही बिल्कुल बगल में ही दिखाई दी ऊनि कपड़ो की दूकान.पर्यटक स्थलों पर आम तौर पर ये धारणा होती है की खरीदारी थोड़ी महंगी होगी, पर सोनमर्ग में उच्च दर्जे के ऊनि कपडे मिल जाते है बिल्कुल वाजिब दाम में. दस्ताने, मोज़े, टोपी खरीदने के बाद पता करना था मुझे मैकेनिक के बारे में. मार्केट के आखरी छोर में एक दूकान पर पूछा तो पता चला अभी तो कोई नहीं मिलेगा आप सुबह पता कर लीजियेगा, अगर कोई मोपेड के जानकार हो तो. वेगो मुझे श्रीनगर में ही दिखाने की इच्छा थी पर क्युकी इतना समय मेरे पास था नहीं तो आगे निकल आयी. खाना खाने मैं पैदल ही निकली पर जब दूकान में मोपेड का जिक्र निकला तो दूकान में बैठे भैया की भी उत्सुकता बढ़ गयी. वेगो से आयी हु, अकेली आयी हु,लद्दाख जाना है सब जानकर वो थोड़ा हैरान भी हुए और खुश भी “यहाँ तो बाइकर्स आते रहते है पर मोपेड से इतनी दूर अकेले हमने नहीं देखा किसीको“. मैकेनिक तो अगली सुबह मिलना था अब बस खाना बाकि था. उनसे अच्छे होटल के बारे में पूछा तो वह अपने ही होटल ले गए जो दूकान के बिलकुल बाजू में था, रहने का इंतज़ाम भी था वहा उन्होंने उसके लिए भी पूछा पर मेरा रूम मैं पहले ही बुक कर चुकी थी. खाने में उन्होंने मुझे कश्मीरी स्पेशल वाज़वान खिलाया. खाते खाते बातचीत का सिलसिला जारी था और तभी मेरे मन में थोड़ा डर और थोड़ी उत्सुकता बनाये जो सवाल था मैंने पूछ लिया “कैसा है ज़ोजि ला,मोपेड जा पायेगी मेरी वहा. बहुत मुश्किल होगा क्या?“. ज़ोजि ला के बारे में मैंने बस सुन रखा था और कुछ अच्छा तो नहीं ही सुना था. पटनीटॉप में जब विशाल से मिली थी तब उसने भी अपनी चिंता जाहिर की थी “कैसे करेगी तू  ज़ोजि ला वेगो से, अच्छी अच्छी गाड़िया फेल होती है, इसका तो टार्क भी कम है “.ऐसा ही कुछ सभी ने कहा था इसलिए फोटो देखने की हिम्मत नहीं हुई. लग रहा था अभी पता नहीं तो ही चिंता खाये जा रही है फोटो में अगर देख लू तो कही आत्मविश्वास पे डर हावी ना हो जाए.

खतरनाक रास्तो में से एक है ज़ोजि ला और लद्दाख के लिए प्रवेश द्वार. लद्दाख की असली चढाई भी शुरू यही से होती है. होटल में सवाल पूछने का एक कारन ये भी था की जो मैं सुन ना चाहती हु वो मन को तसल्ली और हिम्मत देने वाला जवाब मिल जाये और वही हुआ भी ” मैडम आप इतनी दूर आयी है तो इंशाल्लाह आगे भी जरूर जाएँगी, आप कर लोगे ज़ोजि ला पार डरिये मत, हमारा तो रोज़ का आना जाना है यकीन मानिये कुछ नहीं होगा“. खाना ख़तम कर मैं दुआओ के साथ रूम पर लौटी. दिमाग तो अटका हुआ था ज़ोजि ला पर और किस्मत से बीएसएनएल चालू था तो अपने मेंटर को आखिर मैसेज कर ही दिया , ज़ोजि ला क्यों इतना मुश्किल माना जाता है?. जवाब में एक फोटो आयी, वो फोटो डाउनलोड करने से खुदको रोका और सोने चली गयी पर ” मनचला मन चला तेरी ओर” ओर फोटो देख ही ली, देखकर भी उस पार तो जाना ही था पर अब डर अच्छे से मन में घर कर गया था.दिमाग दिल की अपनी अलग लड़ाई शुरू हो चुकी थी ओर इस लड़ाई में नींद कब आयी समझा ही नहीं.

29th June 2016- सुबह कुछ आराम से ही हुई. उठते ही पहले खिड़की के बहार का नज़ारा देखा सुबह की हलकी धुप उजाले में साफ़ दीखते हरे भरे पहाड़, हरा भरा मैदान ओर मैदान में घोड़े.३ दिन से लगातार वेगो चलाने के बाद आज सोनमर्ग में ही रुकने का फैसला किया था .तैयार होकर पहला काम किया मैकेनिक के पास वेगो ले जाने का. मार्केट के आखरी छोर पर ही थी उनकी दुकाने. जब पहले मैकेनिक के पास गयी तो जवाब आया “बेटा मोपेड की तो जानकारी कुछ कम ही है यहाँ बस ट्रक का काम करना ही जानते है”. मुझे निराशा हो उसके पहले वहा खड़े ट्रक ड्राइवर अंकल बोल पड़े बेटा उस दूसरी दुकान में देख लो उसे थोड़ी जानकारी है इन गाड़ियों की. नाम लेकर उस दूसरे मैकेनिक को आवाज़ दी ओर मुझे वहा जाने के लिए कह दिया. मैकेनिक वहा किसी काम में व्यस्त थे पर फिर एक और ट्रक ड्राइवर अंकल ने उन्हें पहले मेरा काम करने के लिए कहा. मैकेनिक को मैंने बताया ज़ोजि ला जाना है इस गाडी से, आप देखिये कोई परेशानी तो नहीं होगी, जाएगी क्या ये ज़ोजि ला.वो वेगो स्टार्ट कर उसे थोड़ा घुमा कर वापस आये ” क्यों नहीं जाएगी बिलकुल जाएगी ये गाडी  बिल्कुल ठीक है“. आस पास काफी ट्रक ड्राइवर्स थे उनमे से भी किसीने कहा ” बेटा आराम से जा, हिम्मत ऐ मर्दा तो मदद ऐ खुदा“. दिन मतलब अच्छा गुजरना था, मैकेनिक ट्रक ड्राइवर्स इन्होने बोल दिया अब क्या डरना था. अब पेट्रोल का इंतज़ाम करना था, दूकान से कैन लेकर मैं पोहोची १३ कम दूर श्रीनगर हाईवे पर पेट्रोल पंप. वह ख़तम कर होटल रूम भी बदला शाम को मेरे दो दोस्त जो आने वाले थे. सब काम ख़तम कर अब समय था सोनमर्ग की वादियों को जीने का.

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वेगो लेकर मैं बढ़ी थाजीवास ग्लेशियर की तरफ, ३ कम की राइड फिर आपको ले चलती है खुशनुमा वादिया, खुला आसमान और आपको मोहब्बत से भर देने वाले नज़ारो में . पर बदकिस्मती देखिये की खूबसूरती के बिच भी नफरत आखिर जगह बना ही रही है.

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राइड करके मैं पहुंची जहा से शुरुआत होती है glaciers के तरफ चढाई की. वही कुछ छोटी चाय की दुकाने है पार्किंग और गाइड और घोड़े किराये पर ले सकते है. घोड़ो के लिए अलग से पगडण्डी बनी हुयी है पर अगर आप खुद चलकर जाना चाहा रहे है तो वो मैदान, वो वादी पूरी आपकी. और जब आप सफ़ेद पानी की बहती धारा में अपने पैर डालकर बैठ सकते हो ,उसकी ठंडक महसूस कर सकते हो, ठंडी बहती हवा को फुर्सत में अपने गालो को चूमने दे सकते हो,नंगे पैरो से जन्नत महसूस कर सकते हो, जब मन चाहे बर्फ से ढके पहाड़ और जब मन चाहे पलटकर दूसरी और हरी भरी घाटियों में बहता पानी, छोटे छोटे घर, दुकाने देख सकते हो तो क्यों भला घोड़ी चढ़ी जाए और बेज़ुबान जानवर को सताया जाए. मैंने फैसला किया पैदल चलने का और साथ ही हो लिया मेरे साथ एक १८ साल का बच्चा,उम्र जैसी उसने बताई थी हो सकता है कम ही हो, स्लेड्जिंग बोर्ड साथ लेकर मुझे मनाते हुए की दीदी ज्यादा पैसे नहीं लूंगा आप ही देख लो कितना दूर है. आपको स्लेड्जिंग भी करवा दूंगा मैं खुद ही . हां मैंने कहा नहीं था पर साथ साथ हम पोहोच गए स्लेड्जिंग पॉइंट.

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स्लेड्जिंग करने में तो मुझे दिलचस्पी नहीं आयी पर बर्फीले पहाड़ की चोटी तक पहुंचने की इच्छा जाग उठी. बच्चे का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने मुझे गम बूट्स दिलवाये, स्लेड्जिंग बोर्ड कही छुपा कर रख दिया और हो लिया मेरे साथ “दीदी पर मैं ज्यादा दूर तक नहीं आऊंगा बस आधे रस्ते वहा से आप चली जाना,मेरा दिन वरना पूरा आप ही के साथ चला जायेगा“. तो चल पड़े हम साथ साथ, आधे रस्ते जहा तक तय हुआ था वो मेरे साथ आया फिर रुक गया “दीदी अब आप ही जाओ आगे”.

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पहाड़ में पूरी बर्फ, कुछ छोटे छोटे पत्थर और बर्फ पिघलकर बहता हुआ पानी. कुछ कुछ जगह ऐसी की कही बर्फ पिघलकर आपका पैर अंदर ना चला जाए . अभी तक तो वो बच्चा साथ में था बहुत बार फिसलते फिसलते मुझे बचाया ,गिरी तो मुझे उठाया ,पैर कहा रखना है ये बताया पर आगे मुझे खुद ही खुदको संभालना था. थोड़ी ही दूर मैं अकेले पहुंची थी की पीछे से आवाज़ आ गयी “अरे दीदी कहा जा रहे हो,गलत जा रहे हो आप,रुको मैं आता हु, आप वाहा चले जाते तो कुत्ते खा जाते आपको,पहाड़ी कुत्ते है ये उनके आस पास भी जाने का मत सोचिये“. पहाड़ी कुत्ते जो रखे जाते है भेड़ की रखवाली के लिए और वह अपना काम पूरी निष्ठा से करते है, मजाल किसीकी की उनके रहते भेड़ को हाथ लगा ले. अरे पर तुम तो वापस जाने वाले थे, “कैसे चले जाता आपको छोड़कर, मेहमान हो आप हमारे आपको कुछ हो जाता तो क्या जवाब देते हम कश्मीर वाले”. और कुछ यु हमारी दोस्ती हुयी. फिर बाते आगे बढ़ी ,परिवार में कौन कौन है और क्या काम करते हो ” इस पर घर की सारी जिम्मेदारी थी सोनमर्ग में गाइड के अलावा अमरनाथ यात्रियों के लिए भी गाइड की सेवा देता था,बेहेन थी एक छोटी जो स्कूल में थी.

“तुम थके नहीं रोज़ा होगा ना तुम्हारा “

“नहीं मैं नहीं थका अल्लाह हिम्मत देता है”

हर कोई यहाँ रोज़ा नहीं करता क्या मार्केट में मैंने देखा कुछ लोग तो खाना खा रहे थे?

“हा तभी तो क़यामत आती है ना, देखा नहीं आपने २०१४ में जो बाढ़ आयी थी, अल्लाह सब देख रहा है”.

“अच्छा ये जो जगह है ना यही बजरंगी भाईजान के शूटिंग हुई थी जो सलमान खान को गोली लग जाती है वही वाला”.

मुझे बताओ तुम भारत में रहना पसंद करोगे या पकिस्तान?

“दीदी मुझे क्या पता पाकिस्तान, ये कुछ ३ % लोग है जो कश्मीर बेच आये है,नफरत फैला रहे है”

बातो बातो में काफी ऊपर चढ़ चुके थे हम,”दीदी आप पहले गेस्ट हो अभी तक के जो इतना ऊपर चढ़ के आये हो वरना कोई आना पसंद नहीं करता“. चोटी तक तो हम नहीं पहुंच पाए क्युकी शाम के पहले निचे भी उतरना था और उसे घर पे सामान देने भी जाना था. अपने आप में ही एक अलग दुनिया में आये जैसा लग रहा था उन पहाड़ो के बिच. निचे उतरते उतरते नदी के किनारे बानी चाय की दूकान पर कावा और मैगी का मज़ा लिया, पहली ही बार ही कावा का स्वाद चका था मैंने. मुझे वेगो के पास छोड़ वो तुरंत भागा घर की और सामान खरीदने के लिए.

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इस बार जो मैंने होटल बुक किया था वो मार्केट से काफी पहले ही था पर किसी कारन से मैं फिर मार्केट के लिए निकली. मार्केट में कल रात वाली दूकान पर जा ही थी की अचानक से आवाज़ आयी “The Wego Girl”. अनजान शहर में आपको कोई इस नाम से बुलाये तो चेहरे पर मुस्कान आना लाजमी ही था. तब तो मुस्कुराकर मैं दूकान के लिए आगे निकल गयी पर लौट ते वक़्त उनसे मिली. होटल वाली लाइन में ही एक होटल के बहार कुछ ३० ३१ उम्र के एक नौजवान और २ बुजुर्ग अंकल बैठे थे. होटल उन्ही का था. उन्होंने मुझे चाय के लिए पूछा और चाय के लिए तो मना हम करते ही नहीं. चाय और बिस्कुट मंगवाई गयी मेरे लिए.एक अंकल ने बातो का सिलसिला आगे बढ़ाया बेटा कहा से आये हो कौन है साथ में उन्हें जवाब दिए, थोड़ा वो चौके फिर बोले-

आप नागपुर से अकेले आये हो, बड़ी हिम्मत की है बेटा आपने , मेरी बेटी के उम्र के ही हो आप वो श्रीनगर में पढ़ती है, वो श्रीनगर से सोनमर्ग आने की भी हिम्मत नहीं कर पाती, कहा तक जाओगे आप “. बताया मैंने और फिर उनसे अपना सवाल पूछ ही लिया

” जोज़ि ला में चल जाएगी ये गाडी”.

बेटा आपने यहाँ तक आने की हिम्मत की है इंशाल्लाह आगे भी आप जरूर जाओगे, मैं आपके लिए दुआ करूँगा, जब आप नागपुर पहुुँच जाओ तो कॉल जरूर करना “.

इतनी शिद्दत और खूबसूरती से बोला जाता है यहाँ “इंशाल्लाह”, हाय, दुआ काबुल ही हो गयी समझो.

उनके बेटे ने भी कहा मैं आज ही आया हु जोज़ि ला पार करके चले जाओगे आप बस थोड़ा आराम से रुकते रुकते जाना और ध्यान रखना. कोई परेशानी आयी अगर तो मदद के लिए लोग भी मिल जाएंगे या मुझे कॉल कर देना. इनके जवाब ही थे जो हिम्मत दे रहे थे. उन्होंने शाम को खाने का न्योता दिया.
आजकल जहा लोगो को प्यार से नफरत और नफरत से मोहब्बत होती जा रही है ऐसे में ऐसे लोगो का मिलना , जिंदगी को उमंग और उम्मीद से भर देता है. फैलती नफरत और खौफ के बिच भी मोहब्बत अपनी जगह ढूंढ ही लेती है.

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हामी भरकर मैं होटल वापस आ गयी अपने दोस्तों के इंतज़ार में. सोनमर्ग में जहा नज़र उठा के देख लेंगे वहा आपको बस खूबसूरती ही दिखेगी और इसलिए इस होटल से भी खूबसूरत पहाड़ दिल जीत रहे थे. दोस्त आये हमने बोहोत मस्ती भी की पर जैसे जैसे रात चढ़ रही थी वैसे वैसे बैचनी बढ़ रही थी.ये बैचनी ख़तम तब ही होनी थी जब अगली सुबह उठकर जोज़ि ला नाम का पहाड़ पार लगता. उसके लिए जरुरी थी रात की अच्छी नींद. अपनी बैचैनी को साथ लेकर और अपने कुछ करीबी लोगो को मुझे आगे के सफर के लिए शुभेछा देने का मैसेज डालकर चली मैं अपनी नींद पूरी करने कल के मुश्किल सफर के लिए.

कश्मीर के रंग

28th June 2016 : अपने सफर को आगे बढ़ाते हुए सुबह 7 बजे निकली मैं  सोनमर्ग का लक्ष्य लेकर. हल्का सा कोहरा, जून में नवंबर वाली ठण्ड और रास्ते के साथ साथ चलती झेलम नदी का मजा लेते हुए शुरू हुआ ये सफर. सोनमर्ग के लिए श्रीनगर होते हुए जाना होता है तो निकल पड़ी मैं बीआरओ द्वारा लगाए हुए रास्ता बताते हुए साइन बोर्ड के इशारो पे श्रीनगर की ओर.आज पहाड़ चढ़ने नहीं उतरने थे.सफर चालू तो कर दिया पर मुश्किल ये की इस ज़िन्दगी में  रंग भर देने वाले मौसम को छोड़कर आगे बढ़ा कैसे जाये.आगे नज़ारे और खूबसूरत ही होने वाले थे पर शर्त ये थी इन्हे छोड़ा जाए. जी कर रहा था वेगो को सड़क किनारे खड़ा करा बैठ जाऊ दिल को शांति देने वाले इन नज़ारो को देखते हुए पर एक नए लक्ष्य का मुझे भी इंतज़ार था .पटनीटॉप से बहार निकलकर जो सबसे पहला काम करना था वो था रकसैक को बारिश से बचाने के लिए ताड़पत्री लेने का.पटनीटॉप से पास ही एक शहर में मुझे काम का सामान मिल गया और फिर सफर कैसे आगे बढ़ रहा था इन मदमस्त हवाओ के साथ कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, की अचानक इस खुले मौसम में कुछ बंद बंद महसूस होने लगा और तब समझा की मेरी वेगो कुछ ही देर में पोहोचने वाली है धरती का स्वर्ग कश्मीर.

सुरक्षा इंतज़ाम एकदम कड़े जहा नज़र घुमाओ पहाड़ पेड़, खूबसूरती और उसके साथ बन्दुक ताने हमारे आर्मी जवान. दूकान के सामने, बनते हुए घर की छत पे, खेलते हुए बच्चो के पास, स्कूल के सामने, पेट्रोल पंप पर, सड़क के किनारे, जंगल के बिच, 2 sec के लिए तो लगा जैसे किसी और देश में आ गयी हु जो आज़ाद नहीं है. वादिया सुन्दर थी पर उनकी हवाओ में डर सा था. हर लोग वाहा 24 घंटे किसी की निगरानी में था. बुरा लग रहा था वो देखकर, बुरा लग रहा था उन लोगो के लिए जो इस निगरानी में जीते है, खुशकिस्मत महसूस कर रही थी खुदको की मैं ऐसे शहर ऐसे वातावरण में पली की आज़ाद भारत को आज़ाद ही देखा. बड़ा मुश्किल होता जीना अगर बंदूकों की निगरानी में जीना पड़ता. उस 10 15 min में बोहोत गुस्सा आया,डर भी लगा खुद पर शर्म भी आयी, कुछ आँखे नम हुयी ,50 सवाल मन में आये पर थी मैं लाचार।

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गलत न वाहा के लोग थे न हमारे आर्मी के जवान, हलात के आगे मजबूर थे सब बस. आगे का सफर अब ऐसे ही कटना था जवानो के समूह और निगरानी के साथ. पहली बार आर्मी को देखकर मेहफ़ूज़ नहीं डर लग रहा था. अब नज़ारे कुछ कम ही अपनी और खींच रहे थे, सफर कब ख़तम होगा इसका इंतज़ार ज्यादा था. सफर ख़तम करने के लिए आगे बढ़ना जरुरी था और बढ़ते बढ़ते वेगो पोहोची कश्मीर के प्रवेश द्वार जवाहर टनल.  1956 में बना गया 2.5 km लम्बा ये टनल जो ले चलता है आपको कश्मीर की वादियों में. किस्मत से जब मैं टनल में गयी मेरे आगे ही एक टैक्सी थी जिसकी लाइट की मदद से टनल पार कर पायी, वरना वेगो की हेड लाइट में उस अँधेरी सुरंग से निकलना मुश्किल ही ठहरता। अपने देश की एक और ऐतिहासिक जगह से होकर गुजरने की थोड़ी ख़ुशी हो रही थी. जवाहर टनल के बहार निकलते ही खड़ी थी हमारी आर्मी जवानो का समुह. इच्छा थी उस ऐतिहासिक टनल को कैमरा में कैद करने की पर  ध्यान ये भी था की सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए बिना इजाजत फोटो ना ली जाए. इजाजत मिलनी नहीं थी ये भी तय ही था और वही हुआ भी एक आर्मी अफसर से पूछने के बाद. कैमरा में ना सही दिल में वो अनुभव हमेशा कैद रहेगा.

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हरी भरी वादियों से होकर गुजरने के बाद समय था कश्मीर के शहरों से गुजरने का और ऐसे ही एक शहर क्वाजिगंड  से गुजरते हुए अचानक से मुझे रोक लिया पुलिस चौकी के बिलकुल आगे एक पुलिस सिपाही ने. मैं थी पूरी तरह से पैक हेलमेट स्क्राफ् जैकेट ग्लव्स जूते.देखते ही पहला सवाल उन्होंने पूछा “आप तो पेहले ये बताइये आपको मैं सर बोलू या मैडम”. तब मैंने अपना हेलमेट और स्क्राफ् हटाया-

” अच्छा तो आप मैडम है, मैडम ये बताइये आपने गाडी का लाइट क्यों चालू रखा है? बंद कीजिये उसे ,कहा से है आप और कहा से आ रही है आप इस स्कूटी पर? साथ में कौन है आपके? “.

उन्हें बताया मैंने टनल पार करने के बाद लाइट बंद करना भूल गयी , कोई साथ नहीं है नागपुर से आयी हु मैं ,सोनमर्ग जा रही हु. उन्हें चौकाने के लिए इतने जवाब काफी थे. “अकेले आयी है आप इतने दूर से”?. चाय पीना पसंद करेंगी.

आप सफर में हो कोई आपको चाय के लिए पूछे और आप मना कर दे इस से बड़ा और गुनाह कोई हो नही सकता, क्युकी जहा चाय को मना किया मतलब एक नए रिश्ते को भी आप मना कर गए और कुछ नया जान ने को भी.जवाब मेरा हां था सोचा चलो चौकी में बैठके चाय पि जाये कुछ यादे, कुछ रिश्ते बटोरे जाए और आराम भी चाइये ही था. पर चाय चौकी पे नहीं तो चौकी के कैंपस में बने कैंटीन में  पीनी थी. कैंटीन के बहार कुछ टेबल कुर्सियां लगी थी  पेड़ो से घिरी हुई, वही बैठने का सोचा. कैंटीन वाले को बोलकर मेरे लिए चाय बुलाई गयी, पुलिस वाले अंकल ने तो साथ में चाय पि नहीं वो मुझे बिठाकर वापस ड्यूटी पर चले गए “मैडम आप आराम से बैठिये चाय पीजिये”. चाय के साथ मुझे जरुरत थी नाश्ते की भी, सुबह से कुछ खाया नहीं था तो मैंने नाश्ता भी मंगवा लिया। पुलिस अंकल एक बार बिच में आकर देख गए कही मैं परेशान तो नहीं हो रही फिर नाश्ता ख़तम भी हो गया पर वो नहीं आये. मैंने कैंटीन में बिल के लिए कहा तो पता चला “बिल तो आपका दे दिया है वो पुलिस जो आपको लेकर आये थे” मैं थोड़ा चौकी ये सुनकर और थोड़ी मुस्कुरायी भी. बस दुःख इस बात का रहा की उन्हें धन्यवाद् नहीं कर पायी,उनकी ड्यूटी खत्म करके बिल देकर वो घर जा चुके थे. वाहा कुछ देर आराम करके वेगो आगे बढ़ी अपनी मंज़िल सोनमर्ग की तरफ.

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दिन चढ़ रहा था पर मौसम ऐसा की धुप का नामों निशाँ नहीं वरना नागपुर में तो जून के अंत में भी जलाने वाली धुप होती है. नज़ारे भी रास्तो के साथ बदलते हुए, ताज़ा कर देने वाले और इतने शहर इतने कस्बो से गुजरने के बाद आर्मी के मौजुदगी की की भी आदत हो ही गयी थी. हमारी हिफाज़त के लिए ही थे वो वाहा अपने परिवार से दूर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए.  अब डर नहीं मेहफ़ूज़ लगने लगा था उनके साथ, पता था कोई परेशानी आयी भी तो ये रहेंगे साथ, कही मैं अकेली नहीं हु.

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वेगो गुज़र रही थी कश्मीर के अलग अलग रास्तो और कस्बो से और ऐसे ही एक कस्बे संगम जो अनंतनाग में पड़ता है ,के पेहले रास्तो के दोनों तरफ दिखने लगी सुप्रसिद्ध कश्मीरी विलो बैट से सजी हुई दुकाने.दुकानों के साथ ही बैट वहा बनायीं भी जा रही थी. यहाँ की सड़के भी घाट रास्तो से अलग 4 लेन हो गयी थी कुछ देर उन रास्तो पर तेजी से वेगो दौड़ाने का मज़ा लिया। इस मज़े में कब गलत रास्ते चली गयी ध्यान ही नहीं रहा और फिर स्वागत किया आर्मी ने. बड़े सख्त से दिखने वाले एक अफसर ने रोक कर पुरे पेपर चेक किये, उतनी ही सख्ती से सही रास्ता बताया और जाने को कहा. मन ही मन मैं ये सोच रही थी की कितना मुश्किल होता होगा इतना सख्त रहना, कभी कभी ना चाहते हुए भी यु बेरुखी दिखाना, ड्यूटी तो पर ड्यूटी है और जिम्मेदारी जब देश की हो तो चूक की गुंजाइश कहा.

संगम से श्रीनगर अब ज्यादा दूर नहीं था लगभग 50 km. शाम करीब 4 4.15 बजे पोहोची मैं श्रीनगर। कैसा था श्रीनगर? बोहोत खूबसूरत, रास्तो के किनारे चिन्नार के लम्बे लम्बे पेड़ , आपके साथ चलता दल लेक, लेक के एक तरफ जहा था शहर वही बाकी तरफ घिरा हुआ था पहाड़ियों से , ठंडी बहती हवा. दल लेक पर कुछ देर समय बिताया पहाड़, पेड़, पानी, हवा,, खूबसूरती आप समझ ही सकते है क्या महसूस हो रहा होगा मुझे वाहा। श्रीनगर से मुझे दवाई लेनी थी और एक अड़चन थी बीएसएनएल की जिसे चालू करना था. दल लेक में समय बिताकर पोहोची मैं मेडिकल की दूकान, दवाइया ली और रास्ता भी पूछा सोनमर्ग के लिए. दूकान में मेरे बाजु में खड़े हुए अंकल और दूकान वाले अंकल ने सलाह मसहूरा कर  सही रास्ता बताया लाल चौक से भेजा जाये या नहीं ये वो सोच रहे थे. दूकान से बहार निकली तो जिन्होंने रास्ता बताया था वो अपनी कार निकालते हुए फिर मिल गए. मेरी वेगो देख थोड़ा चौक गए फिर बोले “बेटा याहा से चले जाओ, रास्ता अच्छा है, आराम से जाना, डरने की कोई कोई बात नहीं और अपना ध्यान रखना” केहकर वो निकल गए. अब बीएसएनएल की परेशानी हल करने का समय था, किस्मत ने इस बार बड़ा साथ दिया और कॉल सेण्टर में किसी समझदार ने फ़ोन उठा लिया और परेशानी 5 min में हल कर दी, कोशिश पटनीटॉप जिस दिन पोहोची थी उस दिन से ही चालू थी सिम चालू करने की और हल हुई श्रीनगर पोहोचकर इस बिच करीब २० कॉल सेण्टर एक्सेक्यूटिव्स से बात कर चुकी थी मैं. परेशानी हल हुई वो ज्यादा जरुरी था. अब शुरू होने वाला था आज की यात्रा का अंतिम पड़ाव। श्रीनगर से शाम 5 बजे निकली मैं सोनमर्ग की और. शाम यहाँ ८ बजे के बाद होती है तो और 3 घंटे का समय था मेरे पास 80 85 km पूरा करने के लिए.

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सोनमर्ग की तरफ बढ़ते हुए रस्ते कुछ और छोटे होते चले गए थोड़े ख़राब भी ,पहाड़ कुछ बड़े, नदियां सफ़ेद और दिखने लगे बर्फ से लदे पहाड़। कश्मीर को जन्नत क्यों कहा जाता है इसकी झलक मिलनी शुरू हुई उन रास्तो पर, समय की पाबंदी ना होती तो 3 घंटे का वो सफर मैं पूरा करती 6 घंटो में. थोड़ा ज्यादा समय बिताती में उन वादियों में अपनी वेगो के साथ. जब पटनीटॉप से सफर चालू किया था तो नदी कही कही साथ तो थी पर पास नहीं की छू सके पर सोनमर्ग से 1 घंटे पहले से जो नज़ारा देखने मिला वो आज भी ख़ुशी से भर देता है. सामने थोड़े भूरे रंग के पहाड़ कुछ बर्फ से ढ़के हुए सूरज की रौशनी से केसरी रंग लेते हुए,ऐसा लग रहा था जैसे कोई ब्रश लेकर रंगो की चित्रकारी कर रहा हो, उन्ही के बाजू में हरे रंग को लपेटे हुए पहाड़ और उन रंगो की जुगलबंदी करते पहाड़ो के नीचे बहती सफ़ेद पाक सिंध नदी. तभी कहा गया है ” जन्नत गर कही है तो यही है यही है यही है” .जन्नत जो जिंदगी को नयी उमंग से भर दे, जिंदगी ना मांगने वाले भी 100 साल के ऊपर जीने की दुआ मांगने लगे. उन रंगो को आँखों में भर उनके साथ अपना समय बिता कर निकली उन नज़ारो के साथ साथ सोनमर्ग. अब ये पहाड़ ये नदी ये रंग साथ ही चलने थे और इन्ही के साथ प्रवेश हुआ मेरा सोनमर्ग में. 8 बजे करीब मैं पोहोची सोनमर्ग और सोनमर्ग बाजार में जाहा गेस्ट हाउस होटल्स की लाइन लगी हुई थी उन्ही में से एक जगह कमरा लिया। इतनी सुंदरता आँखों में भरने के बाद अब समय था आराम का. कहानी और भी है पर अगली कड़ी में

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अवार्ड्स

सकाळ ग्रुप की तरफ से नवाज़ा गया युथ इन्स्पिरेटर अवार्ड

 

युवा भरारी अवार्ड C P & Berar College,Nagpur की तरफ से

सावित्रीबाई बाई फुले अवार्ड से सम्मानित किया गया मुझे लार्ड बुद्धा टीवी चैनल की और से

जम्मू कश्मीर में स्वागत है

जुलाई 2016 और सेप्ट 2017 इस सवा साल में ज़िन्दगी इतनी बदल जाएगी लगा ही नहीं था. बदलना तो ये शुरू तभी से हो गयी थी जब लद्दाख जाने का सोचा था पर उसके बाद भी एक एक कर जो होता चला गया उसके लिए मैं तैयार नहीं थी. ये पोस्ट इतना देरी से आने का एक कारण रहा जुलाई 8 2016 की वो शाम जिसके निशान अभी भी मेरे साथ ही है. खैर क्या जिंदगी बदली और क्या हुआ था 8 जुलाई 2016 को ये आगे की पोस्ट में आपको पता चल ही जायेगा फ़िलहाल बात करते है उन रास्तो की जाहा वेगो चलाने का सपना ना जाने मैंने कब से देखा था. मेरा सपना पूरा करने के लिए जरूररत थी बस उस दरवाज़े को पार करने की. कौनसा दरवाज़ा आइये पता करते है.

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ये था वो दरवाज़ा था ” Excise Dept Toll Post Lakhanpur Welcomes You To Jammu & kashmir State”.उस पल को जीने के लिए कुछ देर गाडी पर बैठ कर उस दरवाज़े को निहारती रही और फिर उसे अपने कैमरे में कैद करने लगी. फिर अपनी वेगो चलाकर पोहोची मैं दरवाज़े के पार. जम्मू कश्मीर की चिकनी सड़क पर दौड़ती मेरी वेगो की ख़ुशी शब्दों से नहीं मेरे चेहरे की चमक से ही बयान हो सकती है. दोनों तरफ के नज़ारो को मैं देख रही थी, खुद ही खुद से बाते कर रही थी, खुद पर ही यकीन नहीं हो रहा था,अजीब सी ख़ुशी थी, और इन सब के बिच दिल से दो लोगो को शुक्रिया करना चाहा रही थी. थोड़ी देर बाद वेगो रोक उन्हें कॉल करने का सोचा पर जम्मू कश्मीर जितने तहे दिल से मुझे बुला रहा था उतने ही तहे दिल से फ़ोन के नेटवर्क को अलविदा भी कह चूका था. थोड़ा बुरा लगा और थोड़ा टेंशन आया पर सफर तो जारी रखना ही था. लक्ष्य था उस दिन का पटनीटॉप.

पूछते पूछते जाना था. साम्बा तक तो सफर बड़े आराम से कटा सीधी लम्बी चिकनी सड़क पर जब लद्दाख जाने की सोची हो तो इन सड़को से लेना ही क्या था. आगे रास्ते कैसे होंगे इनकी हलकी सी झलक साम्बा उधमपुर के रास्तो ने दे दी. जाना ऊंचा था, रास्ता ख़राब था, बिच में कही पूल का काम चालु था. दिमाग संतुलन खो ही रहा था पर ये नज़ारे और अपने लक्ष्य की और बढ़ते कदम ने संभाल लिया. चलती ,रूकती, थकी हुयी पोहोची में एक रेस्टॉरंट पेट पूजा और कुछ आराम के लिए,रेस्टोरेंट करीब खाली ही था तो जाकर बैठ गयी मैं एक टेबल पर. बैठी ही थी की वेटर आया और हालत देखकर बोला,टेबल की और इशारा करते हुए मैडम आप वहा बैठ जाइये अच्छी ठंडी हवा आएगी. जैसे ही बैठी उन्होंने खिड़की खोली और नज़ारा था हरी भरी वादियों का, थकान उन्हें देखते ही काहा चली गयी पता ही नहीं चला. बैठकर अपने फ़ोन का नेटवर्क देखने की सोची पर कुछ हासिल नहीं हुआ, फ़ोन बंद चालू करके देखा कुछ नहीं हुआ तो वेटर से पूछा, पता चला प्राइवेट नेटवर्क यही से बंद हो जाते है बीएसएनएल और यहाँ के नंबर ही चल पाएंगे.बीएसएनएल का सिम तो था मेरे पास पर माइक्रो नहीं और इसलिए उसे एक्टिव भी नहीं कर पा रही थी. ये बात उन्हें बताई तो बोले मैडम आप मेरे फ़ोन में सिम डाल लीजिये और एक्टिव कर लीजिये, आपको कुछ कॉल करने होंगे तो मेरे फ़ोन से भी कर सकते है आप जब तक है यहाँ रख लीजिये मेरा फ़ोन. जितनी खूबसूरत वो वादियां थी वैसी ही खूबसूरती की झलक दिखी मुझे उनमे. खाना तो खिलाया ही उन्होंने पर मेरी परेशानी में भी मदद करने की कोशिस की. उनकी मदद से बीएसएनएल एक्टिव तो हो गया था पर कॉल और इंटरनेट बंद थे. आराम और पेट पूजा करके बढ़ी मेरी वेगो आगे के सफर के लिए.

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शाम करीब 6 बजे पोहोची मैं अपनी मंज़िल पटनीटॉप. पहाड़ो से घिरा हुआ ये हिल स्टेशन, ठंडी हवा, बेहते पानी की आवाज़ और पहाड़ो को देखती मेरी वेगो. याहा मेरी थकान मेरी ख़ुशी पर हावी हो रही थी, इसलिए जल्दी ही चली गयी मैं रेहने के लिए रूम ढूंढ़ने. रूम थोड़े मेहँगे थे और उसपे लोगो को मुझपे विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,उन्होंने एनफील्ड और बाकी बड़ी गाड़ियों में लोगो को आते हुए देखा था पर एक अकेली लड़की मोपेड पर याहा,मुश्किल से एक रूम मिला. रूम साफ़ करने के लिए बोलके मैं निकली अपने बीएसएनएल सिम को माइक्रो करने. एक ही मोबाइल की छोटी सी टिन की दूकान थी वाहा जो मुझे होटल वालो ने ही बताई थी.

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Patnitop

दूकान में मशक्कत बड़ी लम्बी चली, दूकान में माइक्रो सिम कट करने के लिए साधन था नहीं और दुकानदार भी डर रहा था की कुछ गड़बड़ हो गयी कट करने में तो सिम ख़राब ना हो जाये. मैंने ही थोड़ा फाॅर्स किया फिर वो माने अब सिम कट हो गयी फ़ोन में डाल भी दी पर नेटवर्क आने का नाम नहीं. फिर थोड़ी देर में समझा की सिम वो गलत डाल रहे थे. ये सारि मशक्कत जब चल रही थी तब हम में कुछ बाते भी हुयी और बातो बातो में मुझे एक सवाल पूछा गया –

“इतने दूर अकेले आपको डर नहीं लगता? मैंने पूछा डर किस से सब अपने ही तो लोग है ना, हां पर फिर भी कुछ हो गया तो मेरा जवाब था क्या होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ हुआ भी तो बस जान ही जाएगी इस से ज्यादा और कुछ हो सकता है क्या?. जवाब सुनके वो थोड़े दंग हुए और फिर मुस्कुराये की हां और होगा भी क्या.”

फ़ोन का काम ख़तम हो गया था और बाते भी. फ़ोन पे मशक्कत उन्होंने काफी की पर पैसा एक नहीं लिया और शुभकामनाओ के साथ अलविदा किया. एक मुश्किल याहा हल हो गयी थी पर पता नहीं था की दूसरी मुश्किल सामने ही इंतज़ार कर रही थी. जब होटल पोहोची रूम पर तो मैनेजर ने ये बोलते हुए “मैडम रूम का एडवांस बुकिंग था, हमे लगा बुकिंग कैंसिल हो गयी है अभी तक कोई आया नहीं तो,पर अभी उनका कॉल आया था और उन्होंने बताया की वो आ रहे है”. मैं सामन लेकर निचे आयी अपनी वेगो के पास खड़ी हो गयी, समझ ही नहीं आ रहा था अब रात में क्या करू. थकान से शरीर भी जवाब दे रहा था, और मन भी कमज़ोर पड़ने ही वाला था कि 4 एनफील्ड आते हुए दिखी. राइडर्स को देखकर ख़ुशी हो ही रही थी और वह ख़ुशी जशन में बदल गयी जब उनमे से लास्ट राइडर ने मुझे से आगे निकलने के बाद अपनी एनफील्ड रूककर मुझे आवाज़ लगायी “अरे स्नेहल क्या कर रही है तू याहा,इधर आ” मैं गयी उस से गले मिली. ये थे मेरे फेसबुक फ्रेंड विशाल मयेकर जिनसे पहली बार ऐसे मुलाकात हो रही थी . अक्सर हम कहते है दुनिया बोहोत छोटी है,विशाल से मिलकर अनुभव भी कर लिया, मुझपे मुसीबत आने पर तो कुछ ज्यादा ही छोटी हो जाती है लगा. उसे जब मेरी परेशानी पता चली तुरंत बोले ” अरे टेंशन मत ले तू हमारे साथ रुकेगी”.और फिर हम रुके पटनीटॉप के उचाई पे बसे और बेहद खूबसूरत होटल ग्रीन टॉप के डबल सुइट में.

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Vishal aur Main

 

रूम के लिए इतना इंतज़ार, थोड़ी परेशानी, थोड़ी तकलीफ सब जायज़ लग रही थी उस सुइट, विशाल,जागृति और बाकी दोस्तों से मिलकर. मुलाकात, बात, खाना, बीएसएनएल से फ़ोन पर घंटो की लड़ाई इन सब के बाद समय था अगले दिन की शुरुआत के लिए अच्छी नींद लेने का.बिस्तर पर लेटे लेटे मिला जुला सा, कुछ अच्छा कुछ ख़राब सा दिन आँखो के से सामने गुजर रहा था. वो कहते है न “अंत भला तो सब भला”. जैसे खुशनुमा शुरू हुआ था दिन वैसे ही खुशनुमा तरीके से खत्म होने वाली थी रात,बस कुछ जवाब ढूंढ़ने की कोशिश के बाद .मोबाइल की दूकान पर मेरे ही जवाब “सब अपने ही तो लोग है ना” ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. जब सब अपने ही है तो क्यों हम लोगो से दर कर बहार नहीं निकल रहे है ? हम लोगो को अपना नहीं पा रहे है या लोग हमे? लिखते पढ़ते क्या हम रोबोट बनते जा रहे है जिनमे भावनाये नहीं होती?. जवाब ढूंढ़ते ढूंढ़ते तो मैं सो गयी पर क्या आप देंगे मुझे इन सवालो के जवाब.

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पड़ाव दूसरा

साथ चलता है मेरे दुवाओ का काफिला, और ऐसी ही एक दुआ ने असर दिखाया 25 जून 2016 को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर. 25 को शुरू होने वाला था मेरा दिल्ली से लद्दाख तक का सफर. 25 को दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे नागपुर से पार्सल की हुई मेरी वेगो लेनी थी. 25 को सुबह अपना बड़ा सा रकसैक, एक बैग,हेलमेट और जैकेट लेकर मैं ट्रैन से उतरी. मैं एक अकेली और सामान इतना सारा, सामान लेकर पोहोची मैं प्लेटफार्म के पार्सल ऑफिस में. ऑफिस में 2 लोग मौजूद थे,उनमे से एक का नाम था मनोज . मुझे देखकर पहले तो शॉक ही लगा उन्हें,पतली दुबली सी लड़की इतने सारे सामान से लदी हुई और जून की गर्मी से पूरा पसीना पसीना. मैडम सामान रख दीजिये निचे और पहले आराम से बैठकर पानी पीजिये. सामान निचे रखकर कुछ देर मैं बैठी फिर उन्हें रिसिप्ट दिखाई. रिसिप्ट देखकर उन्होंने मुझे प्लेटफार्म के दूसरे पार्सल ऑफिस जाने के लिए कहा. मुझे दोनों ने सामान वही रखने के लिए कहा पर मैंने सोचा की जब गाडी वही से उठानी है तो फिर यहाँ वापस आकर फायदा नहीं इसलिए सामान लेकर ही मैं चल पड़ी प्लेटफार्म की दूसरी और. गलती बस इतनी कर दी की और आधे रस्ते पोहोचकर मैंने किसी और से पार्सल ऑफिस पूछ लिया और उन्होंने मुझे दूसरा रास्ता बता दिया ,उनका कहा हुआ मानकर मैं पोहोच गयी प्लेटफार्म 1 मेन पार्सल ऑफिस, वाहा अपनी गाडी के बारे में पूछा जवाब मिला यहाँ कोई गाडी नहीं है. पहले ही गर्मी इतनी ज्यादा और जवाब ये मिला तो मौसम के पारे से ज्यादा चढ़ गया मेरे दिमाग का पारा. गुस्से गुस्से में निकली मैं फिर से वापस दोनों से मिलने, ऑफिस के बहार पोहोच ही रही थी की दोनों ताला लगते हुए बहार मिल गए “अरे मैडम हमने तो आपको इसी प्लेटफार्म के आखिर में जो ऑफिस है वाहा जाने के लिए कहा था आप कहा चली गयी थी”. अब गुस्सा खुद पे आ रहा था, एक ही जगह के इतने सारे सामान के साथ 3 चक्कर. चलिए मैडम हम आपको ले चलते है, दोनों मेरे साथ ही ऑफिस तक चले मेरी रिसिप्ट की जाँच करवाई और गाडी लेने को कहा. दूसरी मुसीबत ऐसी की गाडी पूरी पैक और पेट्रोल 0. मैडम आप ले जाएँगी अकेली गाडी,सामान काहा रखेंगी,कोई साथ में हो तो बुला लो किसीको. साथ में तो कोई था नहीं,ये उन्हें भी बताया. अच्छा तो हम आपको प्लेटफार्म के दूसरे कोने तक छोड़ देते है वाहा से आप चला लीजियेगा गाडी और उस रस्ते निकल जाइएगा. अब हम पोहोचे दूसरे कोने तो फिर मनोज जी कहते है पर अब आप वाहा तक भी कैसे जाएँगी,रुकिए मैं पेट्रोल यही मंगवा देता हु. घुमाया उन्होंने एक फ़ोन और पेट्रोल लेकर आने के लिए कह दिया. पेट्रोल लाने के लिए आधे घंटे का समय लगने वाला था तो दोनों मेरे साथ ही पूरा समय धुप में खड़े रहे कहते हुए”जब आप धुप में खड़ी रह सकती है फिर हम तो राजस्थान से आये है”. आधे पौन घंटे बाद पेट्रोल आया अब समस्या थी गाडी पैक है, उसके लिए भी उन्होंने इंतज़ाम करवाया गाडी में पेट्रोल डाला मुझसे बिना पैसे लिए हुए और उस पर आगे भी जरुरत पड़े दिल्ली से गाडी नागपुर भेजनी हो तो बताइयेगा हम करवा देंगे,हमारा नंबर रख लीजिये. लद्दाख सफर का पहला पड़ाव था दिल्ली और उसकी इतनी अच्छी शुरुआत होगी ये मैंने सोचा नहीं था. दिल्ली शहर में बिना मतलब मदद मिल जाना ही अपने आप में अजूबा सा लगता है कुछ लोगो को क्युकी सुनाया ही कुछ ऐसा जाता है दिल्ली के बारे में,पर दिल्ली के मामले में भी मेरी किस्मत बुलंद ही रही है,इनसे मेरी पेहचान बस 5 min की ही थी और ये मदद के लिए आगे आ गए और आज भी बैंक के काम को लेकर कभी कोई दिक्कत हो तो कॉल कर लेते है. इसलिए मैं हमेशा कहती हु “हा दुनिया थोड़ी बुरी तो है पर उस से कही ज्यादा खूबसूरत भी है” .

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रेलवे कर्मचारी मदद करते हुए

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वेगो पार्सल

वेगो हाथ में आयी और साथ ही आयी उसके मेरी हिम्मत. गाडी लेने के बाद अब बारी थी रितेश सर से मिलने की जिन्होंने जाने कितने ही लोगो की किस्मत बदली है प्रेरणा देकर. यकीं नहीं हो रहा था की अपनी राजधानी में मैं मेरी वेगो चला रही हु. रितेश सर से मिलना तो तय था उसके साथ मुझे सरप्राइज मिला नवीन मामाजी का,3 साल बाद मिल रही थी दोनों से और उसपर घर के कड़ी पकोड़े,वो खाने के बाद तो लग रहा था ज़िन्दगी में और चाहिए क्या अब इसके आगे. चाहिए और बोहोत कुछ था इसलिए चंद घंटो की बोहोत ही जबरदस्त प्रेरणादायी मुलाकात के बाद निकली मेरी अगली टोली से मिलने. श्रीदीप और रंगा इन दोनों से ही मेरी मुलाकात हुई थी किसी सफर में और बस दोस्ती हो गयी. इन सभी ने मेरा मनोबल बोहोत बढ़ाया और अलविदा किया शुभकामनाओ के साथ.

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रितेश सर के आफिस के बाहर

 

26 जून 2016 निकली मेरी वेगो अपना अगला पड़ाव पूरा करने होशियारपुर की तरफ. थोड़ी हैरान परेशान,जो राइड सुबह 6 बजे शुरू होनी थी वो हुई 9 बजे शुरू ऊपर से दिल्ली इतना बड़ा की गाडी चले जा रही है और दिल्ली ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा. थोड़ी राहत मिली जब गाडी दिल्ली से बहार निकली. दिल्ली से बहार निकलने की ख़ुशी मनाना चालू ही था की एक और खुश खबर मिली मेरी राइड की खबर राजस्थान पत्रिका में छपने की. सोने पे सुहागा वाली बात थी ये फिर तो सफर और सुहाना हो गया इस जश्न के साथ. ख़ुशी और जश्न में कब होशियारपुर पोहोच गयी पता ही नहीं चला. होशियारपुर में रात बितानी थी और फिर सुबह तैयारी करनी थी आगे चलने की पर उसके पहले रात में इंतज़ाम करना था रकसैक को कवर करने के लिए कवर का,मेरे ड्यूल फ़ोन के सिम ट्रे का ताकि जम्मू कश्मीर पोहोचते ही मैं अपना बीएसएनएल चालू कर सकू पर ना सिम ट्रे का इंतज़ाम हो पाया ना कवर का. ऊपर से बीएसएनएल माइक्रो में भी कन्वर्ट नहीं हो पाया. छोड़ी वो टेंशन और रूम पर जाकर करणअर्जुन को उनके गाओं वापस आते हुए देखने में डूब गयी सोचा कवर और सिम ट्रे का जुगाड़ रास्ते में कर लेंगे.

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राजस्थान पत्रिकाओं

 

27 जून 2016 : आज सफर अपने समय सुबह 6 बजे शुरू किया. गाडी शहर के बहार भी बड़ी जल्दी निकल गयी क्युकी छोटा सा ही शहर है होशियारपुर. गाडी शहर के बहार निकली नहीं की रास्ते के दोनों तरफ दिखने लगे बड़े बड़े उचे उचे पेड़, हरियाली ही हरियाली पूरी पंजाब वाली फीलिंग. एन्जॉय करना बस चालू ही किया था की ऊपर वाले ने कुछ नया प्लान बना लिया, सोचा गर्मी से हमे थोड़ी आज़ादी दिलाये, 2 min में दिन से रात हो गयी और बादल जो बरसे की आगे का आप कुछ देख नहीं सकते, न रेनकोट तब किसी काम का रहा और बैग को कवर अपनी ही गलती से था नहीं. जब तक गाडी और खुदको बचाने का सहारा ढूंढ़ती बारिश अपना काम कर चुकी थी. फिर भी एक जगह जाकर शेड में रुकी, सामने खुली हुई दूकान दिखी किस्मत से एक,पहले तो काफी सोचा इतना भीगकर कैसे अंदर पर सफर क्युकी इतना लम्बा तय करना था तो और कोई चारा था नहीं. पूरी भीगी हुयी अंदर जाकर बैठी. उन्ही से कुछ और प्लास्टिक ली की अपना कैमरा फ़ोन जो आलरेडी मैंने एक पॉलिथीन में दाल रखा था पर एक और कवर के नाम पर ले ली. रकसैक के लिए कवर पूछा पर उनके पास था नहीं. बारिश पुरे जोरो शोरो से एक डेड घंटा बरसी उसके बाद कही कुछ कम हुयी तो सोचा चलो निकला जाए वरना कही आगे देरी न हो जाये. भीगी भागी सी निकली अपनी वेगो पे तो मजे की बात ये की 10 min बाद जिस रस्ते पर पोहोची वाहा ऐसा लग रहा था मानो मेघ देवता इनसे दोस्ती तोड़े बैठे है इसलिए रूठकर सालो से बरसे ही नहीं है. थोड़ी खुद पर हसी आ रही थी और थोड़ी कुदरत पर. थोड़ा और आगे पोहोचे तो मेहरबानी से बादल अपना काम पहले निपटा चुके थे,ठंडी हवा और गीली जमीं से उनका पैगाम मिल गया था. बारिश से लड़ते झगड़ते, पंजाब के मक्खन में डूबे परांठे खाते आखिर पोहोची मैं उन रास्तो पर जिन पर गाडी चलाने का सपना ना जाने कब से देखा था,युही बैठे बैठे दिमाग में ख्याल आ जाता था कब चलाऊंगी इन रास्तो पर गाडी,क्या फीलिंग रहेगी उन रास्तो पर गाडी चलाने की और आज बस एक गेट की दुरी थी उन रास्तो और मेरे गाडी की बिच. अगर आप सोच रहे है की मैं लद्दाख की बात कर रही हु तो ना जी ना लद्दाख पोहोचने विच तो लम्बा समय है.. किन रास्तो की बात कर रही हु मैं ये बताउंगी मैं मेरे अगले पोस्ट में तब तक आप भी मजा लीजिये पराठे और बारिश का 🙂

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बारिश का संकेत

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पंजाब का परांठा

पेहला पड़ाव

रास्ता सफर और ज़िन्दगी.लेह लददाख के उस सफर में ना तो रास्ता आसान न तो वाहा तक पोहोचने का सफर और ज़िन्दगी की तो अपनी एक अलग ही लड़ाई चली आ रही है बरसो से. पर सब अगर आसान होता तो रोमांच कहा रह जाता और मुश्किलें चाहे जितनी भी आये जब आप कुछ करने की ठान ही लेते है तो रास्ता तो कुदरत खुद ही बना देती है. मई 2016 जब अपने एक दोस्त के फ़ोन कॉल पर मैंने तय कर लिया था की मैं लददाख जा रही हु,बस ज़िद्द इतनी थी की जाउंगी तो अपने वेगो पर ही. मेरी मोपेड वेगो को वादा था मेरा उसे खारदुंगला टॉप जो की दुनिया का सबसे ऊँचा रास्ता माना जाता है, 18380 feet वाहा ले जाना. दोस्त ने काफी समझाने की कोशिश की “वेगो नहीं चल पायेगी वाहा” पर वादा किया था तो निभाना भी था और पता भी करना था आखिर क्या है ये लददाख का पागलपन और क्यों वेगो नहीं चल सकती. अभी तक कश्मीर, उसकी वादियाँ, वहा का डर,लेह तक जाने वाला मुश्किल रास्ता और आने वाली मुश्किलों के बारे में बस सुन रखा था पर अब खुद जाने का तय किया था,डर लग रहा था. कई सवाल थे मन में क्या मैं सही में तैयार हु ये करने के लिए? क्या मैंने अपने दोस्तों की बात मान लेनी चाइये वेगो से ना जाने की ? क्या मैं ये कर पाऊँगी?. अपने डर और सवाल के जवाबो के लिए व्हाट्सप्प किया मेरे मार्गदर्शक डॉ अमित निकम ये खुद 3 बार लेह जा चुके है और 8 साल से राइडिंग कर रहे है. मुझे पता था इनसे बेहतर मुझे और कोई सही तरीके से नहीं समझा पायेगा. मेरी पेहले की राइड्स में भी इनका काफी सपोर्ट रहा था. उठाया फ़ोन किया मैसेज “खारदुंगला जाना है वेगो से” जवाब था जाओ. आत्मविश्वास जैसे सातवे आसमान पर था, अमित ने कह दिया मतलब तो पक्का वेगो जाएगी खारदुंगला. उसके बाद काफी सारी बाते, क्या तैयारी लगेगी, कैसे है वाहा के रास्ते,काहा काहा ज्यादा दिक्कते आ सकती है,साथ में क्या क्या रखना होगा, मुश्किल आयी तो किस से मदद ले सकती हु, गाडी में क्या क्या ध्यान देना होगा और उन सबके पहले क्युकी गाडी अभी तक किसी ऊंचाई पर नहीं चढ़ी थी तो मुझे सुझाव दिया गया- गाडी का टेस्ट पचमारी के धूपगढ़ पर चढ़ाकर. धूपगढ़ मध्य भारत की सबसे ऊँची जगह है. मई महीने के अंत तक ये सुझाव का पालन भी कर लिया था मैंने और गाडी में क्या क्या ठीक करना होगा ये भी समझ आ गया था.

 

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Wego at Dhupgarh

गाडी की तैयारी तो समझ आ गयी थी अब बारी थी खुदके तैयारी की. लददाख का मौसम,ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी इन बातो के लिए भी खुदको तैयार करना था. तो तय हुआ की शारीरिक रूप से तैयार होने के लिए ज़ुम्बा लगाया जाये. मई के आखरी हफ्ते में शुरू हुई जुम्बा क्लासेज.मेरा ऑफिस नागपुर से कुछ 85 km की दुरी पर है,10.30 बजे ऑफिस का समय होता है तो 8 बजे घर से निकल जाना होता था,आधे दिन मैं ऑफिस इसलिए नहीं जाती थी क्युकी सुबह 7 बजे उठने से ज्यादा मुश्किल काम मुझे कोई और लगता नहीं था. जहा मुझे 7 बजे उठना जान पे आता था वही जुम्बा की क्लास ही 7 बजे शुरू होती थी मतलब सुबह 6-6.30 की बिच उठना होता था. ऑफिस के लिए घरवाले 7 बजे से 10 बार आवाज़े देकर हार जाते थे तब कही मैं 7.30 तक उठती थी. पर यकीन मानिये उस एक महीने बिना किसीके आवाज़ लगाए मैं खुद अपनी मर्ज़ी से 6 बजे उठकर 15 min पहले क्लास पोहोचति थी ताकि डंबल्स, थोड़ा वार्म उप करने का टाइम मिल जाये. 7 से 7.45 तक ज़ुम्बा फिर भागे भागे घर आती थी 15 min में तैयारी कर निकल जाती थी अपने ऑफिस की बस पकड़ने. फिट बनने की लिए डाइट भी जरुरी थी तो भागादौड़ी में दूध पीकर निकल जाती थी और नाश्ते से लेकर खाने का डब्बा साथ ले जाती थी. जिस लड़की को फल किसी जहर से कम नहीं लगता था उसने दिन में 3 बार फल खाना शुरू किया, खाने का महत्त्व भी कम ही था जिंदगी में इसलिए 40 kg के ऊपर बढ़ना मुश्किल हो रखा था पर बस उस खारदुंगला राइड के लिए हर 2 घंटे में खाना शुरू रहता था और वह भी बिलकुल समय पे. सुबह 8.30 बजे बस में अंडा, फल, ऑफिस पोहोचकर 10-10.15 के बिच नाश्ता,12.30 बजे फिर फल,2.30 बजे खाना , शाम 5 बजे केला और रात 9 बजे तक खाना. सारी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी कई सपने रचे जा रहे थे.और असर ये था की एक दिन ऑफिस जाते जाते बस में सोच रही थी खारदुंगला पोहोचने के बाद की ख़ुशी के बारे में और बस आँखों का पानी रोके नहीं रुक रहा था,टप टप पानी बहे जा रहा है,आँखों में एक चमक है और होटो पे मुस्कान, आसुओ को रोकना ही था वरना बस के लोग पागल समझ लेते. डूब चुकी थी मैं पूरी तरीके से उस सपने में,जीने लगी थी सपने का हर लम्हा अपनी तैयारी के साथ. तैयारी का असर भी अच्छा ही आया था, एक महीने में 40 kg से में 42 पर पोहोच गयी थी.

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Koshish mat kijiye isme weight nahi samjhega 😛

गाडी और खुदकी तैयारी तो जोरो पर चालू थी और उतने ही जोरो पर चालू थी मेरे घरवालों की हर वह कोशिश जिस से की मैं खारदुंगला ना पोहोच पाउ.

11 जून 2016 मम्मी पापा की शादी की सालगिरह का दिन, जिसे मना ने के लिए मौजूद थी 3 फॅमिली कुल 3 आंटी मम्मी पापा सोनल दादा और मैं. जश्न उसे कहना बिलकुल ही गलत है क्युकी उस दिन तो जंग लड़ी गयी थी बस तलवारे नहीं थी. जंग में मेरी तरफ थी मैं और दादा और दूसरी तरफ परिवार. मुश्किल था उनसे लड़ना उन्हें समझाना, TVS Scooty Pep की Ad में खारदुंगला और वाहा के रास्ते देखकर उन्होंने मुझे पूछा था ” जिन्दा आएगी तू”, जायज़ थी उनकी हर चिंता, चिंता ख़राब सड़क की, चिंता सड़क पर मिलने वाले लोगो की, की रेप हो जाएगा, वही भारत परोसा जाता है रोज़ टीवी और अखबारों में वही उनके लिए पूरा सच भी था, चिंता थी उन्हें की क्यों इतने फिजूलखर्ची करनी है,चिंता थी उन्हें क्या हासिल कर लेगी वाहा जाकर, क्यों ये ज़िद्द और क्यों ये सपना, वेगो ही क्यों, चिंता की क्या ये सही में वापस फिर हमे मिलेगी. मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं, मैंने थोड़ी फाइट मारी और फिर सोनल दादा का सपोर्ट उनके समझाने का तरीका उसके आगे मान ही गए. 5 घंटे में शांति प्रिय तरीके से जंग ख़तम हो ही गयी कुछ गीले शिकवे बाकी थे वो भी दूर होने ही थे.

गाडी की तैयारी खुद की तैयारी और घरवालों की तैयारी इन सब तैयारियों के बिच आखिर वह दिन आ ही गया 23 जून 2016 जब सुबह सुबह मैं पोहोची रेलवे स्टेशन अपनी गाडी दिल्ली पार्सल करवाने. गाडी पार्सल करने वालो को तो इतनी मिन्नतें “भैया ध्यान से पैक कीजिये, गाडी का ध्यान रखिये, अपना सबकुछ दे रही हु मैं आपको, गाडी को कुछ होना नहीं चाइये,बोहोत लम्बा सफर ये तय कर चुकी है और बोहोत लम्बा सफर तय करना है इसे”. गाडी हुई पार्सल, एक और काम ख़तम. फिर हुई 24 जून 2016 की सुबह, सुबह 7 बजे रोज़ के ही जैसे जुम्बा क्लास पोहोची,7.45 को क्लास से निकलने से पेहले अपनी दोस्त को मिलने गयी, की निकल रही हु मैं आज शाम को दिल्ली,कुछ अलग फीलिंग थी तब कुछ छूट रहा हो जैसे, कुछ डर भी, कुछ अलग बस पर जाना तो था ही. शाम को बैठी मैं दिल्ली की गाडी में और आख़िरकार शुरू हुआ मेरे सपनो का सफर…..

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उत्सुकता बनाये रखिये सफर थोड़ा लम्बा है, धीरे धीरे तय करेंगे. आगे का सफर अगली पोस्ट मे…..

बेटी निडर बनना और लड़ना

ट्रेन में एक बच्ची के पापा को उसको अपर बर्थ पर चढ़ाने की प्रैक्टिस करवाते हुए देख अपने पुराने दिन याद आ गए। जब सारी लड़कियां स्कूटी चलाना सीख रही थी, पता नहीं कहां से मुझे बजाज स्कूटर चलाने का शौक चढ़ा। शायद इसलिए क्यूंकि घर पर तब वही गाड़ी मौजूद थी, उस वक्त मैं नौंवी क्लास में थी। मुझे याद नहीं मैंने पापा से क्या कहा कि उन्होंने सिखाने के लिए मना नहीं किया, लेकिन वो ग्राउंड याद है जहां स्कूटर चलाना सीखा था।

तब हम धमतरी (छत्तीसगढ़) में रहते थे। वहां जिस घर में किराये पर हम रहते थे उसके पीछे ही प्राइमरी स्कूल का ग्राउंड था, घर से वो ग्राउंड साफ नज़र आता था। रविवार के दिन पापा वहीं स्कूटर सिखाने ले जाते थे। पहला रविवार तो याद नहीं क्या किया था, ज़रूर कुछ ध्यान से सीखा नहीं होगा तभी याद नहीं, लेकिन दूसरा रविवार मुझे बड़े अच्छे से याद है। पापा मुझे ग्राउंड पर स्कूटर चलाना सीखा रहे थे और मम्मी हमारी पड़ोस वाली आंटी के साथ घर की गैलरी से मुझे सीखते हुए देख रही थी।

पापा मुझे स्कूटर का हैंडल संभालना सिखा रहे थे, पहले उन्होंने खुद स्कूटर चलाकर दिखाया और फिर मेरी बारी थी। स्कूटर स्टार्ट करके पापा ने मेरे हाथ में दे दिया, एक हाथ से उन्होंने स्कूटर को पीछे से पकड़ा और दूसरे हाथ से सामने हैंडल को। मैं धीरे-धीरे स्कूटर चला रही थी, जब थोड़ा बैलेंस बन गया तो पापा ने हैंडल से अपना हाथ हटा लिया और बस स्कूटर को पीछे से सपोर्ट देते रहे।

अब मैं ग्राउंड में गोल-गोल स्कूटर घुमा रही थी, एक दो बार पीछे मुड़कर देखा तो पापा पीछे से स्कूटर को पकड़े हुए दिखे। एक दो चक्कर घुमाने के बाद जब मेरा कॉन्फिडेंस बढ़ गया और मैं चिल्लाने लगी “डैडी छोड़ो! मैं स्कूटर खुद चलाऊंगी, डैडी छोड़ो! स्कूटर मैं खुद चलाऊंगी, डैडी छोड़ो ना…” कुछ जवाब नहीं आया तो पीछे मुड़कर देखा, पापा तो बड़ी दूर खड़े थे। मुड़कर देखने के बाद जवाब मिला “मैं तो कब से छोड़ चुका हूं, तू ही तो चला रही है।” फिर क्या था अब मैं पूरा धमतरी घूमती थी अपने स्कूटर पर। मम्मी को मार्किट ले जाना, ट्यूशन जाना, पेट्रोल पंप पर तो पेट्रोल डालने से पहले लोग स्कूटर और मुझे पूरा टटोल कर देखते थे कि “इतनी सी लड़की और इतना बड़ा स्कूटर!” फिर जाकर पेट्रोल डालते थे। मज़ा आता था।

स्कूटर का ये साथ कुछ महीनों का ही रहा। पापा का नागपुर ट्रांसफर हो गया, स्कूटर उन्होंने धमतरी में बेच दिया और नागपुर आने के बाद मेरे हाथ में काइनेटिक थमा दी। स्कूटर वाला मज़ा इसमें नहीं था, लेकिन स्कूटर मिले ये भी होना नहीं था। बारहवीं में फिर शौक हुआ होण्डा स्प्लेंडर सीखने का, भाई और सोनल दादा ने मिलकर सिखाई। लेकिन उसे चलाने का ज़्यादा मौका नहीं मिला, स्कूटी तो दी हुई थी मुझे अलग से और उसके बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए पुणे चली गई।

आज जब अकेले अपनी वेगो लेकर भारत दर्शन करती हूं तो लोग पूछते हैं कि घर वालों को तुमने खुद पर इतना कॉन्फिडेंस दिलाया कैसे? जवाब इसका मुझे भी नहीं पता। मैं उन्हें बताती हूं कि बचपन से ही ऐसा था, मुझे कभी मेरे पापा ने ये नहीं कहा कि लड़कियां ये नहीं कर सकती या वो नहीं कर सकती। घर में दो लड़के हैं, मेरे दो छोटे भाई पर उनसे ज़्यादा मुझे ही सिखाया गया।

कराटे सीखा, कत्थक सीखा, क्रिकेट में अलग दिलचस्पी हुआ करती थी तब, तो स्टेट टीम सिलेक्शन के लिए भी गई। टेबल टेनिस स्टेट लेवल पर खेला, लड़कों के साथ ग्राउंड पर फुटबॉल खेला, डांस में स्कूल में नाम कमाया, पिकनिक जाने के लिए याद नहीं कभी कोई रोक टोक हुई हो। ग्रेजुएशन में जब हॉस्टल में रहती थी तब कॉलेज ट्रिप की परमिशन के लिए कॉल किया था, तो जवाब मिला “अब इतनी बड़ी तो हो ही गयी हो कि अपने डिसिज़न खुद ले सको, क्या सही है क्या गलत हर बात मुझसे पूछने की ज़रुरत नहीं है।”

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पर इन सब बातों से लोगों को उनके सवाल का जवाब नहीं मिल पाता, वो यही कहते हैं कि, “ये सब के लिए भी कहीं तो उनका कॉन्फिडेंस जीता होगा!” अब ये तो मुझे नहीं पता कब, कहां, कैसे मैंने ऐसा क्या किया और उनका कॉन्फिडेंस जीता। पर ये उनके ही कॉन्फिडेंस का नतीजा है कि आज मैं इस मुकाम पर हूं। उन्होंने मुझे कभी डरना नहीं सिखाया, उन्होंने मुझे नहीं बताया कि यहां जाने से पुलिस पकड़ लेगी या कोई बाबा आ जाएगा या भूत ले जाएगा। आज भले ही वो थोड़ा डर जाते हैं, कभी-कभी मेरे लड़की होने की याद भी दिला देते हैं। शायद समाज के मौजूदा हालत देखकर और आजकल चर्चा में रहने वाली घटनाओं की वजह से। पर बचपन की कुछ आदतें इतनी आसानी से नहीं छूटती और खासतौर पर एक आदत जो पापा ने सिखाई थी- निडरता। आज जो भी मुझमें है, उनकी ही देन है।

ट्रेन में भी उस बच्ची को उसके पापा केवल बर्थ पर चढ़ना नहीं बल्कि अपने डर पर जीत पाना भी सिखा रहे थे। काश कि सभी पापा अपनी बेटियों को भी यही सिखाएं-

“बेटा बिना डरे लड़ना जमके लड़ना, अपने हर उस डर से लड़ना जो तुम्हे कमज़ोर बनाए,
जो तुम्हे अपना हक़ ना लेने दे, आगे बढ़ने ना दे और जीने की आज़ादी ना दे,
लड़ना अपने सपनो के लिए बिना हिचकिचाए, बनाना अपनी खुद की एक अलग पहचान खुदका एक अलग नाम,
ना हो कोई साथ और हो खुद पे विश्वास कि गलत तुम हो नहीं, तो लड़ना अकेले अपने उस विश्वास के लिए,
लड़ना तुम आज कि फिर लड़ना ना पड़े आने वाली पीढ़ी को,
अपनी पहचान,अपने अधिकार, अपने नाम,अपनी हिफाजत, अपने सपनो के लिए”