पेड़ और पानी

05/06/2017

जितना खूबसूरत आज का दिन था उस से कही ज्यादा खूबसूरत थी आज की शाम. शाम को नवाज़ा गया मुझे एक बोहोत बड़े पुरुस्कार से, वो पुरुस्कार मिला इसी साल चौथी और नवी कक्षा में प्रवेश किये हुए बच्चो से. पुरुस्कार मुझे घोषित कल ही कर दिया था इन्होने,मुझे पता बस आज चला जब शाम को ७ बजे मैं विहार के एंट्रेंस पर पोहोची. गाडी बस लगा ही रही थी और आर्या की आवाज़ आयी- क्या टाइमिंग है आपकी, आर्या के साथ साथ थे मिक्की और तनिष्क. अब आप पूछेंगे ये कौन तो ये है मेरी “वाटर आर्मी” के 3 जवान. जवान और भी है आर्मी में पर आज ये 3 ही थे.

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तनिष्क पेड़ो को पानी डालते हुए

गाडी मैंने खड़ी की हेलमेट निकाला और गाडी पे रखा हुआ पौधा उठाने झुकी ही थी की पौधा मिक्की ने अपने हाथ में ले लिया और हेलमेट आर्या, ये दोनों ही 4th में. अंदर जाकर गार्डन एरिया में हमने पौधा रखा और चालू हो गयी आर्या की बड़बड़ ” अरे दीदी आपको पता है क्या कल मिक्की ने क्या किया, कल ना अकेला ही डब्बे ( 5 लीटर के 2 कैन) लेकर हैंडपंप पर गया और पेड़ो को अकेले ही इसने पानी डाला” मैं थोड़ा चौक गयी. रोज़ हम ना तो मिक्की को हैंडपंप मारने देते है ना ही डब्बे उठाने क्युकी बाकी बच्चो से वो थोड़ा नाजुक और नखरे वाला है. कल सुबह 7 बजे से जो वृक्षारोपण के लिए बहार निकली थी तो सीधा शाम को 5 बजे घर पोहोची जिसकी वजह से थकान थी थोड़ी, अब जब ये इन बच्चो को बताया तो बोलते है ” आप थकते भी हो”. पहली बार सुन रहे है हम आपसे, आप कितना कुछ करते हो राइड पे जाते हो, ऑफिस भी करते हो पेड़ भी लगाते हो, पानी भी डालते हो,क्रिकेट भी खेलते हो इनकी छोटी सी दुनिया की मैं सुपरवूमन.

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और हम मैच जीत गए

ऑफिस से आकर जैसे ही मैं इन्हे ग्राउंड पर आते हुए दिखती हु तुरंत “दीदी आयी दीदी आयी” करके दौड़कर पास आते है और साथ में विहार चलते है कैन उठाने. इनसे मिलने के बाद मुझे ऐसा कोई दिन याद नहीं जब मैंने हैंडपंप चलाया हो या कैन खाली हो या भरी उठायी हु. तनिष्क मुझे करने ही नहीं देता, पंप को हाथ भी लगाया तो “दीदी आप ऑफिस से आये हो,थक गए रहोगे, मैं करता हु ना, आर्या दीदी को मत करने दे उन्हें मत थका”. पानी भी वही डालते है और जब क्रिकेट खेलने का टाइम होता है तो रनर आर्या बन जाता है, पैर की चोट के बारे में उन्हें पता है तो पैर के पास बॉल आयी भी तो “दीदी लगी तो नहीं,सॉरी दीदी”. थकान की वजह से कल पानी डालने के लिए लेट पोहोची तब ये बच्चे वाहा थे नहीं और मेरी हालत जवाब दे चुकी थी इसलिए वापस चली गयी.फिर आज पता चला की पानी तो दिया गया था और वह भी अकेले बस छोटे से मिक्की ने.आज लगा की मुझे ”आउटस्टैंडिंग एचीवर अवार्ड” देना सफल हुआ.

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सकाळ ग्रुप का मुझे दिया गया अवार्ड

कल मैं विहार में नहीं थी उन्हें बताने के लिए की पेड़ में पानी डालना और ना ही मैंने कोई उनकी ड्यूटी लगा रखी है पानी डालने की ना ही कोई जबरदस्ती पर फिर भी जो काम वो मेरे होते हुए बड़े जोश के साथ करते है मेरे ना होते हुए भी जिम्मेदारी के साथ पूरा किया. और बड़ी इम्मान्दारी से मुझे ये भी बताया गया की दीदी ये दो पेड़ो को पानी नहीं दे पाया. आज उनसे पूछा भी अगर मैं नहीं रही फिर भी पानी डालोगे तुम लोग तो जवाब एक साथ सबने हां में ही दिया.आज भी जब एंट्रेंस पर हम मिले तो इन बच्चो की तैयारी पानी डालने जाने के लिए ही हो रही थी. ये बच्चे जुड़े भी मेरे काम से अपने मन से ही, मुझे रोज़ पेड़ लगाते हुए देखते थे आकर एक दिन मदद कर दी और तब से हमारी रोज़ की मुलाकात. ख़ुशी से ज्यादा गर्व हो रहा है खुद पर की कुछ अच्छे बदलाव मैं इन बच्चो में ला पायी बिना जबरदस्ती के.

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आओ पेड़ लगाए

किसीने मुझे कल ही सिखाया है अपनी छोटी से छोटी ख़ुशी लोगो से शेयर करनी चाहिए इसलिए नहीं की आप खुश हो पर इसलिए भी की उन्हें अच्छा लगेगा की आपने उन्हें अपनी ख़ुशी में शामिल किया. और फिर मैं तो खुश भी हु और गर्व भी महसूस कर रही हु.

शुरुआत हुई थी हर रविवार एक पेड़ लगाने से पर पता नहीं था इतने लोग और इतने रिश्ते जुड़ते चले जायेंगे इस सफर में. वाटर आर्मी के बाकि जवानो की कहानी भी बोहोत जल्दी लिखूंगी. वैसे बता दू हमारी सबसे छोटी जवान हाल ही में पहली कक्षा में गयी है.

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सबसे छोटी  चार्मी

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अकेली लड़की और भारत?

Tripoto पर एक सवाल देखा, “I am not sure about travelling Solo in India. Can anyone suggest some safe destinations?” (मुझे भारत में अकेले सफ़र करने को लेकर शंका है। क्या कोई मुझे ऐसी घूमने की जगह बता सकता है जो सुरक्षित हो?) उस पर कुछ लोगों के जवाब थे कि, “भारत सुरक्षित नहीं  है, मैं खुद अपने लोगों के बीच सुरक्षित महसूस नहीं करती।” इस सच को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन ये पूरा सच भी तो नहीं है। एक भारत वो भी तो है जहां अकेली लड़की को मौका नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी समझकर उसकी रक्षा की जाती है।

अगर आप सोच रहे हैं कि ये बस कहने, सुनने या लिखने में ही अच्छा लगता है तो आइये आपको मिलवाती हूं भारत के इस दूसरे पहलू से। इस भारत से मेरी मुलाकात तब हुई, जब अकेली लड़की होते हुए मैंने भारत भ्रमण करने का इरादा बनाया, इस जिज्ञासा के साथ कि चलो अपने लोगों को जाने पहचाने।

मेरा पहला सोलो ट्रिप दिल्ली अमृतसर-

सच कहूं तो मैं बहुत डरी हुई थी पर जब मैं दिल्ली पहुंची और हुमायूं के मकबरे पर सुबह टहलने आई एक आंटी ने मुझे अकेला देखकर बड़ी उत्सुकता से पूछा, “अकेले आई हो?” और फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला जिसमें कुछ इतिहास भी था। मुझे बिल्कुल भी अकेलापन महसूस नहीं हुआ।

दिल्ली घूमने के बाद मैं अमृतसर पहुंची, सुबह 4 बजे गोल्डन टेम्पल जाना था तो सुबह 3:30 बजे मैंने ऑटो पकड़ा और गोल्डन टेम्पल पहुंची।गोल्डन टेम्पल से वाघा बॉर्डर के लिए भी ऑटो लिया, शर्मा जी का ऑटो था वो। खूब बातें हुई उनसे, उनके परिवार के बारे में, मेरे परिवार के बारे में। वो ये सोचकर हैरान हो रहे थे कि आखिर मेरे घरवालों ने मुझे अकेले इतनी दूर कैसे भेज दिया? उन्होंने कहा कि, “दीदी मेरी 3 बहनें हैं, पर ना कभी वो हिम्मत कर पायी अकेले कहीं जाने की और ना कभी हमारी हिम्मत हुई उन्हें अकेले भेजने की।” मुझे कोई मंदिर देखना होता तो वो खुद मुझे दरवाज़े तक छोड़कर आते और कहते, “दीदी हम हैं आपके साथ, कोई परेशानी न होने देंगे।”

फिर वाघा बॉर्डर पर मुलाकात हुई कोलकाता से आए एक परिवार से और मैं आज भी उनके साथ संपर्क में हूं। जब कोलकाता जाने का प्लान बना और दादा-भाभी को खबर दी तो उनकी ख़ुशी का तो पूछिए ही मत। वो बोले, “आपको हमारे घर पर ही रहना है, अच्छा आप चिकन और फिश खाते है ना?”

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Humayun Tomb Delhi

मेरी वाराणसी से रीवा की राइड

रीवा जाते हुए मैंने इलाहबाद का रास्ता लिया, इलाहबाद तक तो सब ठीक रहा पर मुश्किल शुरू हुई उसके बाद। रास्ता बहुत ख़राब था, शाम के 6 बज चुके थे, 130 कि.मी. जाना और बाकी था और मेरी सवारी थी एक स्कूटर। रोड का काम चालू था तो सफ़ेद मिट्टी में गाड़ी फंसी जा रही थी, स्कूटर चलने में भी बहुत मुश्किल हो रही थी। रास्ता सही है या गलत समझ नहीं आ रहा था, तभी सामने एक रीवा के नंबर प्लेट की बाइक दिखी। मैं समझ गई कि ये भी रीवा जा रहे हैं और मैं हो ली उनके पीछे-पीछे। कुछ दूर तक तो उनके पीछे चली फिर अचानक से उन्होंने अपनी बाइक दूसरे रास्ते पर मोड़ ली।

मैंने अब एक जगह रुककर लोगों से पूछा तो मुझे बताया गया कि बिलकुल सीधा-सीधा जाना है। रात हो चुकी थी, सीधे चलते-चलते मैं ऐसी जगह जा फंसी जहां रास्ता ही ख़तम हो गया था। रास्ते पर कोई लाइट नहीं और किसी से पूछ सकूं ऐसा कोई इंसान भी नहीं दिख रहा था। डरकर बस रोना ही बाकी था कि पीछे से आवाज़ आयी, “अरे आप तो गलत रास्ते आ गयी, मैंने वहां से गाडी मोड़ ली थी क्यूंकि वो रास्ता अच्छा था। मुझे लगा आप पीछे-पीछे आ जाएंगी, आप नहीं दिखी तो मैं आ गया आपको देखने। अब साथ ही चलिएगा।” ये वही बाइक वाले जनाब थे, 100 km का सफर हम दोनों ने साथ में तय किया उनकी बाइक और मेरा स्कूटर। रास्ता ऐसा सुनसान कि कोई कुछ कर ले तो खबर भी ना मिले। बीच में बारिश भी हुई, हम एक ढाबे पर रुके और रात 10 बजे हम रीवा पहुंचे बिलकुल सही सलामत। वहां से मैं अपने होटल और वो अपने घर, हम आज भी हम संपर्क में हैं।

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मेरी कन्याकुमारी राइड

कन्याकुमारी से कुछ 117 km पहले मेरा स्कूटर एक फैक्ट्री के सामने खराब हो गया, वो स्टार्ट तो हो रहा था पर आगे नहीं बढ़ रहा था। फैक्ट्री का गार्ड समझ चुका था कि कोई परेशानी ज़रुर है। वो देखने आए पर दिक्कत ये कि ना उन्हें हिंदी समझ आ रही थी और ना इंग्लिश। उन्होंने और दो लोगों को बुलाया लेकिन ना वो गाड़ी की परेशानी समझ पा रहे थे और ना मेरी भाषा।

ऐसा करते-करते लोग जमा होते चले गए और फिर आये उस फैक्ट्री के मेंटेनेंस मैनेजर, उन्हें हिंदी-इंग्लिश समझ तो आ रही थी, पर गाड़ी की परेशानी नहीं। उन्होंने अपने पहचान के एक मैकेनिक को कॉल लगाया और आने के लिए कहा। कॉल कट हुआ ही था कि उनकी कंपनी का एक वर्कर आए जो मेरी बात समझ पा रहे थे और उन्होंने गाड़ी की प्रॉब्लम भी पता लगा ली। उन्होंने तुरंत मैकेनिक को कॉल करके परेशानी बताई। जब ये सब लोग मिलके मेरी परेशानी का हल ढूंढ रहे थे तो मैं बैठकर कॉफ़ी पी रही थी। कुछ  देर बाद मैकेनिक आया मैंटेनस मैनेजर उनके साथ गाड़ी को धक्का देकर लेकर गए और मुझे कार से वर्कशॉप तक छोड़ा गया। जब तक गाड़ी ठीक नहीं हुई वो मेरे साथ रहे। तिरुनेलवेल्ली तक गाड़ी उन्होंने खुद चलाई और वहां से 90 km दूर कन्याकुमारी का सफर रात को 11:30 बजे मैंने पूरा किया।

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Swami Vivekanand point Kanyakumari

अनुभव ऐसे और भी हैं, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक। बिना जान-पहचान किसी ने बस यूं ही रोटी खिला दी तो किसी ने चाय पिला दी। मेरा फ़ोन बंद पड़ा तो कॉल के लिए मदद कर दी। एक किताब लिख दी जाए अनुभव इतने हैं, लिखूंगी उनके बारे में भी पर एक-एक कर। आज जितने अनुभव लिखे हैं उम्मीद है उसमे आपको भारत के दूसरे पहलू की झलकियां ज़रूर दिखी होंगी।

आप अगर मुझसे भारत के बारे में पूछेंगे तो मैं बस यही कहूंगी हां थोड़ा बुरा तो है पर उससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत भी है। थोड़ा नज़र बदलकर देखिए और एक बार हिम्मत करके देखिए। टीवी, पेपर, सोशल मीडिया इसके परे भी एक सच है जिसे आप खुद अपने अनुभवों से ही जान और समझ सकते हैं। हर अनुभव अच्छा होगा ज़रूरी नहीं, पर उसके डर से घर से बाहर निकलना तो छोड़ा नहीं जा सकता। लड़ना नहीं सीखेंगें तो देश बदलेंगे कैसे? जीतेंगे कैसे? आपकी कमज़ोरी ही किसी और की ताकत बनती है, आप किसे ताकतवर देखना चाहते हैं? तय आपको करना होगा।

कालू

इनसे मिलिए ये है कालू. कालू से हम मिले कळसूबाई पीक  की नाईट ट्रेक पर कळसूबाई बोले तो महाराष्ट्र का एवेरेस्ट. हम हमारे गाइड के साथ निकले पीक के लिए और ये जनाब हमारे पीछे पीछे, थे ये गाइड के पेहचान वाले ही. 15 min ही हुए थे हमे शुरुवात किये हुए की गाइड को याद आया वो अपना फ़ोन शायद गाओं में ही भूल गए है. हमने कहा उनसे आप जाइये आपका फ़ोन लेकर आइये हम यही रुकते है. गाइड तो चले गए हमे लगा था कालू जनाब भी चले जायेंगे, पर नहीं ये बैठे रहे हमारे साथ हमारे बाजू में ही जब तक गाइड आये नहीं. गाइड आने के बाद शुरू की हमने फिर आगे की चढाई और कालू जी हमारे साथ साथ. हमे तो हिम्मत क्या ही देते ये खुद ही इतने डरपोक की थोड़ी भी आवाज़ हुई नहीं की हमारे पैरो के पास आ जाते. कालू ने तो कई बार हमे ही आजु बाजु छान बिन करने को मजबूर कर दिया था की कही कोई है तो नहीं. था कोई नहीं ये युही होशियार बने जा रहे थे. कुछ सुबह 3 बजे हम कळसूबाई टॉप से कुछ 10 min पेहले कुछ हॉटेल्स जाहा रात को रुका जा सकता है वहा पोहोचे. वाहा हमारे गाइड का भी एक होटल था जहा उन्होंने हमारे सोने का इंतज़ाम कर दिया. सुबह कुछ 6 बजे हम टॉप पर जाने के लिए निकले , इस बार गाइड साथ नहीं आने वाले थे क्युकी उन्हें नाश्ते चाय की तैयारी करनी थी ट्रेक के लिए आये और आने वाले बाकि लोगो के लिए भी. Saturday Sunday होने की वजह से काफी लोग ट्रेक के लिए आते है  तब  ऑफ सीजन में भी बिज़नेस इनका अच्छा  हो  जाता है. गाइड नहीं भी साथ आये तो भी कालू जनाब हमारे साथ साथ कळसूबाई टॉप चढ़े, जब तक हम वाहा रुके ये भी हमारे साथ और निचे उतरना चालू किया तो  भी हमारे पीछे पीछे ही. ट्रेक के लिए आये हुए एक ग्रुप के किसी मेमबर ने कमेंट भी किया ये आपके साथ साथ  आया है,हर किसीके साथ आते नहीं ये.

घर पर  कोई पालतू जानवर कभी रहा नहीं तो लोग जो इतना कहते है  कुत्ते आपके सबसे अच्छे दोस्त होते है, निष्ठावान होते है ये सब कभी महसूस करने मिला ही नहीं. फिर कालू से मिलकर समझा की लोग जो भी केहते है सच्च ही है. हमने तो कालू को एक बिस्किट भी नहीं खिलाया था,फिर भी वो हमारे साथ रहा. हर ट्रिप में अलग अलग लोगो से रिश्ते बनाये, वो रिश्ते बने उन लोगो से बात करके कुछ अपने बारे में बताकर कुछ उनके बारे में जानकार और फिर इस ट्रिप में बना ये एक अनोखा रिश्ता सारे रिश्तो से अलग, जहा ना कुछ बताने की जरुरत पड़ी ना कुछ जान ने की. उम्मीद है जब कभी अगली बार कळसूबाई गयी कालू इसी तरह हमारे साथ चलेगा.

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Kaalu

मेरा इंडिया ग्रीन इंडिया

Almost everyday people discuss about environmental issues on different mediums and also really want to contribute to solve the issues but somehow fail to take out time from their hectic schedule. We understand your problem hence we will help you.

HOW : We are starting an initiative “Mera India Green India”. On any of your special occasion (Birthday’s, Anniversaries, Valentines,First Salary anything) give us a call,tell us which tree and how many trees you want to plant and we will do it for you. Buying saplings from nursery,selection of location (unless you want it in some specific place), plantation,maintenance of trees will be taken care by us. We will give your name to that tree/trees. You just need to pay for the service and sapling.So from next time instead of giving an excuse give us a call. Make your special day memorable and special for the world 😊

For Mumbai, Nikesh Jilthe : 90 96 133400
Nagpur, Snehal Wankhede : 9930322101

Last year on environment day 05.06.2016 we had taken a pledge to do plantation every Sunday and till now 47 Sunday’s are completed.

Friend’s this time only All the Best will not work,we will also need your support which starts by spreading the message. Share this with your friends family colleagues and enemies too even are part  of the Mother Earth.

#SaveEnvironment #MeraIndiaGreenIndia #TreePlantation #India #Joinhands #payback

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पेहली इफ्तारी और चश्मे का पानी

IMAG090630 जून 2016 की वो शाम, कारगिल शहर की हलकी सी ठण्ड और वहा के होटल का वो बरामदा.शहर घूमकर लौटी थी मैं अपने होटल और स्वागत करने के लिए तैयार थे तोषिब.

आ गए आप कारगिल देखकर.कैसा लगा आपको हमारा शहर. क्या देखा आपने , यकीन हुआ आपको की पाकिस्तान भी दिखता है यहाँ से.

मज़ा आया ,कुछ नए लोगो से  मिली, नमकीन चाय भी पि.

घूमने का मज़ा तो ले लिया था,अब कुछ खाने का इंतेज़ाम करना था. खाने की अच्छी जगह मैंने तोषिब से ही पूछ ली तो उसने सीधा इफ्तारी का न्योता ही दे दिया. इसके पहले मैंने कभी इफ्तारी खायी नहीं थी सो झट से हां भी बोल दिया. शाम को तोषिब के घर से ही आने वाली थी इफ्तारी, आने पर तोषिब खुद बुलाने आने वाला था तब तक मैंने थोड़ा आराम करने का सोचा.

पहचान तोषिब  से तब तक बस इतनी थी की कुछ दो घंटे पहले इनके होटल में रूम बुक किया था. रूम बुक करने में मदद मिली थी २ राइडर्स की, जो बस राह चलते युही मिल गए थे. मुझे कुछ समझ नहीं रहा था की कारगिल में कहा ठहरा जाये तो इन दोनों राइडर्स की मदद ले ली थी. होटल के सामने ही था तोषिब  का जनरल स्टोर्स. होटल और जनरल स्टोर्स दोनों ही सँभालने की जिम्मेदारी तोषिब पर. २ घंटे की पहचान में बात हमने की थी बस १५ min, तोषिब  ने मेरी मदद की थी मेरे वेगो पर बंधे सामान को निकालकर रूम तक पहुंचाने में और फिर कारगिल में क्या देखा जा सकता है ये बताने में. जब कारगिल देखकर वापस लौटी तो पता नहीं था अपनी पहली इफ्तारी खाने का मौका मिलेगा

रूम पर जैसी ही पहुंची थकान की वजह से नींद आ गयी. दो तीन बार दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़ आयी पर नींद से उठकर दरवाज़ा खोलने की इच्छा ना हुयी. और आख़िरकार उठकर जब घडी देखि तो ८ बज चुके थे. उठकर फ्रेश होती की फिर से दरवाज़ा खट खटाने की आवाज़ आयी. तोषिब  खाना खाने बुलाने आया था. १० min बाद जब निचे दुकान पर पहुंची तो पता चला मेरे इंतज़ार में तोषिब  ने रोज़ा नहीं तोडा है. आप मेहमान है आपके पहले मैं कैसे खा लेता. दुकान पर तोषिब के अलावा और एक उनके पहचान वाले जिनका टूर्स एंड ट्रेवल्स का बिज़नस था वो भी मौजूद थे. हमारी बात चित शुरू हो उसके पहले  तोषिब  ने जमीन पर ही मेरे बैठने के लिए एक चटाई बिछाई, थैले में से सब्ज़ी मेरे सामने रखी और फिर वही थैला मेरे सामने रखकर उस पर रोटी रख दी.

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इफ्तारी

और फिर शुरू हुआ बातो का सिलसिला. दुकान पर मौजूद मेहमान मुझे लेह में रुकने के लिए अलग अलग होटल बता रहे थे. तोषिब के हाव भाव से मुझे समझ आ रहा था की मैंने उनकी बातो में ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. और बिच में ही होटल के टॉपिक को रोककर तोषिब ने पूछा “मैडम आपने कभी चश्मे का पानी पिया है, बोहोत ही मीठा पानी होता है और मिनरल वाटर से भी अच्छा”. मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की आखिर चश्मे का पानी होता क्या है. और तोषिब उसका हिंदी शब्द ढूंढ नहीं पा रहा था.  तभी हमारे 3 की मेहफिल में आये एक और शक्श रात के 8 बजे के अँधेरे और सन्नाटे को चीरते हुए. नाम तो उनका  याद नहीं पर ये थे तोषिब के  बचपन के दोस्त. इन्होंने अपनी SBI PO की नौकरी छोड़ स्कूल में टीचर बन ना पसंद किया. कह रहे थे “नहीं होता मैडम इतना काम हमसे ,जाने का समय तो था आने का नहीं, लाइफ भी तो कोई चीज़ है. वो नौकरी ही किस काम की जिसके चलते सुकून से शाम को दोस्तों के साथ वक़्त ही न बिताने मिले,छोड़ दी मैंने नौकरी”. काश मेरे लिए भी इतना ही आसान होता नौकरी छोड़ पाना.

और इन शख्स ने बताया मुझे “चश्मे का पानी” मतलब “झरने का पानी“. उस पानी से मीठा और स्वाद वाला पानी मैंने आज तक नहीं पिया है,प्राकृतिक ठंडा पानी. बातो का काफिला फिर थोड़ा और आगे बढ़ा. “मैडम मेरे दोस्त का भी पास ही में होटल है, रात को वहा कैंपिंग भी होती है. मैडम अभी धुप है तो हम सब्ज़िया सुखाकर रख देते है ताकि ठण्ड में खा सके. वरना तो बस दाल उबालकर खाओ ऐसा लगता है पेट में पूरी दाल दाल ही हो गयी है. रास्ते सभी बंद हो जाते है बर्फ की वजह से तो कुछ मिलना भी मुश्किल. बड़ी मुश्किल से निकलती है ठण्ड,कुछ काम भी नहीं मिलता”. परेशानी को भी वो इतने हस्ते हस्ते बयां कर रहे थे.

कारगिल के उस जनरल स्टोर में जमीन पर चटाई पर बैठी हुई मैं अकेली इन दोनों लड़को की बाते सुन रही थी. रास्ते पर लड़की तो दूर की बात है पर कोई इंसान भी उस समय मौजूद नहीं था. बस कुछ कुत्तो के भौकने की आवाज़.फिर भी जितना महफूज मैं अपने घर पर बैठकर खुदको मेहसूस करती उतना ही महफूज मुझे वहा लग रहा था. घर से दूर भी कुछ घर जैसा लग रहा था. ना तो कोई डर था ना ही कोई हिचक और ना शंका. होना भी शायद लाजमी ना था क्योंकि फॉर्मेलिटी कम और अपनापन ज्यादा था,एक रिस्पेक्ट थी. रिस्पेक्ट अपने काम के लिए,अपने मेहमान के लिए,अपनी संस्कृति के लिए. वो काफी था मुझे विश्वास दिलाने के लिए. कारगिल के उस शहर की वो दिखने में तो साधारण दावत पर मुझसे पूछा जाये तो ऐसी दावत के लिए किसी 5 सितारा होटल की दावत छोड़ने का मलाल न होगा. वहा होता है एक दिखावा सजावट का, काटे छुरी का, टेबल चेयर का, क्रोकेरी  का, अंग्रेजी का, किसको प्रभावित करने का, यहाँ था बस अपनापन.ना कोई ढोंग, ना कोई दिखावा, बस सादगी और सरल  निश्छल  मन. अगर ये खूबसूरती साथ हो तो किसी और श्रृंगार की क्या कीमत.

बाते कुछ और भी होती पर दूसरे दिन जल्दी निकलना था इसलिए बातो का सिलिसिला वही ख़तम करना पड़ा . दूसरे दिन तोषिब ने सामान गाडी पर बाँधने में मेरी मदद की और दुआ के साथ “इंशाल्लाह आप जरूर कामयाब होंगे” अलविदा किया. वो इफ्तारी और चश्मे का पानी थी मेरी ईदी जो ईद के पेहले ही नसीब हो गयी थी.लौटूंगी शायद फिर कभी कारगिल, परिंदो की तरह.

युथ सेन्टर

कुछ रिश्ते बनाते बनाते जहा पूरी ज़िन्दगी निकल जाती है वही कुछ रिश्ते बस एक मुस्कुराहट से ही बन जाते है. ऐसा ही कुछ प्यारा सा रिश्ता बना मेरा झाँसी से १६ km दूर बसे ओरछा गांव के बच्चो से.यु तो ओरछा में कई आकर्षण है पर मुझे जिसने सबसे ज्यादा आकर्षित किया वह है वाहा का “युथ सेन्टर” और वाहा के बच्चे. जितने मासूम ये बच्चे है उतने ही अनुशाषित भी. इस युथ सेण्टर की शुरुआत की फ्रेंड्स ऑफ़ ओरछा की आशा डिसूज़ा ने जो अल्मोड़ा,उत्तराखंड की निवासी है. जहा युथ सेन्टर की शुरुआत इन्होंने की उसे सँभालते ओरछा के होम स्टे के होस्ट के बच्चे है. आशा डिसूज़ा महीने में एक बार आकर नए नए गेम्स लाकर देती है और बच्चो को सिखाकर भी जाती है. उसके अलावा युथ सेन्टर में योगदान रहता है होम स्टे में रुके हुए मेहमानों का जो दुनियाभर से आते है और इन्हें कुछ नया सीखा जाते है.

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युथ सेंन्टर खुलने का निर्धारित समय है दोपहर के ३ से ४ जिसमे करीब २० से २५ बच्चो के नाम रजिस्टर्ड है. इसे खोलने की जिम्मेदारी किसी टीचर मेंटर या गाइड की नहीं तो युथ सेन्टर की ही एक बच्ची खुशि जो ५ वि कक्षा में पढ़ती है उसे दी गयी है. गुरुवार जो की छुट्टी का दिन निर्धारित है उस दिन छोड़कर बाकि दिन अपने समय पर ये युथ सेन्टर खोल दिया जाता है. बिना अपनी ख़ुशी दीदी से परमिशन लिए ये बच्चे अंदर नहीं आते, अंदर आते ही गुड आफ्टरनून विश करते है .ये है सारे हमउम्र ही पर उस एक घंटे के लिए ख़ुशी दीदी उनकी टीचर बन जाती है जिसे वे बिना किसी जबरदस्ती और कोई न देख रहा हो तो भी आदर देना जानते है. अंदर आकर बिना कोई शोर किये बच्चे अपने लिए गेम्स सेलेक्ट करते है. गेम्स भी ऐसे जो उन्हें कुछ सिखाये जैसे मास्टरमाइंड पजल फिर कुछ देर इंग्लिश सीखते है और थोड़े आउटडोर गेम जैसे फोर बॉक्स और हर संडे ड्राइंग.

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Spider Man Puzzle जिसमे थोड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन मेरा भी है 😉

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और काऊ की हैडलाइन पर ड्राइंग फ्लैग की

जहा उनका अनुशाषण ईमानदारी देखकर मैं अचम्भे में थी उतनी ही हैरानियत हुई उनकी बाते सुनकर.जब मैंने उनसे उनके सपनो के बारे में पूछा तो जवाब मिले पेंटर,नेवी,आर्मी,कलेक्टर और जो मेरा फेवरेट जवाब था मुझे ना पैसे कमाकर अमेरिका अफ्रीका घूमना है दुनिया देखनी है :). और फिर जब बात चली की स्कूल में पढाई के अलावा आप लोग और किन एक्टिविटीज में भाग लेते हो तो एक जवाब आया मैडम मुझे न डांस करना बोहोत पसंद  है और इस बार २६ जनवरी को पार्टिसिपेट भी करना था. पर ड्रेस लेने के लिए पापा के पास पैसे नहीं थे तो मैं नहीं कर पाया. इस पर मैं कुछ बोलू उसके पेह्ले ख़ुशी और बाकि बच्चो ने ही बोलना चालू कर दिया. अरे तो हर बार जरूरी थोड़ी है की नयी ड्रेस ली जाये अपने दोस्तों से भी तो ली जा सकती है. मुझे भी “बुमरो बुमरो” डांस में ड्रेस की जरुरत पड़ी थी तब मैंने अपने दीदी से ड्रेस ले लिया था. और पैसे हम भी तो बचा सकते है,अगर कोई रिश्तेदार या हमारे घर आये  मेहमान पैसे देकर जाते है तो जमा करके रखना चाहिये. फिर जब कभी जरुरत पड़े तो उसी में से निकाल सकते है. अगर कभी मम्मी पापा को पैसो को लेकर टेंशन हो तो उन्हें भी मदद कर सकते है,बिना ये सोचे की ये बस हमारे पैसे है. मैंने १३०० रूपए जमा कर लिए थे उसमे से ५०० की मैंने ड्रेस खरीद ली अपने लिए और ८०० अभी भी बाकि है,तुम भी ऐसे कर सकते हो.

इन बच्चो की समझदारी बस इतनी ही नहीं तो जहा आधी दुनिया धर्म के नाम पर लड़ती है वही ये सभी धर्म का आदर भी करना जानते है. बाहर खेलते खेलते किसीने “अल्लाह हु अकबर ” बड़ी ही मस्ती में गाना शुरू किया और उसी मस्ती में सारे बच्चे वैसे ही गाने लगे.2 ही सेकंड हुए होंगे की सब रुक गए और खुद ही सबने  सॉरी बोल दिया ये कहकर की “ये किसीके धर्म का गाना है उसका मजाक  नहीं उड़ाना चाहिए अगली बार हम ऐसा नहीं करेंगे”. खेलने के बाद इनका समय ख़तम होता है अटेंडेंस के बाद ही.

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Four Square

फक्र हो रहा था इन बच्चो से मिलकर। जहां शहर के बच्चो को देखकर हमेशा एक सोच में पढ़ जाती हु की कहा खो गया है इनका बचपन, वही उस छोटे से गाँव के कुछ बच्चो को देखकर फिर बच्चा बन जाने की इच्छा जाग उठी. ख़ुशी हो रही थी ये देखकर की आज भी ऐसा बचपन कही जिन्दा है. युथ सेन्टर पर जाकर मेरी कोशिश चालू थी की इन्हें कुछ नया सिखाकर जाऊ. पर हुआ कुछ उल्टा दो दिन के उस एक एक घंटे ने मुझे  ही बोहोत कुछ सीखा दिया. उन छोटे बच्चो को देखकर लगा था इन्हें कुछ समझदारी की बाते सिखाकर जाउंगी पर मेरी समझदारी की बाते जाहा किताबो से निकालकर आयी होती वही उनकी समझदारी जिंदगी को जीकर आ रही थी.इसलिए निदा फाजली कहेते है की

घटाओ में निकलो धुप में नहाकर देखो

ज़िन्दगी क्या है किताबो को हटाकर देखो

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बच्चो की गैंग

अगर कभी ओरछा जाये तो अपना कुछ समय इस युथ सेन्टर में जरूर बिताये.उन बच्चो के लिए नहीं तो अपने लिए,कुछ नया जरूर सीखकर आएंगे.

पेहली मुलाकात

Happiness is when you are struggling to find a hotel to stay in an unknown city as they are skeptical of a girl travelling alone on her scooty and suddenly enters a Hero :p

तो ये कहानी है पटनीटॉप की. पोहोच तो गयी थी मैं पटनीटॉप अब परेशानी हो रही थी रहने की.२ होटल  में पूछ चुकी थी पर अकेली लड़की स्कूटी पे इतना दूर ५० सवाल और थोड़ा शक, होना भी जायज़ था लोगो पे विश्वास वैसे ही कम करते है आजकल हम और फिर एरिया जम्मू कश्मीर का. होशियारपुर से पटनीटॉप का सफर भी कुछ मिला जुला सा ही था कुछ अच्छा कुछ बुरा और अब फिर होटल के लिए मेहनत.निराश होकर एक होटल के निचे खड़ी ही थी तभी ४ रॉयल एनफील्ड गुजरी और उसमे से आखरी रॉयल एनफील्ड थोड़ा आगे जाकर रुकी राइडर ने हेलमेट का गिलास ऊपर किया और आवाज़ दि “ओये Snehal इधर आ” बाइक के पास जाकर देखा Vishal  there he was लाइफ में इतनी ख़ुशी कभी किसी और से मिलकर नहीं हुई थी जितनी उस दिन हुई वह भी पहली मुलाकात मे.हम दोस्त बने FB से राइडिंग के कॉमन पैशन की वजह से. Vishal मुम्बई से और मैं नागपुर से , नागपुर तो लोग कम ही आते है तो हमारा तय हुआ था की अगर कभी मैं  मुम्बई या फिर पुणे भी आयी तो हम मिलेंगे पर ये तीनो शहर छोड़कर हम मिले पटनीटॉप मे एक अनजान शहर मे.मिले और उसके बाद तो टेंशन की बात ही नहीं “चल तू हमारे साथ रहेगी हम ये होटल मे रुके है “. दुनिया बोहोत छोटी है और जब मुझपे मुसीबत आती है तो शायद और थोड़ी छोटी हो जाती है ;p.

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नमकीन चाय मीठी याद

करगिल बॉर्डर से थोड़ा आगे हुंडरमान गाँव, जो पाकिस्तान से 1971 वॉर में हमारे पास आ गया था. उसी से थोड़ा ऊपर सेना चौकी के बाद एक छोटी बस्ती उन लोगो की जो लड़ाई के बाद भारत में ही रह गए. वहां जाने की इजाज़त हर किसीको तो नहीं है जैसा कि आर्मी जवान ने मुझे बताया पर महाराष्ट्र की गाडी होने का मुझे थोड़ा फायदा मिला और बस्ती में जाने मिल गया.

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Hunderman Village

चेक पोस्ट के थोड़ा आगे पहुँचते ही एक कार को टेककर रास्ते के किनारे दो लोग बैठे हुए दिखे. एक कुछ ९० साल के बुजुर्ग और एक अंकल.मैंने गाडी रोकी पूछने के लिए कि “और आगे जा सकते है ना“, बड़े मुस्कुराते हुए उन्होंने जवाब दिया “हा हा देख आओ आगे“.देखने के लिए तो कुछ था नहीं पर कुछ अलग ख़ुशी मिल रही थी. कुछ बच्चे भी दौड़ते हुए आये मिलने के लिए तो और अच्छा लग रहा था. नाम के अलावा बात उन्होंने कुछ की नहीं,थोड़ी  देर उनके साथ समय बिताकर मैंने वापसी की तैयारी की .वापसी में वो दोनों वही बैठे दिखे .गाडी काफी धीमी गति में थी तो आवाज़ देकर पूछ लिया “देख आये बेटा”. मैंने जवाब दिया हा अंकल. फिर थोड़ी पूछताछ आप कहा से आये हो, अकेले आये हो वो भी स्कूटी पे. जवाब दिए उनके सवालो के और फिर अगला सवाल चाय पिओगे बेटा, जवाब हा ही था. अंकल दौड़कर घर गए,घर थोड़ी उचाई पे था और  बस चाय ही नहीं तो साथ रोटी भी लेकर आये. मुझे बैठने के लिए एक पत्थर दिया और बस बैठ गए हम गप्पे मारने. सबसे पहले तो वो मुझे चाय के बारे में बताने लगे. नमकीन चाय पीते है हम यहाँ .ठण्ड में ये चाय काफी मदद करती है और एसिडिटी की प्रॉब्लम भी नहीं करती और भी अलग अलग फायदे.  रंग देखकर ही मुझे कुछ अजीब सा लग रहा था पर पीनी तो थी ही.जैसे  ही एक घुट पि आगे पिने की इच्छा ख़तम  सी हो गयी थी पर वो मुमकिन नहीं था की किसीका दिल तोडा जाये. होटल होता तो चाय वही छोड़कर चली जाती पर यहाँ तो मेहमाननवाज़ी थी. चाय के साथ वो रोटी खाने के लिए भी बोलने लगे “कुछ खाया नहीं होगा आपने , भूक लगी होगी आपको,दूर से सफर करके आ रहे हो , थोड़ी खा लो” .पर हाथो में पेट्रोल लगे होने की वजह से रोटी नहीं खा सकती थी .जब तक मैं चाय पीती एक और अंकल आ गए और उनके साथ उनका बेटा. अब हम ३ से ५ हो गए थे .वो अंकल के भी वही सवाल अकेले आये हो इतनी दूर से वो भी स्कूटी से. जब सारे जवाब हा में मिले तो वो कहते है “आप पढ़े लिखे हो ना बेटा  इसलिए ये हिम्मत कर पाए हमारी बच्चिया तो नहीं कर पायेगी. कारगिल से ऊपर आने में ही डर जाती है“.कितनी बड़ी बात कह दी थी उन्होंने। वह पढ़े लिखे ना होते हुए भी पढाई के महत्त्व को समझ पा रहे थे. वह कहते है ना की किसी चीज़ की कीमत उसके खोने के बाद ही होती है.

पढ़ने के काफी फायदे होते है हम तो नहीं पढ़ पाए.स्कूल आधे समय बंद रहती थी हमारी और आधे समय टीचर नहीं, छोड़ दी हमने पढाई. अब बनी है थोड़ी अच्छी स्कूल,8th क्लास तक है पर, टीचर कभी आते है कभी नहीं.उनकी बातो के साथ चाय धीरे धीरे चल रही थी फिर भी आधी ही हो पायी थी और ये मुझे पता था अगर ऐसे एक एक घुट लेकर चाय पि गयी तो आज ना ख़तम होनी. तो उठाया गिलास और पि ली एक साथ. चाय पीकर कैसा लगा बोहोत गन्दा क्योंकि इसके पहले कभी नहीं पि थी. सच कहा जाये तो अगर मैं किसी और जगह बैठी होती तो उलटी कर देती पर याहा मेरे दिल, दिमाग, तन, मन का भी शुक्रिया की जिस प्यार से एक अनजान के लिए वो चाय और रोटी लाये थे उस प्यार की लाज रख ली. अगर वो उस समय एक और गिलास चाय लाकर रख देते तो शायद उनके मुस्कुराते चेहरे के लिए वो भी पि जाती.चाय ख़तम हुई पर हमारी बाते नहीं भारत पाकिस्तान के किस्से, यादे.गाँव में रहकर जो वो काम करते है उसकी बाते,छोटे छोटे खेत और ज़िन्दगी.

बाते और भी होती पर अँधेरा होने से पहले गेस्ट हाउस पहुंचना था. तो अलविदा कहकर निकल पड़ी उनकी दुवाओ  और कुछ सवाल के साथ.जो सबसे बड़ा सवाल मन में आया, वो ये  की कुछ लोग है जो चाह कर भी पढ़ नहीं पा रहे और कुछ हम जैसे खुदको एडुकेटेड कहने वाले लोग क्या इसका सही इस्तेमाल कर रहे है.

सुचना  चाय बुरी इसलिए नहीं लगी की बुरी बानी थी चाय बुरी इसलये लगी की कभी पहले पि ही नहीं थी

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Namkin Chai

The Magic Moment

Do I believe in magic?.Dint really until that striking moment which took away all my fears and made me believe “Yes I can do it”. I feel such moments come daily in our lives,somehow we ignore it in our bhagti daudti tension wali daily life with many different roles to play. Travelling helps me experience those moments and appreciate the beauty of life. I was lucky to have one such experience on my very first solo ride to the unexplored gem Bhaisaghat.Bhaisaghat is on Jabalpur Damoh State Highway,bifurcating from the small town of Singrampur, if travelling by own vehicle one will never regret a short detour to the beauty which Bhaisaghat holds.The excellent road with greenery on both sides and the mountain range full of twist and turns is beautiful.Instead of me describing the place lets catch the glimpse of itIMAG1024

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After crossing this impressive road I reached the 1st tourist point Nidan Waterfall check point where you need to buy a entry ticket. Sounds easy and simple way to get in ohh wait not for a single girl,I prefer less crowded places but it has its problems and disadvanatges.It was time to test my convincing skills on two guards at check point

Me-Uncle Nidan Waterfall

Guards- Yehi hai.kaha jana hai apko?

Me-Uncle fall dekhne

Guards– kitne log hai aapke sath?

Me-Akeli

Guards-madam fir toh nahi jane de sakte aapko

Me-uncle kyu

Guards– akele permission hi nahi hai upar se aap ladki ho kuch ho gaya toh hamari jawabdari ho jayegi,naukri chali jayegi

Me-Uncle kuch nahi hoga main dhyan rakhungi,Nagpur se,itni dur se akele aayi hu bas ye fall dekhne bina dekhe kaise jau

Guards : with the surprise look,akele aye ho aap is gadi pe.Par nahi jane de sakte hum aapko. Abhi abhi kuch ladke gaye hai niche pani me pata nahi kaise honge pike honge,hum nahi jane de sakte

Me- (No offence boys,but sometimes you really are a problem :p) some more convincing,uncle waste ho jayega itna dur aana please bas thode der ke liye,kuch nahi hoga main dhyan rakhungi aapki naukri nahi jayegi

Guards :Discussion time between them  and finally- ok hum aapko jane denge par bas pas me ek viewpoint hai jaha se fall dikhta hai wahi tak. Aap niche pani me nahi jaoge aur bas 15 min ,15 mins me aap nahi aaye toh hume aapko dhndte huye aana padega.

And one guard came to drop me to that place.

IMG_9031                                         Waterfall from the view point

Desperately wanted to go down to the point from where water was coming but had promised to get back in 15 min.So time to go back,no not really :).I was about to start my bike and the magic moment happened I saw a traveller bus stopping at the view point and to my surprise 12 Nuns age group between 25 to 82 got down from the traveller. I was astonished,happy,excited (Your wish is my command moment).I knew this is my chance to go down with them,sit near the water and enjoy the beauty .

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That was the moment when I realised there is some energy watching you,listening you,protecting you earlier also there were moments when my wish got fulfilled but the energy which I was introduced to by nature at that moment was different. It felt like someone is saying you follow your dream I am there with you,keep your fears aside just believe in yourself.Even today when I go riding on Highways all alone this energy keeps me going not letting me get scared.I guess this also answers the most important question everyone ask “Dont you feel scared”

Time to move to the 2nd point Nazara view point and again to my surprise when I got back to check point and asked for this point eventhough this place was more secluded and interior than waterfall they allowed me saying “jaiye madam dekh aaiye aap nahi daroge bas kahi dikkat lage toh laut aana aur mera no rakh lo jarurat pade toh call kar lena” 🙂

IMG_9062                                          Road to Nazara view point

 

IMAG1026                                                 View from Ghat

This was My Magic Moment.How about you?Whats yours or are you still ignoring it in daily chaos.

 

And The Journey Starts

10 days

3400 kms

Nagpur-Nirmal-Hyderabad-Bangalore-Chitradurga-Goa-Pune-Nagpur

Solo rider & a TVS Wego

It was 18th of December 2015,the day full of mixed emotions for me  ,the day of doubts ,excitement and a bit of reluctance. The day when my love for travelling and exploring overpowered my urge to stay with my brother, who had come all the way from Pune to meet me.Many felt ,how  could I cover so much distance and that too on a moped . I wanted to break those shackles created by our very own society about a single girl travelling on a moped with very limited resources.I am glad I did that.The entire experience was so enriching that I decided to write.The journey was indeed soul enriching. Here’s my experience straight from the heart!

18th dec- Day 1- 6.30 am the journey begins from Nagpur.First destination decided was Hyderabad.476 kms from Nagpur woh alag baat hai ki humne pehle hi din 550 kms chala liya.This was  my first time to embark on such a long journey.The first two hours of my journey went by feeling sleepy and dan in awe with the beautiful sunrise, it was an everyday sunrise because I travel the same route by bus to go to my office but the charm was multifold today.After the 2 hrs I took a  breakfast break in Jamb 65 kms from nagpur ,yes, I rode only 65 kms in 2 hrs.I believe in riding slow but this slow scared me,Hyderabad was real far.I entered the famous Ashok Hotel of Jamb, after placing order for the breakfast and doing some mental calculation of the distance and speed to reach Hyderabad by 6 pm, sipping a hot cup of chai ,I put on my headphones listened to matargashti ..I jus love DAT song did some matargashti myself oblivious to the people. After the not so satisfactory breakfast I hit the road again with determination.

Till Hinganghat the roads are  in very good condition 4 lane,smooth ride but after that till Adilabad its mostly single lane because of the on going construction and thanks to our previous  contractors who started the job dint complete it but on the other hand it got  delayed.Once you cross Maharashtra border the road gets better and again 4 lane.

After crossing Jamb rode continuously till Adilabad with only 15 mins break and 1 stop for petrol refill.

After Adilabad I started seeing the sign board of Nirmal where my Dada Bhabhi stay . I got excited that wow after inviting me so many times to come to their place I will be finally visiting them as I thought the town is on the highway but nope you need to take a small detour to visit Nirmal where it says Hyderabad 226 straight and Nirmal 22kms to right.But then whats the fun of riding a bike if we dont get the freedom of doing what we want to so the decision was made and simultaneously a surprise call was made “Bhabhi in 15 mins I will be home”.The road to Nirmal is good and the point from where Ghat starts the view is astonishing one can see 7 small rivers from there (I dont have any picture as I thought will click in return but took another route and not everything needs evidence,right). It was exciting to meet someone familiar in a completely new city and I got to eat awesome biryani with Bhabhi to make up to the boring breakfast while her dental patient is still waiting with half the treatment done and half remaining :p .Thanks to the patient or the lunch would not have been possible.

It was 3 pm and I bid adieu to Nirmal.

Hyderabad 222 kms,3 pm my heart was racing as i had never rode at night on highways was a bit apprehensive too but the best part is they have so many villages enroute so problems can be handled .After continuous journey of 4 hrs reached hyderabad but not the end of the story abhi toh bas city enter kiye ho destination nahi pohoche(Welcome to the Big City) and so the journey continued till 8.45pm.What I liked the most was it was so easy to reach the destination as people were so helpful and clear about the directions .”People were helpful” might sound strange to many but its true, whenever I travel alone people cared more and were more helpful it felt like its their responsibility to keep me safe.So with all the help on direction (Ya I dint use GPS,not very techsavy) 8.45 pm I reached Hotel Palazzo a very nice place to stay and again it was time for another surprise call to one of my friends the rockstar and actress  staying in Hyderabad.My friend was suppose to pick me up from a mall near to my hotel so I thought to take walk to the malI, I love to take walk in new cities as I feel I get to know that city more and you become part of that city. So when I planned to walk till the mall to my surprise the watchman walked with me till the end of the hotel lane as it was dark (I told you people are more helpful).So I reach mall and It was time to first get shocked to see your  friend in a Saree😝,then relive all the hostel memories,gossip and obviously much required selfie😊 the time was made more memorable by the  joining of anothet stylish star her husband,ek hi raat me do do star😊.And even after the tiring ride of 550 kms the chat continued till 1.30 am. This is the best thing I love while travelling meeting old and new people enroute creating new bonds surprising them listening to their stories creating new stories.

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So with all the Happiness in the heart and khatte mithe experiences it was time to doze off to start again next day for some more new experiences.